Anuj Agarwal
यूं तो यह खबर उत्तर प्रदेश की है कि वहाँ के 32 इंजनियरिंग व मैनेजमेंट कॉलेज बंद हो रहे हैं, मगर कुछ ऐसी ही खबर देश के प्रत्येक राज्य में छप रही हैं। इस बर्ष एआईसीटीई से सम्बद्ध 10,300 कॉलेजो में से दस प्रतिशत यानि एक हज़ार से ज्यादा बंद हो रहे हैं। डायलॉग इंडिया ने अपने निजी संस्थानों के बार्षिक सर्वेक्षण : 2017 में यह खुलासा किया भी था कि अगले चार वर्षों में आधे से ज्यादा तकनीकी संस्थान बंद होने वाले हैं। सच्चाई यह है कि देश के लगभग 4000 तकनीकी शिक्षा संस्थान बंद होने के कगार पर है किंतू उनमें पढ़ रहे प्रथम , द्वितीय व तृतीय वर्ष के विद्यार्थियों का कोर्स बाकी है, इसलिए एकदम से बंद नहीं कर सकते। फिर सवाल सरकार की इज़्ज़त का है।
ऐसा इन संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व रोजगार न दिला पाने के कारण भी हो रहा है। (देश के निजी विश्विद्यालयों ने भी परिदृश्य बदला है और इनमें से 5 लाख सीटे के भागीदार वे भी हैं और 2 से 3 लाख रोजगार भी।) वहाँ भी दिए जाने वाले रोजगार के मुकाबले दुगनी सीटें उपलब्ध हैं। एआइसीटीई खुद मानती है कि उससे संबद्ध संस्थानों में 37 लाख सीटें है किंतू प्रवेश केवल 20 लाख ही हो पाते हैं। ये भी माल कमाने के लालच में बच्चो व माता पिता को बहला फुसला कर, सब्जबाग दिखलाकर। इसी कारण अयोग्य विद्यार्थी प्रवेश तो ले लेता है किंतू कुछ समय बात ही पढ़ाई छोड़ देता है। ऐसे विद्यार्थियों की संख्या 7 लाख प्रतिबर्ष है यानि कुल प्रवेश का 35 प्रतिशत।
अंदाज़ा लगाइए कितने बड़े सुनियोजित धोखे व लूट होती हैं नयी पीढ़ी के साथ। जैसे तैसे जो 13 लाख लोग डिग्री ले भी पाते हैं उनमें से आधे यानि 6 से 7 लाख नोकरी लायक नहीं होते और बेरोजगार रह जाते हैं। जिन 6-7 लाख विद्यार्थियों को नोकरी मिलती भी है उनमें से 1 से 2 लाख ही जॉब सेटिस्फेक्शन महसूस कर पाते है और बाकि कुढ़ते जलते संघर्ष करते रहते हैं।
यह सरकारों के नीतिकारों पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है कि जब देश को 6 से 7 लाख ही इंजीनियरिंग व मैनेजमेंट पास लोग चाहिए तो 37 लाख सीटों का ढांचा जो लाखों करोड़ रुपये खर्चकर क्यों तैयार किया गया? फिर इतने संसाधनों व समय, धन व युवाओं की ऊर्जा क्यो बर्बाद की जा रही है? किसकी जबाबदेही है इस सुनियोजित सिंडिकेट की लूट व षड्यंत्र की?
मजेदार बात यह है कि देश के हर नेता, नोकरशाह, उद्योगपति व व्यापारी की इन संस्थानों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष पत्ती यानी हिस्सेदारी है। कितनी हास्यास्पद बात है कि हमारे देश मे एक करोड़ लोग इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं और देश का दो तिहाई हिस्सा आज भी अत्यधिक पिछड़ा है। बिना शिक्षा के भारतीयकरण के शोध, इन्नोवेशन, इंट्रप्रेनेरशिप, औधोगिकरण के अभाव के आयात आधारित अर्थव्यवस्था का यही हाल होना ही है। मोदी सरकार लाख मेक इन इंडिया का घंटा बजाती रहे।
Anuj Agarwal
Editor, Dialogue India
General Secretary, MAULIK BHARAT


