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काण्डोम –Anupama Garg

Anupama Garg

भैया,
मूड्स के कोंडम का एक पैकिट देना।’’
मेरी बेशर्म आवाज़,
जैसे ही मेडिकल स्टोर में दी सुनाई,
मेरा छोटा कद,
बच्चों सा चेहरा देख कर,
बगल में खड़ी लड़की,
धीमे से बुदबुदाई.........
‘‘आप .........पर से खुद ही क्यों नहीं उठा लेती’’

फिर उसे जैसे ध्यान आया,
कि मैं तो चरित्रहीन कुलटा हूँ।
गंगा का प्रवाह उल्टा हूँ।
वो, अच्छी लड़की थी।
फेयर एण्ड लवली लेकर,
चुपचाप पैसे दे कर,
चलती बनी।

मगर स्टोर में पसरी थी,
मेरे मुँह खोलने से ले कर,
वहाँ से निकलने तक,
चुप्पी घनी।

लगभग, हर किसी की भौंहे खिंची हुई थी,
और सबकी निगाहें मुझसे बचती हुई,
मैं दुकान से ऐसे निकली,
मानों कोई सनसनी।

वैसे,
दीगर बात ये है ,
कि कॉण्डोम मुझे चाहिये थे,
सेक्स के लिए नहीं,
एक रिसर्च प्रोजेक्ट की फाईल में सेम्पल लगाने के लिए,
ये तमाशा तो यूँ ही खड़ा किया था मैंने,
लेगों की शरीर धर्मिता आज़माने के लिए।

आखिर, ऐसा है क्या उस माँस के टुकड़े में,
जो लड़की के स्तन देख कर फड़फडाता है।
खड़ा हो जाता है।
मगर उसी लड़की के कहने पर,
कॉण्डोम, न खरीदना, न बेचना, न पहनना चाहता है।

कॉण्डोम सिर्फ़ रबर का टुकड़ा नहीं,
ये स्वीकृति की सीमा भी दर्शाता है।
क्या ही अच्छा होता, गर लोग समझते,
कि कॉण्डोम सिर्फ़ सुरक्षित सेक्स नहीं,
स्त्री की देह की गरिमा व शरीर धर्मिता का,
सम्मान भी सिखाता है।

Anupama Garg

Anupama identifies herself as a young, energetic, thoughtful and sensitive human being before anything else. An author, a content strategist, a communications expert, a ghost writer, a blogger, a devil’s advocate and a woman are some other hats she wears.

She writes books on controversial subjects, expresses her opinions and thoughts vocally and believes in empowerment and responsibility of expression. She can be reached on her LinkedIn/Facebook profile(s) at:

https://in.linkedin.com/in/anupama-garg-1b059b31

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