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  • रक्षाबंधन — Er Brij Umrao

    रक्षाबंधन — Er Brij Umrao

    Er Brij Umrao

    भाई बहन का प्यार,
    यह राखी का त्योहार।
    बहना दूर से चलकर आई,
    कम न हो अपना प्यार।।

    प्रेम प्यार सुचिता का संगम,
    न हो मलाल मन में जड़ जंगम।
    भ्रात प्रेम की धारा बहती,
    मन में न साल न कोई गम।।

    नहीं कामना कुछ पाने की,
    भैया तू निश्चिंत रहे।
    प्रेम दिवस पर मिल तेरे से,
    हर पलछिन आनंद रहे।।

    स्नेह प्रेम की यह गंगा,
    अविरल बहती रहे सदा।
    मिल जाना जब सुमिरन आये,
    यहां-वहां यूं यदा कदा।।

    स्नेह प्यार का यह सागर,
    लहरों से संस्कारित हो।
    ज्यों दरार पटती वर्षा से,
    आत्म प्रेम आधारित हो।।

    धन वैभव नेपथ्य की बातें,
    सुमधुर सागर उमड़ रहा।
    ज्यों नदिया दरिया से मिलती,
    नभ में बादल घुमड़ रहा।।

    अश्क बह रहे गालों पर,
    आंखों में शैलाब उठा।
    खुशियों की धारा बह निकली,
    दोनों को ही जुदा जुदा।।

    शक की कहीं भी जगह न हो,
    आशंका भागे दूर दूर।
    प्रीति की डोर बंधे ऐसी,
    तन मन हो जाये मजबूर।।

    आशा विश्वास प्रेम श्रद्धा,
    इर्द गिर्द पहरा देती।
    स्नेह प्रेम की धार बहे,
    तन मन को नहला देती।।

    Er Brij Umrao

  • संस्कार — Er Brij Umrao

    संस्कार — Er Brij Umrao

    Er Brij Umrao

    जन्म प्रक्रिया से शूदक हो,
    संस्कार से होता पावन।
    प्रेम प्यार स्नेह समर्पण,
    अन्तर्मन होता उत्प्लावन।।

    संस्कार से सेवित शिशु की,
    अपनी छटा निराली।
    तीक्ष्ण बुद्धि कौशल की मूरत,
    पुण्य पल्लवित डाली।।

    तीन ऋणों को साथ ले चले,
    देव पित्र अरु गुरु का कर्ज।
    सेवा में तीनों के तत्पर,
    सदा निभाता अपना फर्ज।।

    पुष्पित पोषण स्वस्थ संरक्षण,
    शिशु को करे प्रभावित।
    आदर्श संस्कृति से पोषित,
    प्रेम रस रहे प्रवाहित।।

    उन्नत पोषित पौधा हो,
    विराट वृक्ष बन जाता।
    पर्यावरण संरक्षा करता,
    जग की सेवा करता।।

    काम, क्रोध और लोभ,
    मोह, ईर्ष्या का संगम।
    सोंच को कर देते दूषित,
    मन भी हो जाता जड़ जंगम।।

    जीवन के झंझावातों से,
    हरदम होता है दो चार।
    वैदिक संस्कृति संस्कार को,
    नमन करे वह बारंबार।।

    आदर्श राह का राही बन,
    सर्वोच्च शिखर तक जाता।
    मात पिता गुरु का संरक्षण,
    सच्ची राह बताता।।

    सुमधुर, सुन्दर सदा सुहावन,
    पोषित पुरुषार्थ तुम्हारा ।
    अग्रिम पंक्ति में तुम चलते,
    पीछे घूमें जग सारा।।

    Er Brij Umrao