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  • सरकारी नौकरी प्रतियोगी परीक्षा के छात्र की कहानी — Er Akhilesh Pradhan

    सरकारी नौकरी प्रतियोगी परीक्षा के छात्र की कहानी — Er Akhilesh Pradhan

    Er Akhilesh Pradhan

    अगर पाठक भावुक कर देने वाले किसी लेख की उम्मीद में हैं तो आपको इस लेख का पहला पैराग्राफ ही निराश कर सकता है, इसलिए आप यहीं से पढ़ना बंद कर सकते हैं।

    एक प्रतियोगी परीक्षा का छात्र ग्रेजुएट होने के बाद जिस दिन सरकारी नौकरी की चाह में कोंचिग/ट्यूशन लेना शुरू करता है। पहले दिन से ही उसके भीतर की अभूतपूर्व संभावनाओं का ह्रास होना शुरू हो जाता है। प्रतियोगिता शब्द का महत्व उसे पहले दिन से ही समझा दिया जाता है कि यह एक ऐसी लंबी रेस है, जिसमें पूरी सहजता से, विनम्रता से अपने आसपास के वातावरण को, उसमें उपस्थित सभी तत्वों को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ना है। उतना ही देखना सुनना जानना है जितना आपकी इस रेस के लिए आवश्यक है। इसके अलावा आपको निरंतर छंटनी करने की प्रक्रिया से गुजरना है।

    आगे बढ़ने की इस कसौटी में आपको सबसे पहले अपनी सामाजिकता गिरवीं रखनी होती है। परिवार, मित्र, समाज इन सबको कुछ समय के लिए किनारे रखना होता है, क्योंकि इस अंधी रेस में अमूमन माना‌ यह जाता है कि आप जिस समाज का हिस्सा हैं वह इतना असंवेदनशील है कि वहाँ ये तत्व आपकी बेशकीमती पढ़ाई में आवश्यक व्यवधान पैदा करने के लिए ही बने हुए हैं। यह मानते हुए भी छात्र समाजशास्त्र का क,ख,ग समझ लेता है। पढ़ाई के दौरान ऐसे विरोधाभास आपको हर शास्त्र में मिलते हैं चाहे वह भौतिकशास्त्र हो, खगोलशास्त्र हो, राजनीति शास्त्र हो, अर्थशास्त्र हो या फिर दर्शनशास्त्र। आप इन विरोधाभासों के बीच बुरी तरीके से उलझते जाते हैं, लेकिन आपको इसका इंच मात्र भी आभास नहीं होने दिया जाता है क्योंकि नौकरी पा लेने की महत्वाकांक्षा को आपके मस्तिष्क में एक ऐसे चिप की भांति फिट कर दिया जाता है जो समय-समय पर आपके लिए खाद पानी का काम करता है, लेकिन उसकी भी एक सीमा होती है। आपके भीतर जो संभावनाओं के भ्रूण पैदा हो सकते थे, वे जन्म से पूर्व ही मृत्यु को प्यारे हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में अपने भीतर की संभावनाओं को मूर्त रूप में बचाना ठीक कुछ वैसा ही है कि पानी में आप तैर भी रहे हैं और अपने शरीर में आपको पानी की बूंदों का स्पर्श तक नहीं चाहिए।

    एक प्रतियोगी छात्र अपने पूरी तैयारी के दौरान अगर किसी शब्द से सबसे ज्यादा मुखातिब होता है तो वह है “वस्तुनिष्ठ” या “आॅब्जेक्टिव” । मूलमंत्र यह है कि जितना वह वस्तुनिष्ठ प्रश्नों से धींगामुस्ती करेगा, उसके प्रमेय को समझेगा, उतनी शीघ्रता से वह कुछ हासिल कर जाएगा। लेकिन इसमें भी आप विडम्बना देखें कि वह आजीवन इस शब्द का का मर्म ही समझ नहीं पाता है। क्योंकि संभावनाओं के समुद्र को सोखने की तैयारी पहले दिन से ही शुरू हो जाती है।

    उदाहरण के लिए देखें कि एक प्रतियोगी छात्र के सम्मुख किताबों के बाद दूसरी सबसे जरूरी चीज न्यूजपेपर होती है। न्यूजपेपर पढ़ने की भी उसे कला बताई जाती है, यहाँ भी उसे नजरबंद किया जाता है, जैसे आपको सिर्फ रूटिन तरीके से संपादकीय ही पढ़ना है और इसके अलावा देश-विदेश, खेल और अर्थशास्त्र से जुड़ी कुछ छुटपुट खबरें। इसके अलावा आपको देश, समाज, मोहल्ले की तमाम घटनाओं को पढ़ना छोड़िए, उनके प्रति उपेक्षा रखनी होती है, प्रतिक्रिया देना तो दूर की बात हो गई, आपको सोचने की भी मनाही होती है, क्योंकि इससे आपके मशीन बनने का कोई खास संबंध नहीं होता है। वास्तव में होना यह चाहिए कि आपको दृष्टा भाव से वस्तुनिष्ठता के साथ घटनाओं को देखना सीखाना चाहिए लेकिन होता इसका उल्टा है आपको सबजेक्टिव बनाया जाता है, गलती से कहीं आप सबजेक्ट से अलग भटकने का प्रयास भी करते हैं तो आपको उलाहना दी जाती है, ताकि आप सीधे से लाइन पर आ जाएं। यहीं से आपकी ऑब्जेक्टिविटी की धज्जियाँ उड़नी शुरू हो जाती है।

    वस्तुनिष्ठता को लेकर अभी हाल-फिलहाल का एक उदाहरण देता हूं-

    मेरा एक बचपन का मित्र है, मित्र कम भाई ज्यादा है, रेल्वे में कार्यरत है, अभी जब ट्रेन में हो रही अव्यवस्थाओं की वजह से सैकड़ों मजदूरों की मौत हुई, तो उस पेपर कटिंग को मैंने सोशल मीडिया में अपलोड किया, मेरे मित्र की प्रतिक्रिया यह रही – “हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, हमें स्याह पहलू को हटाकर, उस अच्छे पहलू को भी देखना चाहिए कि लाखों मजदूर घर भी तो पहुंचे हैं।” मैं अपने मित्र की इस प्रतिक्रिया से अवाक रह गया। मैंने जवाब में कहा – कहो तो घर पहुंचने वाले लोगों की संख्या से मौतों की संख्या को भाग देकर प्रतिशत निकालें। सीधी सपाट चीज है, हम ऐसे क्यों हो गये हैं कि एक इंसान की मृत्यु भी हमें दिखाई नहीं देती है, मृत्यु मृत्यु है बस, अब हम इसमें भी ऐसे सिक्के पहलू जैसे बेफिजूल के तर्क घुसेड़ेंगे क्या। मित्र ने फिर कहा – रेल्वे की जो क्षमता है वह उस हिसाब से अपना बेस्ट दे रही है। मित्र के इस जवाब के बाद मेरे पास अब बोलने के लिए कुछ नहीं रह गया था। गलती मेरे मित्र की भी नहीं है, वह सिस्टम का हिस्सा बन चुका है, वह उतना ही सोच पाता है, जितना उसे सोचने के लिए कहा जाता है, सोच के स्तर पर भी वह सीमा नहीं लांघ पाता है। अन्यथा एक रेल्वे कर्मचारी से इतर उसके भीतर का एक आम इंसान यह कहता कि इतने लोगों की मौत एक बहुत बड़ी मानवीय चूक है, रेल्वे के लिए यह शर्मिंदगी का विषय है, रेल्वे को इसके लिए बकायदा माफी माँगनी चाहिए। वह शोक जताता, पीड़ा होती उसे, यह पीड़ा उसके शब्दों से उभर कर आती, एक रेल्वे कर्मचारी होने के नाते वह ग्लानि से भर जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, उल्टे उसने जस्टिफाई किया, क्योंकि चीजों को जस का तस देखने के विरूध्द जो आवश्यक प्रतिबंध होते हैं वह व्यवस्था ने बहुत पहले ही उस पर लगा दिए हैं। दोष उसका नहीं है, उसकी ट्रेनिंग ही ऐसी हुई है। इसलिए वह चाहकर भी आॅब्जेक्टिव नहीं हो पाता है, शायद सबजेक्टिव होना ही उसकी नियति में है।

    वास्तव में देखा जाए तो सही को सही और गलत को गलत देखना एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र की डिक्शनरी में होता ही नहीं है, भले वह इनके होने करने का प्रपंच कर सकता है, लेकिन धरातल में ऐसा कुछ नहीं होता है। असल में उसकी डिक्शनरी में होती है विवेचना, समालोचना, चैक एंड बैलेंस, योग्यता, सफलता और इस जैसी ढेरों लोकलुभावन शब्दावलियाँ, जो आगे जाकर उसे मशीनरी में फिट करती हैं, जिसकी वह आजीवन पालना करता है।

    जिजीविषा से भरे, कुछ विरले, कुछ एक अपवाद स्वरूप मेरे मित्र हैं, जो सरकारी नौकरी में हैं, वे बार-बार कहते हैं – हमारी ट्रेनिंग में ही हमें शोषणकारी तंत्र की पृष्ठभूमि समझा दी जाती है, असल‌ में प्रबंधन के नाम पर हम कुप्रबंधन के विशेषज्ञ होते हैं। हमें ईशारों में ही समझा दिया जाता है कि व्यवस्था के नाम पर हमें निरंतर अव्यवस्था को सुचारू रूप से संभालना है। हमें वस्तुस्थिति को “दृष्टा भाव” से नहीं वरन् “समता भाव” से देखना होता है, ट्रेनिंग के दौरान ही जब हमें यही सब सिखाया जाता है तो आगे जाकर हममें से अधिकांश लोग दफ्तर या फील्ड में क्या क्या करते होंगे अंदाजा लगा लीजिए। मैं उनकी इस बात पर असहमति जताते हुए इतना ही कहूंगा कि “आपकी ट्रेनिंग उसी दिन से शुरू हो जाती है जब आप सरकारी नौकरी की तैयारी के इस दलदल में कूदते हैं, ट्रेनिंग ऐसा औपचारिक पड़ाव है, जहाँ आपके व्यक्तित्व का अंतिम प्रमाणीकरण होता है।”

    Er Akhilesh Pradhan

  • ऐसा लगा जैसे मैंने पहाड़ को थोड़ा भी नहीं समझा है

    ऐसा लगा जैसे मैंने पहाड़ को थोड़ा भी नहीं समझा है

    Akhilesh Pradhan 

     रोज की तरह कल नंदा देवी मंदिर परिसर जाना हुआ। नंदा देवी मंदिर मुनस्यारी के डानाधार क्षेत्र में अवस्थित है। तो जब मैं मंदिर से नीचे उतर रहा था तो मंदिर परिसर के मुख्य द्वार पर एक पोस्टर लगा हुआ था, वह पोस्टर सप्ताह भर पहले हुए किसी इवेंट से संबंधित था। उस पोस्टर को वहाँ चिपका देखकर मेरे मन में दो ख्याल आए, पहला यह कि ये कार्यक्रम तो कब का समाप्त हो चुका है, तो इसे यहाँ से निकाला जा सकता है, दूसरा यह कि मंदिर परिसर के मुख्य द्वार पर ये कहीं से भी सही नहीं लग रहा है, यूं कहें कि अशोभनीय सा लगा।
     
    अब जैसे ही मैं उस पोस्टर को वहाँ से निकाल‌ रहा था, उतने ही समय वहाँ से दो महिलाएँ गुजर रही थी, उन्होंने मुझे आश्चर्य भाव से कहा – भैया आप पोस्टर को क्यों निकाल रहे हैं। वैसे पहाड़ के लोग आश्चर्य भाव से ही पूछते हैं, गुस्से या धमकाने का भाव आपको मिलेगा ही नहीं।
    मैंने उन्हें जवाब में कहा – दीदी ये प्रोग्राम तो हो चुका है।
    फिर उन्होंने कहा – फिर भी क्यों निकाला भैया।
    मैं उनके इस सवाल‌ से चुप सा हो गया, मैंने आंखे फेर ली और वहीं हमारे एक दोस्त की गाड़ी में बैठकर वहाँ से निकल गया।
     
    गाड़ी एक किलोमीटर से अधिक चल चुकी थी, मुझे अचानक महसूस हुआ कि ये मैंने क्या कर दिया। मुझे उनका बोलने का तरीका,उनके चेहरे के भाव याद आने लगे। फिर मैंने अपने दोस्त को बहाना मारकर गाड़ी रोकने को कहा और उसे आगे जाने को‌ कह दिया। अब वहाँ से मैं पैदल वापस उन दो महिलाओं के पास गया। मुझे पता नहीं क्यों ऐसा महसूस हो रहा था कि शायद मेरे द्वारा उन्हें चोट पहुंची है। मैं जब उनके पास पहुंचा तो मैंने उन्हें पहाड़ी परंपरा के अनुसार दोनों हाथों से नमस्ते करते हुए कहा – दीदी, मैं कोई बाहर से आने वाला टूरिस्ट जैसा नहीं हूं, पिछले चार साल से यहां आ रहा हूं, यहाँ बच्चों को मुफ्त में पढ़ाता भी हूं, यहाँ के लोगों के जीवनस्तर को सुधारने के लिए प्रयास भी कर रहा हूं, मुझे टूरिस्ट मत समझना दीदी, मैं तो अब यहीं का‌ हो गया हूं। शायद मेरे पोस्टर निकालने से आपको अच्छा नहीं लगा होगा, मुझे माफ कर दीजिएगा। मैं उसे वापस फिर से वहीं चिपका देता हूं, इसलिए मैं वापस लौटकर आया हूं।
     
    दीदी ने मुस्कुराते हुए जवाब में कहा – अरे! नहीं भैया, वो तो पुराना हो चुका है, उसको और क्या चिपकाना हुआ, रहने दो। फिर उन्होंने चिंता जाहिर करने के भाव से कहा – लोग तो इन पहाड़ों का पता नहीं क्या क्या कर जाते हैं भैया। बाहर से लोग आकर फूल, पौधे तहस नहस करते हैं, तोड़कर ले जाते हैं। पता नहीं क्या क्या उल्टा पुल्टा जो करते हैं लोग, कैसा जो मजा आता होगा उनको ऐसा करके। ऐसा कहते हुए उन्होंने एक‌ विस्मयकारी मुस्कुराहट फेरी और उतने ही समय वहाँ सामान जोहने वाली मैक्स की एक गाड़ी आ रही थी, उन्होंने हाथ फेरते हुए उस गाड़ी को रोका और दौड़ते हंसते उसमें लिफ्ट लेकर वो चली गईं। उस मैक्स की गाड़ी के ठीक पीछे से जो एक टूरिस्ट गाड़ी आ रही थी, उसमें बैठे कुछ लोग इस दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे, मुझे पता नहीं क्यों उन टूरिस्ट लोगों के इस तरीके को देखकर हंसी आ गई।

    आपको लग रहा होगा कि एक पुराने पोस्टर फाड़ने को लेकर, यानि इतनी छोटी सी बात के लिए कौन इतनी मेहनत करे। ये भी कोई बात हुई क्या। लेकिन आप पहाड़ को समझने की कोशिश करेंगे तो लगेगा कि ये ध्यान देने योग्य बात है। मैंने पहाड़ी लोगों के मन को देखा है, वे अपने में मस्त रहते हैं, वे आपसे कभी नाराज नहीं होंगे, वे आपको बस प्रेमभाव से बोल देंगे, अब वो हम पर होता है कि हम सही गलत समझ पाते हैं या नहीं। काश, काश मुझमें ये क्षमता होती कि दीदी के उस अपनेपन और सरलता से परिपूर्ण भाषायी अंदाज, उस बोलने के तरीके को आपके सामने लिख कर बता पाता, काश मैं भाषायी विस्तार दे पाता उनके चेहरे की उस मासूमियत को। आप भी कहते कि दुनिया में आज भी ऐसी चीजें बची हुई हैं क्या? खैर..।

    उस दीदी ने जब मुझसे कहा कि पोस्टर का डेट जा चुका है, फिर भी आपने क्यों फाड़ा भैया? इसका सीधा सा अर्थ यह था कि मुझे कोई हक नहीं बनता है कि मैं उस पोस्टर को‌ वहाँ से हटाऊं। यानि उन्होंने तो मुझे अन्य लोगों की तरह एक बाहरी असभ्य टूरिस्ट ही समझा होगा। उनके ऐसा सवाल करने का सिर्फ और सिर्फ यही अर्थ हुआ कि उस पोस्टर को निकालना कम‌ से कम मेरे अधिकार क्षेत्र में तो नहीं था। यानि मैं कौन हुआ उनके सही गलत का निर्धारण करने वाला। असल में बात सिर्फ उस टुच्चे से पोस्टर को हटाने की नहीं है, पिछले कुछ सालों से जो बाहर से यहाँ टूरिस्ट आते थे, उन्होंने खूब उत्पात मचाया हुआ है, कोई खेतों में राजमा, जड़ी बूटी आदि की पौध को उखाड़ कर ले जाते, फल हुआ नहीं रहता था और तोड़ देते। बाहरी लोगों के स्वार्थ और लिप्सा की वजह से ऐसी चीजें लगातार होती आई है तो लोगों के मन में भी यही बैठ गया है कि अधिकतर बाहर मैदानों से आने वाले टूरिस्ट तो ऐसे ही होते हैं।

    मैं पूरे भरोसे से कहता हूं कि अगर इतिहास में ऐसी बदमाशियां नहीं हुई होती तो उस दीदी को मेरे पोस्टर फाड़ने पर सवाल नहीं करना पड़ता। उनका मुझे सवाल करना इस बात का संकेत था कि – –
    -आप कैसे से जो हो गये हैं,
    -पहाड़ को भी अपने शहरों की तरह समझने लगते हैं,
    -आपके बस का नहीं हुआ हम‌ पहाड़ी लोगों के मन को समझना।

    Akhilesh Pradhan


    Akhilesh Pradhan