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विकास का अर्थ कृत्रिमता बनाम सहज प्रकृति

June 6, 2018

Apoorva Pratap Singh


पिछले साल एक न्यूज़ थी कि घर में आग लगने पर पालतू कुत्ता और मालिक का दुधमुंहा बच्चा जल के मर गए । जब उनकी लाश निकाली गयी तो कुत्ते की पूरी जली बॉडी उस बच्चे के ऊपर झुकी हुई हालत में मिली। अर्थ यह है कि वो कुत्ता उस बच्चे को आग से बचाने की कोशिश में उस बच्चे के ऊपर झुका रहा, क्यूंकी उसे लगा कि वो ऐसे बच्चे तक आग नहीं पहुँचने देगा!!! क्या इतना समर्पण इंसान दे पाएगा!! अब आप कहेंगे कि यह तो प्रेक्टिकल ही नहीं है, मूर्खता है? पर कोई सोसाइटी कितनी तरक्की कर चुकी है इसका मानक यह क्यूँ नहीं होना चाहिए कि वहाँ का प्राणी कितना प्रेम कर सकता है!! यह क्यूँ मानक है कि वो दूसरे ग्रह पर पहुँच उस को भी बर्बाद करने के लिए कितनी जोड़-तोड़ कर रहा है!!

मनुष्य को कैसे पता कि वो ही समस्त प्राणियों में सर्वोच्च है ? मतलब कैसे ? उसने घर बनाए हैं, गाड़ी - मोटर वगैरह, मतलब एक पूरी कृत्रिम व्यवस्था जो कि प्राकृतिक व्यवस्था के समानान्तर है, उसने खड़ी की है ! आप कहेंगे उसके पास भाषा है, इमोशन्स हैं ! पर हाऊ डू यू नो कि आपके अलावा किसी और प्राणी के पास आपसे बेहतर लिंबिक सिस्टम नहीं है ? लिंबिक सिस्टम मस्तिष्क की वो संरचनाएं जो यादों व भावों जैसी ही कई एब्स्त्रेक्त चीजों को संचालित करती हैं।

मसलन डोलफ़िन और व्हेल दिमाग के साइज़ से ले कर इंटेलिजेंस में भी मानव से ज़्यादा होशियार होती हैं। वो अपनी एनेटोमी को भी मनुष्य से रिलेट करती हैं, जैसे कि अगर आप बार बार अपना दायां हाथ उसके समक्ष उठाएंगे तो वो भी अपना दायाँ फिन वैसे ही हिलाना शुरू हो जाएंगी। वो शीशे में भी खुद को पहचानती हैं और अब तो यह भी पता चल रहा है कि वो अपने समूह में डोल्फ़िंस को भी अलग अलग नाम देती हैं और वैसे ही स्वर में उन्हें बुलाती भी हैं । मानव की अपेक्षा व्हेल्स और डोलफ़िन लगभग 20 गुना ज़्यादा तेज़ी से सुन के प्रोसेस कर सकती हैं। यहाँ तक कि पूरी संभावना है कि वो जब आवाज़ देती हैं तो जो वो अपने आसपास देख रही होती है तो उस आवाज़ के संग ही वो डेटा भी दूसरी डोलफ़िन को देती हो । मतलब मनुष्य जहां यह काम दो ऑर्गन से करता है वहीं वो बस अपने एक ही सेंस यानि औडिओ से कर देतीं हैं!

ऐसे ही सारस या सियार, साथी के मरने पर वो फिर से जोड़ा नहीं बनाते, यह तो परम मानव के गुण हैं !! बस एक से लौ लग गई तो बस लग गई !! वो यह साबित करते हैं कि सब कुछ मन में होता है, शारीरिक जरूरतें सेकेन्डरी हैं ! जीवन हॉर्मोन्स-लिपिड्स से भी पहले भावनाओं से संचालित होता है।

एक और बात यह भी कि कुत्ता और भेड़िया में से भेड़िया ज़्यादा स्ट्रॉंग है लेकिन सदियों पहले कुत्ता भी भेड़िया ही था, लेकिन वो भेड़िये कुत्ते बन गए जो अपनी से अलग प्रजाति यानि मनुष्य से भी प्रेम करने लगे। मनुष्य के मानकों के अनुसार तो कुत्ते ने मनुष्य के अनुसार खुद को ढाल अपने को कमजोर ही किया किन्तु अगर विकास प्रेम करने कि क्षमता से नापा जाये तो कुत्ता बहुत आगे हो जाएगा।

ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि डोलफ़िन जैसे अति विकसित प्राणी भी विकास के उस चरम पर पहुंचे हों कभी पर उसके आगे उन्होने विकास चुना ही नहीं, जीवन चुना, प्रेम चुना, शारीरिक विकास भी चुना पर जिसे मनुष्य तरक्की मानता है वो नहीं चुना, वो उस एज पे पहुँच के रुक गए और वापिस लौटे! क्या पता उनकी प्रकृति की समझ हमसे बेहतर हो इसलिए उन्हें पता हो कि इस चूहा दौड़ का कोई हासिल नहीं है।

मैं सोचती हूं कि इंसान पहले फैसले दिमाग से करता है, फिर खुद को भोला और प्योर भी फील करने को अपने दिल से अपने फेवर में तर्क गढ़वाता है जबकि यहीं जानवर इसका उलट करते हैं, दिल से फैसले ले के उनका दिमाग उन के तर्क गढ़ता है।

यह बेहतर ही तो है शायद !!!

Apoorva Pratap Singh


Apoorva Pratap Singh

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‘रण्डी है साली’ – गाली या प्रेरणा

May 27, 2018

Pradyumna Yadav


पहली बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह करीब 8 साल की थी. घर में किसी ने गाली दी थी. शायद बड़ी या छोटी दादी में से कोई थी. घर का माहौल ऐसा था कि वहां गाली खाना और गाली देना आम बात थी. तब उसे रंडी का मतलब नहीं पता था. वो लड़कों के साथ लड़कों की तरह दिनभर उछलकूद करती थी. शायद ये बात दादी को ठीक नहीं लगी थी. इसीलिए उसे रंडी कहा गया.

दूसरी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह 14 साल की थी. उस समय वह लड़कियों की तरह रहना और लड़की होना सीख रही थी. वक्ष बहुत उभरे तो नहीं थे लेकिन इतने थे कि कपड़ो में उनका आकार दिखने लगा था. उस दिन वह पहली बार स्कूल में टाइट कपड़े पहनकर गयी थी. उसकी चाल ढाल बिल्कुल वही थी जिसे अब छोड़ने और बदलने की सीख दी जाने लगी थी. बड़ी क्लास के लड़कों को यह ठीक नहीं लगा. उनमें से किसी एक की दबी जुबान उस दिन खुल गयी - ' रंडी है साली ' .


तीसरी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह 18 साल की थी. मुहल्ले के कुछ लड़कों ने उसे मुहल्ले के बाहर के दो दोस्तों के साथ बात करते हुए देख लिया था. उनकी नज़रों में ऐसी हिकारत थी कि वह भीतर तक सहम गयी थी. ' रंडी निकल गयी है ये. एक नहीं दो के साथ लगी पड़ी है. अपने मुहल्ले का नाम खराब कर दिया साली ने. ' उस दिन रंडी शब्द उसके कानों में देर तक गूंजता रहा.

चौथी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह घर से लड़ झगड़ कर पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए यूनिवर्सिटी में दाखिले की जिद करने लगी. उस समय वह 23 की थी. उस दिन उसने ऐसी जिद पकड़ी कि वह घर के बाहर ही धरने पर बैठ गयी. पूरा मोहल्ला इकठ्ठा हो गया. उसकी जिद जायज थी. इंट्रेस इक्जाम में उसे सातवीं रैंक मिली थी. उसने बड़ी मुश्किल से चोरी छिपे एंट्रेंस इक्जाम दिया था.

उसकी जिद थी कि वह पढ़ेगी. उसे अभी शादी नहीं करनी. अगर किसी ने दबाव बनाया तो वह घर की चौखट पर ही जान दे देगी. मुहल्ले के शिक्षित बुजुर्गों के हस्तक्षेप के बाद घरवालों को झुकना पड़ा. लेकिन सभी बुजुर्ग ऐसे नहीं थे. उस दिन कईयों में आपसी खुसुरफुसुर हुई जो न चाहते हुए भी उसके कानों तक पहुंच गई - ' रंडी है फलाने की लड़की. जाने कितनों लड़को से मिलती है. कई बार तो मैंने सामने से जाकर देख लिया है. लेकिन मजाल की वहां से हटे. लाज शर्म कुछ है ही नहीं. उल्टा मुझे ही घूर के देखती है. इसको बाहर इसलिए जाना है ताकि वहां खुलकर मुंह काला कर सके. '

पांचवी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह अपने प्रेमी के साथ शहर में घूमते हुए देखी गयी. उम्र थी 25. वह बेधड़क अपने प्रेमी का हाथ अपने हाथों में लिए घूमती थी. 
उस दिन बाइक से गुजरते हुए एक लड़के ने चीखकर कहा था - ' एक बार हमें भी छूने दे रंडी. हम क्या इससे बुरे हैं. '

छठी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह डिप्टी एसपी पद के लिए चयनित हुई. उम्र थी 27 साल. पार्टी के लिए वह दोस्तो के साथ रेस्टोरेंट गयी थी. वहां उसे फिर वही शब्द सुनने को मिला. 'अरे देख. ये रंडिया तो अधिकारी बन गयी. गज़ब भौकाल है साली का. हमी स्साला चुतिया बैठे हैं '

पिछले पांच बार उस लड़की ने रंडी शब्द सुनने के बाद क्या किया , उसने नहीं बताया था. लेकिन इस बार क्या हुआ, वो सब कुछ उसने बेहद गर्व के साथ बताया.

वह अपनी सीट से उठी और लड़के का कॉलर पकड़ के चार तमाचे जड़ दिए. उसने लड़के को ऐसा धक्का दिया कि वह अपनी सीट समेत ज़मीन पर लुढ़क गया. लड़के के दोस्त उसका आक्रामक रवैया देखकर चंपत हो गए. उस दिन लड़की ने उस लड़के को बहुत देर तक गालियां दी. उस पर लात घूंसे बरसाती रही. शायद 27 साल की उम्र तक उसने जो भी सहा था सब उस दिन ही फूट पड़ा. आखिर में पुलिस के आने के बाद ही लड़की ने उस लड़के को छोड़ा.

उस दिन उसे गुस्से के साथ पछतावा और गर्व भी था. मैंने पहली बार किसी इंसान में एक साथ इतनी भावनाएं देखी थी. उसमें 27 साल की उम्र तक जो भी झेला गया था , सबका गुस्सा भरा हुआ था. उसे यह पछतावा भी था कि वह 27 साल की उम्र में पहली बार रंडी कहने पर किसी का विरोध कर पाई. इतना समय लग गया उसे. उसे इस बात का गर्व भी था कि पहली बार उसने विरोध किया. ऐसा विरोध कि आसपास सब दंग रह गए.

उस दिन के बाद उसे किसी बेहद सामान्य या किसी बड़ी बात के चलते कितनी बार रंडी बोला गया उसे याद नहीं था. उसने रंडी बोले जाने की वजह से कितनों की खबर ली ये भी उसे याद नहीं था.

अब जब वो अपनी बीती जिंदगी कि ये सारी बातें बताती है तो उसे रंडी गाली नहीं बल्कि प्रेरणा लगती है. वह कहती है कि मैं नाहक ही गुस्सा हो जाया करती थी. रंडी कोई गाली नहीं है. रंडी मेरे लिए प्रेरणा है. मुझे जितनी बार रंडी बोला गया उतनी बार मेरा रंडी के प्रति सम्मान बढ़ता गया.
 
मैं आज जो भी हूँ वह महिलाओं के खिलाफ , समाज के तयशुदा मानकों को तोड़कर हूं. मैंने जब भी ऐसा कुछ किया मुझे रंडी कहा गया. मुझे आज कोई रंडी कहे तो गर्व होगा. मैं खुद को चरित्रवान और सभ्य-सुशील महिला की बजाय रंडी कहलवाना पसंद करूंगी. रंडी सिर्फ शब्द नहीं है. रंडी उस व्यवस्था से विद्रोह है जिससे निकलकर मैंने अपनी जिंदगी जीने के तौर तरीके खुद तय किये हैं.

Pradyumna Yadav


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सेलेब्रिटी एक्टिविज़्म : फेमिनिज़्म का सेफ्टी वाल्व –Apoorva Pratap Singh

May 16, 2018

Apoorva Pratap Singh

एक साक्षात्कार में स्वरा भास्कर से पूछा गया कि कास्टिंग काउच होता है या नहीं ? वो ढीठ की तरह मुस्कुराते हुए बात को घुमाती रही पर उत्तर नहीं दिया पूछने वाले ने कहा कि सिर्फ यस या नो में उत्तर दे दीजिए पर स्वरा भास्कर जो लम्बी चिट्ठी पत्री या सो कॉल्ड एक्टिविज़्म आउट्रेज करने का समय निकाल लेती हैं उनसे हां या ना, वो भी न हुआ बोलीं कि मेरी फिल्म के बारे में बात कीजिये !!! भंसाली को चिट्ठी लिखना जल में रह कर मगर से बैर नहीं होता लेकिन कास्टिंग काउच पर कुछ कहना यकीनन उनके इंडस्ट्री में निजी हितों को प्रभावित करता !!

स्वरा हिपोक्रेट हैं यह पिछले दो साल से सबको पता है इस तथ्य से जिसको दिक्कत हो उस पर सिर्फ तरस खा सकते हैं । 

ट्रेलर में एक जगह सोनम बॉयफ्रेंड से कह रही है कि "जाके अपनी माँ से ही शादी कर ले, मदर लवर" !!! ये साफ़ साफ़ गालियों का यूफेमिज़्म हैं !! माँ से शादी करने का अर्थ क्या होता है ? 
करीना कपूर एक जगह 'मिस पुरी' से मिसेज़ मल्होत्रा बनने को ले कर घबराई हुईं है जो कि खुद ही करीना कपूर 'खान' बनी बैठी हैं ! इवन इन लोगों की इंटर रिलिजियस शादियों में भी बच्चे का नाम पति के धर्म से ही होता है जैसे कि 'तैमूर' या खुद 'सैफ' ही !!

स्वरा जो 3 महीने पहले योनि मात्र महसूस कर रही थीं अब चूत शब्द गाली की तरह इस्तेमाल कर रहीं हैं !! कंगना जो रजत शर्मा के शो में सलमान की बजरंगी भाईजान ठुकराने के दावे ठोंक रहीं, उन्होंने सलमान की ही 'रेडी' में दो मिनट का ही रोल किया था !!

कंगना ने जब अपनी निजी खुन्नस निकाली थी जिसे यहां लोग क्रांतिकारी और फेमिनिज़्म बता रहे थे तब मैंने अपना पॉइंट उनके एंटी रखा तब कहीं किसी ने मुझे या मेरी जैसी लड़कियों (जो प्रो कंगना नहीं थी) को कहा कि यह औरतें मर्दवादी हैं, आदमियों की जी हुजूरी करती हैं, शातिर हैं वगैरह !!

तो मुझे यह कहना है कि आप लोग इतनी ढिठाई लाते कहां से हैं और आपको किसी को भी झंडाबरदार बनाने की इतनी जल्दी क्यों है ?? आपको आपके पॉइंट या जिसे आप फेमिनिज़्म कहते हैं उस पर/का किसी स्वरा या कंगना को ठप्पा लगवाने की ज़रूरत ही क्या है ? आप को इतना इंफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स क्यों है ? आप को अपने में आत्म विश्वास क्यों नहीं है ? आप के पास खुद का कोई एंगल क्यों नहीं होता ? आप गुटों में 'सोचना' इतना क्यों भाता है ?

समझती हूं कि पोस्ट लिखना ख़ब्त है आपकी और कोई भी सतही मुद्दा जिस पर पोस्ट लिख कर कुछ ऑर्गेज़्म टाइप का मज़ा आ जाता है उस पे आप लिख देते हैं पर इतनी भड़भड़ाहट क्यों हैं तमगे देने की !!! 

शेहला राशिद मत बनिये, वो लिवइन पर du में रैली निकालते हैं जैसे कि यही औरतों की सबसे बड़ी दिक्कत है, इस पर काम हो गया तो औरतें पिटना बन्द हो जाएंगी, उनकी वेजेज़ बराबर हो जाएंगी, वो साक्षर हो जाएंगी वगैरह !!
इस तरह की रैलियां और यह सेलेब्रिटी टाइप एक्टिविस्ट केवल सेफ्टी वाल्व होते हैं जो असल मुद्दे तक पहुंचने नहीं देते न ही इनके लिए इनका कोई मोल है !! पर यहां फेसबुकिये किरान्तिकारियों की आरती उतारनी चाहिए !!

मैं शायद आपसे भी बड़ी मूर्ख हूं क्या पता आपसे भी बड़ी शातिर हूं !! मैं जो भी हूं लेकिन काम की बात यह है कि आप एक नम्बर के मूर्ख हैं या शातिर !!

मुझे स्वरा और कंगनाओं से कोई मतलब नहीं हैं ! लेकिन यहां के जो मसखरे हैं, (स्वरा की भाषा में कहें तो चूतियों से कह सकती हूं लेकिन अभी नहीं कहूँगी)उनसे दो बातें कभी कभी ज़रूरी हो जाती हैं और मैं इन की अपने जैसे लोगों पर लगाये आरोपों को बिलकुल पर्सनली लेती हूं !! आप लोगों को डिमोटिवेट करना इसलिए जरूरी समझती हूं क्योंकि अगर नहीं किया तो आपसे अलग राय रखने वालों का तो आप जनाज़ा निकाल देंगे !

Apoorva Pratap Singh


Apoorva Pratap Singh

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ब्रहमताल झील की ट्रेकिंग –Vineeta Yashswi

April 13, 2018

Vineeta Yashswi

बाहर अभी भी अंधेरा ही है और सर्दी भी बहुत ज्यादा। मैं अनमने मन से उठ के भवाली जाने के लिये तैयार हुई जहाँ से मुझे लोहाजंग, चमोली के लिये टैक्सी पकड़नी है जो सुबह 7 बजे हल्द्वानी से भवाली पहुँचने वाली है। यदि वो टैक्सी छूटी तो फिर लोहाजंग पहुुंचना मुश्किल हो जायेगा। लोहाजंग से मुझे ब्रहमताल का ट्रेक करना है जो 3,840 मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक बेहद खूबसूरत हिमालयी झील है...

स्टेशन जाते हुए घुप्प अंधेरी सड़क पर सन्नाटा पसरा रहा जिसे कुत्तों के भोंकने की आवाजें तोड़ती रही। बस कुछ नेपाली मजदूर दूध की पेटियाँ अपने पीठ पर लादे उन्हें घरों में बाँटने के लिये जाते जरुर दिखे। स्टेशन पर भी सन्नाटा है और भवाली के लिये कोई साधन नहीं मिला। कुछ टैक्सी वाले चक्कर काटने लगे और मनमानी बुकिंग में भवाली जाने को तैयार हैं पर कुछ देर खड़े रहने के बाद पिथौरागढ़ जाने वाली गाड़ी मिल गयी जिसने 7 बजे भवाली पहुँचा दिया...

जिस टैक्सी से मुझे जाना है उसका टायर पंक्चर हो गया इसलिये भवाली में कुछ देर इंतजार करना पड़ा जो बेहद उबाऊ और कठिन काम है तब तो और भी ज्यादा जब ठंडी भी गजब की हो। खैर भवाली में बने पार्क में आधा घंटा बिताया तब तक टैक्सी आ गयी और मैं अल्मोड़ा को निकल गयी...

रास्ते में कोसी नदी को देख कर दुःख हुआ क्योंकि अच्छी बारिश न होने के कारण कोसी सूखी पड़ी है। कुछ देर में टैक्सी अल्मोड़ा होते हुए सोमेश्वर पहुँची। सोमेश्वर घाटी हमेशा की तरह ही खूबसूरत लगी जिसे फसलों से लहलहाते खेत और भी आकर्षक बना रहे हैं…

सोमेश्वर से कौसानी होते हुए टैक्सी आगे बढ़ी और छोटे-छोटे गांवों, खेतों और जंगलों को पार करते हुए ग्वालदम पहुँची जहाँ खाने की लिये कुछ देर रुकी। मौसम में अभी भी हल्की ठंड है और बादल भी छाये हैं। यहाँ कुछ सैलानी सेल्फी लेते जरूर नजर आये। यहाँ से आगे का रास्ता ज्यादा संकीर्ण और घुमावदार होने लगा। अभी काफी लम्बा रास्ता तय करना है इसलिये ड्राइवर ने गाड़ी बहुत कंजूसी से रोकी पर रास्ते में एक  शादी का नाच-गाना बेफिक्री से चल रहा है जिसने ट्रेफिक रोक दिया। गाँव की ये शादियाँ देखने में मजा आता है। इनमें एक ओर पारंपरिक रीति-रिवाज होते हैं तो वहीं ये नये जमाने की आबोहवा का मजा लेने से भी नहीं हिचकते फिर वो नाच-गाना हो या आधुनिक लिबास। यहाँ सब कुछ मिलता है। यहाँ तक की स्मार्ट फोन भी  इंटरनेट कनेक्शन के साथ। वट्सैप और फेसबुक से ये अंजान नहीं हैं। हाँ ये अलग बात है कि इंटरनेट सिग्नल या तो आते नहीं या स्पीड बहुत कम होती है। कुछ युवक-युवतियाँ शादी की सेल्फी इंटरनेट पर अपडेट करना चाहते हैं पर शायद कन्क्टीविटी न होने के कारण अपडेट नहीं कर पा रहे जिसकी खीझ उनके चेहरों में दिखायी देती है। शादी की खुशी से बड़ा गम है यह इनके लिये। काफी खुशामद करके जैसे-तैसे बारात ने थोड़ा रास्ता दिया तो सड़क खुली और टैक्सी आगे बढ़ी...

आगे रास्ता कई जगहों पर टूटा है और लोग इन खस्ताहाल सड़कों पर जिन्दगी की बाजी लगाने को मजबूर हैं। पर नजारे बहुत खूबसूरत हैं। छोटे गाँवों के बीच से बहती हुई पिण्डर नदी बहुत अच्छी लग रही है। संकरी सड़कों से होते हुए कुछ देर में देवाल पहुँचे। यहाँ ड्राइवर ने चाय पीने के लिये टैक्सी रोकी तो मैं देवाल की छोटी सी बाजार देखने आ गयी। इस छोटी कस्बाई बाजार में स्थानीय लोगों के जरूरत का सारा सामान मिलता है। मैं एक फल की दुकान में गयी। दुकानदार ने संतरे मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा - यहाँ के संतरे एक बार खा लोगी तो हमेशा याद करोगी। उसकी बात पर मुझे कोई भरोसा नहीं है पर भूख लगने के कारण मैंने संतरे ले लिये और एक संतरा छील के खाया। वाकई में क्या स्वादिष्ट संतरा है। इतना मीठा, रसीला और मुलायम संतरा मैंने इससे पहले कभी नहीं खाया। एक टुकड़ा मुँह में रखते ही ऐसे पिघल गया जैसे केंडी फ्लाॅस पिघलती है...

अब शाम होने लगी और आगे का रास्ता और भी खौफनाक हो गया। सड़कें कई जगहों में टूटी दिखी। लगभग डेढ़ घंटे में टैक्सी लोहाजंग पहुँच गयी और मैं लोहाजंग के अपने गैस्ट हाउस चली गयी। कुछ देर आराम करने के बाद जब मैं बाहर निकली तो सामने नन्दाघुंटी की चोटी सूर्यास्त की रोशनी से नहायी हुई थी जिसे हल्के बादलों ने ढका था। मैं बाजार आ गयी। रास्ते में देखा कुछ महिलायें और पुरुष को एक घास सुखा कर उसे बोरों में भरते देखा...

मैं उनके पास चली गयी। तीनों महिलायें पारम्परिक गढ़वाली लिबास, काला घाघरा, स्वेटर और सर में फूलों के डिजाइन वाला स्कार्फ पहने हैं। उनके घाघरे मोटे कपड़े के हैं जो ठंड से बचाने के लिये अच्छे होते होंगे परन्तु पुरुष तो आधुनिक लिबास पैंट-शर्ट, स्वेटर और जैकेट में हैं। मेरे जाने से महिलायें शर्मा गयी और अपने मुँह नीचे कर लिये जिससे उनके लाल-लाल चेहरे और भी लाल हो गये...

घास के बारे में पूछने पर पीछे खड़ा एक आदमी बोला - ये झूला घास है। इसे हमने बाजार में बेचने के लिये जंगलों से इकट्ठा किया है। इससे बहुत चीजें बनती हैं जैसे - धूप, पेंट और  तरह-तरह की इत्र। पूरी बातचीत के दौरान महिलायें लगातार सर झुकाये काम करती रही और पुरुष मुझसे बात करते रहे। हालाँकि बात हिन्दी भाषा में हुई पर गढ़वाली भाषा की झलक दिखती है...

उनसे बातें करके मैं बाजार आ गयी। लोहाजंग की छोटी बाजार में गाँव वालों और ट्रेकिंग के लिये आये पर्यटकों की जरूरत का सामान मिल जाता है। एक दुकानदार ने बताया - सड़क बंद होने से परेशानी होती है क्योंकि जरूरत का सामान नहीं आ पाता। दुकानदारों से बात करते हुए महसूस हुआ कि ये लोग काफी बिजनस माइंडेड हैं। ट्रेकिंग के लिये आये पर्यटकों से पैसे कैसे वसूलने हैं ये अच्छे से जानते हैं...

बाजार का चक्कर थोड़ी देर में ही पूरा हो गया। रैस्ट हाउस लौटते हुए एक बुजुर्ग मिल गये। उनके झुर्रियों से भरे चेहरे में उनकी दो छोटी-छोटी आँखें सबसे ज्यादा चमक रही हैं। लोहाजंग के बारे में बताते हुए जब वो बोले तो उनके मुँह में दाँत भी अवशेष मात्र बचे दिखेए उन्होंने बताया - लोहाजंग में देवी पार्वती की राक्षस लोहासुर के साथ घमासान जंग हुई थी जिसमें देवी पार्वती ने राक्षस लोहासुर को मार डाला। इसीलिये इसे लोहजंग कहते हैं। लोह मतलब राक्षस लोहासुर और जंग मतलब युद्ध...

जल्दी ही घुप्प अंधेरा छा गया और पूरा गाँव सन्नाटे के साये में चला गया और ठंडी भी बहुत ज्यादा बढ़ गयी। मैंने खाना खाया और सो गई...

सुबह जब नींद खुली तो देखा नन्दाघुंटी में उगते सूरज की रोशनी में डूबी है पर हाँ बादलों से ढकी हुई। गुनगुनी धूप में खड़े होकर गाँव की खूबसूरती का मजा लिया और ब्रेकफास्ट निपटाया। कुछ देर में ट्रेक गाइड महेश भी आ गया। लगभग 4 फीट 9 इंच के कद वाला महेश अभी 19 साल का है और पिछले कुछ सालों से ट्रेकर्स को ट्रेकिंग पर ले जा रहा है। यही उसकी आय का मुख्य स्रोत है। देवाल के नजदीक का रहने वाला महेश खेती-बाड़ी की स्थितियों से बहुत ज्यादा संतुष्ट नहीं दिखता इसलिये ये काम कर रहा है ताकि परिवार को आर्थिक मदद कर सके। महेश के साथ उसके चाचा भी आये हैं। 69 वर्षीय चाचाजी हैं तो दुबले-पतले परं पर काम में काफी फुर्तीले हैं और बोलते भी खूब हैं। महेश ने बताया कि आज हम बेकलताल तक जायेंगे...

Himalaya

कुछ देर में ट्रेक शुरू हो गया। बाजार के बीच से एक रास्ता ऊपर को निकल गया और फिर धीरे-धीरे बाजार नीचे छूट गया। मौसम अब गर्म होने लगा। कहीं-कहीं सरसों के खेतों से घिरे मकान दिखे जो सुन्दर लगे। आजकल यहाँ बुराँश ही बुराँश खिला है। पूरा रास्ता बुरांश के लाल रंग से रंगा है। लाल बुरांशों के बीच  कहीं गुलाबी तो कहीं सफेद बुरांश भी दिख जाता। सरसों के पीले फूलों में लिपटी जमीन और बुरांश की लाली मिल कर इस जगह को जन्नत बना रहे हैं जिसे त्रिशुल और नंदाघुटी की चोटियाँ और भी निखार रही हैं...

Peak Trishul

सीधे-सरल रास्ते को आसपास के नजारे और भी सुन्दर बना रहे हैं। आगे बढ़ते हुए रास्ते में घास का बंडल पीठ में बाँध के लाती दो महिलायें मिली। दोनों ने धोती को कमर में लपेटा है और पैरों में कुछ नहीं पहना है। दोनों के चेहरों में बिखरी हँसी इस बात की गवाही दे रही हैं कि उन्हें इस बात की कोई शिकायत नहीं हैं। उनमें से एक महिला ने हँसते हुए कहा - हमारे लिये तो यह रोज की बात है। हम तो रोज ही जंगल जाते हैं और घास लाते हैं। अगर यह काम नहीं करेंगे तो खायेंगे क्या ? दूसरी महिला ने कैमरा देख कर अपनी फोटो खिंचवाना चाहा और शर्त रखते हुए बोली - तुम मुझे फोटो दिखाओगी और अगर अच्छी नहीं आयी तो दूसरा फोटो खींचोगी। उसकी शर्त सुन कर हँसी तो आयी पर मजा भी आया क्योंकि ऐसी शर्त अभी तक मेरे सामने पहली बार ही रखी गयी है। खैर मैंने उसकी चार फोटो खींच कर उसे दिखायी जिसमें से पहली दो उसने रिजेक्ट कर दी और मुझे फिर से फोटो खींचने के लिये बोला। मेरी खुशकिस्मती है कि इस बार वाली फोटो उसे पसंद आयी और उसने कहा - किसी किताब में फोटो छपने भेजोगे तो मेरी पसंद वाली फोटो ही भेजना। आधुनिक तकनीक से ये महिलायें भी अब अंजान नहीं हैं ये देख कर अच्छा लगा। उन दोनों से बातें तो और भी करनी थी पर उन्हें देर तक रोकना भी ठीक नहीं इसलिये जल्दी ही ट्रेक शुरू कर दिया...

रास्ता अब घने जंगलों के बीच से जाने लगा। जमीन में कई जगह सुअर के मिट्टी खोदे हुए के निशान दिखे। कई जगह झोपड़ियाँ बनी हैं जिनमें गर्मियों में खानाबदोश आते हैं और अपने पशुओं को रखते हैं। हिमालय की सफेद चोटियाँ हर जगह से दिखायी दे जाती जो थकावट नहीं होने दे रही हैं। जंगल में जैसे-जैसे आगे बढ़े वैसे ही ठंडी भी बढ़ने लगी और रास्ते में बर्फ के ढेर भी दिखने लगे। आगे का काफी लम्बा रास्ता बर्फ के ऊपर चल के ही तय किया...

मैंने चाचाजी से मौसम के बारे में पूछा तो अपने फुर्तीले अंदाज में कहा - अब मौसम की क्या कहें। वैसे भी नैनीताल का फैशन और हिमालय का मौसम तो हर पल बदलते हैं। इसके बाद उनसे पूछने के लिये दूसरा सवाल नहीं था। हम तीन बजे बेकलताल पहुँचे और टेंट लगा के खाना खाया फिर पास के जंगल से सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा की ताकि रात को जला सकें। अब शाम होने लगी और मैं बेकलताल देखने चली गयी...

Bekaltaal

बेकलताल झील का नाम है और ऐसी मान्यता है कि इसमें नाग देवता का वास है जो इस झील को हमेशा पानी से भरा रखते हैं। हरे रंग की झील ने मुझे दूर से ही आकर्षित कर लिया। सूरज की ढलती हुई रोशनी इसके रंग को और निखार रही है। शोरगुल से दूर यहाँ सिर्फ शांति है। कुछ देर मैं झील के किनारे ही बैठी रही। कभी-कभी मछलियों के उछल-कूद करने से झील के शांत पानी में हलचल हो जाती जो फिर शांत भी हो जाती। कुछ देर इस पसरी हुई शांती में मछलियों की उछल-कूद का मजा लेने के बाद में झील के किनारे-किनारे पैदल चलने लगी...

यहाँ बैकल नाग देवता का एक छोटा मंदिर भी है। जिसके अंदर कुछ पत्थर की मूर्तियाँ रखी हैं। मंदिर की हालत देख के लगा कि यहाँ कोई पुजारी नहीं आता होगा। झील के किनारों पर मछली पकड़ने के काटे डले हैं यानि गाँव वाले यहाँ आते रहते होंगे। झील का पूरा चक्कर लगा के मैं दूसरे रास्ते से वापस लौट गयी। सूरज अस्त होने लगा और उसकी लाली में पूरी घाटी कुछ देर के लिये डूब गयी और फिर अचानक ही घुप्प अंधेरा छा गया और पूरी घाटी सन्नाटे की आगोश में चली गयी...

अब बहुत तेज ठंड होने लगी और हवायें भी चलने लगी इसलिये इकट्ठा की हुई लकड़ियाँ जला ली और आग के पास खड़े होकर सूप पीया। तेज हवाओं से धुंआ इधर-उधर फैल रहा था इसलिये बार-बार जगह बदलना जरुरी हो गया। अभी आसमान में तारे चमक रहे हैं। अद्भुद होता है रात के सन्नाटे में तारों भरा आसमान देखना पर ठंडी बहुत ज्यादा बढ़ गयी इसलिये खाना खा कर टैंट में आयी और स्पीपिंग बैग के हवाले हो गयी...

सुबह हल्की रोशनी से आँख खुली पर ठंडी अभी भी कम नहीं हुई। कुछ देर स्लीपिंग बैग में आलस करने के बाद मैं बाहर आयी और आग के पास खड़ी हो गयी। घाटी होने के कारण यहाँ धूप देर में आती है। आग के पास ही चाय-नाश्ता किया और आज के ट्रेक की तैयारी की। आज हमने ब्रह्मताल जाना है...

Peak Camet

आज शुरू के दो-तीन घंटे कठिन चढ़ाई वाले रहे जिसे पार करने में 3 घंटे लग गये। रास्ता घने जंगलों  से होकर जा रहा है इसलिये हल्की सी ठंड बनी है। चढ़ाई पार करते ही विशाल बुग्याल (घास का मैदान) सामने नजर आया। यहाँ से त्रिशुल और नन्दाघुंटी की चोटियाँ इतनी नजदीक लग रही हैं जैसे कि थोड़ा और चल के उन्हें छुआ जा सके। बुग्याल के एक ओर हिमालय अपनी सुन्दरता के साथ खड़ा है तो दूसरी ओर छोटे-छोटे गाँव नजर आये। नीले आसमान में छाये हल्के-हल्के बादल इस खूबसूरती को और बढ़ा रहे हैं। ये बेहद खूबसूरत नजारा है। मैं कुछ समय इस मैदान में बैठी रही और इन पलों को जितना हो सका जीने की कोशिश की और फिर चलना शुरू किया। अब तो बुग्याल का रास्ता शुरू हो गया। सर्दियाँं होने के कारण बुग्याल सूखे हैं पर बुग्याल सूखे हों या हरे-भरे हमेशा अच्छे ही लगते हैं। अब पैदल चलने में मजा आने लगा। बीच-बीच में खच्चर वाले अपने खच्चरों को ले जा रहे हैं जिनके गले में बजने वाली घंटियों से पूरा बुग्याल कुछ देर के लिये झनझना जाता और फिर खामोश छा जाती। जंगल अब नीचे छूट गया। यहाँ तो दूर-दूर तलक बुग्याल ही फैले हैं...

हिमालय अपनी भव्यता के साथ काफी देर तक साथ चलता रहा। बुग्याल में एक ही सीध में आगे बढ़ती ही रही कि महेश ने नीचे उतरने का इशारा कर दिया और जैसे ही नीचे उतरना शुरू किया वैसे ही ट्रेक कठिन हो गया क्योंकि आगे का रास्ता पथरीला है और इस पथरीले रास्ते में ही नीचे उतरना है। बुग्याल की गुदगुदी नर्म जमीन में चलने के बाद इस पथरीले रास्ते में चलना वैसा ही था जैसे हाइवे की चकाचक सड़क से सीधे खड़ंजे वाली गड्ढेदार सड़क पर आ जाना…

इस पथरीले रास्ते ने अच्छी खासी कसरत करा दी पर ट्रेकिंग का मजा भी तब ही है जब हर पल कुछ नया होता रहे। इस पथरीले रास्ते को पार करके नीचे पहुँची और फिर सीधी जमीन में चलना शुरू कर दिया।  इसी रास्ते में माँ नन्दा का मंदिर दिखा जो यहाँ की कुलदेवी हैं। अब तक तो नजारा और मौसम दोनों ही बहुत अच्छे हैं पर कुछ ही देर में ही आसमान बादलों से घिरने लगा। मैंने चाचाजी से फिर मौसम के बारे में जानना चाहा तो वो हँसते हुए बोले - नैनीताल का फैशन और हिमालय का मौसम कभी भी बदल जाते है...

कैम्प साइट पर पहुँचते ही गजब की ठंडी होने लगी और ये क्या थोड़ी ही देर में हल्के बर्फ के फाये भी गिरने लगे। मैंने पहली बार बर्फ के फाहों को तारे के आकार का गिरते हुए देखा। बर्फ के फाहों का ये आकार मेरे लिये किसी अजूबे से कम नहीं है। मुझे लगा बर्फ कुछ देर गिरेगी और फिर मौसम निखर आयेगा जैसा कि अमूमन इन जगहों पर होता है और मेरा अंदाज सही निकला। कुछ देर में ही बर्फ गिरनी बंद हो गई और हल्की सूरज की रोशनी दिखने लगी। लंच करने के बाद मैं टहलते हुए ब्रहामताल की ओर आ गयी जो मेरे टेंट से कुछ दूरी पर है...

स्थानीय मान्यता के अनुसार ऋषि वेद व्यास जब वेदों की रचना कर रहे थे, उस समय उन्हें पन्ने पलटने के लिये पानी की आवश्यकता पड़ी और उन्होंने भगवान ब्रह्मा से प्रार्थना की। ब्रह्मा ने वेद व्यास की प्रार्थना पर इस झील का निर्माण किया और इसका नाम ब्रह्मताल पड़ गया। ब्रह्मताल का पानी बिल्कुल पारदर्शी है पर इसका रंग गहरा काला नजर आता है...

Brahmtal in heavy snow

गहरे काले रंग की झील आजकल थोड़ी सूखी है इसलिये शायद किनारों पर काफी कीचड़ जमी दिखी।  हल्की सूरज की रोशनी में झील अच्छी लग रही है। थोड़ी देर यूँ ही झील के किनारे टहलने के मैं कैमरा लेने टैंट में वापस लौटी तो मौसम अचानक खराब हो गया और पहले से ज्यादा तेजी से बर्फ गिरने लगी। बर्फ का गिरना अच्छा लगता है इसलिये मैं इसका मजा लेने लगी। बर्फ की गति लगातार बढ़ती ही रही और साथ ही ठंड भी। मुझे अभी भी यकीन है कि कुछ देर में बर्फ गिरना बंद हो जायेगा और रात को मौसम साफ होगा...

पर बर्फ तो लगातार तेज ही होती चली गयी। महेश ने गरमा-गरम मोमो बना दिये। इस मौसम में मोमो और गरम-गरम काॅफी का मजा ही और था। बर्फ अभी गिर ही रही जो अब परेशानी का सबब भी बनने लगी क्योंकि बर्फ ऐसे ही गिरती रही तो वापसी मुश्किल हो जायेगी। अब अंधेरा होने लगा और ठंड भी बढ़ गयी। टेंट भी बर्फ के वजन से थोड़ा दबने लगा था इसलिये उसके ऊपर गिरी बर्फ को झाड़ना जरुरी हो गया। कुछ देर में बर्फ गिरना फिर बंद हो गया और बादलों के बीच से आँख मिचैली करता हुआ चाँद नजर आने लगा तो उम्मीद बन गयी कि अब आसमान साफ ही हो जायेगा...

चाचाजी ने आग जला दी गयी जिससे थोड़ी राहत मिली पर धुँए का हवा के साथ घूमते रहना एक गंभीर समस्या बन गया। बर्फ पड़ने से चचाजी के चेहरे में रौनक आ गयी और बोले - हमें तो बर्फ में ही अच्छा लगता है। बर्फ नहीं पड़ती है तो दुःःख होता है। ऐसे मौसम में तो हम में दोगुनी ताकत आ जाती है। उनसे उनके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया - मेरे परिवार में मेरी पत्नी, दो लड़के और एक लड़की है। अपने सफेद बालों में हाथ फेरते हुए उन्होंने बीड़ी का एक लम्बा कश खींचते हुए बोले - बच्चे तो पढ़-लिख गये हैं। दोनों लड़के काम करते हैं और लड़की की जल्दी शादी कर दूँगा। आसमान की ओर देखते हुए उन्होंने मौसम का कुछ अनुमान लगाया और फिर बुदबुदाये - मेरा एक लड़का मुम्बई के होटल में काम करता है और अच्छा कमा लेता है। वो कभी-कभार मुम्बई से टूरिस्टों को यहाँ भेज देता है जिन्हें मैं इधर के ट्रेक करा देता हूँ। इससे अच्छी कमाई हो जाती है। मेरे यह पूछने पर कि क्या यहाँ तेंदूआ और कस्तूरी हिरन भी दिखते हैं ? उन्होंने हँसते हुए कहा - बहुत दिखते हैं। कितने बार तो मैंने खुद तेंदुआ देखा है। फिर खिल-खिला कर हँसते हुए 22 साल पुराना किस्सा सुनाया - एक बार मुझे किसी के पास कस्तूरी हिरन की कस्तूरी मिल गई जिसे मैंने 15 हजार रुपये में उससे खरीदा और दिल्ली की एक पार्टी को 25 हजार रुपये में बेच दिया। मुझे 10 हजार रुपये का फायदा हो गया। आज से 22 साल पहले 10 हजार रुपये की बहुत कीमत थी। तब तो आप अभी भी ये सब काम करते होंगे मेरे ऐसा पूछने पर उनका जवाब था - नहीं अब ऐसा नहीं करता बस एक ही बार यह किया जिसके लिये मेरे घर वालों और जात-बिरादरी के लोगों ने बहुत सुनाया फिर उसके बाद कभी ऐसा नहीं किया। किस्सा सुनाने के बाद उनके झुर्रियों भरे चेहरे में हँसी बिखर गयी और उनकी आँखें लगभग गायब हो गयी...

अपने अनुभव से उन्होंने कहा - बर्फ रात को भी गिरेगी क्योंकि मौसम अभी ठीक से खुला नहीं है। पर फिलहाल बर्फ रुकी इसलिये मुझे उम्मीद है कि सुबह मौसम ठीक होगा। इसी भरोसे के साथ आग के पास और बर्फ के ऊपर खड़े होकर खाना खाया फिर टेंट में आ गयी। आज ठंड बहुत ज्यादा है और सन्नाटा भी महसूस हो रहा है। नींद तो नहीं आई पर अभी आधी रात भी नहीं हुई कि बर्फ गिरनी शुरू हो गयी। बर्फ से बार-बार टेंट अंदर की ओर दबने लगा जिसे झाड़ना जरुरी हो गया। काफी देर तक इसी तरह समय कटा और फिर पता नहीं कब आँख लग गयी...

अचानक बाहर से महेश और चाचाजी के चिल्लाने की आवाजों से आँख खुली। महेश बाहर से मेरे टेंट के ऊपर पड़ी बर्फ को झाड़ रहा है। मैं टेंट से बाहर आयी तो देखा जमीन में बहुत मोटी परत बर्फ की जम गयी है और अभी भी तेज बर्फ पड़ रही है। बर्फ की मोटी परत से मेरा टेंट भी नीचे दबने लगा। महेश और चाचाजी ने मुझे बार-बार बर्फ झाड़ते रहने को कहा ताकि टेंट दबे नहीं। सुबह होने में अभी दो घंटे बचे हैं। मेरे ये दो घंटे टेंट में बैठकर बर्फ झाड़ते हुए ही बीते। सुबह का उजाला देख जान में जान आयी और मैं बाहर आ गयी। अब तक तो बेहिसाब बर्फ जम गयी और उतनी ही तेजी से बर्फ गिर भी रही है...

पहले मेरा इरादा सामने वाली चोटी में जाने का था पर अब सब जगह बर्फ ही बर्फ है। रात की बची हुई लकड़ियों को चाचाजी ने जला दिया जिसके पास खड़े होकर चाय नाश्ता किया। हालांकि आज रात भी मुझे  टेंट में ही रुकना है पर चाचाजी ने कहा अब बर्फ का रुकना मुश्किल है। ऐसे में यहाँ फँसना किसी मुसीबत से कम नहीं होगा। इसलिये तय हुआ कि लोहाजंग तक का पूरा टेªक एक ही दिन में कर के आज ही लोहाजंग पहुँच जायेंगे...

जब चलना शुरू किया तो बर्फीली हवाओं ने मुँह में थप्पड़ बरसाने शुरू कर दिये। ताजी गिरी बर्फ में चलने पर पाँव अंदर तक धसक रहे हैं। थोड़ा चल लेने के बाद ब्रह्मताल आ गया। इस समय झील को देखना अलग ही एहसास है क्योंकि झील के चारों ओर बर्फ ही बर्फ है और ऊपर से भी बर्फ गिर रही है। कल कुछ देर के लिये ही झील दूसरे रूप में दिखी थी पर आज सब बदला हुआ है। कुछ देर झील के पास खड़े रहने के बाद फिर चलना शुरू कर दिया। अब पथरीली चढ़ाई शुरू हो गयी। बार-बार बर्फ के नीचे दबे पत्थरों की टोह लेते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ रहा है उस पर तेज हवाऐं चलना और मुश्किल कर रही हैं...

कल आते समय नजारा रंगीन था और मात्र कुछ घंटों में सब बदल गया। आज रंग के नाम पर सिर्फ सफेद ही है। चाचाजी की बात सही थी कि हिमालय का मौसम कभी भी बदलता है हालाँकि नैनीताल के फैशन के बारे में कुछ नहीं कह सकती। जैसे-तैसे पथरीली चढ़ाई पार की और बुग्याल पर आये। कल जो बुग्याल पीली सूखी घास से ढका था वही बुग्याल आज बर्फ से ढका है। यहाँ पहुँच के एक बार लगा शायद अब बर्फ कम हो जाये पर यह भ्रम ही निकला क्योंकि थोड़ी ही देर में दोगुनी तेजी से बर्फ गिरने लगी। अब तो यह पक्का हो गया कि यहाँ रुकना मुसीबत में फँसना है इसलिये लोहजंग जाना ही होगा जो अभी बहुत दूर है...

कुछ देर बुग्याल में रुकने के बाद आगे चलना शुरू किया। आज इधर-उधर देखने को कुछ नहीं है। हिमालय कहाँ है इसका कुछ आभास नहीं है क्योंकि बर्फिली धुुंध से सब ढका है। बुग्याल में हवायें और भी तेज हो गयी जिसने मुसीबत और बढ़ा दी। सिर झुकाये हुए बुग्याल पार किया और जंगल वाले इलाके में आ गये। पेड़ भी बर्फ से ढके हैं। सफेद के अलावा दूसरा कोई रंग नहीं है। यहाँ रास्ता थोड़ा संकरा हो गया जिसमें फिसलना मतलब गहरी खाई में गिरना है...

काफी लम्बा रास्ता ऐसे ही तय किया। बीच में एक जगह आयी जहाँ बर्फ बहुत ज्यादा तेजी से गिरने लगी। यहाँ फिर से पाँव गहरे तक बर्फ में धसकने लगे। जूतों के अंदर भी पैर ठंड से सुन्न होने लगे और दस्तानों के अंदर तो हाथों के होने का एहसास भी नहीं हो रहा...

कठिनाई से ही पर इस हिस्से को भी पार कर लिया। अब बर्फ गिरनी तो बंद हो गयी पर बारिश पड़ने लगी। लोहाजंग दिखायी देने लगा पर अभी भी काफी चलना है। अब तो मौसम तरह-तरह के रंग दिखाने लगा। कभी बारिश, कभी बर्फ, कभी धुंध तो कभी बिल्कुल साफ। हर कदम में मौसम ने नया रूप दिखाया। धुुंध के बीच कभी कोई छोटा सा घर नजर आ जाता तो अच्छा लगता। काफी देर से सफेद रंग की आदि हो चुकी आँखों को भी कोई दूसरा रंग देखना सुकुन दे रहा है। अब रास्ते में बर्फ नहीं है। लगता है जैसे सिर्फ ऊँचाई में ही बर्फ गिरी है। खैर जो भी हो मौसम का हर रंग देखते हुए अंततः शाम होते-होते लोहाजंग आ ही गया। मैं थकान और ठंड से हाल बेहाल हूं इसलिये जल्दी ही खाना खाया और आराम किया...

सुबह भी बारिश और धुंध है। दिन में मौसम खुला तो मैं नजदीक ही अजना टाॅप चली गयी। जाते हुए रास्ते में छोटे बच्चों का स्कूल दिखा। शायद ठंड के कारण बच्चे अंदर न बैठ के छत पर बैठे हैं। मेरे हाथ में कैमरा देखते ही सारे बच्चे मेरे सामने इकट्ठा हो गये और फोटो के लिये अपने-अपने पोज देने लगे। बच्चों के स्टाइल को देख के लगा कि इन्हें पर्यटकों और कैमरों की आदत है। रास्ते में कुछ घर और खेत भी दिखे। एक खेत में किसान बहुत ही तन्मयता के साथ बैलों से हल जोत रहा है। यही तो है असली हार्ड-वर्क। मैं कुछ देर उसे हल जोतते हुए देखती रही फिर आगे बढ़ गयी और घने जंगल में पहुँच गयी। एक बार लगा जैसे मैं रास्ता भटक गयी हूँ पर आगे बढ़ते-बढ़ते अजना टाॅप आ गया। मैं कुछ देर घास में लेट कर आसमान को देखती रही...

अब फिर से मौसम बिगड़ने लगा और ओले गिरने लगे। लौटते हुए पूरा रास्ता ओलों के बीच ही कटा। इन गिरते हुए ओलों के बीच अचानक ही एक 25-26 साल की महिला दिखायी दी। गोरे चिट्टे रंग और ठेठ पहाड़ी ठसक वाली उस महिला ने भी वही पारम्परिक लिबास ही पहना है। उसने मुझे रोकते हुए कहा - अजना टाॅप से आ रही हो ? तुम तो भीग गयी। मेरे घर चलो मैं आग जला दूंगी और तुम्हें चाय पिला दूँगी। मेरा रेस्ट हाउस यहाँ से कुछ ही दूर था पर मैं उसके साथ उसके घर चली गयी...

हम रास्ते से थोड़ा ऊपर निकले और खेतों के बीच से होते हुए उसके घर पहुँचे। घर अंदर से तो मिट्टी से लिपा है पर बाहर से सीमेंट लगा है जिसे गुलाबी रंग के पेंट से रंगा गया है। छत पारम्परिक पत्थर की स्लेटों की है जिसे तिरछा करके लगाया है। पशुओं का कमरा अलग है। मुझे एक कमरे में बिठा कर वो दूसरे कमरे में चली गयी। इस कमरे में एक सोफा दो कुर्सियाँ और बीच में एक मेज है जो हाथ से बने मेजपोश से ढकी है। दिवार में कुछ सजावट के सामान के साथ देवी-देवताओं के कैलेंडर टंके हैं। घर के एक कोने में एक टेलिविजन ने भी अपनी जगह बनायी है। कुछ देर उस कमरे में अकेले रहने के बाद मैं महिला जिस कमरे में गई थी वहीं चली गयी। वो वहाँ रसोई के चूल्हे में आग जला रही है। मेरे आते ही वो थोड़ा शर्माते हुए बोली - आप बाहर बैठो। यहाँ कुर्सी नहीं है और लकड़ी का धुँआ भी है। मैं आपके लिये आग वहीं जलाकर लाती हूँ। परन्तु मैं रसोई में ही बैठ गयी। उसका नाम पूछने पर वो आग जलाते हुए बोली - चम्पा। चम्पा को देख के लगा है कि उसकी उम्र ज्यादा नहीं है इसलिये मैंने उम्र पूछ ही ली। चाय का बर्तन आग में रखते हुए बोली-  27 साल। फिर बोली - मेरी शादी को 7 साल हो गये हैं। मेरा मायका टिहरी में है। फिर कुछ सोच के बोली - अब तो नई टिहरी में आ गया है। पुराना वाला घर और जमीन तो टिहरी का बांध बनने में डूब गया। उदासी से बोली - मुझे तो नये घर की आदत भी नहीं है इसलिये मायके जाने का मन नहीं करता। मैं तो जाड़ों में भी यहीं रहती हूँ। उस समय घर पर कोई नहीं था। कुछ लोग खेत पर काम करने गये थे और कुछ बाजार की ओर...

चूल्हे से चाय का बर्तन उतराते हुए चम्पा ने कहा - खेती बाढ़ी से तो गुजर बसर नहीं होती उस पर  मौसम का भी कुछ भरोसा नहीं है। कभी कैसा तो कभी कैसा।  अपने मन का हुआ। सरकार भी कुछ ध्यान नहीं देती। सब कुछ खुद ही करना हुआ। आग के पास बैठकर गरम लगने लगा। मैंने उससे रसोई गैस के बारे में पूछा तो बोली - जाड़ों में तो लकड़ी में ही खाना बनाते हैं। खाना भी बन जाता है और गर्मी भी रहती है। गैस बहुत महंगी हो गयी है इसलिये बचानी पड़ती है। चम्पा ने स्टील के ग्लास में चाय बना के मेरे हाथ में दी और फिर इधर-उधर कुछ ढूँढने लगी। पूछने पर बोली - देख रही हूँ अगर कहीं कोई बिस्कुट रखा मिल जाता तो तुम्हें देती। तुमको भूख भी तो लग रही होगी। इतना अपनापन और फिक्र ऐसी जगह में रहने वाले ही कर सकते हैं वरना शहरों में तो लोगों को अपनी ही होश नहीं होती। चाय की चुस्कियों के साथ उसकी बातें सुनते हुए समय जल्दी बीत गया और ओले गिरने भी बंद हो गये। उसे इजाजत ले के मैं लौट गयी। चम्पा सड़क तक मुझे छोड़ने आयी और बोली - कभी आओ तो मिलने के लिये आना। चम्पा के साथ आज आखरी दिन अच्छा बीता...

यहाँ कुछ यादगार पल बिता के अगली सुबह नैनीताल वापसी की यात्रा शुरू कर दी...

Vineeta Yashswi

Vineeta Yashswi, a travel enthusiast. She loves travelling with the aim of reaching new places, people, and cultures. She loves trekking too.

As a trekker, she completed the treks, 

Milam Glacier (3500 mt.),
Nanda Devi East Base Camp (4200 mt.),
Roopkund Trek (4800 mt.),
Kuari Pass Trek (3,500mt.),
Chadar Trek in Leh on Frozen Zanskar River,
Winter Deo Tibba Peak in Himachal (6001 mt),
Kedarnath Trek (3885 mt.),
Gangotri (3100mt.),
Gaumukh (4255mt.),
Tapovan (4463mt.) trek,
Devariyatal (2438 m.),
Tungnath (3680 m.),
Chandrashila (4000 m.),
Brahamtal Trek (4000mt.),
Kedartal Trek (4790mt.) and other.

She has a great passion for photography since her childhood. She says, "The photography is a pure medium of expression for me".

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काण्डोम –Anupama Garg

August 10, 2017

Anupama Garg

भैया,
मूड्स के कोंडम का एक पैकिट देना।’’
मेरी बेशर्म आवाज़,
जैसे ही मेडिकल स्टोर में दी सुनाई,
मेरा छोटा कद,
बच्चों सा चेहरा देख कर,
बगल में खड़ी लड़की,
धीमे से बुदबुदाई.........
‘‘आप .........पर से खुद ही क्यों नहीं उठा लेती’’

फिर उसे जैसे ध्यान आया,
कि मैं तो चरित्रहीन कुलटा हूँ।
गंगा का प्रवाह उल्टा हूँ।
वो, अच्छी लड़की थी।
फेयर एण्ड लवली लेकर,
चुपचाप पैसे दे कर,
चलती बनी।

मगर स्टोर में पसरी थी,
मेरे मुँह खोलने से ले कर,
वहाँ से निकलने तक,
चुप्पी घनी।

लगभग, हर किसी की भौंहे खिंची हुई थी,
और सबकी निगाहें मुझसे बचती हुई,
मैं दुकान से ऐसे निकली,
मानों कोई सनसनी।

वैसे,
दीगर बात ये है ,
कि कॉण्डोम मुझे चाहिये थे,
सेक्स के लिए नहीं,
एक रिसर्च प्रोजेक्ट की फाईल में सेम्पल लगाने के लिए,
ये तमाशा तो यूँ ही खड़ा किया था मैंने,
लेगों की शरीर धर्मिता आज़माने के लिए।

आखिर, ऐसा है क्या उस माँस के टुकड़े में,
जो लड़की के स्तन देख कर फड़फडाता है।
खड़ा हो जाता है।
मगर उसी लड़की के कहने पर,
कॉण्डोम, न खरीदना, न बेचना, न पहनना चाहता है।

कॉण्डोम सिर्फ़ रबर का टुकड़ा नहीं,
ये स्वीकृति की सीमा भी दर्शाता है।
क्या ही अच्छा होता, गर लोग समझते,
कि कॉण्डोम सिर्फ़ सुरक्षित सेक्स नहीं,
स्त्री की देह की गरिमा व शरीर धर्मिता का,
सम्मान भी सिखाता है।

Anupama Garg

Anupama identifies herself as a young, energetic, thoughtful and sensitive human being before anything else. An author, a content strategist, a communications expert, a ghost writer, a blogger, a devil’s advocate and a woman are some other hats she wears.

She writes books on controversial subjects, expresses her opinions and thoughts vocally and believes in empowerment and responsibility of expression. She can be reached on her LinkedIn/Facebook profile(s) at:

https://in.linkedin.com/in/anupama-garg-1b059b31

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