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  • जब मै कहूँगा, प्रेम !

    जब मै कहूँगा, प्रेम !

    Kashyap Kishor Mishra

    जब मै कहूँगा, प्रेम !
    वो लाड़ होगा माँ का |
    स्नेह की गुनगुन से फदकता
    बोरसी में औटाये दूध सा सौंधा|

    बहन का नेह होगा,
    सुबह बम्बे का नरम जल
    ओस से भीगा कमल
    मृदु और कोमल |

    होगा वह नदिया का जल
    उज्जवल छलछल निर्मल |

    सुबह की धूप होगा,
    जिसकी नरम सेंक, मोहक |

    प्रेम !
    माँ की मालिश है,
    है भईया का दुलार|

    नाजुक, सुलगते कंडे से निकाली
    घी टपकाई मुलायम लिट्टी के साथ
    हिंग-जीरा का दाल में, अलग से बघार|

    Kashyap Kishor Mishra

    किसी डगर पर सावधान करती,
    एक अनजान काका की गोहार है, प्रेम |
    तो कभी, साहून काकी का दिया
    घलुआ अचार है, प्रेम |
    प्रेम, मंदिर में रहती
    परित्यक्त जलपा दादी
    का वो आशीष है,
    जो वो गावँ के हर बच्चे को देती है,
    अपने नाती-पोते सोचती है|

    भरी दुपहरी में मनुआ का
    टीप कर तोड़ा मीठा आम
    बारहा मिलता रहा,
    प्रेम के नाम |

    प्रेम,
    दादी की मनुहार होगा
    डांट फटकार होगा |
    और फिर धीरे से
    दी गई, आखिरी चवन्नी होगा |

    यूँ ही प्रेम कहते समझते,
    आखीर में तुमतक आऊंगा
    तुमसे पूछूँगा, प्रेम?
    और तुम कहोगी,
    धत, पागल!
    प्रेम बस किया जाता है।