Dr Mukesh Kumar “Mukul”
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अरे वो बसंत…
तू आते हो, इठलाते हो,
ठण्ड की मार भगाते हो,
वसुंधरा को सजाते हो,
प्रेम का राग जगाते हो।
अरे वो बसंत…
पल में पतझर को रुखसत कर,
चहुँ ओर हरियाली बिछाते हो,
उत्सव और उल्लास भरकर,
जीवन को सजाते हो,
दूर भगाकर आलस तन-मन से,
जज्बातो को जगाते हो,
अरे वो बसंत…
प्रेम-राग का तान छेड़कर,
क्यूँ मन को हर्षाते हो?
प्रियतमा की बाँहो सा,
तुम स्नेह सब पर लुटाते हो,
तन-मन प्रफ्फुलित कर प्रेम-रस में,
फिर क्यूँ “मुकुल” को तड़पाते हो?
अरे वो बसंत…
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