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  • शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति

    शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति

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    भारतीय पत्रकारिता को भारतीय लोकतंत्र और भारत के लोक की रक्षा करनी है तो इस पत्रकारिता को अपने आईकॉन चुनने होंगे। भगत सिंह के लेख छापने वाले प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने भगत सिंह की शहादत के दो दिन बाद ही अपनी शहादत क्यों दी थी।क्या प्रताप के संपादक अपने एक स्तंभकार की शहादत से प्रेरित होकर दंगाईयों के सामने खड़े हो गए थे।अगर भगत सिंह ही गणेश शंकर विद्यार्थी की  शहादत के प्रेरक थे तो गणेश शंकर विद्यार्थी और भगत सिंह को अपना हीरो मानने वाले मुफस्सिल पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की शहादत को भारतीय पत्रकारिता किस तरह भुला सकती है। मैं पत्रकारिता के नियंताओं से करबद्ध प्रार्थना करना चाहता हूँ कि सिरसा में 21 नवंबर 2002 को हर हाल में सच कहने की जिद में शहीद हुए पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति के शहादत दिवस को “पत्रकारिता प्रेरणा दिवस” के रूप में आयोजित किया जाए। शहीद छत्रपति के शहादत की 16 वीं वर्षी पर सिरसा(हरियाणा) में छत्रपति के अनुगामियों की ओर से एक स्मृति सभा जरूर आयोजित है पर भारतीय प्रेस परिषद, भारत के पत्रकार संगठन, संस्थान छत्रपति से अब तक अनजान क्यों हैं?

    अपनी शहादत के बाद 15 वर्षो बाद रामचन्द्र छत्रपति पिछले वर्ष 2017 के अगस्त माह में तब मुख्यधारा की मीडिया में चर्चे में आए थे, जब हरियाणा में देवताधारी-बलात्कारी को जेल भेजा गया था।तथाकथित देवता गुरमीत (राम-रहीम) के जेल जाने के बाद जिस तरह की हिंसा भड़काई गई और जिस तरह हिंसा को रोकने के लिए सेना की मदद ली गई, यह वाकया दुनियाँ की मीडिया में जितना चर्चित हुआ। काश, इस तथाकथित देवता को पहली बार बलात्कारी घोषित करने वाले रामचन्द्र छत्रपति की आवाज उनकी शहादत के बाद सुन ली गई होती। अंग्रेजी पत्रकारिता पर आरोप है कि अंग्रेजी पत्रकारिता अक्सर भारत की समस्याओं को अंग्रेज हुकूमत की तरह देखती है। लेकिन हम पूछते हैं कि हिंदी पत्रकारिता ने 16 वर्ष पूर्व सिरसा में शहीद हुए एक पत्रकार की शहादत को तब राष्ट्रीय महत्व क्यों नहीं प्रदान किया था।साध्वियों के साथ बलात्कार, साध्वी के भाई की हत्या,बलात्कार को उजागर करने वाले पत्रकार की हत्या,400 साधुओं को नपुंसक बनाने के सिद्ध हो चुके आरोपों के अभियुक्त राम रहीम को क्या भारतीय मीडिया अभी भी दुनियाँ का सबसे बड़ा खूनी राक्षस घोषित करने के लिए तैयार है?दुनियाँ में क्या इससे बड़े क्रूर, हवशी, राक्षस की कथा आपने सुनी है? क्या देवी-देवताओं वाले राष्ट्र में मीडिया के आकाओं के दिल में इस बलात्कारी -बाबा के प्रति कोई आस्था कायम है? भारत के नारीवादी संगठन जो मीटू अभियान में ज्यादा जोर लगा रहे हैं, वे सिरसा के इस मामले को दुनियाँ का सबसे बड़ा बलात्कार कांड घोषित करने में मुहूर्त का इंतजार क्यों कर रहे हैं?

    मैं 2003 में पहली बार मेधा पाटकर के साथ जनांदोलनों की एक राष्ट्रव्यापी यात्रा के दौरान सिरसा पहुँचा था तो प्रसिद्ध समाजशास्त्री योगेंद्र यादव जो हरियाणा में यात्रा के मगर्दर्शक थे, उन्होंने तब बताया था कि “सिरसा में हमारे मित्र रामचन्द्र छत्रपति ने इस तरह सच लिखने की जिद के साथ अपनी शहादत दी है।”मुझे तब यह जानकारी भी मिली कि तत्कालीन भारत के प्रसिद्ध संपादक प्रभाष जोशी ने रामचन्द्र छत्रपति की शहादत के बाद सिरसा की यात्रा की है और छत्रपति के कातिलों को ललकारते हुए कहा है कि “हमारी पत्रकारिता के समक्ष छोटे-छोटे हिटलर खड़े हैं, अगर हम इन हिटलरों से युद्ध नहीं रचेंगे तो हमारी यह प्यारी पत्रकारिता नष्ट हो जाएगी”।प्रभाष जोशी की चेतावनी को हमने अपनी चुनौती मान ली और हम 15 वर्षों से सिरसा को बकोध्यानम देख रहे हैं। 2004 में हिन्दुस्तान की प्रधान संपादक मृणाल पाण्डेय ने अपने अखबार के संपादकीय पृष्ठ में मेरा आलेख प्रकाशित कराया था, जिसकी हजारों प्रति तब हरियाणा में पाठकों की माँग पर अलग से भेजी गई थी। उस विशिष्ट आलेख का शीर्षक था-“रामचन्द्र छत्रपति की शहादत का मतलब पूरा सच।”संपादकीय पृष्ठ की अपनी सीमा होती है, बावजूद किसी हिंदी अख़बार ने पहली बार छत्रपति की शहादत को इस तरह प्रस्तुत किया था।मैंने 2004 में राम रहीम के सच्चा सौदा डेरा के अंदर प्रवेश करने का साहस जुटाया था। मैंने डेरा के अंदर एक-एक हिस्से को अपनी आँखों से देखने की कोशिश की थी पर देवता के गुफा के बाहर आकर मेरे कदम रूक गए थे या सिहर गए थे। देवता के मायालोक में तमाम विहंगम दृश्य, तिलिस्म, चमत्कार देखने के बावजूद मैंने गुफा द्वार से लौटकर आज से 14 वर्ष पूर्व जो डायरी लिखी थी, उसके कुछ हिस्से को रामबहादुर राय के संपादकत्व मेधा प्रथम प्रवक्ता और योगेंद्र यादव के संपादकत्व वाले सामयिक वार्ता ने प्रकाशित किया था। छत्रपति की शहादत के एक दशक पूरे होने पर संतोष भारतीय ने चौथी दुनियाँ में उस सिरसा डायरी को अक्षरशः प्रकाशित किया था, बावजूद मैं दावे के साथ कह रहा हूँ कि मेरी उस सिरसा डायरी को गंभीरता से नहीं लिया गया।शायद इस मान्यता की वजह से भी कि शहादत को पत्रकारिता का वसूल नहीं बनाना चाहिए या इस वजह से कि जिन्हें देवता मानकर राष्ट्र के प्रधानमंत्री नमन करते हों, उनके भाल पर हमारी पत्रकारिता की वजह से कोई खरोंच ना आए।

    रामचन्द्र छत्रपति खेती-किसानी से जुड़े एक मुफस्सिल पत्रकार थे। उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित कुछ राष्ट्रीय हिंदी दैनिकों के लिए जिला संवाददाता का कार्य किया था। वे संवाददाता के रूप में अपने शहर सिरसा स्थित “सच्चा सौदा डेरा” के झूठ को विशेष महत्व देना चाहते थे। राष्ट्रीय समाचार पत्रों में अपने प्राथमिक विषय को प्राथमिकता ना मिलने की वजह से उन्होंने खेती-किसानी के पसीने की ताकत से वर्ष 2000 में दैनिक समाचार पत्र”पूरा सच” की शुरूआत की थी। 30 मई 2002 को “पूरा सच” में छपा था -“धर्म के नाम पर किए जा रहे हैं,साध्वियों के जीवन बर्बाद”। इस खबर ने हरियाणा-पंजाब की वादियों में तूफान मचा दिया था। डेरा भक्तों के द्वारा हरियाणा-पंजाब के शहरों में हो रहे हिंसा के  प्रभाव में चंडीगढ़ उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पूरा सच की इस खबर के आधार पर सीबीआई जाँच का आदेश दिया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में यह एक अविस्मरणीय अध्याय है कि एक मुफस्सिल अखबार की खबर के आधार पर उच्च न्यायालय ने स्वतः स्फूर्त सीबीआई जाँच का आदेश दिया हो। इस घटना के बाद भी “पूरा सच” के संपादक की सुरक्षा के प्रति राज्य ने कोई सुध नहीं ली। रामचन्द्र छत्रपति को राम रहीम के द्वारा नियुक्त अपराधियों ने गोली मारी, शासन ने बेहतर ईलाज की जिम्मेवारी नहीं ली औऱ हमले के 27 दिन बाद 21 नवम्बर को छत्रपति ने अपोलो दिल्ली में दम तोड़ दिया। छत्रपति की हत्या के नामजद अभियुक्त गुरमीत राम-रहीम ने इस हत्या के विरूद्ध सीबीआई जाँच को बार-बार रोकने व प्रभावित करने की कोशिश की पर रामचंद्र छत्रपति के पुत्र अंशुल छत्रपति के अनुरोध पर न्यायमूर्ति राजेन्द्र सच्चर  सुप्रीम कोर्ट में खड़े हुए तो अब सारी गवाहियों के बाद साध्वी बलात्कारों के अभियुक्त गुरमीत जल्दी ही छत्रपति की हत्या के अभियोग में 20 वर्षों की जेल या फाँसी की सजा पाने के लिए मजबूर होंगे। छत्रपति के न्याय के संघर्ष में विश्वास है कि जल्दी ही जीत हासिल हो।

    Ramchandra Chhatrapati (In Portrait) and His Son Anshul Chhatrapati

    “पूरा सच” के संस्थापक संपादक ने ढाई साल की छोटी सी अवधि में अपने अखबार को बहुत लंबी उमर दे दी। पुत्र ने संपादक पिता के बताए नक्से कदम पर अख़बार के संपादन के साथ-साथ मुकदमे की पैरवी को एकसूत्री लक्ष्य मान लिया। पूरा सच डेरा के कुकृत्यों को लगातार उजागर करता रहा। शहादत की विरासत पर खड़े अख़बार ने कभी मुड़ कर देखना जरूरी नहीं समझा। गुरू गोविंद सिंह जी का रूप धारण कर भक्तों को अमृत छकाने की खबर को भी पहली बार अंशुल छत्रपति के संपादन में पूरा सच ने ही उजागर किया। लेकिन अंशुल ने अपनी सुरक्षा के प्रति सावधानियां बरती। पूरा सच ने ही एक कामपिपासु बाबा के हवस में 400 साधुओं को नपुंसक बनाने की खबर को पहली बार उजागर किया। अंशुल ने विवेकपूर्ण सावधानी यह बरती की कि कभी दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस कर अपने किए से कीर्तिमान प्राप्ति करने की चेष्टा नहीं की।साध्वी बलात्कार मामला, अपने पिता की हत्या,साध्वी के भाई की हत्या सहित साधु नपुंसक मामलों में अलग-अलग सीबीआई जांच के लिए गवाही जुटाने, योग्य अधिवक्ताओं को तलाशने की जिम्मेवारी अंशुल ने अपने कंधे पर ली।जिम्मेवारियों के वजन से अंशुल का कंधा ना टूटा पर अंशुल का घर बिक गया। पूरा सच को अर्थाभाव की वजह से 4 साल पहले बंद करना पड़ा है।जो पत्रकारिता को सबसे कमजोर की आवाज मानते हैं, उनके लिए रामचन्द्र छत्रपति बेहतर आईकॉन हो सकते हैं। मैंने अपने आईकॉन से आपको परिचित कराया।यहाँ दुनियाँ की सबसे ऊँची मूर्ति तो आपको नहीं मिलेगी, दुनियाँ के सबसे बडे सेक्स स्कैंडल को उजागर करते हुए शहादत देने वाले एक संपादक की कीर्ति मिलेगी। पत्रकारिता को बदलने की लीक दिल्ली से नहीं, सिरसा से शुरू होती है। मेरे लिए सिरसा इस समय पत्रकारिता का तीर्थ हो चुका है, आईये आप भी मेरे तीर्थ को अपना तीर्थ बनाइये।

    आनंद बाजार के पत्रकार सुब्रतो बसु को 2018 का रामचन्द्र छत्रपति सम्मान

    शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति के सुधि प्रशंसक पिछले 8 वर्षों से भारत में साहित्य और पत्रकारिता में जन-प्रतिबद्धता के लिए प्रतिबद्ध लेखक-पत्रकारों को रामचन्द्र छत्रपति की स्मृति में “छत्रपति सम्मान” से सम्मानित करते हैं। सिरसा के प्राध्यापक, अधिवक्ता, साहित्यकारों की पहल पर गठित “संवाद सिरसा” ने 2010 से छत्रपति के शहादत दिवस के अवसर पर सिरसा में छत्रपति की स्मृति सभा आयोजित कर छत्रपति सम्मान देने की परंपरा कायम की है। प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर 2012 में छत्रपति सम्मान से सम्मानित हुए थे। कुलदीप नैयर के साथ-साथ रवीश कुमार, अभय कुमार दुबे, ओम थानवी, उर्मिलेश, गुरदयाल सिंह, जगमोहन सिंह छत्रपति सम्मान से नवाजे जा चुके हैं। सुब्रतो बसु को बिहार में सरिता -महेश की शहादत से पूर्व उनके सामाजिक कर्म को आनन्द बाजार में पहली बार कवरेज करने के लिए ” IFJ Award” मिल चुका है। सुब्रतो आनंद बाजार कोलकाता में स्थानीय क्षेत्रीय संपादक हैं और इन्होंने अपने अखबार में रामचन्द्र छत्रपति की शहादत से जुड़ी पृष्ठभूमि को कई किस्तों में लिखा था।

    कुलदीप नैयर को सिरसा आने से रोकने के लिए गुप्तचर एजेंसियों के द्वारा सूचना भिजवाई गई थी। कुलदीप नैयर के सम्मान प्राप्त कर दिल्ली पहुंचने के बाद डेरा भक्तों ने सिरसा में गुरुद्वारा के ग्रंथी की गाड़ी में आगजनी क़र शहर में कर्फ्यू कायम करवाया था। कुलदीप नैयर ने सिरसा में अभिभूत होकर कहा था-मैं छत्रपति को भारतीय पत्रकारिता के भीतर भगत सिंह की तरह देख रहा हूँ इसलिए कि मैंने लाहौर में भगत सिंह के शहादत स्थल पर खड़ा होकर जिस तरह महसूस किया था,उसी तरह का अहसास आज सिरसा आकर महसूस हो रहा है।

    पुष्पराज

    जनांदोलनों को लिखने वाले यायावर पत्रकार और चर्चित पुस्तक नंदीग्राम डायरी के लेखक

  • राष्ट्र के नाम खुला  आपातकालीन ख़त : 100 वर्ष पुराने पटना संग्रहालय को बचाने की अपील –Pushpraj

    राष्ट्र के नाम खुला आपातकालीन ख़त : 100 वर्ष पुराने पटना संग्रहालय को बचाने की अपील –Pushpraj

    Pushpraj

    Patna Museum

    100 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध राजकीय संग्रहालय का स्वामित्व सोसायटी (ट्रस्ट) को सौंपना भारत की सांस्कृतिक संपदा पर बड़ा हमला है। यह हमला राज्य सृजित राष्ट्रीय आपदा है. हम इसकी मुखालफत करते हैं।

    पटना संग्रहालय बचाओ समिति

    Patna, Bihar

    Patna Museum, Bihar

    100 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध पटना संग्रहालय को बचाना क्योँ जरुरी है –

    1. ब्रिटिश शासन काल में 1917 में स्थापित पटना संग्रहालय अविभाजित भारत के पुरातन संग्रहालयों में तीसरा पुरातन संग्रहालय है ,जो अपनी स्थापना का 100 वर्ष पूरा कर रहा है .यह आश्चर्यजनक सत्य है कि इस प्रसिद्ध राष्ट्रीय संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में राजकीय स्तर पर होनेवाले  शताब्दी वर्ष के श्रृंखलाबद्ध आयोजनों पर विराम लगाकर इस संग्रहालय को विस्थापित किया जा रहा है .

    2. सितम्बर – अक्टूबर 2017 में एक माह ले लिए  संग्रहालय को बंद करने की सूचना को (संग्रहालयों की सुरक्षा के सन्दर्भ में अंतरराष्ट्रीय मानदंड के अनुसार)विज्ञापित किए बिना पटना संग्रहालय को एक माह के लिए बंद कर दिया गया .इस दौरान पटना संग्रहालय के अधिकारिओं की शक्ति को अपने अंकुश में लेकर विश्व प्रसिद्ध कृति यक्षिणी सहित हजारों पुरावशेष और कला -कृतिओं को पटना संग्रहालय से स्वायत्त संस्था बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित किया गया .

    3. बिहार संग्रहालय 1860 के सोसायटी एक्ट से निर्मित एक स्वायत्त संस्था “बिहार म्यूजियम सोसायटी “ के द्वारा संचालित है ,जिसके मुख्य प्रवर्तक बिहार के मुख्य सचिव अंजनी सिंह हैं .अंजनी सिंह इस ट्रस्ट के नॉडल ऑफिसर हैं .बिहार म्यूजियम सोसायटी के संचालन का सर्वाधिकार नॉडल ऑफिसर के पास केन्द्रित है .बिहार संग्रहालय के निर्माण को माननीय पटना उच्च न्यायालय ने “ नोट इन पब्लिक इंटरेस्ट “ कहा था .बिहार संग्रहालय के निर्माण स्थल पर 6 हैरिटेज बंगले मौजूद थे ,जिसे तोड़ने से बचाने के लिए मुख्यमंत्री से देश के इतिहासकारों ने गुहार की थी .

    4. पटना के कुछ प्रमुख इतिहासकारों ,संग्रहालय विषेशज्ञों,विशिष्ट बुद्धिजीविओं ने 2015 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र भेजकर पटना संग्रहालय के पुरावशेषों को ट्रस्ट के तहत संचालित ,निर्मित बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरण की योजना को अवैधानिक बताते हुए पटना संग्रहालय को बचाने की अपील की थी. इस पत्र पर बिहार के प्रथम संग्रहालय निदेशक हरिकिशोर प्रसाद, प्रो.हेतुकर झा, प्रो.अरुण कुमार सिन्हा, प्रो .जयदेव मिश्र, प्रो .राजेन्द्र राम, प्रो.शत्रुघ्न शरण, पद्मश्री उषा किरण खान, पद्मश्री गजेन्द्र नारायण सिंह और नव-नालंदा संग्रहालय के पूर्व-निदेशक भूपेन्द्र नाथ सिंह ने हस्ताक्षर किए थे .

    5. बंगाल से बिहार के अलग होने के बाद संविधान सभा के अध्यक्ष, “ बिहार निर्माता “ डॉ .सच्चिदानंद सिन्हा ने बिहार –उड़ीसा के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर के पटना निवास पर आयोजित बैठक में 15 जनवरी 1917 को पटना में संग्रहालय के निर्माण का प्रस्ताव दिया था .बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी के निर्देशन में अप्रैल 1917 को पटना उच्च न्यायालय के भवन के एक हिस्से में “पटना संग्रहालय” की स्थापना की गयी.1929 के जनवरी माह तक पटना संग्रहालय पटना उच्च न्यायालय के भवन में कार्यरत रहा . भारतीय स्थापत्य कला के बेहतरीन प्रतीक INDO-SARACENIC “ इंडो-सारासेनिक शैली “ से निर्मित खुबसूरत भवन में पहली फ़रवरी 1929 से पटना संग्रहालय को नया आयाम प्राप्त हुआ . कालांतर में उड़ीसा के अलग होने के बाद बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी  बिहार रिसर्च सोसायटी में परिणत हो गया .पटना संग्रहालय के संचालन के लिए पटना म्यूजियम मैनेजिंग कमिटी गठित था,जिसके अध्यक्ष पटना उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश होते थे .1961 तक पटना संग्रहालय मैनेजिंग कमिटी के द्वारा संचालित होता रहा .1961 के 25 अप्रैल से बिहार सरकार ने बिहार के पुरातात्विक स्थलों और सभी संग्रहालयों को पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय के प्रशासकीय नियंत्रण में लिया तो पटना संग्रहालय की मैनेजिंग कमिटी का अधिकार समाप्त हो गया .

    6. बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी की स्थापना एशियाटिक सोसायटी की  अवधारणा पर हुई थी .बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी इतिहास – पुरातत्व के अंतराष्ट्रीय अध्ययन ,शोध में वैज्ञानिक दृष्टिकोण  के आधार पर कार्यरत महत्वपूर्ण संस्था थी .बिहार रिसर्च सोसायटी को पटना संग्रहालय के संस्थापक Mother- organization की तरह देखना चाहिए .भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी के संस्थापकों में थे ,जिन्होंने बिहार रिसर्च सोसायटी को आगे बढाने के साथ –साथ 1926 से 1937( मृत्युकाल ) तक पटना संग्रहालय की मैनेजिंग कमिटी के अध्यक्ष की जिम्मेवारी निभाई. पटना संग्रहालय के संस्थापकों में एडवर्ड गेट, वाल्स, प्रो.जे.एन समादार, डॉ.सच्चिदानंद सिन्हा, के .पी जायसवाल, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, एस .ए.शेर, ए.एस अल्तेकर की भूमिका को शताब्दी वर्ष में स्मरण करना और उनकी भूमिका का  दस्तावेजीकरण आनेवाली पीढ़ीओं के लिए प्रेरणादायी होता .दुःखद आश्चर्य यह है कि विगत 2 दशक से ज्यादा समय से बिहार रिसर्च सोसायटी की सभी गतिविधिओं को पूर्णतः बंद कर दिया गया .एक सरकार ने आर्थिक सहायता बंद कर बिहार रिसर्च सोसायटी में एक दशक से ज्यादा वक्त तक ताला लगा दिया था दूसरी सरकार ने इस संस्थान को पटना संग्रहालय का अधिकृत हिस्सा बनाकर संस्थान को नौकरशाही व्यवस्था का अंग बना दिया .इन्डियन हिस्ट्री कांग्रेस ने 1997 में बिहार रिसर्च सोसायटी के अस्तित्व को बचाने के लिए प्रताव पारित किया था .बिहार रिसर्च सोसायटी का पटना संग्रहालय के साथ विलयन के बाद विलयन अधिनियम के प्रावधान के अनुसार “परामर्शदात्री समिति“ का गठन आवश्यक था, जो एक दशक बीते अब तक गठित नहीं हुआ .

      महापंडित राहुल सांकृत्यायन के द्वारा तिब्बत से लाई गयी हजारों पाण्डुलिपिओं की वजह से यह संस्थान बिहार के सभी शिक्षण संस्थानों और विश्व विद्यालयों से ज्यादा महत्व रखता है लेकिन अफ़सोस कि बिहार में कभी बिहार रिसर्च सोसायटी के गरिमा की पुनर्वापसी को सांस्कृतिक-राजनीतिक सामाजिक मुद्दा नहीं बनाया गया. (गौरतलब है कि महापंडित के द्वारा रखी पाण्डुलिपिओं में ऐसी जानकारी निहित है ,जिससे बिहार और भारतीय इतिहास की दृष्टि बदल सकती है .)

    7. भारतीय संस्कृति और मानवता की विकास यात्रा  के महानतम अध्येता महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भारतीय अतीत के साथ जुड़े बौद्ध संस्कृति के विकास  की खोज के लिए तिब्बत की कई कष्टपूर्ण एतिहासिक यात्राएं की और तिब्बत से दुर्गम रास्तों से 22 खच्चरों  पर ढो कर साथ लाए बौद्ध साहित्य और कलाकृतिओं से(कुल 6000से ज्यादा पाण्डुलिपियां और कला कृतिया ) पटना संग्रहालय को समृद्धि प्रदान किया था.राहुल सांकृत्यायन के द्वारा तिब्बत और विश्व यात्रा से लाए गए अमूल्य धरोहर पटना संग्रहालय के एक्शेसन रजिस्टर में 1933 से 1956 तक महापंडित से दान स्वरूप प्राप्त होने का प्रमाण है . राहुल सांकृत्यायन के द्वारा लाए गए पाण्डुलिपिओं को तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के लिए उपयोगी मानकर स्थानान्तरण चाहती थी  पर काशी प्रसाद जायसवाल जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान के हस्तक्षेप से पाण्डुलिपि को बिहार रिसर्च सोसायटी में सुरक्षित बचाया गया .काशी प्रसाद जायसवाल ने उन पांडुलिपिओं का अपनी देखरेख में अनुवाद शुरू कराए थे ,जो काशी प्रसाद जी की असामयिक मौत की वजह से आगे नहीं बढ़ सका . रॉयल नीदरर्लैंड एकेडमी ऑफ़ आर्ट्स एंड साईंस ने ERNST STEINKELLNER के द्वारा बौद्ध संस्कृति और तिब्बत में राहुल सांकृत्यायन के द्वारा खोज किए गए ज्ञान भंडार पर किए गए शोध प्रबंध को 2003 में A Tale of Leaves on Sanskrit Manscripts in Tibet their Past and their Future प्रकाशित किया है .यूरोप के विश्व विद्यालयों में राहुल सांकृत्यायन की प्रतिष्ठा किसी भारतीय राजनेता से ज्यादा है .थंका कलाकृतिओं के बारे में राहुल जी ने अपनी जीवनयात्रा में खुद लिखा है कि जर्मनी ,फ़्रांस ,लन्दन और श्रीलंका में थंका को प्राप्त अप्रत्याशित प्रतिष्ठा के बावजूद उन्होंने पटना संग्रहालय को ही क्योँ प्राथमिकता दी .यूरोप के किसी देश में 4 -5 थंका कला कृति के लिए मिले बहुत बड़े धन के प्रस्ताव के बाद राहुल जी को इनकी कीमत का अंदाजा लगा और उन्होंने तय किया कि इतनी कीमती कलाकृति को अपने राष्ट्र की धरोहर के रूप में संरक्षित करना ही आनेवाली पीढियो के लिए उपयोगी होगा .  पटना संग्रहालय विकास के कालक्रम में अपने साथ 4 संस्थानों को इकट्ठे जोड़ता है .पुरातात्विक धरोहरों के अद्भुत संग्रहों वाला पटना संग्रहालय,राहुल सांकृत्यायन गैलरी और संग्रहालय की बुनियाद “बिहार रिसर्च सोसायटी “. काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान भी संग्रहालय परिसर में ही स्थित है .यह संस्थान बिहार सरकार के शिक्षा विभाग के द्वारा संचालित है .67वर्ष पूर्व स्थापित इस संस्थान को अब तक अपना भवन तक नसीब नहीं हुआ है .शोध और अध्ययन के प्रति बिहार सरकार की उदासीनता का यह बेहतरीन सबूत है .

    8. पटना संग्रहालय की स्थापना अखंड भारत की ब्रिटिश सरकार के द्वारा की गयी थी इसलिए इस संग्रहालय को एक राज्य सरकार अगर  “ राज्य संपदा” की तरह कब्जे में लेती है तो यह नीतिसंगत नहीं है .तत्कालीन पुरातत्वप्रेमी ब्रिटिश प्रशासकों के सहयोग से पटना संग्रहालय के संस्थापकों ने हड़प्पा, मोहनजोदड़ो से लेकर अखंड भारत के पाकिस्तान ,बांग्ला देश , रावलपिंडी,तमिलनाडु,आन्ध्र प्रदेश ,उड़ीसा सहित अलग –अलग हिस्सों में बिखड़े पुरातत्व के महत्व की सामग्री को इकट्ठा किया .पटना म्यूजियम की मैनेजिंग कमिटी के आग्रह पर प्राचीन भारतीय मुद्राओं के संकलन के लिए ब्रिटिश सरकार ने उच्च स्तरीय क्वायंस कमिटी गठित की थी ,जिसके प्रयास से पटना संग्रहालय के पास प्राचीन दुर्लभ  मुद्राओं का संग्रह प्राप्त हुआ .स्थापना काल के उत्तरार्ध में मौर्यकालीन पुरातत्व के लिए प्रसिद्ध हुए पटना संग्रहालय के लिए राहुल सांकृत्यायन ने दुनियां के देशों की यात्रा के दौरान “सांस्कृतिक –राजदूत “ की भूमिका निभाई और पटना संग्रहालय को दुनियां के देशों में बौद्ध कालीन पुरातात्विक संग्रहों वाले “ बौद्ध संग्रहालय “ की पहचान प्राप्त हुई .बौद्ध कालीन पुरातत्वों में भगवान बुद्ध के अस्थि कलश ,मौर्य कालीन दीदारगंज यक्षिणी और जैन तीर्थंकर से जुड़े पुरातत्वों ने इस संग्रहालय को भारत के अन्य संग्रहालयों के मध्य विशिष्टता प्रदान की .

    9. महापंडित राहुल सांकृत्यायन की पुत्री जया सांकृत्यायन पटना संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में विस्थापन की सूचना से विचलित हुईं और उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 12 सितम्बर 2017 को आपातकालीन पत्र भेजा. बिहार के मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में पटना संग्रहालय के धरोहरों के स्थानांतरण के विरुद्ध उन्होंने स्पष्ट लिखा. ”आज के स्वाधीन भारत में राहुल जी की प्रिय कर्मभूमि बिहार में उनकी देन ,उनकी सोच का मान ना रखना ,उनके प्रति निरादर है. इस विद्या मंदिर को निर्जीव और वीरान ना किया जाए. ”इस पत्र के आलोक में मुख्यमंत्री ने सांकृत्यायन परिवार से कोई वार्ता तो नहीं की पर इस पत्र का सकारात्मक असर यह हुआ कि राहुल सांकृत्यायन गैलरी का स्थानान्तरण रुक गया .

    10. स्मरणीय है कि भारत सरकार के लेखा महानियंत्रक (CAG) ने वर्ष 2014 में पटना संग्रहालय के सन्दर्भ में अपनी रिपोर्ट में इस बात पर गहरी आपत्ति जताई है कि महापंडित राहुल सांकृत्यायन के द्वारा लायी गयी 6 हजार तिब्बती पाण्डुलिपिओं का वैज्ञानिक तरीके से रखरखाव और प्रबंधन नहीं हो रहा है .सीएजी ने अब तक उन पाण्डुलिपिओं के अनुवाद और प्रकाशन नहीं होने के सवाल पर नौकरशाही की कार्यशैली पर सवाल उठाया है .सीएजी ने पटना संग्रहालय में पुरातत्वों के रख्ररखाव के प्रति लापरवाही को देखते हुए अमूल्य पुरातत्वों के साथ भविष्य में असुरक्षा और गायब होने के की संभावना प्रकट की है .भारत सरकार की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में एक सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर पटना संग्रहालय के पुरातत्वों की हिफाजत के लिए उच्च स्तरीय जाँच कमिटी के गठन करने की जरूरत थी .लेकिन बिहार सरकार ने सीएजी की रिपोर्ट की अनदेखी करते हुए गैर क़ानूनी तरीके से पटना संग्रहालय के सबसे महत्वपूर्ण पुरावशेषों और कला–कृतिओं को  स्थानान्तरित करने की भूमिका निभाई . ​

    11. जिस पटना संग्रहालय को अखंड भारत में भारतीय संग्रहालय की तरह विकसित किया गया ,उस संग्रहालय को मुख्यमंत्री ने राज्य की सम्पदा / अपनी निजी संपदा की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश क्योँ की ?जाहिर है कि राष्ट्रीय धरोहर मानकर ही 80 -90 के दशक में केंद्र सरकार ने पटना संग्रहालय को अपने अधीन में लेने की प्रक्रिया शुरू की थी पर तत्कालीन बिहार सरकार ने अंतिम समय में किसी तरह का राजनीतिक अड़चन लाकर केंद्र सरकार की कोशिश को रोक दिया था .

    12. बिहार सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 23 अक्टूबर 2017 को पटना संग्रहालय की यात्रा की और पटना संग्रहालय के अस्तित्व को कायम रखने की घोषणा  की .मुख्यमंत्री पटना संग्रहालय में मौजूद 1764 के पूर्व के पुरावशेष बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित करने की बार –बार घोषणा कर रहे हैं. मुख्यमंत्री के द्वारा पटना संग्रहालय में 3 घंटे बिताने के बाद 24 अक्टूबर 2017 को टाईम्स ऑफ़ इण्डिया में प्रकाशित समाचार के अनुसार पटना संग्रहालय से 39 हजार पुरावशेषों को स्थानांतरित किया जाएगा .बिहार सरकार के संस्कृति सचिव ने गत वर्ष  इसी अख़बार में 50 हजार पुरावशेषों के स्थानांतरण की बात की थी.
      (https://m.timesofindia.com/city/patna/Patna-Museum-on-the-verge-of-losingsheen/articleshow/54769499.cms)

      मुख्यमंत्री ने बिहार संग्रहालय के लोकार्पण के अवसर पर पटना संग्रहालय से  1764 के पूर्व के पुरावशेष बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित होने के बाद पटना संग्रहालय को “ मॉडर्न आर्ट गैलरी “ के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी. मौर्यकालीन, बौद्धकालीन विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय से उसकी पहचान बने प्रसिद्ध यक्षिणी सहित हजारों पुरावशेषों को हटाकर “ मॉडर्न आर्ट गैलरी “ परिवर्तित करने से भारतीय इतिहास, भारतीय संस्कृति और भारतीय ज्ञान संपदा का जो नुकसान हो रहा है ,उसकी भरपाई नामुमकिन है.

      मुख्यमंत्री ने  पटना संग्रहालय को पुनर्गठित करने को घोषणा की है .इस  घोषणा के आलोक में पटना संग्रहालय को पूर्णतः वातानुकूलित करने और करोडो की लागत से जापान की कंस्ट्रक्सन कम्पनी माकी की मदद से भवन निर्माण कराने और पटना संग्रहालय को सोसायटी में बदलने की प्रक्रिया को अंतिम मंजूरी दिया जाना है. भारतीय स्थापत्य के बेहतरीन प्रतीक  “इन्डियन सारासेनिक शैली “ से निर्मित हैरिटेज इमारत के साथ जापान की कंस्ट्रक्सन कपनी के द्वारा निर्माण की योजना अविवेकपूर्ण प्रतीत होता है .भारतीय स्थापत्य की विशेषज्ञता वाले  आईआईटी रूडकी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की उपेक्षा क्योँ? 100 वर्ष प्राचीन राजकीय संग्रहालय को सोसायटी के द्वारा संचालित करने की योजना लोकतंत्र विरोधी कदम साबित होगा. यह फैसला सांस्कृतिक संपदा पर  राज्य प्रदत्त आपदा है .

    13. सीएजी ने पटना संग्रहालय के पुरातत्वों की असुरक्षा पर जो संदेह प्रकट किए थे ,इस आधार पर पटना संग्रहालय से पुरावशेषों के स्थानान्तण के बाद क्या उन पुरातत्वों की तस्करी का  रास्ता ज्यादा सुगम हो जाएगा? सोसायटी एक्ट से संचालित बिहार संग्रहालय में पुरातत्वों की सुरक्षा के लिए मौजूद भारतीय पुरातत्व संरक्षण कानूनों की सख्ती बेअसर होगी .सोसायटी एक्ट से संचालित ट्रस्ट को निजी स्वामित्व वाले कम्पनी की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है.बिहार संग्रहालय का  इस्तेमाल मुनाफे के व्यापार में बदल जाए तो आम लोगों के लिए बिहार संग्रहालय में प्रवेश मुश्किल हो जाएगा .

    14. विश्व की यह संभवतः पहली घटना है ,जब किसी प्राकृतिक-अप्राकृतिक आपदा के बिना एक मुख्यमंत्री और एक मुख्य सचिव के निर्णय से 100 वर्ष पुरातन विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय को स्थानांतरित किया जा रहा हो. शोध, अध्ययन की प्रक्रिया से जुड़े अध्येताओं के समक्ष यह सवाल उपस्थित होता है कि पटना संग्रहालय के 100 वर्षों के कालक्रम में दुनियां की तमाम भाषाओँ में अब तक हुए शोध में जिन अभिलेखों, पुरावशेषों, कलाकृतिओं को पटना संग्रहालय में दर्शाया गया था, उन हजारों पुस्तकों, जर्नल को पढ़ते हुए निराशा मिलेगी और नए अध्येताओं के समक्ष पुराने विद्वान झूठे साबित होंगें .

    15. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना संग्रहालय से पुरावशेषों के स्थानान्तरण को अपनी बड़ी उपलब्धिओं की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं .पटना संग्रहालय बचाओ समिति को  देश के कई प्रतिष्ठित इतिहासकारों,पुरातत्ववेत्ताओं और संग्रहालय विशेषज्ञों का समर्थन प्राप्त है .हमलोग चाहते हैं कि मुख्यमंत्री पटना संग्रहालय को राष्ट्रीय धरोहर स्वीकार करते हुए इस संग्रहालय से स्थानान्तरित सभी पुरावशेषों ,कला –कृतिओं को अतिशीघ्र पटना संग्रहालय में वापस करने की व्यवस्था करें .बिहार के मुख्यमंत्री के समक्ष भारत के सभी विश्व विद्यालयों के इतिहास के प्राध्यापकों के द्वारा यह प्रश्न खड़ा करना चाहिए कि पटना संग्रहालय के पुरावशेषों के सन्दर्भ में 100 वर्षों में हुए हजारों शोध दस्तावेजों,पुस्तकों को असत्य साबित होने से बचाया जाय . एक विश्व  प्रसिद्ध राष्ट्रीय संग्रहालय के स्थानान्तरण से भारतीय इतिहास –पुरातत्व के अध्ययन –शोध की प्रक्रिया किस तरह प्रभावित होगी,इस बात पर देश के तमाम इतिहास के अध्येताओं,शिक्षाविदों और छात्रों के बीच चर्चा होनी चाहिए .

    16. इस घटनाक्रम से सबक लेते हुए पुरातत्वों की सुरक्षा के प्रति भारत सरकार को कड़े कानून बनाने चाहिए और देश के तमाम संग्रहालयों और पुरातात्विक स्थलों की सुरक्षा के लिए गृह मंत्रालय को खास तरह का  सतर्कता सेल गठित करना चाहिए .पुरातत्व का व्यापार,तस्करी जब कभी होता है तो अधिकतम मुनाफा के लिए पुरातत्व को देश से बाहर पहुँचाया जाता है .भारतीय पुरातात्विक सामग्री यूरोपीय देशों में लाखों –करोड़ों डालर /पौंड में बिकते हैं. पुरातत्व को राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा प्राप्त है .जिसे सरकार राष्ट्रीय धरोहर स्वीकार कर रही है ,उसकी सुरक्षा की गारंटी के लिए सख्त राष्ट्रीय सुरक्षा कानून अब आवश्यक हो गया है.

    17. बिहार के मुख्यमंत्री अगर पटना संग्रहालय से पुरातत्वों के विस्थापन को जायज मानते हैं तो इस मसले पर पटना में इन्डियन हिस्ट्री कांग्रेस का विशेष अधिवेशन बुलाने की चुनौती स्वीकार करें .मुख्यमंत्री पटना संग्रहालय के विस्थापन की वजह से प्रभावित हो रही सरकार की छवि को सुधारने के लिए बिहार में स्थित सभी संग्रहालयों की यात्रा कर रहे हैं .इतिहास के अध्येताओं को बिहार के मुख्यमंत्री से यह सवाल पूछना चाहिए कि नीतीश कुमार स्वाभाविक रूप से अगर इतिहास,संस्कृति और संग्रहालयों के प्रेमी हैं तो इनके 12 वर्षों के कार्यकाल में पटना संग्रहालय की संस्थापक बिहार रिसर्च सोसायटी की शोध प्रक्रिया को क्योँ धनाभाव में बंद कर दिया गया ?नीतीश कुमार के कार्यकाल में महापंडित के द्वारा लाई गयी तिब्बती पाण्डुलिपिओं के अनुवाद –प्रकाशन को क्योँ महत्त्व नहीं दिया गया?

    18. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद को भारतीय संस्कृति का रक्षक घोषित करते हैं तो इस सवाल का जवाब भी मुख्यमंत्री को देना चाहिए कि पटना संग्रहालय के संस्थापकों में शामिल ब्रिटिश प्रशासकों की प्रतिमा पटना संग्रहालय में अगर स्थापित है तो पटना संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में संस्थापकों में अग्रणी भारतीय प्रतीकों की उपेक्षा क्योँ, बिहार निर्माता डॉ .सच्चिदानंद सिन्हा, काशी प्रसाद जायसवाल और महापंडित सांकृत्यायन की इस शताब्दी वर्ष में पटना संग्रहालय परिसर में ऊँची प्रतिमा क्योँ नहीं ???

    पटना संग्रहालय के अस्तित्व को बचाना भारतीय इतिहास, पुरातत्व के साथ–साथ भारतीय ज्ञान संपदा को बचाने की शिद्दत है. संपादकों, पत्रकारों, बुद्धिजीविओं, शिक्षकों, छात्रों, राजनेताओं से अपेक्षा है कि वे इस मुद्दे को गंभीरता के साथ समझने की कोशिश करें और पटना संग्रहालय को बचाने के सवाल को बिहार का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश करें .

    निवेदक

    • प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद, पूर्व राज्यपाल त्रिपुरा (संरक्षक, पटना संग्रहालय बचाओ समिति)
    • पुष्पराज, लेखक –पत्रकार (संयोजक,पटना संग्रहालय बचाओ समिति), संपर्क – 9431862080. 

    पटना संग्रहालय को बचाने के पक्ष में –

    • इरफ़ान हवीब (प्रसिद्ध इतिहासकार,अलीगढ ),
    • रोमिला थापर (प्रसिद्ध इतिहासकार ,दिल्ली ),
    • डॉ .डी.एन.झा (प्रसिद्ध इतिहासकार ,दिल्ली ),
    • डॉ.इम्तयाज अहमद (अ .प्रा.निदेशक, खुदा बख्स लाईब्रेरी, पटना ),
    • प्रोफ़ेसर चमनलाल (जेएनयू),
    • मेधा पाटकर( प्रसिद्ध समाज सेविका ),
    • एस .एस .विश्वास (अ.प्रा.महा.नेशनल म्यूजियम,दिल्ली ),
    • हरिकिशोर प्रसाद (अ.प्रा .प्रथम निदेशक, संग्रहालय बिहार ),
    • मधु सरीन( वरिष्ठ पत्रकार, न्यूयार्क ),
    • जॉन ग्लेस्बी (शिक्षाविद बर्मिघम),
    • जेम्स लोंग्चे वांग्लत ( अरुणाचल प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री ),
    • डॉ. मैनेजर पाण्डेय (प्रख्यात आलोचक ,दिल्ली ),
    • डॉ. मुरली मनोहर प्रसाद सिन्हा (दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष),
    • डॉ.रेखा अवस्थी(संपादक ,नया पथ ,दिल्ली ),
    • शेखर पाठक ( इतिहासवेत्ता एवं संपादक,पहाड़ ,नैनीताल ),
    • राजीव लोचन साह (संपादक ,नैनीताल समाचार ),
    • डॉ.चौथीराम यादव (वरिष्ठ आलोचक एवं  अ.प्रा.विभागाध्यक्ष, बीएचयू),
    • डॉ .विजय बहादुर सिंह (वरिष्ठ आलोचक ,भोपाल ),
    • प्रोफ़ेसर एजाज हुसैन (इतिहासकार, शांति निकेतन ),
    • पद्मश्री गिरिराज किशोर (व्यास सम्मान प्राप्त वरिष्ठ लेखक, कानपुर ),
    • कृष्ण कल्पित (अ.प्रा.अपर महानिदेशक ,प्रसार भारती ,दिल्ली ),
    • डॉ.हितेंद्र पटेल (प्राध्यापक ,रवीन्द्र भारती विश्व. प .बंगाल ),
    • डॉ .खगेन्द्र ठाकुर ( बिहार सरकार का शिखर सम्मान प्राप्त आलोचक ),
    • मदन कश्यप (प्रसिद्ध कवि),
    • दिनेश मिश्र (प्रख्यात नदी विशेषज्ञ एवं सदस्य नमामि गंगा परियोजना, भारत सरकार ),
    • डॉ. जगन्नाथ मिश्र (पूर्व मुख्यमंत्री ,बिहार ),
    • मार्शल डॉ.विमल सूर्य चिमणकर (केन्द्रीय संगठक,समता सैनिक दल .नागपुर ),
    • भंते रेवत दीक्षाभूमि(प्रसिद्ध बुद्धिस्ट,महाराष्ट्र ),
    • विकास नारायण राय ( अ.प्रा.पुलिस महा. हरियाणा ),
    • कुमार प्रशांत (वरिष्ठ पत्रकार एवं सचिव ,गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली),
    • डॉ.रविभूषण (वरिष्ठ लेखक एवं स्तंभकार),
    • जयप्रकाश धूमकेतु (संपादक, अभिनव कदम; सचिव, राहुल सांकृत्यायन पीठ मऊ, ऊ.प्र.),
    • के .के शर्मा (अ.प्रा.क्यूरेटर ,पटना संग्रहालय ),
    • सुधांशु रंजन (वरिष्ठ पत्रकार ,दिल्ली ),
    • सोनिया जब्बर (लेखिका ,दिल्ली ),
    • गौरीनाथ (संपादक ,बया ),
    • अंशुल छत्रपति (सम्पादक ,पूरा सच ,सिरसा ),
    • लेखराज ढ़ोठ (वरिष्ठ अधिवक्ता ,सिरसा ),
    • ए.के जैन ( प्रसिद्ध व्हिसिल ब्लोवर ,दिल्ली ),
    • आशुतोष मिश्र (अधिवक्ता,सुप्रीम कोर्ट ,दिल्ली ),
    • आशा काचरू (अ.प्रा.प्रो.जर्मनी ),
    • तरसेन पाल (कृषक नेता ,जम्मू ),
    • जीत गुहा नियोगी ( श्रमिक नेता ,छत्तीसगढ़ मुक्तिमोर्चा ,दल्ली राजहारा ),
    • कर्नल बी .सी लाहिरी (प्रतिष्ठित कवि-लेखक,कोलकाता),
    • विजय शर्मा (लेखक ,कोलकाता ),
    • स्वदेश दास अधिकारी (कृषक नेता ,नंदीग्राम ),
    • पलाश विश्वास (वरिष्ठ पत्रकार ,कोलकाता ),
    • कपिल आर्य (वरिष्ठ लेखक ,कोलकाता ),
    • सरुर अहमद (वरिष्ठ पत्रकार ,पटना ),
    • रणजीव (नदी विशेषज्ञ,पटना ),
    • कुणाल (राज्य सचिव, भाकपा (माले, बिहार),
    • अवधेश कुमार (राज्य सचिव, माकपा, बिहार),
    • सत्यनारायण सिंह (राज्य सचिव ,भाकपा, बिहार ),
    • अरुण सिंह (राज्य सचिव, एसयूसीआई, (कम्युनिस्ट) बिहार )
    • अशोक सिन्हा (केदार दास श्रम एवं शोध संस्थान,पटना ),
    • सुमंत (भारतीय सांस्कृतिक सहयोग मैत्री संघ,पटना ),
    • जया सांकृत्यायन, प्रो .जेता सांकृत्यायन,
    • अनिल जायसवाल ( पटना उच्च न्यायालय में अधिवक्ता एवं प्रसिद्ध इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल के पौत्र ),
    • प्रो .एस .के गांगुली (अ .प्रा .केमेस्ट्री ,पटना वि.)
    • शाह आलम (पीपुल्स फिल्म मेकर, चम्बल ),
    • पुखराज (टेलीविजन पत्रकार, हैदराबाद ),
    • डॉ .राजेन्द्र प्रसाद सिंह (संपादक, तीस्ता हिमालय, सिल्लीगुड़ी)

    Patna Museum, Bihar

    Pushpraj