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  • जो भारत के कालाधन की वास्तविकता का केवल ककहरा ही समझते हैं मेरा दावा है कि वे यह भी समझते हैं कि सस्ती लोकप्रियता वाले चोचले कालाधन का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते उल्टे कालेधन के नेक्सस को मजबूती व सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं

    सामाजिक यायावर


    मोटा-मोटी समझा जाए तो भारत में कालाधन दो प्रकार का होता है। लेख को पढ़ने के बाद आप स्वयं ही तय कर लें कि क्या सतही चोचलेबाजी से वास्तविक कालेधन पर नियंत्रण संभव है। सतही चोचलेबाजी से उल्टे वास्तविक कालाधन व कालाधन रखने वाला अधिक सुरक्षित व ताकतवर होता जाता है। लोगों की नजरों में कालाधन न रखने के रूप में सदचरित्रता का प्रमाणपत्र ऊपर से मिल जाता है।

    लेखाजोखा की चतुराई से पैदा किया गया कालाधन

    ऐसा कालाधन आयकर से बचने के लिए आय को कम बता कर आयकर न दिए जाने के कारण बनता है। इस प्रकार के कालाधन में कम से कम 70 % हिस्सा कालाधन नहीं होता है। क्योंकि यदि आय आयकर की सबसे ऊपर वाली स्लैब में भी आती है तो भी आयकर 30% ही होगा। इस प्रकार वाले काला धन में अधिकतम केवल 30% की ही आयकर चोरी संभव होती है। इसमें आम आदमी के विकास के लिए सार्वनजिक संपत्तियों की चोरी, देश की संपत्ति पर कब्जा, देश के लोगों का संगठित रूप से शोषण, प्रताड़ना आदि की मात्रा न के बराबर रहती है।

    इस प्रकार का कालाधन भारत के सभी व्यापारियों के पास होता है। चाहे वह छोटा हो या बड़ा। छोटे कस्बे का हो या मेट्रो शहरों का। पूरे देश में कुछेक अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो गांव से लेकर देश की राजधानी तक भारत के सभी व्यापारी बिक्री व आय कर की चोरी करते हैं। इस प्रकार का कालाधन उन लोगों के पास भी होता है जो कंपनियों में नौकरियां करते हैं और कभी-कभार अवसर मिलने पर फर्जी बिल लगा कर अपने पास कुछ पैसा बना लेते हैं।

    इस प्रकार के कालाधन में सार्वजनिक संपत्तियों, राष्ट्र की संपत्तियों पर कब्जा नहीं होता है, लोगों का शोषण नहीं होता है, हिंसा नहीं होती है, धूर्तता नहीं होती है। केवल कर चोरी होती है वह भी लिखापढ़ी की चतुराई व पारस्परिक निर्भरता से, मसलन खरीदार भी खुश होता है कि उसका वैट बच गया क्योंकि पक्का बिल नहीं बना। लगभग सभी स्तरों पर इस प्रकार के कालेधन की पैदाइश होती है।

    इस प्रकार का कालाधन जल्दी पकड़ाई में आ जाता है क्योंकि व्यापार के लिए व्यापारियों को कैश इन हैंड रखना होता है क्योंकि हर स्तर पर व्यापार कैश इन हैंड ही होता है ताकि बिक्री व आय कर से बचा जा सके। बहुत ऐसे व्यापार हैं जिनका चरित्र ही ऐसा होता है कि पूरा का पूरा व्यापार ही कैश इन हैँड से चलता है, व्यापारी चाहे तब भी वह बिल-वाउचर नहीं बना सकता है, संभव ही नहीं। इसलिए व्यापारी के न चाहते हुए भी उसके पास का धन तकनीकी रूप से कालाधन की श्रेणी में आ जाता है।

    बिक्रीकर के अधिकारियों, विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारियों व आयकर के अधिकारियों को दी जाने वाली घूस जो देनी ही है अन्यथा उनसे बिना मतलब की परेशानी लगातार झेलनी पड़ती है। यह राशि बिना बिल बाउचर में झोल किए हुए पैदा ही नहीं की जा सकती है। भारत में सरकारी अधिकारियों को इतने अधिक अधिकार हैं कि एक झटके में दशकों से चली आ रहे व्यापार को ताला पड़वा सकते हैं।

    इस प्रकार का कालाधन स्वेच्छा से कई गई कर चोरी व लालफीताशाही के प्रपंचों व प्रताड़नाओं की विवशता के कारण उत्पन्न होता है।

    धूर्तता, बर्बरता, क्रूरता व भ्रष्टाचार के व्यापक नेक्सस से पैदा किया गया कालाधन

    इस प्रकार का कालाधन भ्रष्टाचार, नौकरशाही के सामंती अधिकार, सत्ता प्रतिष्ठानों के साथ व्यापक नेक्सस आदि से उत्पन्न होता है। इस प्रकार के कालेधन में हर एक पैसा कालाधन होता है और बिना अपवाद सारा का सारा कालाधन सार्वजनिक संपत्तियों व राष्ट्र की संपत्तियों पर कब्जे, देश के लोगों के शोषण व प्रताड़ना तथा बर्बरता व निर्लज्जता से पैदा किया जाता है।

    इस प्रकार का कालाधन बहुत अधिक खतरनाक होता है। भारत में नेक्सस इतना तगड़ा है कि इस कालाधन को साबित करना बिलकुल ही असंभव है। कालाधन रखने वाले मूछों में ताव देते हुए बाकायदा खुद को ईमानदार घोषित करते हुए रहते हैं, क्योंकि उनको पता है कि उनके पास कालाधन है यह साबित हो ही नहीं सकता है। इनको खुद पर नहीं नेक्सस पर विश्वास होता है।

    चूंकि हर स्तर पर नेक्सस है इसलिए लिखापढ़ी काफी दुरुस्त रहती है, या तो सभी पकड़े जाएं या कोई नहीं। इस नेक्सस में व्यापारी, NGO, मानवाधिकार कार्यकर्ता, मीडिया, न्यायपालिका, कार्यपालिका व विधायिका सभी गुथ्थमगुत्था हैं।

    इस प्रकार के कालेधन की उत्पादन की सबसे महत्वपूर्ण व मूलभूत कड़ी हर स्तर पर भारत की नौकरशाही है। बिना इस कड़ी के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। भ्रष्टाचार की जांच भी यही कड़ी करती है, भ्रष्टाचार के आरोपों पर कार्यवाही करने का अधिकार भी इसी कड़ी के पास रहते हैं। न्यायपालिका भी नौकरशाही ही है। सार्वजनिक व राष्ट्रीय संपत्तियों के संदर्भ में नीतियां बनाने का अधिकार भी इसी कड़ी के पास रहते हैं। बहुत गहरा व व्यापक नेक्सस है, इस नेक्सस को छुआ नहीं जा सकता, बिलकुल सुरक्षित नेक्सस। इनमें हर स्तर पर कालाधन पैदा करने वाली कड़ियों में तीन प्रमुख हैं। मीडिया को इनमें इसलिए नहीं रख रहा क्योंकि ऊपर के लेवल की बात यदि छोड़ दी जाए तो पत्रकारों के पास छोटा हिस्सा ही आ पाता है जबकि बदनामी अधिक पाता है।

    व्यापारी व NGO 

    मैं व्यापारी व NGO को इसलिए एक साथ रख रहा हूं क्योंकि सरकारी ग्रांट से चलने वाले NGO व व्यापारियों का चरित्र स्तर के श्रेणी पर एक समान ही होता है। NGO को ज्यादे खतरनाक व नीच इसलिए मानता हूं क्योंकि NGO सामाजिक विकास के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति कब्जाता है। नेक्सस व सेटिंग के आधार पर सरकारी ग्रांट से चलने वाले NGO कई प्रकार के होते हैं। इनमें से एक वे होते हैं जो स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों व नेताओं से सेटिंग करके प्रोजेक्ट लेकर पैसा कमाते व कमवाते हैं। इनके पास का एक-एक पैसा कालाधन होता है और लोगों के विकास के लिए प्रयोग किए जाने वाला पैसा होता है। इनके घर की एक-एक ईंट, इनके बच्चों के मुंह का एक-एक निवाला सभी कुछ देश की संपत्ति का होता है। बहुत व्यापारी लोगों ने इस प्रकार के NGO तंत्र को अपने धंधे के रूप में स्थापित कर लिया है।

    इनमें से बहुत NGO वाले ऐसे होते हैं जो नया-नया पैसा देखे होते हैं तो खूब दिखावा करते हैं व कूदफांद करते हैं, यदि इस प्रकार के मूर्खों को छोड़ दिया जाए तो यह कड़ी सुरक्षित कड़ी होती है।

    कुछ बड़े व्यापारी व NGO तो इतने ताकतवर होते हैं कि उनके लिए करोड़ों, अरबों व खरबों के प्रोजेक्ट राजनेताओं व नौकरशाही के नेक्सस द्वारा बनाए जाते हैं ताकि राष्ट्रीय संपत्तियों पर कब्जा किया जा सके। इन लोगों को कोई परेशानी न हो इसलिए देश के लोगों की सुविधा को ताक में रखकर नीतियां व नियम बनाए जाते हैं। यह कड़ी बहुत अधिक सुरक्षित कड़ी होती है।

    नेता

    इन सबमें सबसे असुरक्षित कड़ी नेता वाली होती है। कारण यह है कि नेता को अपने लगुओं-भगुओं की देखभाल करनी होती है। चुनाव लड़ना होता है। बिना चुनाव के भी अपनी फिजा बनाने के लिए लगातार पैसा खर्चते रहना पड़ता है। इसलिए नेता के पास पैसा है यह सबको दिखता है। नेता सबसे कम भ्रष्ट होते हुए भी सबसे अधिक बदनाम इसीलिए रहता है। नेता पकड़ा भी जाता है क्योंकि उसको अपने पास खर्चों के लिए कैश इन हैंड रखना पड़ता है, अन्यथा उनकी नेतागिरी ठप्प हो जाएगी।

    नौकरशाह

    सबसे सुरक्षित कड़ी नौकरशाह वाली होती है। सबसे अधिक भ्रष्ट, क्रूर, बर्बर व निर्लज्ज लेकिन सबसे अधिक ईमानदार मानी जाने वाली कड़ी। भ्रष्टाचार का कालाधन बिना नौकरशाही के उत्पन्न ही नहीं हो सकता। फिर भी सबसे अधिक ईमानदार मानी जाने वाली कड़ी क्योंकि इनकी संपत्ति व पैसा दिखता नहीं है। क्योंकि इनको कहीं खर्च ही नहीं करना है, दूसरा सारे अधिकार इन्हीं के पास हैं, सरकार से इतनी सुविधाएं मिलती हैं कि इनको अपनी संपत्ति व पैसा खर्च करने की जरूरत ही नहीं।

     

    इस प्रकार का कालाधन किसी गांव के सरकारी प्राइमरी स्कूल के चपरासी से लेकर देश के व्यापारियों, नेताओं व आला-नौकरशाहों तक सभी के पास होता है। वैसे संभव तो नहीं लेकिन हो सकता है कि देश में इक्का दुक्का सरकारी लोग सच में ही कालाधन की एक चवन्नी नहीं रखते हों।

     

    इस प्रकार वाले कालेधन का अधिकतर हिस्सा मुद्रा के रूप में नहीं होता है। इसका लेनदेन या तो अचल संपत्तियों के रूप में होता है या इसको अचल संपत्तियों के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है। बेनामी संपत्तियों के रूप में होता है। विश्वसनीय रिश्तेदारों के व्यापार में अलिखित शेयर के रूप में प्रयोग होता है। विदेशी बैंको में जमा होता है फिर वहां से घुमा फिरा कर वापस भारत में व्यापारिक निवेश के रूप में लाया जाता है।

     

    दरअसल  समाज के विकास को अवरुद्ध करने वाला कालाधन यही धूर्तता, बर्बरता, क्रूरता व भ्रष्टाचार के व्यापक नेक्सस से पैदा किया गया वाला कालाधन होता है। लेकिन भारत में इसको छेड़ा तक नहीं जाता है, उल्टे समय-समय पर इसको बचाने के लिए झोल झपाटे वाले चोचलेबाजी की जाती है, लोगों को लगता है कि क्रांति हो रही है।

     

    चलते-चलते

    भारत में कम संख्या में ही सही लेकिन ऐसे भी नौकरशाह हैं जो भले लोग हैं, समाज के भले के लिए जज्बे के साथ काम करते हैं। समाज के विकास के लिए ऊर्जा से काम करते हैं। इनमें से लगभग सभी लोग यह जाहिर करते हैं कि वे आर्थिक रूप से बेहद ईमानदार हैं। मैं जानता हूं कि वे आर्थिक रूप से ईमानदार नहीं हैं। लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि वे मेरे लिए उनका आर्थिक ईमानदार न होना बिलकुल भी मायने नहीं रखता। मेरे लिए उनका सामाजिक प्रतिबद्ध होना, समाज के भले के लिए जज्बे के साथ काम करना सर्वोच्च ईमानदारी होती है इसलिए मेरी दृष्टि में वे विशुद्ध ईमानदार हैं, इसलिए कोई उनके साथ खड़ा हो या न हो लेकिन मैं बिना किसी नेक्सस के आजीवन अपनी छोटी-बड़ी क्षमता के साथ उनके साथ खड़ा रहूंगा।

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