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  • किसानों की जमीन पूंजीपतियों  द्वारा जबर्दस्ती छीनी जाती है या हम किसान को मजबूर कर देते है ऐसा करने पर

    किसानों की जमीन पूंजीपतियों द्वारा जबर्दस्ती छीनी जाती है या हम किसान को मजबूर कर देते है ऐसा करने पर

    Nishant Rana[divider style=’right’]

    आए दिन हम सुनते रहते है की कोर्पोरेट किसानों की जमीन हथियाती जा रही है इसके आगे भी यह सुनते है कि  सरकार जोर जबर्दस्ती पूंजीपतियों को किसान की जमीनों पर कब्जा दिलवा रही है। इसके लिए हम दूर दराज के क्षेत्र, जंगलों आदि के बारे में की-बोर्ड पर बैठे तुक्के मारते रहते है क्योकि पुलिस फौजों के फोटो गाहे बगाहे हमारे सामने को निकलते रहते है भले वह फोटों प्रायोजित होते हो या किसी अन्य प्रयोजन के लिए इस्तेमाल किए जाते हो। हमने तो सरकार पुलिस फ़ौज को कोसते हुए किसानों के समर्थन में लेख दे मारा है बस हो गया तथ्यों तक जाने में समय ऊर्जा भी खर्च होती है और कहानी भी हमारी समझ से अलहदा मिल सकती है तो आज की पत्रकारिता जो मिनट दर मिनट बदलते ट्रेंडिंग मुद्दों पर खड़ी है इन सब पर कौन सर खपाए।

    फिलहाल यह लेख न किसानों की जमीन पर कब्जा करते जा रहे कोर्पोरेट के समर्थन में है , न ही किसी पुलिस या फ़ौज के किसी उत्पीड़न के मामले को जस्टिफाई करने के लिए इसलिए विनती है कि किसी भी टिका टिप्पणी से पहले लेख पूरा पढ़ा जाए।

    किसान किस तरह खेती बाड़ी से दूर होते हुए अपने खेतों से भी दूर होता जा रहा है। इसके लिए बस्तर के किसी आदिवासी गाँव, राजस्थान, मध्य प्रदेश के दूर दराज के गाँवो तक पहुँचने की जरुरत नहीं है जहाँ “विकास” नामक सदी का सबसे बड़ा मानवीय और प्राकृतिक करप्शन अपने बिलकुल शुरुआती दौर में पैर जमा रहा है। विकास का मतलब अन्यत्र विश्व में कुछ भी होता हो लेकिन हमारे समाज में विकास का इससे इतर मतलब कम से कम मुझे तो नहीं ही दिखाई पड़ता है!

    यहाँ मैं बात करना चाहता हूँ उन गांवो के बदलाव की जो छोटे बड़े शहरों से बहुत दूर नहीं थे लेकिन शहरी प्रभाव से लगभग लगभग अछूते थे , देश की राजधानी दिल्ली के दो सौ किलोमीटर के दायरे में आज भी सैकड़ो गाँव ऐसे मिल जायेंगे जो शहरों से लगभग पूरी तरह कटे हुए है जहाँ शहरों से जोडती हुई सड़कें या तो दो एक साल पुरानी है या अभी तक बनी ही नहीं है। कितने ही गाँव दो छोटी छोटी नदियों के किनारे बसे हुए है जिनमें बरसात में पानी आ जाने के कारण बाहरी क्षेत्रों से सम्बन्ध बिलकुल कट जाता था , जहाँ अभी तक यातायात के साधन के नाम पर केवल रेलवे की दो चार पसेंजेर ट्रेनों का सहारा है। जो इन ग्रामीण क्षेत्रों पर बने हाल्ट पर मिनट दो मिनट के लिए रूकती है. आदमी तो आपने आने जाने का बंदोबस्त कर भी ले लेकिन कितनी औरते और बच्चे अपनी बीमारी और जरूरतों के लिए भी बीस किलोमीटर की दूरी आज भी तय करना बहुत ही टेढ़े कामों में से एक है । आज भी इन ग्रामीण क्षेत्रों में दो चार आदमी औरत ऐसे मिल जाते है जो कभी शहर नहीं गए या केवल मज़बूरी में गए हुए होते है।

    इन सब के बाद भी ये गाँव आत्म निर्भर थे,  शांति से जीवन व्यतीत करते थे , होड़, हबड़-तबड़ से दूर थे। जीवन यापन की बेसिक जरूरतों अन्न, सब्जी, दाल एवं अन्य खाद्यान्नो, कपड़ा, मकान आदि को पूरा करते हुए को भी धीमी गति से ही सही लेकिन मजबूत स्थिति की ओर बढ़ रहे थे। नदियों, तालाबों, पशुओं, पेड़ पौधे से निर्भरता और जरूरतों का जीता-जागता सम्बन्ध बना हुआ था। गाँव का आदमी आज भी जल्दी से इन सब को नुकसान नहीं पहुंचाता बल्कि प्रकृति का पोषण ही करता है। भारत के गाँवो की सबसे बड़ी ताकत यहीं रही है की उनकी निर्भरता बाजार पर न के बराबर रही है जबकि बाजार उन पर आज भी पूरी तरह निर्भर है। हम भारतीय गांवों के साथ जो सबसे बुरा कर सकते थे वह यहीं था की गांवों की आत्मनिर्भरता को ज्यादा से ज्यादा कमजोर किया जाए. जिसके लिए हम सब ने पिछले तीन दशक भरपूर प्रयास किया है। हमनें कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है की भारत के गाँव-किसान बाजार की मांग के हिसाब चलने लग जाए, बाजार का उन पर पूरी तरह नियन्त्रण हो जाए। इस बात की शुरुआत को इस तरह से समझ सकते है खेतों के पानी देने के लिए रहट का इस्तेमाल होता था, तालाबों में भरपूर पानी रहता था, जुताई के लिए हल बैलों का प्रयोग होता था, रासायनिक जहर की उसे कोई जानकारी नहीं थी। धरती अपनी शक्ति में स्वयं वृद्धि करे इसके लिए कुछ एक सालों में जमीन को बिना फसल लिए कुछ समय के लिए खाली छोड़ा जाता था।  इन सब के लिए किसान को बाजार की कितनी जरूरत पड़ने वाली थी या नहीं पड़ने वाली थी यह हम आसानी से देख सकते है। किसान का उत्पादन के लिए अलग से कुछ खर्चा था ही नहीं सब कुछ प्रकृति , पशुओ, गाँव में रहने वाले सभी व्यक्तियों का सामूहिकता सहजता से बढ़ते कदम थे जो न केवल उन्हें मजबूत कर रहे थे बल्कि पूरी धरा को एक कड़ी में जोड़ते हुए मजबूत कर रहे थे।

    एक नजर :- ग्रामीण किसान-महिला बेहद परिश्रमी, उत्पादक व Entrepreneur (व्यवसायी) होती है

     

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    हल-बैल बनाम ट्रैक्टर

    यह हम थे जिसने यह मानसिकता बनाई हल बैल चलाने वाले किसान को हीनता  या तरस खाने वाली की दृष्टि से देखा। जबकि हीनता से हमारी दृष्टि को देखा जाना चाहिए था। हम घंटो मोबाइल चला सकते है, टीवी देख सकते है , बे-सिर पैर की बहसों में घंटो ऊर्जा खर्च कर सकते है। हम यह  भी नहीं जानते की हमारी थाली में जो रोटी रखी है वह लूट कर खाई जा रही रोटी ही हो। लेकिन हम खेतीं को आधुनिक बनाने के व्याख्यान  दे मारेंगे। हल बैल किसान के घर की चीज है जो उसे सहज उपलब्ध रहती है, फसल, पशुओं के चक्र में आपसी जरूरते, रख रखाव जरूरत से ज्यादा पूरी होती रहती है जबकि ट्रैक्टर बाहरी चीज है जिसके लिए उसे बड़ी पूंजी लोन आदि जुटाने पड़ते है। इसके बाद उसके रख-रखाव चलाने के भारी खर्चे अलग से। किसान खर्चा उठा सकता है उसके लिए कोई बड़ी बात भी नहीं होती है। लेकिन जिस दलदल में हम फंसे थे हमने किसान को भी उसी दलदल में धकेल दिया। हल बैल की जुताई धरती को उत्तेजित नहीं करती है, धरती उर्वरक क्षमता को पोषित करते केंचुओं एवं अन्य कीड़ो मकोड़ों आदि को नहीं मारती है जबकि ट्रैक्टर की जुताई खेत की क्षमता को कम करती जाती है। चूँकि अब हल बैल से खेती करना शर्म की बात है किसान अपने सहज जीवन और जमीन का ही दुश्मन बन बैठा.

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    प्राकृतिक खाद बनाम रासायनिक खाद

    प्राकृतिक खाद भी किसान को सहजता से उपलब्ध है जो खेती किसानी फसलों को बिना किसी नुकसान के भरपूर पोषण देता है। लेकिन बाजार की मांग को पूरा करने में वह रासायनिक खादों का प्रयोग भी प्रचुर मात्रा में करने लगा। रासायनिक खाद जमीन की उर्वरक क्षमता को तेजी से बढाते है, एक के बाद एक तेजी से ज्यादा ज्यादा फसल लेनी है क्योकिं किसान तो पूंजी बनाने के लिए भी फसल पर ही निर्भर है। इस चक्कर में ऐसा समय भी दूर नहीं जब धरती किसानों का साथ छोड़ देती है  हमने गाँव-किसान को जहर की खेती करने मजबूर कर दिया है की वह अपना स्तर किसी भी तरीके चकाचौंध के ढोंग की तरफ धकेले वरना हेय दृष्टि से देखे जाने और पिछड़ा महसूस करने के लिए तैयार रहे।

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    रहट-तालाब-कुएं बनाम नलकूप-सब्मर्सिबल

    रहट

    नब्बे के दशक तक रहट-तालाब-कुएं गाँव खेती की लाइफ-लाइन हुआ करते थे। तालाब या कुओं से आप जबर्दश्ती पानी निकलते नहीं रह सकते। कुओं से पानी निकालने के लिए या तालाबों से पानी के लिए धरती के नीचे का जलस्तर या तो बहुत अच्छी अवस्था में होना चाहिए या फिर बारिश आदि के पानी को इकठ्ठा करने उसे साफ़ बनाए रखने के लिए, बर्बाद न करने के लिए सामूहिक सजगता अवश्य होनी चाहिए। किसानों द्वारा खेतों में प्रयोग किए जाने वाले नलकूपों से पानी तो खेती के लिए उतना ही निकाला जाता है जितना रहट आदि के माध्यम से निकाला जाता है। अंतर आया है तो गति का, निर्भरता का एवं उसके जल के मुख्य स्रोतों से दूर जाने का। अंतर केवल गति या श्रम की कमी का होता तब कोई दिक्कत नहीं थी  लेकिन भारतीय किसान रहट द्वारा पानी निकालने के लिए किसी बाह्य कारक पर निर्भर नहीं था। आज वह बिजली और महंगे तेल पर पूरी तरह निर्भर है, साथ के साथ जो सबसे बुरा हो सकता था वह यह था किसान और गाँवो का भी सबसे आखिर में ही सही लेकिन तालाबों और कुओं से सम्पर्क टूटता चला गया। इतना भी जरुरी नहीं समझा गया की लोगों को इतना तो जागरूक किया जाए कि कम से कम जानकारी में तो इतना पता हो की पृथ्वी के नीचे अथाह जल भंडार नहीं है। रही सही कसर आज घर घर में सब्मर्सिबल लगवा कर पूरी की जा रही है। यह सब क्या षड्यंत्र का हिस्सा नहीं है. जब प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट किए जाने का काम  इतने बड़े पैमाने पर हो सकता है तो किसान के लिए वाटर हार्वेस्टिंग जैसे प्रोग्राम भी बड़े स्तर पर स्थापित किए जा सकते थे, वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों की ओर बढा जा सकता था लेकिन जब सोच समझ ही रखा है की किसानों को आत्मनिर्भर बनाना पूंजीवाद पर चोट करेगा तो क्यों उसके लिए प्रयास किए जाए।

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    एक नजर :- किसान और अर्थव्यवस्था  

    चलते चलते

    यह हम थे जिसने मानसिकता बनाई की शहर में रहना ही आपको महान, बुद्धिमान बना देता है और गाँव में रहने वाला व्यक्ति मूर्ख होता है। यह हम थे जिसने गाँव किसान को लगातर हीन मानते हुए यह दिखाया की भोग करना, कुछ अधिकार प्राप्त हो जाए तो केवल अपने भोग करने के लिए उनका जितना हो सकता है दुरूपयोग करना और इन दुरुपयोगों में भी अपने आप को महान साबित किए रहना। यह हम थे जिन्होंने भोग, ढोंग और धूर्त्तता को आदर्श के तौर पर  स्थापित किया। हमने ही यह स्थापित किया कि महंगी डिग्री हासिल कर के कुछ उत्पाद बेच लेना , नौकरी कर लेना, मानसिक गुलाम हो जाना महानता है और जो खेत घर परिवार संभाले हुए है जो पूरी अर्थव्यवस्था में वास्तविक योगदान देते है वह सब हमसे कम समझ रखते है।

    मुद्रा में ही बात कर ले तो हम आज तक किसान के  दैनिक श्रम की कीमत नहीं तय कर पाए , हम किसान को यह अधिकार नहीं दे पाए की वह अपनी फसल की कीमत क्या रखेगा,  हम यह तय नहीं कर पाए यह किसान का अधिकार है की वह अपनी फसल को मर्जी जिस बाजार में बेचे, वहीँ किसान अपनी ही चीजे बाजार से कई गुना दामों पर खरीदने को मजबूर है। हमने विकल्प ही क्या छोड़ा है सिवा भूखे मरने या मुद्रा के बदले जमीन बदलने के  और हम बात करते है किसान को सिखाने की, उसे आधुनिक बनाने की ; कुछ बेसिक शर्म लिहाज तो हम में भी होना ही चाहिए।  किसान बाजार के खेलों में फंस कर जमीन बेचता है,  जिसे  बाजार की और धकेलने का काम हम आप लगातार अपने दैनिक जीवन में करते है। जमीन की लड़ाई तो रह ही नहीं जाती है लड़ाई तो फिर मुआवजों की होती है हम यह बात समझते ही नहीं है कि दुनिया का कोई भी मुआवजा उस जमीन के बराबर हो ही नहीं सकता। पूंजी अपने आप को फिर से बढ़ा लेती है, जमीन बेचने वाला किसान उस पूंजी का कितना भी सही इस्तेमाल कर ले लेकिन उतनी जमीन के उत्पादन की कीमत प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कही न कही कोई किसान ही चुकाता है। हमने हर उस बात को उच्च मापदंडो पर निर्धारित किया जो धूर्तता, ढोंग, परजीविता पर आधारित थी जिन पर किसी भी सभ्य समाज के मनुष्य को शर्म आनी चाहिए थी। जो शहर गांवों के रहमों-करम पर फले फूले हो, लूट खसोट को अपने जीवन का हिस्सा बना चुके हो वह एक भी व्यक्ति को वास्तव में कैसे आत्मनिर्भर बना सकते है, हाँ अगर आप  कम से कम मुद्रा पर अधिक से अधिक प्राकृतिक संसाधनों पर सरल सम्पन्न जीवन व्यतीत करते लोगों के बजाय धूर्तता के साथ बनाई गयी परजीवी व्यवस्था, किसी भी तरीके से इकठ्ठा की गई मुद्रा पर आधारित मापदंडो को जो गांवों की शक्ति पर भोग करती है को आत्मनिर्भरता, ईमानदारी, चेतना के विकास में सहायक तत्व, महानता बोलते हो तो अलग बात है।

    एक नजर :- बूचड़खाने

  • नौ का पहाड़ा

    नौ का पहाड़ा

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    वह बच्चा पतली सी न टूटने वाली डंडी की मार से जमीन पर नीचे पड़ा था।

    मम्मी, जो स्कूल में जा कर उस बच्चे की मैम हो जाती थी, ने नौ का पहाड़ा घर से याद करने को कहा था। नौ का पहाड़ा उसके लिए अभी खेल है वह नौ का पहाड़ा दोहराए जा रहा है नौ ई कना नौ, नौ दूनी अट्ठारह, नौ तिया सत्ताईस… मम्मी देखो मेरे को तो एक दम याद हो गया, सुनो नौ ई कना नौ, नौ दूनी अट्ठारह नौ तिया सत्ताईस, नौ चौक छत्तीस… नौ दहाई नब्बे। मैंने तो अभी ही सुना दिया तुम कुछ कहोगी तो नहीं मैं भूल गया तो!

    – नहीं!

    “पहाड़ा दिया था सुनने को चलो तुम सुनाओ।” सबको ताजा कर दे ऐसी मुस्कान लिए बच्चा पहाड़ा सुनाना शुरू करता है नौ ई कना नौ, नौ दूनी अट्ठारह, नौ तिया सत्ताईस, नौ चौक…. नौ चौक…. मैम जी मैंने घर पर तो सुनाया था, मैंने याद किया था।

    डंडी उठती है और उस बच्चे पर जमीन पर चीखते-चिल्लाते पड़े होने पर भी पड़ती रहती है।

    वह बच्चा पतली सी न टूटने वाली डंडी की मार से जमीन पर नीचे पड़ा था, शारीरिक चोट उसके लिए नई नहीं थी लेकिन ठगे जाने, विश्वास टूटे जाने को महसूस करने का उसका यह पहला अनुभव था।

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    Devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 


  • सामूहिक नेतृत्व बनाम गरियाने की आजादी

    सामूहिक नेतृत्व बनाम गरियाने की आजादी

    Nishant Rana


    हमें अपने खांचे इतने पसंद है कि जो हमारे खांचों में फिट बैठता है बस वहीं भगवान का दूसरा रूप है जो हमारे खांचों से अलग है उसे केवल इसलिए गालियां देंगे की हमारे खांचे वाला ऊपर दिखाई दे।
    आजादी के समय सबका योगदान था भगत सिंह, आजाद , गांधी , अम्बेडकर , नेहरू , सुभाषचंद्र आदि आदि। इन सभी को आज खेमे में बांट दिया गया है अलग अलग खेमों द्वारा गरियाया ही जाता है प्रेमचंद, टैगोर आदि को भी नहीं बख्शा जाता केवल इसलिए कि वह सब आपकी पसंद के हिसाब से काम क्यों नही कर रहे थे, भले ही हम खुद तमाम मकड़ जालों में फंसे हो , एक निश्चित पैटर्न में जीवन जी रहे हो, अपने ही स्वार्थ, सुरक्षा , सुविधाओं के लिए जीवन बिता रहे हो और वह सब इसलिए जब कभी कभार हमारा अंतर्मन हमें धिक्कारता है तो हम तुरन्त अपनी जिम्मेदारी किसी दूसरे पर डाल देना चाहते है, अपना पल्ला दूसरों पर झाड़ लेने से खुद को जिम्मेदार ठहराने वाली ऊर्जा से कुछ समय के लिए मुक्ति या शांति तो मिल ही जाती है।

    चलते चलते –

    हर व्यक्ति के जीवन के अलग अलग घटना क्रम है , अलग अलग परिस्थितियां है, हर व्यतित्व का विकास अलग है, अलग अलग काम करने के तरीके है ,  अलग अलग क्षेत्रों में रुचि व प्रतिभा है। जिस व्यक्ति की जैसी समझ और तासीर बनती जाती है उसी के हिसाब से जीवन जीता है जो जिसे उचित लगता है उसी समझ से सामाजिक योगदान भी करता है। कोई नेतृत्व अच्छा करता है , कोई लिखता अच्छा है, किसी का सामाजिक चिंतन बहुत गहरा है किसी का वैज्ञानिक पक्ष मजबूत है। हां हर जीवन के असर, संदेश बहुत सीमित से लेकर बहुत व्यापक हो सकते।
    कोई व्यक्ति भगवान भी नहीं है, समय जीवन भी निश्चित ही है जिसकी जैसी समझ थी उसने अपना जीवन होम करके देश समाज के लिए काम किया। हम कब देखेंगे कि समाज एक व्यक्ति नहीं बनाता यह मिलजुल कर बनता है। हम कब खांचों से मुक्त होकर वाकई अपनी जिम्मेदारी समझेंगे कब इन लोगों को अलग अलग गरियाने के बजाय इनके सामूहिक नेतृत्व से सीख लेंगे।

    स्वतंत्रता दिवस की शुभकामना के साथ बस इतना ही कि आजादी, लोकतंत्र कोई एक दिन या एक बार की विषय-वस्तु नहीं है। रोने की भी नहीं की है  यह प्रत्येक मनुष्य की जिमेदारी है की जितना हमारे पूर्वज हमारे लिए परिस्थितियां जितनी सुगम बना कर गए हम अगली पीढ़ियों को बेहतर लोकतांत्रिक मूल्य और समाज देकर जाए।

     

  • किसान और अर्थव्यवस्था

    वह भी समय ही था जब स्कूल-कॉलेज नहीं थे, बैंक नहीं थे, थे भी तो किसान की पहुंच से दूर थे।बिना स्कूल जाए लोग खेती किसानी करना सीखें, मौसम के हिसाब से फसलों का चुनाव करना सीखें, एक दूसरे की सहायता की, समूह बनाए जितना प्रकृति से लिया उसे बढ़ा कर ही लौटाया। बच्चों का रिश्ता प्रकृति, पशुओं से सहज रूप से अपने आप ही जुड़ता चला जाता। खेतीं किसानी करने वाले परिवार जो अच्छा खा पी रहे , बाकी लोगों के लिए भी खाने का इंतजाम कर रहे, पशु पाल रहे। अपने और पशुओं के रहने की अच्छी व्यवस्था कर रहे। ऐसे परिवारों को किसी डिग्री, मैनेजमेंट से कैसे कमतर आँक सकते। लेकिन जिस देश में जहां हर व्यवस्था में जाति व्यवस्था सर घुसाए खड़ी हो जिस व्यवस्था में सदियों से यह तय होता आ रहा कि जो मेहनती है वह पूरा जीवन शोषण और दुत्कार है दूसरी और वह देखता है की जो मेहनत नहीं कर रहे, झूठ, दलाली , नौकरशाही आदि में भोग के साधन बड़ी मान सम्मान के दिखावे के साथ जुटा रहे, सेवक के नाम पर अधिकारों का दुरुपयोग उसी को दबाने में कर रहे। जहां इस दिखावे के लालच में एक एक पद के लिए लाखों लोग अपने जीवन के कई-कई साल बर्बाद कर देते है।

    एक वह व्यक्ति जो खेतीं किसानी कर सकता उसका गुलामी की और ले जाती शिक्षा का कोई मतलब नहीं लेकिन केवल क्लर्क, फौजी, सिपाही की नौकरी प्राप्त करने तक कि केवल अर्य्हता के लिए लाखों रुपए समय स्कूलों, ट्यूशनों आदि में फूंक दिए जाते है।
    एक किसान जिसकी पैदा किया गया आलू टमाटर प्याज अन्य सब्जियां एवं अन्य कच्चा माल कौड़ियों के दाम बिक जाती है वहीं प्रोसेस होकर बाजार में कई सौ गुना दाम पर बिकता है।
    एक किसान जिसे रासायनिक उर्वरकों की बिल्कुल आवश्यकता नहीं वह हजारों रुपए इन पर फूंक देता है। बाजार से कदमताल के चक्कर में किसान ऐसा फंसा की खुद अपना और अपनी जमीन का दुश्मन बन बैठा। कितने ही लड़को को कहते सुनता हूँ जमीन के बदले में नौकरी और पैसा मिल रहा तो क्या बुरा है। एक पूंजीवादी व्यवस्था के लिए इससे अच्छी बात क्या होगी जहाँ देश एक फैक्ट्री हो जाए और देश के किसान उसके नौकर हो जाए।

    जब सूबे का मुख्यमंत्री कहता है की हमने किसानों से बिजली के लिए कुछ नहीं कहा तब लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि चोरी को बढ़ावा दे रहा। किसान जो अन्न उगा रहा , रख रखाव कर रहा , देश दुनिया के लिए भोजन, कपड़े आदि की व्यवस्था कर रहा सारा तथाकथित विकास जिसके शोषण के दम पर खड़ा है वह बिजली चोर हो गया। वह अच्छा खा पी ओढ़ नहीं सकता। इस नैतिकता की दुहाई वो जमात दे रही जिसके लिए बिजली का उपयोग फोन, लैपटॉप चार्ज करने , ऐसी, कूलर, वाशिंग मशीन, फ्रीज आदि उपकरण चलाने भर तक बिना एक बूंद पर्यावरण के बारे में सोचे बिना करते है। बिजली जैसे नोटों से पैदा हो जाती हो। खाना जैसे नोटों से पैदा होता हो, कपड़े जैसे नोटों से पैदा होते हो , पानी जैसे नोटों से बनता हो। केवल समझ या मन में यह सब न कर पाने की टीस भी रखते तो बेहूदी बात कहने से पहले दस बार सोचते।

    चलते चलते –

    गाँधी जी इन मंसूबों को अच्छे से समझते थे। वह देश को गांव की नजर से देखते थे। वह समझते बूझते थे कि इस देश की आत्मा गांव और किसान है। इनका बाजारीकरण करने के बजाय यहां से सीखने और प्रयोग करने की जरूरत है। वह किसान को नौकर बनने के की बजाय कुटीर उद्योगों और प्राकृतिक खेतीं के माध्यम से मालिक बनने को कह रहे थे। देश-दुनिया पर्यावरण और बेहतर जीवन जा रास्ता इन्हीं अल्टरनेट व्यवस्थाओं से होता हुआ निकेलगा जिसके केंद्र में किसान और कृषि होंगे।
    किसानों के पास हमेशा व्यवस्था बदल सकने की ताकत रहीं है, किसान आपकी दयादृष्टि पर नहीं है। किसान की दयादृष्टि पर आप है। देश की अर्थव्यवस्था पहले भी खेती किसानी पर निर्भर थी, आज भी है और आगे भी रहेगी। यह हमें तय करना है की हम किसानों के शोषण पर आधारित व्यवस्था, देश को नरकीय स्थिति में ले जाने के साथ है अथवा उस व्यवस्था के जिसमें किसान और जमीन जो देश की अर्थव्यवस्था का आधार है वह पोषण और लाभ की स्थिति में होने है।

  • बूचड़खाने –

    25-30  साल पहले तक तो किसानों के लिए पशु-पालन कोई मुश्किल काम न था , पशुओं के लिए बड़े चारागाह छोड़े जाते थे, उसी में तालाब भी खुदवाएं जाते थे। पशु चरते, तालाब कीचड़ आदि में आराम फरमाते। दुधारू पशु समय पर अपने खूंटे तक भी पहुँचना समझते थे। किसान ने बाजारों से दूरी बनाई हुई थी। आपसी ताल मेल और निर्भरता इतनी बेहतर थी की मशीनरी आदि की जरुरत भी महसूस न होती थी।  खाने के लिए पैदा किया , पैदा कर के खाया यही क्रम चलता रहता था, पैदा भी जरूरत से बहुत ज्यादा नहीं किया जाता था।

    मुद्रा के बिना  लोगों का काम आराम से चलता रहता था , इन सब में खुद के लिए भी खूब समय बच जाता था लेकिन जिस समाज में बाज़ार  मेहनतकश और उत्पादक वर्ग के शोषण करने के लिए तैयार किया गया हो तो वह वर्ग इसकी चपेट में कैसे न आता। आपको शिक्षा, कपडे, भोजन , चिकित्सा , सुविधाएं आदि सब बाजार से खरीदना है। अगर यही सब आधुनिकता है तो किसान वर्ग क्यों न होड़ करता, आधुनिकता में वह क्यों न फँसता !

    आज की तारीख में घास के मैदान नहीं है, तालाब नाममात्र के बचे है। पशुपालन एक आदमी के दिन रात का काम है उन्हें पानी पिलाना होता है, चारे की व्यवस्था करनी होती है, दूध समय पर दुहना होता है आप किसी भी काम में नागा नहीं कर सकते। खल चौकर की व्यवस्था भी बाहर से ही करनी है। किसानों को खेती से पैसे हाथों हाथ नहीं मिलते उसके लिए फसल पकने व उसके बिकने तक का इंतजार करना होता है। दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए वह दुधारू पशुओं पर निर्भर है जिनका दूध बेच कर उसे आय होती रहती है। पशुओं का और उसके परिवार के छोटे मोटे खर्च निकलते रहते है। मोटा मोटा इतना समझ लीजिए आज की तारीख में अगर आप 30-40 हजार की नौकरी करते है, शहर में रहते है आप एक गाय या भैंस जो दुधारू भी हो के रहने-खाने का खर्च नहीं उठा सकते।

    किसान भी जो पशु पुराने हो जाते है, दूध नहीं दे पाते , बीमार हो जाते है उन्हें निकालते रहना होता है। पशुओं की संख्या भी बढ़ती है जगह के हिसाब से उनकी संख्या भी मेंटेन करके रखनी होती है। कई बार अचानक किसी पारिवारिक जरूरत के लिए पशु बेचने होते है।

    अब आप बताइये एक किसान बूढ़े बीमार पशुओं का क्या करेगा, पैसे के बिना नए पशु कहाँ से खरीदेगा। ऐसा तो है नहीं की आप वापिस पुराने तौर तरीकों पर लौटने के लिए किसानों की मदद कर रहे हो। आपकी कोरी धार्मिक भावुकता, चूतियापे में तो पशुओ के रेट गिर जाते है, उन्हें ग्राहक नहीं मिलते लेकिन पहले से ही आधुनिक होने की छटपटाहट , बाजार से ताल मेल करने के सहर्ष में जुटे किसानों की इन क़दमों  से जो कमर टूटती है, मानसिक उत्पीड़न होता है वह क्या करे !

  • अपने लिए ही हिंसा के जाल बुनते हुए हम

    आज जिस समाज में हम खड़े है हमारे चारों तरफ भय और हिंसा का माहौल है , किसी भी कीमत पर एक दूसरे को पीछे धकेल कर आगे बढ़ने ही होड़ मची है . हजारों सालों में हिंसा को इतना सूक्ष्म किया है की हमारा दैनिक जीवन जाने अंजाने  बिना किसी का भोग किये , शोषण किये आगे ही नहीं बढता और जब जब इस हिंसा में विस्फोट हुआ है तब तब धरती से जीवन को खत्म करती चली गई. शुरुआत  से  देखते चले तो जीने के ढंग में वैदिक व्यवस्था को सर्वोत्तम मान लिया। वर्ण व्यवस्था ऐसी बनायीं की आज तक मानसिक विकास थमा हुआ। जात पात के नाम पर मनुष्य को मनुष्य न समझा गया , स्त्रियों और शूद्रों को केवल भोगने के लिए ही पैदा होना बता दिया। इतने कड़े नियम बना दिए गए चलना , खाना पीना साँस लेना ही दूभर हो गया।
    कुछ लोगों यहां से हटे तो जैनी हो गए मोक्ष के नाम पर शरीर को इतने कष्ट दिए की पूछो मत, अहिंसा के नाम पर इतने कट्टर हो गए की अपने शरीर के साथ की जा रही हिंसा ही न दिखी ।
    एक व्यक्ति ने आगे आकर जीवन को समझने के लिए तब के सारे तरीकेे अपनाये जब शरीर को कष्ट देकर , तपस्या कर के, भूखा रह कर भी कुछ न हुआ तब जो सामने है उसे देखते हुए, मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझते हुए बुद्ध ने सभी प्रपंचो की पोल पट्टी खोली। जीवन को समझने समझाने की कोशिश की लेकिन हमने उसका भी क्या किया बुद्ध के बाद उस पर भी झंडा लगा कर धर्म बना दिया। आज सबका जमाल घोटा चल रहा है, वर्तमान दिखता नहीं इतिहास में घुस कर किसी भविष्य के लिये मार काट मचाये पड़े है किसी को ब्राह्मणवादी व्यवस्था लागू करनी है , कोई संगठन हिंदुत्व की रक्षा के लिए लड़ रहा है , किसी को साम्यवाद चाहिए , कुछ को भौतिकवाद चाहिए भले ही इन सब के लिए वर्तमान में कितनी भी हत्याएँ करनी पड़े , भृष्ट होना पड़े, खुद को कष्ट देना पड़े। अपना विकास हुआ नहीं पहले देश सुधार के तरीके दिमाग में भर लिए जाते है भले ही उस कल्पना के परिणाम कितने भी भयानक हो , ऐसे सुधार अंत आते आते में व्यक्तिगत कुंठाओं को तृप्त करने में ही योगदान देते है।
    विकास के नाम पर हमनें किस दिन अपना भला किया है, अलग अलग नामों के साथ क्या सब एक जैसे ही नहीं है!
    पूर्वजों ने अपने समय के हिसाब से जो ठीक लगा किया जो सुरक्षा , सत्ता , जीवन को समझने के लिए जो रास्ता दिखा अपना लिया, लेकिन हम किस हिसाब से अपने को विकसित बोलते है जैसे माहौल में पैदा हो गए, जैसा सुनते आये वहीं हमारा अंतिम सत्य हो गया भले ही वह कितना वीभत्स हो , वास्तविकता से कितना भी दूर हो बिना जांचे परखे ही अपना लेना उस पर तर्क वितर्क करते रहने ही विकसित होना होता है क्या भले ही पाँच हजार साल पुरानी जाति प्रथा पर ही गर्व क्यों न कर रहे हो । वास्तविकता यहीं है की वाह्य रूप से हम कितना भी आगे निकल आए हो मानसिक रूप से अपवाद व्यक्तित्वों को छोड़ कर हम दो कदम सही से न चले है। आज भौतिक सुखों को इकठ्ठा करने राह पकड़ रखी है लेकिन उम्र निकल जाती है सुख कमाते कमाते लेकिन वो दिन नहीं आता जिस दिन फुर्सत से उन सुखों का भी भोग कर ले , देख ले की इतना सब चाहिए भी था की नहीं, चाहिए भी था तो किस कीमत पर कभी सोचा की रोज एक जैसा जीवन जीने के लिए, धार्मिक, भौतिक उन्मादों में कितनी झीलों, तालाबों, नदियों की हत्या कर दी, कितने जंगल मिटा दिए , कितने जानवर मिटा दिए, युद्धों में कितने इंसान बलि चढ़ चुके। कल्पना कीजिए की खुद के ही जीवन का घेरा कितना सीमित कर चुके। कल्पना कीजिए उस कल की जिसमें ‘सीमेंट के एक घर’ जो कहीं रेगिस्तान में दुनिया की सारी सुविधाएँ लिए बिना पानी , भोजन व अन्य किसी भी प्राकृतिक संपदा के बिना खड़ा है।

  • सामाजिक नेतृत्व और अवतार

    उत्तर प्रदेश की राजनीति में पांच पार्टियां मुख्य है कांग्रेस, भाजपा, सपा ,बसपा और लोकदल। पिछले कई सालों से सपा और बसपा ने ही प्रदेश की  राजनीति में मुख्य धमक रखी, पिछले लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा भी राजनैतिक सत्तात्मक लड़ाई में दोबारा दावेदारी ठोक चुकी। लोकदल व कांग्रेस प्रदेश की राजनीति में अस्तित्व बनाये रखने के लिए ही जूझते दिखे। खैर पोस्ट के विषय पर आते है –

    भारतीय राजनीति में नेतृत्व दो तरीकों से होता आया है एक है सामंती तरीका जिसमें खुद को अवतार बना कर उसे लंबे समय तक भुनाया जा सकता है , अवतार नफरत फैलाकर, हिन्दू रक्षक, मुस्लिम रक्षक, दलित रक्षक , कल्पनाओं में ले जा कर आदि कैसे भी बन सकते है, ऐसा नहीं है कि इतना करने के लिए भी मेहनत नहीं करनी पड़ती बिल्कुल करनी पड़ती है लेकिन इस बात से कोई मतलब नहीं होता की जमीनी समस्याएं क्या है, उन पर काम कैसे करना है । सत्ता पाने और उसे बनाए रखने के लिए बस लोगों को आपके ईश्वर मान लेने तक बरगलाना है।
    दूसरा तरीका है जिससे लोकतंत्र मजबूत होता है। नेतृत्व लोगों के बीच से निकलता हुआ ऊपर तक पहुँचता है, इसमें आप अवतार नहीं होते , बरगलाना आपकी प्राथमिकता नहीं होती, क्षेत्रीय नेताओं के संगठन से शीर्ष नेतृत्व बनता है , अलग-अलग क्षेत्र की अलग-अलग समस्याओं पर काम करते हुए लोगों के बीच नेता बनते है , चुनाव जीतकर अपने क्षेत्र के लोगों का प्रतिनिधित्व करते है। प्रदेश स्तर या राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व इस बात पर निर्भर करता है की क्षेत्र स्तर की राजनीति में आप लोगों की समस्याओं पर कितना काम कर रहे; क्षेत्रीय नेताओं को अपने लोगों के लिए काम करने , बात रखने के लिए, आगे बढ़ने कितने मौके दे रहे। क्षेत्रीय नेतृत्व अपने वादों पर असफल तो शीर्ष स्तर पर भी नेतृत्व असफल।

    भारतीय समाज सामंती मानसिकता वाला है, लंबे समय से अवतारों को गढ़ता रचता आ रहा है, आम जन चाहे कोई सी भी जाति से आता हो उसे राजनीति में भी दो चीजें अवश्य चाहिए एक अवतार पूजने के लिए जो उसके मन मुताबिक बाते बस कह देता हो दूसरा जिससे नफरत की जा सके इतनी नफरत की पूज्य अवतार केवल और केवल दूसरे से नफरत की वजह से भी पूज्य रह जाए तो कोई दिक्कत नहीं। भारतीय राजनीति हमारी सामाजिक मानसिकता से बिलकुल अछूती नहीं रह सकती यदि कोई व्यक्ति अवतार-करण तोड़ने के लिए भी प्रयास कर रहा हो तो देर-सवेर हम उसे भी पूजने लग जायेंगे।
    अपने आप को मसीहा बना देने की राजनीति करने में मैं बसपा को दूसरे स्थान पर रखूँगा क्योंकि भाजपा सत्ता में हो न हो उसकी विचारधारा चाहे वह नफरत फैलानी वाली हो, लोगों को बांटने वाली हो, समाज में सामंती व्यवस्था स्थापित करने वाली हो उसकी पूरी टीम समाज में लगातार अपना काम करती रहती है, पार्टी सत्ता में हो न हो वह समाज में लगातार वह अपनी विचारधारा पोषित करती रहती है। जबकि बसपा दलित उत्थान को मुद्दा बना कर अस्तित्व में आयी थी लेकिन बहन जी से अलग इतने सालों बाद भी न तो दलितों की स्थिति में कोई सुधार दिखा न ही दलित नेतृत्व करता कोई क्षेत्रीय नेता। चुनावों से पहले दलित मुद्दे, अन्य समस्याएं कहाँ गायब रहते है ! यह सवाल उठते नहीं है उठते भी है तो जवाब नदारद ही रहते है। मेरा यह मानना है कि सत्ता अपने कामों को पूरा करने के लिए जरुरी हो सकती है लेकिन किसी नेतृत्व या विचार की मज़बूरी नही हो सकती । लेकिन अवतार वाद की राजनीति इतनी प्रबल हो चुकी है कि जिसे पूजते है वह शीर्ष पर बने रहना चाहिए भले ही खुद की स्थिति ज्यों की त्यों रहें। दलित नेतृत्व जो आना चाहिए था जो नेतृत्व सामाजिक आंदोलन रच सकता था , समाज की दिशा तय कर सकता था वह आया ही नहीं। लेकिन जो आया वह सत्ता का सुख पाने के लिए समझौते और सामंती मानसिकता को ही मजबूत करता चला गया।