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  • अभिनव प्रयास : उत्तरप्रदेश के झाँसी जिले के ब्लाक बामौर के एक वर्षीय बच्चे के चेहरे की सर्जरी

    आज हम एक ऐसे परिदृश्य को दर्शाना चाहते हें जो प्रकृति द्वारा संरचित चित्रण के मूल रूप को परिवर्तित करता है। यह ग्राम धनोरा के असहाय निर्धन परिवार में जन्मे 1 बर्षीय बालक की कहानी है जिसका जन्म रात्रि के ऐसे नक्षत्र में हुआ जो उस पूरे परिवार की दिशा और दशा को विगाड़ देता है। 

    दोनों वक्त के भरण पोषण के लिए एक वक्त का खाना पैदा करने वाले व किसी दिन आधा पेट भरकर सो जाने वाले व्यक्ति दुर्गा प्रसाद अपने बेटे हिमांशु को लेकर बहुत उत्साहित थे और जब हिमांशू ने जन्म लिया तो उसके माता पिता उसको देख कर आश्चर्यचकित रह गए और मन ही मन भगवान से कहने लगे की किस जन्म का पाप किया था। आने जाने वालों की बधाई में भी एक उपहास, कभी कटाक्ष कभी भय सा दिख रहा था क्योंकि हिमांशु का होठ जन्म से कटा होने के कारण उसकी शक्ल विकृत दिखाई दे रही थी कोई इसको कुछ कह रहा था कोई कुछ, लेकिन था तो दुर्गाप्रसाद और उसकी पत्नी का अंश ही। सो बस मन मसोस कर रह गए।

    बच्चा दो माह का हो गया और माता पिता उसको देख देखकर और भविष्य की सोचकर बहुत परेशान थे फिर एक दिन RBSK की टीम धनोरा आगनवाड़ी स्वास्थ्य परीक्षण करने पहुची टीम की डॉ स्वाति श्रीवास्तव और संगीता बच्चों का परीक्षण कर रहे थे टीम के दूसरे सदस्य डॉ गोविन्द श्रीवास्तव आगनवाड़ी और आशा से बात कर के पूछ रहे ऐसे कोई बच्चा जो जन्म जात बीमारी से ग्रसित हो, काफी समझाने के बाद आगनवाड़ी ने बताया एक बच्चा है ऐसी बीमारी का जो जन्म से कटे होंठ का है। बुलवाये जाने पर आगनवाड़ी दुर्गाप्रसाद को बुलाकर लाई और उसके साथ गांव के कई लोग आ गए।

    टीम ने हिमांशू के कटे होठ की सर्जरी के बारे में बताना शुरू किया तो कई लोग हाँ कह रहे थे की सरकार की योजना तो ठीक है तो कई लोग वहीँ उसको गुमराह कर रहे थे कि वो ठीक है अपने आप सही हो जायगा टीम सभी की जिज्ञासा शांत करने की कोशिश कर रही थी वहीँ दुर्गाप्रसाद विचलित हो रहा था एक तरफ बच्चे का भविष्य दिख रहा था दूसरी तरफ वह अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में सोच रहा था बहुत सोचकर दुर्गाप्रसाद बोला हमारे बच्चे को कोई परेशानी तो नही होगी मैं बहुत गरीब आदमी हूँ टीम उसको पूरी सांत्वना और प्रक्रिया बताकर वापस आ गयी।

    वापस आकर डॉ गोविन्द ने फोन पर जिला कार्यक्रम प्रबंधक श्री ऋषिराज और DEIC डॉ रामबाबू को बच्चे के विषय में जानकारी दी, डॉ गोविन्द पूर्ण विश्वास में थे क्योंकि जनपदीय प्रबंधन ऐसे कुछ केस और सर्जरी के लिए प्रयास रत थे और भागदौड़ में लगे थे। डॉ रामबाबू ने चिकित्सक से वार्ता कर निर्धारित तिथि पर बच्चे को चेकअप के लिए मेडिकल कॉलेज लाने के लिए कहा। बामौर से मेडिकल कॉलेज की दूरी लगभग 100 km देखते हुए जिला कार्यक्रम प्रबंधक द्वारा RBSK वाहन से ही दुर्गाप्रसाद को लाने की सलाह दी गयी क्योंकि चेकअप आदि में समय को देखते हुए कहीं दुर्गाप्रसाद निराश न हो जाये।

    तय दिन पर सुबह 7 बजे ही दुर्गाप्रसाद बामौर स्वास्थ्य केंद्र पर आ गया था। मेडिकल कॉलेज झाँसी में डॉ को दिखाया और बार्ड में भर्ती करने को बोला हिमांशू को वार्ड में भर्ती कराया फिर अगले दिन उसकी जाँच टीम की सदस्यों डॉ स्वाति और डॉ नेहा दुबे ने भागदौड़ करके पूरी करवा दी। जाँच में बच्चे का हिमिग्लोबिन कम होने के कारण कुछ दिन के लिए रोक दिया डॉ ने सलाह दी हीमोग्लोबिन सामान्य आने पर ही आप्रेशन किया जगया कुछ दवा लेकर दुर्गाप्रसाद अपने बच्चे हिमांशू को लेकर वापस गाँव आ गया।

    इस बीच टीम फोन पर ही फालोअप कर रही थी धीरे धीरे दुर्गाप्रसाद भी निराश होता जा रहा था उसको लग रहा था उसका काम कागज़ों तक ही सिमट कर रह गया। स्थिति को समझते हुए डॉ गोविन्द श्रीवास्तव सीधे फिर धनोरा गाँव पंहुचे तो बच्चे की माँ बोली आप ने साहब कहा था की उसका आप्रेशन हो जायगा लेकिन सिर्फ इतने दिन बस जांच करवाकर कुछ नहीं हुआ हम मेहनत मजदूरी वाले लोग रोज रोज कब तक चक्कर लगाते फिरे? फिर समझाया गया कि बच्चे में खून की कमी को देखते हुए अभी ऑपरेशन संभव नहीं है कुछ महीनो में सामान्य आने पर आपरेशन कर दिया जायगा बच्चे को अपने पास से ताकत की सीरप और अच्छी खिलाई पिलाई करने की सलाह देते हुए फिर से समझा बुझा कर डॉ गोविन्द वापस आ गए।

    फिर कुछ महीने बाद बच्चे बामौर अस्पताल बुलाया और उसका हीमोग्लोबिन जांच बामौर अस्पताल में ही करा लिया अब उसका हीमोग्लोबिन सामान्य था जिसकी सूचना डॉ रामबाबू को दी गयी। इतने लंबे समय को देखते हुए स्माइल ट्रेन लखनऊ में बात की गयी सहमति मिलते ही अगले ही दिन डॉ गोविन्द श्रीवास्तव को कानपूर स्माइल ट्रेन में उसका ओप्रेशन कराने को कहा गया लेकिन परिस्थिति विकट हो चुकी थी दुर्गाप्रसाद गाँव वालो के कटाक्ष सुन सुन कर पक चुका था जो उसको रोज ताने दे रहे थे क्यों हुआ कुछ सरकारी काम?

    टीम ने जैसे ही दुर्गाप्रसाद से चलने की बात कही वो बोला नही साहब एक बार गये थे खून कम था अबकी बार फिर डॉ मना कर दिया तो गांव वाले बहुत मज़ाक उड़ाएंगे। टीम के समझाने पर अंत में कानपूर स्माइल ट्रेन जाने को राजी हुआ।कानपुर स्माइल ट्रेन में डॉ को दिखाया और उसको भर्ती कराया और उसकी जाँच कराई सब सामान्य थी अगले दिन उसका ओप्रेशन था आखिरकार हिमांशु को ऑपरेशन के लिए OT में भेजा गया और कुछ घंटे बाद हिमांशू बार्ड में आ गया उसको देख कर उसकी माँ की आँखो में आँसू आ गए और दुर्गाप्रसाद के तो बोल ही नही निकल रहे थे वो तो बस पट्टी खोलकर अपने बच्चे का चेहरा जल्दी से जल्दी देखना चाह रहा था।

    जब दुर्गाप्रसाद अपने बच्चे हिमांशू को लेकर गाँव धनोरा पहुच गया गांव के लोग हिमांशू को सब देखने आ गए। दुर्गाप्रसाद अपने बच्चे को लेकर बहुत खुश था सरकार की योजना और टीम की पहल की सराहना हो रही थी। अब कुछ महीने बीत जाने अब हिमांशू पहले जैसा नही रहा अब वो सामान्य बच्चों की तरह उसका होंठ हो चुका है हिमांशू की माँ कहती हैं साहब आप न होते हम तो अपने बच्चे का कुछ नही करवा पाते आप की वजह से हमारा बच्चा बाकी बच्चों की तरह दिखने लगा है। हमारी टीम काफी खुश है हमें अच्छा लग रहा है गाँव के लोगो ने सरकार द्वारा चल रही योजनाओ की सराहना कर रहे हैं।

    हम अपने को गर्वान्वित महसूस करते हैं हम ऐसे एक अभिनव प्रयास के अंग है जो बच्चों के जीवन में खुशियाँ देता है और उनके माँ बाप के चेहरे पर मुस्कान!

    About Author:

    डॉ गोविन्द श्रीवास्तव 
    फिजियोथिरेपिस्ट RBSK
    ब्लाक बामौर, झांसी

  • अभिनव प्रयास, झांसी : जब हम जीत कर भी हार गए और 11 वर्ष की बच्ची छाया को बचा नहीं पाए

    अभिनव प्रयास, झांसी : जब हम जीत कर भी हार गए और 11 वर्ष की बच्ची छाया को बचा नहीं पाए

    उ.प्र. राज्य के जनपद झाँसी के एक ग्राम के प्राथमिक स्कूल में पढ़ने वाली छात्रा स्व. कु. छाया की करुणामय दास्तान।

    सरकारी स्कूल के बाहर एक बरगद के पेड़ के नीचे बने बड़े से चौक पर खुद को मई की तपती धूप से बचाते हुए एक कोने में घुटनों को पेट की तरफ़ मोडे हुए गठरी बनी एक हाड़ माँस की काया लम्बी लम्बी साँसें लेते हुए जाने एक टक आसमान की तरफ़ क्या निहार रही थी। इसी समय स्कूल की तरफ़ आती हुयी एक चार पहिया गाड़ी को देखकर बाहर खेल रहे बच्चे शोर मचाने लगे जिससे घबराकर चौक पे लेती वो लड़की वहाँ से लड़खड़ाती हुई धीरे धीरे आगे कहीँ चली गयी। गाड़ी से राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की टीम ने उतर कर स्कूल के आसपास के वातावरण का जायेजा लिया और फ़िर आसपास खेल रहे बच्चो को स्कूल चलने के लिये बोले। टीम द्वारा आज स्कूल में तय तिथि परबच्चो का स्वास्थ्य परीक्षण होना है ।

    एक एक करके सभी बच्चो का लम्बाई वजन/सामान्य जाँच/आँखो एवं दाँतों की जाँच डा० ऋषि राज एवं डा० ब्रिषालि यादव द्वारा की जा रही थी। टीम के अन्य सदस्य डा० हैदर एवं टीना शर्मा द्वारा बच्चो एवं स्कूल स्टाफ को स्वास्थ्य एवं स्वच्छता से सम्बन्धित जानकारी दी जा रही थी। इसी बीच वहाँ मौजूद शिक्षिका श्रीमती सुमन ने एक बच्ची की बीमारी के बारे में बताया जो अपनी बीमारी के कारण स्कूल नहीँ आ रही थी। टीम ने तुरंत उस बच्ची को और उसके अभिभावकों को स्कूल बुलवाया।

    यह वही बच्ची थी जो कुछ देर पहले गठरी बनी पेड़ की छाया में लेटी थी। उसके साथ उसकी दादी आयी थी। खामोश खड़ी हुई बच्ची ने उसका नाम पूछे जाने पर एक बार अपनी दादी की तरफ़ देखते हुए घबराते हुए अपना नाम छाया बताया।

    डा. ब्रिषालि द्वारा उसको प्यार से बहला कर उसकी जाँच करने पर पता चला की छाया तो खून की कमी के साथ साथ साँस लेने में दिक्कत है और वह बहुत कुपोषित अवस्था में है। दो कदम भी चलना उसके लिये दूभर है। 11 साल की बच्ची छाया को तत्काल मेडिकल कालेज संदर्भित किये जाने की बात पर उसकी दादी ने मायूसी जतायी और जाने से मना कर दिया।

    टीम द्वारा कारण पूछे जाने पर दादी ने बताया के छाया की माँ नहीँ है। बाप मज़दूरी पर जाता है। एक बहन है बड़ी तो वह नानी के घर पर रहती है। इसलिये छाया को अगर भर्ती करायेंगे तो कौन उसकी देखभाल करेगा। टीम द्वारा और स्कूल के शिक्षिका द्वारा समझाये जाने पर छाया की दादी अगले दिन छाया को मेडिकल लाने को राजी हो गयी।

    टीम द्वारा गाँव के लोगो से पूछ ताछ के दौरान पता चला कि छाया के पैदा होने के छः माह बाद ही उसकी माँ ने फाँसी लगा के आत्महत्या कर ली थी। कोई कहता है दो बेटियों को जन्म देने के कारण लोगो के ताने सुनते सुनते तंग आ गयी थी तो कुछ का कहना था के छाया के पिता के ऊपर कर्ज़ बहुत था और वह शराब भी बहुत पीता था जिसके चलते आये दिन बकायेदार दरवाजे पे आकर गाली गलौज करते थे और वोह खुद शराब के नशे में सारा गुस्सा छाया की माँ पर उतार देता था। मज़दूरी से ना ही तो घर का कुछ हला भला हो रहा था ना ही बच्चीया ढंग से पल पा रही थी। इन्ही सब बातों से तंग आकर छाया की माँ ने फाँसी लगा ली थी।

    अगले दिन छाया मेडिकल कालेज अपनी दादी के साथ आयी जहाँ आर बी एस के टीम से डा० ब्रिषालि और डा० हैदर ने उनको एमर्जेन्सी में भर्ती कराया। छाया की जांचों की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी।  हीमोग्लोबीन मात्र 3% होने के कारण छाया को तुरंत खून चढ़ना था किन्तु छाया के साथ सिर्फ़ उसकी दादी थी जो अधिक उम्र के कारण रक्तदान नहीँ कर सकती थी। छाया और उसकी दादी टकटकी लगाये एक दूसरे को देखते तो कभी हसरत भरी निगाहों से दोनों डाक्टरों की तरफ़ देखते।

    ईश्वर के इशारे को समझते हुये आर बी एस के टीम के डा० हैदर ने तुरंत एक यूनिट रक्तदान करने का फैसला किया और उसी दिन छाया को एक यूनिट रक्त उपलब्ध हो गया। अगले दिन छाया की हालत में सुधार था मगर आज भी उसे और खून की ज़रूरत थी। इस बार फ़िर ईश्वर के इशारे को समझते हुए आर बी एस के टीम के श्री शिव कुमार पटेल ने एक यूनिट रक्तदान किया और इस तरह छाया को दो यूनिट रक्त चढ़ाया गया। तीसरे दिन छाया की हालत सुधरने पर उसे एमर्जेन्सी से वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया।

    बेहतरीन चिकित्सा सेवा के चलते 6 दिन बाद छाया अब काफी बेहतर मेहसूस कर रही थी। वह अब बिना थके चल रही थी और उसकी साँस भी सामान्य थी। हीमोग्लोबीन भी आश्चर्जनक रूप से 6 दिन में 8% हो गया था। छाया की दादी और छाया आर बी एस के टीम को धन्यवाद दे रहे थे और आर बी एस के टीम ईश्वर का धन्यवाद दे रही थी कि ईश्वर ने उन्हे इस पुनीत कार्य के लिये चुना।

    छाया ठीक होकर अपने घर चली गयी। डाक्टरों ने उसे आराम करने और अच्छी तरह से खाने पीने की सलाह देकर पंद्रह दिन बाद आने को बोला। पंद्रह दिन गुज़र जाने के बाद भी जब छाया नहीँ आयी तो आर बी एस के टीम के श्री पटेल उसके गाँव गये और उसका हाल चाल लिया। छाया के पिता और दादी सब बहुत खुश थे। गाँव वाले भी सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना की भूरि भूरि प्रशंसा कर रहे थे। गाँव वालो के इस आदर सत्कार से टीम का सीना गर्व चौड़ा हो गया और मन ही मन गर्व भी महसूस हो रहा था।

    कुछ दिन गुज़र गये मगर छाया दुबारा दिखाने नहीँ आयी। टीम द्वारा जब उसके पिता को फोन करके उसकी खैरियत पूछी गयी तो उधर से जो जवाब मिला उसे सुनकर सारी टीम के लोग स्तब्ध रह गये। छाया के पिता ने बताया के छाया इस दुनिया से चल बसी है वह अपनी माँ की गोद में चली गयी।

    समस्त टीम सदस्यों के लिये यह एक अफ़सोस का वक्त तो था मगर सब अंदर ही अंदर सोच रहे थे के आखिर चूक कहाँ हो गयी? छाया के जैसी जाने कितनी जिंदगियां ऐसे ही जानलेवा बीमारियों की भेंट चढ़ जाती है। भारत सरकार के इस स्वास्थ्य मिशन को हम सभी राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्येक्रम के टीम सदस्यों को साकार बनाना है ताकि फ़िर किसी की छाया ना छिन सके।

    हमारी पीड़ा:

    सुनने लिखने और पढ़ने में छोटी सी कहानी लेकिन कई सवाल कटाक्ष हम सभी पर….

    • क्या ज़िम्मेदार केवल स्वास्थ्य विभाग है बाकि पंचायतराज, और कुपोषण को समर्पित ICDS, बेसिक शिक्षा कोई नहीं??
    • एक बच्ची खून की कमी से ग्रसित थी क्या कर रहे थे बाकि विभाग के प्रतिनिधि??
    • क्या ज़िम्मेदारी सिर्फ विभागों की है वहां रह रहे अड़ोसी पडोसी किसी को नहीं दिखा जो वाह वाही करने आ गए और जब बच्ची मौत के मुंह में थी किसी को नहीं सूझा कम से कम उस टीम को ही फोन कर देते जो उसको मौत के मुंह से खींच कर लायी थी।
    • उसके बाप की तो क्या कहेँ शायद बिटिया तो बोझ होती है लेकिन दादी तुम भी तो स्त्री थी तुम क्यों न बोली और इंतज़ार किया उस बेबस निरीह बच्ची के मारने हाँ क़त्ल का , उस बच्ची के क़त्ल में तुम भी भागीदार हो और उन लोगो की भावनाओं के क़त्ल की भी जो अपने काम से बढ़कर उस बच्ची के लिए भागे जिनकी वो कुछ नहीं लगती थी।
    • वो मीडिया जो अगर उस बच्ची को कुछ अस्पताल में हुआ होता तो चीख चीख कर ढिंढोरा पीट रहा होता कि डॉक्टर की लापरवाही से मौत हुई, तुम्हारी नज़रे क्यों नहीं जाती उस सड़ती मरती मानवीयता पर जहाँ इतने बड़े गाँव में कोई प्रधान और पंचायत सदस्य बोलेरो और स्कार्पियो के आगे प्रधान लिखे घूमते है उन पर प्रश्नचिन्ह क्यों नहीं??

    सवाल बहुत हैं और बहुतों पर हैं हम दुःखी हैं लेकिन निराश बिलकुल नहीं, हमारा मिशन, हमारा अभिनव प्रयास इनके लिए ही है।

    हे प्रभु हमको इतनी शक्ति देना, सामर्थ्य देना, प्रेरणा देना,भाव देना कि हम अपने मार्ग पर अडिग रहे, सतत चलते रहें

    डा० शुजाअत हैदर जाफरी
    फिजियोथिरैपिस्ट
    आरबीएसके, झाँसी