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विकास का अर्थ कृत्रिमता बनाम सहज प्रकृति

Apoorva Pratap Singh


पिछले साल एक न्यूज़ थी कि घर में आग लगने पर पालतू कुत्ता और मालिक का दुधमुंहा बच्चा जल के मर गए । जब उनकी लाश निकाली गयी तो कुत्ते की पूरी जली बॉडी उस बच्चे के ऊपर झुकी हुई हालत में मिली। अर्थ यह है कि वो कुत्ता उस बच्चे को आग से बचाने की कोशिश में उस बच्चे के ऊपर झुका रहा, क्यूंकी उसे लगा कि वो ऐसे बच्चे तक आग नहीं पहुँचने देगा!!! क्या इतना समर्पण इंसान दे पाएगा!! अब आप कहेंगे कि यह तो प्रेक्टिकल ही नहीं है, मूर्खता है? पर कोई सोसाइटी कितनी तरक्की कर चुकी है इसका मानक यह क्यूँ नहीं होना चाहिए कि वहाँ का प्राणी कितना प्रेम कर सकता है!! यह क्यूँ मानक है कि वो दूसरे ग्रह पर पहुँच उस को भी बर्बाद करने के लिए कितनी जोड़-तोड़ कर रहा है!!

मनुष्य को कैसे पता कि वो ही समस्त प्राणियों में सर्वोच्च है ? मतलब कैसे ? उसने घर बनाए हैं, गाड़ी - मोटर वगैरह, मतलब एक पूरी कृत्रिम व्यवस्था जो कि प्राकृतिक व्यवस्था के समानान्तर है, उसने खड़ी की है ! आप कहेंगे उसके पास भाषा है, इमोशन्स हैं ! पर हाऊ डू यू नो कि आपके अलावा किसी और प्राणी के पास आपसे बेहतर लिंबिक सिस्टम नहीं है ? लिंबिक सिस्टम मस्तिष्क की वो संरचनाएं जो यादों व भावों जैसी ही कई एब्स्त्रेक्त चीजों को संचालित करती हैं।

मसलन डोलफ़िन और व्हेल दिमाग के साइज़ से ले कर इंटेलिजेंस में भी मानव से ज़्यादा होशियार होती हैं। वो अपनी एनेटोमी को भी मनुष्य से रिलेट करती हैं, जैसे कि अगर आप बार बार अपना दायां हाथ उसके समक्ष उठाएंगे तो वो भी अपना दायाँ फिन वैसे ही हिलाना शुरू हो जाएंगी। वो शीशे में भी खुद को पहचानती हैं और अब तो यह भी पता चल रहा है कि वो अपने समूह में डोल्फ़िंस को भी अलग अलग नाम देती हैं और वैसे ही स्वर में उन्हें बुलाती भी हैं । मानव की अपेक्षा व्हेल्स और डोलफ़िन लगभग 20 गुना ज़्यादा तेज़ी से सुन के प्रोसेस कर सकती हैं। यहाँ तक कि पूरी संभावना है कि वो जब आवाज़ देती हैं तो जो वो अपने आसपास देख रही होती है तो उस आवाज़ के संग ही वो डेटा भी दूसरी डोलफ़िन को देती हो । मतलब मनुष्य जहां यह काम दो ऑर्गन से करता है वहीं वो बस अपने एक ही सेंस यानि औडिओ से कर देतीं हैं!

ऐसे ही सारस या सियार, साथी के मरने पर वो फिर से जोड़ा नहीं बनाते, यह तो परम मानव के गुण हैं !! बस एक से लौ लग गई तो बस लग गई !! वो यह साबित करते हैं कि सब कुछ मन में होता है, शारीरिक जरूरतें सेकेन्डरी हैं ! जीवन हॉर्मोन्स-लिपिड्स से भी पहले भावनाओं से संचालित होता है।

एक और बात यह भी कि कुत्ता और भेड़िया में से भेड़िया ज़्यादा स्ट्रॉंग है लेकिन सदियों पहले कुत्ता भी भेड़िया ही था, लेकिन वो भेड़िये कुत्ते बन गए जो अपनी से अलग प्रजाति यानि मनुष्य से भी प्रेम करने लगे। मनुष्य के मानकों के अनुसार तो कुत्ते ने मनुष्य के अनुसार खुद को ढाल अपने को कमजोर ही किया किन्तु अगर विकास प्रेम करने कि क्षमता से नापा जाये तो कुत्ता बहुत आगे हो जाएगा।

ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि डोलफ़िन जैसे अति विकसित प्राणी भी विकास के उस चरम पर पहुंचे हों कभी पर उसके आगे उन्होने विकास चुना ही नहीं, जीवन चुना, प्रेम चुना, शारीरिक विकास भी चुना पर जिसे मनुष्य तरक्की मानता है वो नहीं चुना, वो उस एज पे पहुँच के रुक गए और वापिस लौटे! क्या पता उनकी प्रकृति की समझ हमसे बेहतर हो इसलिए उन्हें पता हो कि इस चूहा दौड़ का कोई हासिल नहीं है।

मैं सोचती हूं कि इंसान पहले फैसले दिमाग से करता है, फिर खुद को भोला और प्योर भी फील करने को अपने दिल से अपने फेवर में तर्क गढ़वाता है जबकि यहीं जानवर इसका उलट करते हैं, दिल से फैसले ले के उनका दिमाग उन के तर्क गढ़ता है।

यह बेहतर ही तो है शायद !!!

Apoorva Pratap Singh


Apoorva Pratap Singh

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