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    पर्यटन : पछवादून, उत्तराखंड — Sanjay Jain

    Sanjay Jain

    शनिवार छुट्टी का दिन था। तीन दिनों से लगातार भारी बारिश ने घर में कैद किया हुआ था। दोपहर 1:00 बजे के करीब बारिश थोड़ी हल्की हुई नाश्ता भोजन सब हो चुका था सो स्कूटी निकाली और चल पड़ा भीगने के लिए भीगी हुई प्रकृति के रंगों को महसूस करने के लिए। तेज बारिश सीधी आंखों पर पड़ती है पर यह फुहारे थी, स्कूटी चलाने के लिए एकदम संतुलित मात्रा। जा पहुंचा घर से 2 किलोमीटर दूर जमना किनारे नाव घाट। भारी बारिश के बाद उफनती, इठलाती जमना नदी। बीच टापू पर कुछ बगुला भगत अपना शिकार कर रहे थे। कुछ देर बाद कुछ कोए भी इनकी दावत में शामिल हो गए। अब सब मिलकर शिकार करने लगे थे, कोई रंगभेद नहीं काले और सफेद का!!

    आस-पास के गांव वाले पानी में बह कर आई हुई लकड़ियों को ललचाई नजरों से देख रहे थे। लेकिन वहां पर पानी का बहाव बहुत तेज था वरना वह नदी में घुसकर लकड़िया निकाल लाते। नदी किनारे बिना प्लास्टर वाले मकान में दरारें उभर आई थी, उसे खाली किया जा रहा था। रात में ढहने की आशंका थ। बच्चे बूढ़े लड़कियां मर्द सब आ रहे थे उफनते दरिया को देखने के लिए। पहाड़ों पर से बादल भी नीचे उतर आए थे जमुना जी के पांव धोने के लिए। बच्चे नंबर प्लेट वाली साइकिल लेकर घूम रहे थे। हल्की बारिश जारी थी। लोग आ जा रहे थे। यहां से 5 किलोमीटर दूर डाकपत्थर बैराज की ओर चल पड़ा। विराज के पास गरमा गरम समोसे देख कर ठिठक गया। भीगने पर चाय और गरम समोसे ने मौसम का आनंद दुगना कर दिया। दोनों स्वाद बने हुए थे।

    बैराज पर किसी मेले की तरह का मंजर था। जमुना के उफान का नजारा लेने के लिए बच्चे औरत मर्द शहरी देहाती सब आए थे, बुर्के वाली भी थी और बेपर्दा भी हिंदू मुसलमान सब। प्रकृति सबको जोड़ देती है ना कोई रंगभेद करती है ना धर्म भेद। हर की पौड़ी गंगा पर शायद ही कोई मुस्लिम जाता हो, लेकिन यहां सब धर्म के लोग थे। सब के कैमरे निकले हुए थे,धड़ाधड़ सेल्फीयां!! जमुना के साथ फोटुएं!!! बैराज पर बने पार्कों में कोई नहीं जाना चाहता था।

    भुट्टे चाय और पकौड़ी वाले भी अपना-अपना हिस्सा बांट रहे थे। पुल पार 12-15 के झुंडों में युवक नदी से लकड़ियां निकाल रहे थे, बड़े-बड़े स्लीपर भी थे। घर की औरतें और बच्चे भी मदद कर रहे थे आखिर उन्हें भी सर्दियों में लकड़ियां जलानी थी। घोड़ा बग्गी भैंसा बुग्गी टेंपो मोटरसाइकिल सब लकड़ियां ढोने में लगी हुई थी। छोटे-छोटे झगड़े भी थे लकड़ी के लिए। तूने क्यों उठाई मेरी लकड़ी मैंने निकालकर इकट्ठी की थी। ड्रिफ्ट वुड के लिए भी लकड़ी देखने लगा लेकिन कोई शेप नहीं मिली। उन्हें लकड़ियां निकालता छोड़ सात किलोमीटर दूर बॉर्डर पार कर हिमाचल के किल्लोड़ गाँव की तरफ निकल गया।

    टोंस नदी के किनारे खड़ी चढ़ाई और भारी बरसात में पूरी सड़क बैठ कर कच्चे रास्ते में तब्दील हो गई थी। स्कूटी बहुत संभल-संभलकर चलानी पड़ी। आखिर मंजिल आ ही गई। तीन तरफ से पहाड़ियों से घिरी सुंदरता से भरपूर किल्लोड़ घाटी! आसपास में मेरी सबसे प्रिय जगह। गजब की शांति। शहर के शोर और ट्रैफिक की चकचक से दूर। कभी-कभी एक आद बस या स्कूटर मोटरसाइकिल आ जाती है या जानवरों के लिए चारा पत्ती लेकर जाती महिलाएं। मैं जूते निकाल कर पैराफिट पर बैठ गया और प्रकृति को आत्मसात करने की कोशिश करने लगा। थोड़ी देर बाद लेट गया। ठंडी ठंडी हवा और कीटों का मधुर संगीत जैसे देव लोक।

    इस शांति को भंग किया शाम 6:00 बजे से मंदिर के लाउडस्पीकर ने, देवता रुष्ट ना हो। इसलिए गांव वालों ने नया मंदिर बना लिया था महासू देवता का। पूरी घाटी में भजन नुमा बजते रहे। उस नीरव शांति में थोड़ी देर ऐसे भी झेला। विकास यहां तक पहुंचने लगा है। पास ही देवदार के जंगल के बीच एक ही स्कूटी खड़ी थी। आसपास निगाह दौड़ाई कोई नहीं तभी ऊपर पहाड़ी पर प्रेमी जोड़े का अक्स दिखाई दिया ऐसी जगह जहां से कोई उन्हें नहीं देख सके, लेकिन वह सब को देख सकते थे प्रेमियों के लिए मुफीद जगह। अंधेरा होने लगा था। किल्लोड़ का पांच सात दुकानों का बाजार जहां दुकान पर पेंसिल जूते से लेकर सीमेंट तक हर जरूरत की वस्तु मिल जाती थी, बिना किसी तामझाम के। मैंने एक और चाय और नमकीन ली। अब अंधेरा होने लगा था। वापस चला तो रास्ते में जिन झरनों को छोड़ आया था वह मुझे वापस जाने से रोकने लगे खैर उन झरनों का भी आतिथ्य  स्वीकार किया, और उनका जल ग्रहण किया। बारिश कुछ देर रुकने के बाद फिर शुरू हो गई थी, भीग चुका था। वापसी में बैराज पर फिर चाय की तलब लगी। गरम चाय और समोसे ने अपने अंदाज में समा बांध दिया। कोयलों पर सिंकते भुट्टों के बिना भीगना कैसे पूरा होता। अंततः बरसात में बह गई सड़क और टूटे गड्ढों के बीच घर वापसी। प्रकृति का आनंद लेना हो तो समय का बिल्कुल ख्याल ना रखें, जल्दबाजी ना करें, सुबह 7:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक का लक्ष्य लेकर चलें। खाना-पीना घर से साथ ले जाएं या वहीं गरम चाय समोसे सुड़कें। अकेले या केवल एक और साथी हो जो प्रकृति को आत्मसात कर सके तो बेहतर होगा। इसलिए निकल पड़ो घर से बरसते बादलों के बीच साइकिल या स्कूटी उठाकर या फिर पैदल ही, पर कारों में  तो बिल्कुल नहीं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से मात्र चालीस किलोमीटर की दूरी पर पछवादून में यह सौंदर्य बिखरा हुआ है आइए और आनंद उठाइए।!!!!

    Sanjay Jain