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  • माओ त्से-तुंग वाले मसले पर एक और उठापटक-बेबाक-लेख – जो गंभीर हैं, लोकतांत्रिक दृष्टि रखते हैं, उनको लेख खराब न लगेगा

    सामाजिक यायावर

    भारत में कस्बाई व शहरी लोग अंग्रेजी भाषा को पहली कक्षा से पढ़ना शुरू कर देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में छठवीं कक्षा से अंग्रेजी शुरू होती थी। अब तो खैर हर गली नुक्कड़ में अंग्रेजी मीडियम व तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय स्कूल खुल गए हैं। पहली कक्षा से बारहवीं तक अंग्रेजी भाषा-विषय के रूप में साथ चिपकी रहती है। स्नातक में भी अंग्रेजी भाषा को सामान्य विषय की तरह उत्तीर्ण करना पड़ता है। इंजीनियरी जैसी प्रोफेशनल डिग्रियों की पढ़ाई तक में अंग्रेजी एक विषय की भांति चिपकी रहती है, वह भी तब जबकि डिग्री की पढ़ाई लिखाई तो अंग्रेजी में ही होती है।

    अंग्रेजी हमारी सामान्य बोलचाल की भाषा में भी समाहित है। गावों के निरक्षर लोग भी अपनी भाषा में बिना जानकारी के अंग्रेजी के कई शब्दों का प्रयोग करते हैं। कुल मिलाकर मतलब यह कि अंग्रेजी हमारे सामाजिक जीवन में रचीबसी हुई है। जो अंग्रेजी बोलता है उसको संभ्रांत व योग्य मान लिया जाता है। अंग्रेजी में संभ्रांतता, योग्यता, क्षमता व शक्ति निहित मानी जाती है।

    इतना सब होने व बचपन से पढ़ाई पूरी करने तक मतलब लगातार कम से कम लगभग 15 वर्षों तक अंग्रेजी पढ़ने बोलने व लिखने के बावजूद गंभीर अंग्रेजी को पढ़ने समझने बोलने व लिखने में अच्छे-अच्छे पुरोधा पानी मांगते हैं, जबकि अंग्रेजी बहुत समृद्ध व परिष्कृत भाषा नहीं है। जो अंग्रेजी से स्नातक, परास्नातक किए होते हैं उनकी भी हालत कमोवेश ऐसी ही होती है। अपवादों की बात अलग है, अपवाद नियम बनाते भी नहीं हैं।

    आप माओवाद, माओ, साम्यवाद पर बात कीजिए। JNU के लोग मक्खियों की तरह भिनभिनाते हुए आ जाएंगें। उनमें से बहुतेरे तो फूहड़ तरीके से धमकाएंगे कि JNU के हैं इसलिए चीन, माओ, माओवाद, साम्यवाद को समझते हैं। भिनभिनाते हुए आपके साथ सड़कछाप, सड़ियल, सतही, बेशर्म व बेहूदा व्यवहार करेंगे, शाब्दिक गुंडई करेंगे।

    JNU छोड़िए जो JNU की कैंटीन में जाकर चाय पी लेता है, जो उसकी चहारदीवारी को छू लेता है या कभी उसकी बाहरी दीवारों में सटकर पेशाब भी कर आता है वह भी अपने को विचारक, चिंतक, विद्वान व सामाजिक मसलों का विशेषज्ञ मान लेता है।

    इसलिए JNU या JNU के जैसे ठेकेदारों से मेरा फिलहाल इतना ही कहना है कि गंभीर बात कीजिए। JNU एक बौद्धिक सामंतवादी संस्थान है। कोशिश कीजिए कि JNU-वादी सामंती सोच से बाहर आकर आदमी की तरह बात कीजिए, तहजीब व तमीज से बात करने का प्रयास कीजिए।

    JNU भारत को लोकतंत्र, अभिव्यक्ति का स्वातंत्र्य, मानवाधिकार आदि मूल्य सिखाता है, भारत के लोगों को जीवन जीना JNU सिखाता है, इस प्रकार की नीचता पूर्ण अहंकार से बाहर आकर अपनी बात रखिए।

    आपके व्यवहार से ही JNU का स्तर साबित होता है। पिछले लगभग दो दशकों में, अपवाद प्रतिशत लोगों को छोड़कर JNU के लोगों से बातचीत व चर्चाओं के बाद ही मैं JNU को एक रद्दी यूनिवर्सिटी मानने के नतीजे पर पहुंचा हूँ।

    समय समय पर JNU के ऊपर कई लेख लिखता रहा हूं। आपके अनुसार आपको शोध करने व रिफरेंसेस खोजने की क्षमता योग्यता व धैर्य तो है ही, मेरे इन लेखों की लिंक खोज सकते हैं, सामान्य आदमी हूं लिंक्स बहुत सरलता से मिल जाएंगीं। फेसबुक के कारण ये लेख मैंने बस यूं ही प्रथम दृष्टया ही लिखे थे। चाहेंगे तो गहराई से लिख कर भी आइना दिखा सकने की क्षमता व योग्यता रखता हूं। लेकिन यह सब ऊर्जा बर्बादी है।

    मान लीजिए यदि आप JNU के भी हैं और यदि आपने JNU में चीनी भाषा पढ़ी है, माओ से संबंधित साहित्य भी पढ़ा है तब भी आप अपनी बात सहजता से ही रखिए। ऐसा क्यों कह रहा हूं, यह समझने के लिए आपको आगे की पूरी पोस्ट ध्यान से पढ़ना पड़ेगा।

    पहली बात तो यह है कि चीनी भाषा वर्तमान युग की भाषाओं की सबसे क्लिष्ट, समृद्ध व परिष्कृत भाषाओं में से है। वास्तव में यदि ध्यान से देखा जाए तो चीनी भाषा जैसी कोई भाषा है भी नहीं। चीन में कई भाषाएं हैं लेकिन चीनी भाषा जैसी कोई भाषा नहीं है।  फिर भी आपके JNU-सामंती-बौद्धिक अहंकार की तुष्टि के लिए मान लेते हैं कि चीन की भाषा एक ही है, उसका नाम चीनी-भाषा ही है और आपने JNU से स्नातक/परास्नातक में चीनी भाषा पढ़ी है। आपकी सहूलियत के लिए वह सब भी जो “नहीं है”, उसको “है” ऐसा मान भी लेते हैं तब भी …..

    जब बचपन से पहली कक्षा से हर साल प्रमुख विषय के रूप में अंग्रेजी पढ़ते हुए, स्नातक परास्नातक में, कम्पटीशन की तैयारी करते हुए, इंजीनियरी आदि जैसे कोर्सेस की किताबें अंग्रेजी में पढ़ते हुए, अंग्रेजी फिल्में देखते हुए, अंग्रेजी अखबारों को पढ़ते हुए, सड़क में चलते हुए अंग्रेजी के होर्डिंग्स को देखते हुए, अंग्रेजी जैसी भाषा को ठीक से समझ नहीं पाते तो चीनी भाषा जैसी क्लिष्ट, समृद्ध व परिमार्जित भाषा के विद्वान आप महज दो चार वर्षों में ककहरा टाइप सीखते हुए कैसे हो सकते हैं। फिर चीन में कई प्रमुख भाषाएं हैं जो एक दूसरे से भिन्न हैं।

    भाषा के संदर्भ में एक जरूरी बात और कहना चाहता हूं। जिस भाषा या जिन भाषाओं के संपर्क में बच्चा अपने पैदा होने के दिन से रहता है, वही भाषाएं जीवन भर उस बच्चे की मौलिक भाषाएं होती हैं, भाषाओं के नुक्ते समझ आते हैं, साहित्य समझ आता है।

    पहले हिंदी को ही ठीक से समझना सीख लीजिए, चीनी भाषा पर अपनी विद्वता व विशेषज्ञता की चर्चा फिर कभी कर लीजिएगा, अभी उचित अवसर नहीं है।

    अब JNU के माओ-भक्तों व गैर-JNU के माओ-भक्तों से जो यह मानते हैं कि उनने माओ के बारे में पढ़ा है उनके बारे में भी कुछ खरी-खरी दो टूक बात कर ली जाए। 

    ये लोग इस गलतफहमी में रहते हैं या अपनी कंडीशनिंग के कारण मूर्खता में विद्वता देखते हुए गलतफहमी प्लाँट करते रहते हैं कि दुनिया के लोकतांत्रिक देश (ये लोग इनको साम्राज्यवादी देश कहते हैं) माओ त्से-तुंग के विरोध में सूचनाएं प्लांट करते हैं।

    इन लोगों से मैं यही कहना चाहता हूं कि जनाब आपके भगवान माओ त्से-तुंग ने जैसा भी चीन बनाया है वह बहुत ही वीभत्स-कारपोरेट साम्राज्यवादी देश बनाया है। आपके माओ का चरित्र साम्राज्यवादी था, चीन देश को निहायत ही बर्बर चरित्र का कारपोरेट ही संचालित करता है। चीन का कारपोरेट साम्राज्यवादी देशों के कारपोरेट की तुलना में ज्यादे केंद्रित सत्ता रखता है।

    अपनी सोच, मानसिकता की कंडीशंडनिंग व एक्सपोजर के छोटे-छोटे कुंठित दड़बों से बाहर निकल कर दुनिया को उसकी मौलिकता के साथ बिना पूर्वाग्रहों व अनुमानों के देखने समझने का प्रयास कीजिए। चीन व माओ का यथार्थ समझ पाने की दृष्टि आनी शुरू हो जाएगी। लोकतंत्र बेहतर लगने लगेगा। लोकतंत्र को परिमार्जन की ओर ढाला जा सकता है, माओवाद को कतई नहीं। हिंसा व बर्बरता में परिमार्जन की कोई संभावना नहीं होती, हो ही नहीं सकती।

    जैसे भारत कागज में लोकतांत्रिक देश है लेकिन असल में लोकतांत्रिक देश नहीं है, भारत के लोग अभी लोकतांत्रिक मूल्यों का ककहरा भी नहीं समझते हैं। वैसे ही चीन कागज में साम्यवादी व्यवस्था के देश है लेकिन असल में वीभत्स व बर्बर कारपोरेट साम्राज्यवादी देश है। अब इस बात के लिए रिफरेंस मांगने की मूर्खता न कीजिएगा। क्योंकि यह समझने की बात है, महसूस करने की बात है, एक्सपोजर की बात है, दृष्टि की बात है।

    जो चीन सत्ता के लिए माओ के निर्देशन में अपने ही 7 करोड़ लोगों की हत्या कर सकता है। जो चीन 1989 में अपने ही छात्रों के शांतिप्रिय आंदोलन के खिलाफ कई लाख सैनिक उतार सकता है और चारों तरफ से घेर कर हजारों मासूम छात्रों की हत्याएं कर सकता है।

    वह चीन आपकी यूनिवर्सिटीज में साहित्य, दस्तावेजों व किताबें नहीं प्लांट नहीं करेगा। इसकी कल्पना भी कैसे कर सकते हैं आप। इसलिए प्लांटेड किताबों व दस्तावेजों के दम पर कूदिए मत। वास्तव में जानने समझने महसूस व दृष्टि विकसित कर पाने के विभिन्न स्तरों पर स्वाध्याय कीजिए, तभी कुछ गंभीर चर्चा कर पाने लायक दृष्टि रख पाएंगे।

    जरूरी नहीं कि सभी लंपट ही हों, सभी खोखले ही हों, सभी सतही ही हों। दुनिया में गंभीर लोग भी हैं, दृष्टिवान लोग भी हैं, ऐसे लोग भी हैं जो सामाजिक मसलों को गहराई से भेद कर देख व समझ लेने की क्षमता व दृष्टि विकसित कर लिए होते हैं।

    चीन व माओ के ऊपर चीन के ही गंभीर चिंतक लोगों ने चीन के ऐतिहासिक दस्तावेजों को पढ़ने समझने, चीन के समाज को नजदीक से जानने समझने के बाद निष्पक्ष भाव से अच्छी किताबें लिखी हैं। यदि आपकी पहुंच, हैसियत व औकात है, इन किताबों का इंतजाम कर पाने की तो इनको पढ़िए। कुछ नहीं तो कम से कम चीन के दूसरे चेहरे का अंदाजा होगा। चीन के लोगों की वैचारिक विभिन्नता के बारे में पता चलेगा।

    जो चीन शांति प्रदर्शन को रोकने के लिए लाखों सैनिक उतार देता हो, जो चीन भविष्य में आंदोलनों की संभावनाएं के भ्रूण को भी खतम करने के लिए अपने ही हजारों मासूम युवा छात्रों को चारों तरफ से घेरकर गोलियों से भून कर हत्याएं करता हो।

    वह चीन स्वतंत्र किताबें व दस्तावेज लिखने की इजाजत देता होगा, इस बचकानी कल्पना को सच मानने वालों के वैचारिक स्तर पर चर्चा करना भी ऊर्जा बर्बादी है। JNU, माओवादी समर्थक, माओ-भक्त व साम्यवाद-माओवाद को एक ही मानने वाले चीन की प्रायोजित व प्लांटेड किताबों, साहित्य व दस्तावेजों के मायाजाल व कंडीशनिंग में सच कितना व किस स्तर का जानते समझते होगें, इसका अंदाजा लगाना बिलकुल मुश्किल नहीं।

    चलते-चलते :

    जो माओ व माओवाद का समर्थक/भक्त है, वह ढोंग चाहे जैसा करे तर्क चाहे जो दे लेकिन अपने वास्तविक चरित्र में निहायत ही हिंसक, बर्बर, फरेबी, झूठा व रक्तपिपाशु है।

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  • JNU जैसे संस्थानों की विशिष्टता विशेष अनुदानों, अनुग्रहों व संसदीय कानूनों की शक्तियों की देन है न कि अर्जित की हुई

    IIM, Calicut

    IIM, Calicut

     

    JNU, New Delhi

    JNU, New Delhi

    जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की स्थापना करना अच्छा निर्णय था। तत्कालीन प्रधानमंत्री व भारत सरकार की दूरगामी सोच का परिणाम था। JNU की स्थापना करने की मंशा में कोई दुर्भाव नहीं था, वरन् भारत देश की बेहतरी निहित थी। JNU ने विशिष्टता अर्जित नहीं की है। JNU की स्थापना में JNU की स्थापना के क्षण से मिलने वाले विशेष अनुदानों व अनुग्रहों का बहुत बड़ा योगदान है। JNU की विशिष्टता सरकार से मिले इन्हीं विशिष्ट अनुदानों व अनुग्रहों के आधारभूत स्तंभों पर खड़ी है।

     

    JNU, New Delhi

    JNU, New Delhi

     

    • भारतीय संसद में JNU की स्थापना व विशिष्ट दर्जा देने के लिए कानून बना जो JNU को शक्ति देता है। JNU को संसदीय कानून का यह विशिष्ट स्तर स्थापना के समय से प्राप्त है। JNU ने यह स्तर अर्जित नहीं किया। सरकारी अनुग्रह था।
    • दिल्ली जैसी सघन जनसंख्या वाली राजधानी में एक यूनिवर्सिटी के लिए लगभग 1000 एकड़ जैसी बड़ी जमीन का अधिग्रहण किया गया।
    • छात्रों के रहने के लिए पर्याप्त से अधिक संख्या में सुविधा संपन्न छात्रावासों का निर्माण किया गया।
    • पढ़ाई, छात्रावास व भोजनालय की फीसें इतनी कम रखी गईं कि एक तरह से मुफ्त जैसा ही माना जा सकता है।
    • ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों के छात्रों के लिए प्रवेश परीक्षा में विशेष अंक देने का प्रावधान रखा गया ताकि गांवों के छात्र JNU में पहुंच सकें।
    • छात्रों का विकास हो, उनकी सोच दूरगामी हो, वे चिंतनशील बनें इसलिए समृद्ध व सुविधा संपन्न पुस्तकालयों व वाचनालयों की स्थापना की गई।
    • छात्रों की राजनैतिक चेतनशीलता का विकास हो इसलिए JNU के छात्रसंघ की स्थापना भी विशिष्ट रूप से की गई।
    • भारत में उपलब्ध योग्य लोगों का चयन शिक्षकों के रूप में किया गया।
    • शिक्षकों को बेहतर वेतन व सुविधाएं दी गईं।
    • आदि।

    भारत देश को JNU ने नहीं बनाया। भारत की आजादी में JNU का कोई योगदान नहीं। भारत के विकास में JNU का विशिष्ट योगदान नहीं। सामाजिक संसाधनों व संसदीय कानून रूपी विशिष्ट अनुग्रहों के आधारों पर JNU वजूद बना व खड़ा है। JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई नही है।

    फेसबुक में JNU के ऊपर लिखी गई मेरी पोस्टों पर JNU के लोगों की अधिकतर टिप्पणियां बेबुनियाद तर्कों पर रही हैं। JNU के शिक्षकों, छात्रों व भूतपूर्व छात्रों का यह कहना कि भारत में JNU सबसे अधिक लोकतांत्रिक है, पूरी तरह बेबुनियाद व फिजूल बात है।

    जब JNU ने अपनी विशिष्टता अर्जित ही नहीं की है तो JNU के लोगों के अंदर लोकतांत्रिक समझ विकसित होने की बात कैसे हो सकती है। JNU को स्थापित करने वाले लोगों की सोच व दूरदृष्टि लोकतांत्रिक थी, जिसके कारण JNU का ढांचा ऐसा बना कि यह लोकतांत्रिक संस्थान हो जाता है।

    बने हुए ढांचे में जीने का मतलब उस ढांचे की समझ होने की अनिवार्यता नहीं है। JNU के लोगों में यदि लोकतांत्रिक समझ होती तो JNU भारत में “सामाजिक समता” व “जाति-व्यवस्था के अंत” आदि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपना सक्रिय योगदान करता होता। JNU के लोगों में यदि लोकतांत्रिक समझ होती तो JNU भारत के गावों व किसानों के आर्थिक विकास की व्यवहारिक व धरातलीय योजनाएं बनाता होता। और भी बहुत करता होता।

    भारत में पिछले कुछ वर्षों से एक अजीब व बेहद घटिया फैशन चल गया है जो शायद भारत के मीडिया के कारण उत्पन्न हुआ है। भारत में कुकरमुत्तों की तरह टीवी चैनल्स बने हैं जिनका काम सिर्फ बरसाती मेढ़कों की तरह शोर मचाते हुए टर्राना है। इस मीडिया का अधिकतर अर्थात लगभग 98% हिस्सा भारत के मेट्रों शहरों तक ही सीमित है, इस 98% प्रतिशत में भी बहुत बड़ा हिस्सा राजधानियों तक ही सीमित है। नेशनल मीडिया का तो मतलब ही दिल्ली राजधानी है।

    इसी मूर्खता भरे फैशन के कारण ही JNU को भारत की सभी विश्वविद्यालयों का प्रतिनिधि मान लिया गया है। मानो JNU ही पूरे भारत का विश्वविद्यालय है। मानो JNU ही भारत की विचारशीलता, चिंतनशीलता, सामाजिक सोच, सामाजिक प्रतिबद्धता, सामाजिक कर्मठता व राजनैतिक परिवर्तनों का केंद्र है।

    जैसे दिल्ली भारत नहीं है, भारत जैसे बड़े देश का केवल एक शहर है। बिलकुल वैसे ही JNU का मतलब भारत के सारे विश्वविद्यालय नहीं है। JNU भारत के अनेकों विश्वविद्यालयों में से एक विश्वविद्यालय है। चूंकि JNU दिल्ली में है जहां सारा मीडिया है और JNU की स्थापना विशिष्ट सरकारी व संसदीय अनुदानों व अनुग्रहों के द्वारा हुई है, इसलिए JNU में छींक आने का भी हंगामा होता है। वास्तव में हमारे, हमारे तंत्र व मीडिया का यह चरित्र देश के अन्य विश्वविद्यालयों व उनके छात्रों को कुंठित करता है, उनकी योग्यता, कार्यक्षमता व प्रतिभा को खंडित करता है।

    भारत के किसी भी विश्वविद्यालय को उसकी स्थापना के पहले क्षण से ऐसी विशिष्ट संसदीय व सरकारी अनुग्रह व अनुकंपाएं मिल जाएं तो उसका स्तर JNU के स्तर से कतई कम नहीं होगा भले ही उसको किसी बीहड़ में स्थापित किया जाए। इसकी संभावनाएं भी बहुत हैं कि ऐसे विश्वविद्यालयों का स्तर JNU के स्तर से बेहतर ही हो।

    JNU के लोगों को यह मूल्यांकन करना चाहिए कि जितना उनको भारत ने दिया है उसके एवज में वे भारत को क्या दे रहे हैं। यदि इसका मूल्यांकन हो तो यदि JNU के लोग ईमानदार होगें तो उनको शर्म आएगी। बिना अर्जित की हुई विशिष्टता पर अहंकार करना, दूसरों को अपने से हीन समझने की मानसिकता आदि JNU कितना लोकतांत्रिक है, कितना सामाजिक सोच का है, कितना स्वतंत्र चिंतक है, खुद ब खुद प्रमाणित कर देते हैं। धिक्कार पैदा होती है JNU के शिक्षकों व छात्रों के अहंकार व बड़बोलेपन को देखकर। भारत के लोगों ने JNU बनाया है, इसलिए भारत के लोग JNU से अधिक लोकतांत्रिक, सामाजिक व स्वतंत्र चिंतन के हुए। यदि JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई होती तब यह माना जा सकता था कि JNU को संस्थान के रूप में लोकतांत्रिक समझ है।

    देश में देश को बनाने व दिशा देने के लिए JNU से बड़े व गंभीर मुद्दे हैं। लेकिन चूंकि मीडिया कभी उन पर ध्यान नहीं देता। लोगों के वेस्टेड इंटरेस्ट व महात्वाकांक्षाओं के लिए उनकी कोई वैल्यू नहीं होती इसलिए वे मुद्दे हमेशा किनारे ही पडे रहते हैं। इसके बावजूद यह दावा किया जाता है कि देश के लिए सोचा व किया जाता है।

    देश के बहुत लोगों की दृष्टि में JNU पूरा भारत होगा, लेकिन मेरी दृष्टि में JNU सिर्फ और सिर्फ एक यूनिवर्सिटी है जिसकी स्थापना देश के विचारशील व दूरदृष्टिवान लोगों ने इस विश्वास से की थी कि इसके लोग सामाजिक विकास के लिए चिंतन करेंगें, निर्माण करेंगें, सामाजिक चेतनशीलता पैदा करेंगें न कि केवल नौकरी, पैसा, ग्लैमर, अय्याशी व कैरियर के पीछे ही भागेंगें। यदि JNU का उद्देश्य यही सब होना था तो संसद में JNU के लिए अलग से कानून बनाकर विशिष्टता देने की जरूरत ही क्या थी।

    भारत में सैकड़ों यूनिवर्सिटीज हैं जहां के छात्र अपना हर दिन दर्द में गुजारते हैं। मैं अपने जीवन में कई ऐसे छात्र नेताओं से मिला हूं जिनको पुलिस की पिटाई ने जीवन भर के लिए अपंग कर दिया और ये छात्र नेता JNU के छात्रसंघ अध्यक्ष की तुलना में बहुत ही बेहतर व दर्दीला भाषण देने की क्षमता व योग्यता रखते थे। भारत की इन सैकड़ों अनजानी यूनिवर्सिटीज के सैकड़ों हजारों छात्र नेता अपने जीवन में ढेरों फर्जी मुकदमें झेलते हैं।

    इन छात्रनेताओं व छात्रों का क्या? लेकिन कभी कहीं से कोई आवाज नहीं उठती इन छात्र नेताओं के लिए। क्यों नहीं उठी। केवल इसलिए नहीं उठी क्योंकि वे ऐसे विश्वविद्यालयों से नहीं थे जिनको हर वर्ष अरबों रुपए की सरकारी अनुदान मिलता हो और जिनको संसद में विशेष कानून द्वारा संरक्षण व विशिष्टता प्राप्त हो। क्या दोष है इन विश्वविद्यालयों का और इनमें पढ़ने वाले छात्रों का?

    हमारी संवेदनशीलता, जागरूकता इन विश्वविद्यालयों के छात्रों के साथ क्यों नहीं जुड़ती है? क्या ये लोग भारत देश के नहीं है? क्या ये विश्वविद्यालय भारत देश के अंदर नहीं है। यदि JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई होती तो बात समझ आ सकती थी कि JNU ने विशिष्टता अर्जित की है।

     

    IIM, Kozhikode

    IIM, Kozhikode

    जैसे JNU की विशिष्टता प्रायोजित है, अनुदान, अनुकंपा व अनुग्रहों के स्तंभों पर स्थापित है। तो ऐसा भारत के हर विश्वविद्यालय के साथ क्यों नहीं? एक ही देश के अंदर इतना भेदभाव क्यों? buy provigil south africa yanginstitute.com modafinil kup online इसीलिए मैं चाहता हूं कि या तो भारत के हर जिले में कम से कम एक JNU, IIT, IIMAIIMS आदि हो जिनको वैसी ही विशिष्ट अनुदान, अनुग्रह व संसदीय कानून की शक्ति आदि मिले जो JNU, IIT, IIM व AIIMS जैसे संस्थानों को इनकी स्थापना के क्षण से प्राप्त है। 

    JNU ने विशिष्टता अर्जित नहीं किया है, विशिष्टता प्रायोजित है, मिथक है। इसलिए देश के हर जिले में JNU(s) की स्थापना किया जाना कोई बड़ी बात नहीं। देश के लाखों करोड़ों युवाओं को हक है JNU जैसी विशिष्टता को भोगने का, उनको भी हक है खुद को लोकतांत्रिक, सामाजिक व स्वतंत्र चिंतक मानने व कहलवाने का।

     

    देश का लाखों करोड़ों युवा पैदा होते ही केवल नौकरी पैसा व ग्लैमर पाने के लिए अंतहीन चूहादौड़ में झोंक दिए जाते हैं। कोचिंग सेंटर्स लूटते हैं, बच्चे आत्महत्याएं करते हैं, कुंठित होते हैं, हीन भावना से ग्रस्त होते हैं। प्रतिक्रिया वादी बनते हैं। इन्हीं प्रायोजित विशिष्टता वाले संस्थानों में पहुंचना ही बचपन से अपना मकसद चुन लेते हैं। कितना ओछा व छोटा मकसद होता है जीवन का। जो पहुंच गए वे आजीवन स्वयं को दूसरों की तुलना में विशिष्ट मानने के अहंकार में जीते हैं। जबकि यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो इन संस्थानों में प्रवेश पाने में रटने की योग्यता के अतिरिक्त कौन सी वास्तविक योग्यता होती है। किंतु चूंकि ऐसे संस्थानों की संख्या भारत की जनसंख्या के अनुपात में नगण्य है तथा अन्य संस्थानों को सरकारी विशिष्ट अनुग्रह मिलते नहीं हैं इसलिए एक मिथक स्थापित हो गया है कि जो भी इन संस्थानों में प्रवेश पाता है वह बहुत योग्य है, विशिष्ट है। 

     

    भारत के सुनहरे भविष्य के लिए शैक्षणिक संस्थानों की प्रायोजित विशिष्टता की स्थापना करने की प्रवृत्ति अब खतम कर देना चाहिए। भारत की संसद से हर उस कानून को खतम कर देना चाहिए जो किसी शैक्षणिक संस्थान को देश के अन्य संस्थानों की तुलना में विशिष्टता देता हो। क्योंकि भारत के किसी संस्थान ने विशिष्टता अर्जित नहीं की है। भारत की संसद ने ऐसे संस्थानों की स्थापना के पहले क्षण से ही उनको संवैधानिक रूप से विशिष्ट संस्थान होने की शक्ति दी है। 

     

    शैक्षणिक संस्थानों की विशिष्टता अर्जित की हुई होनी चाहिए न कि किसी राजकीय व संवैधानिक शक्ति व अनुग्रह के प्रायोजन से प्राप्त हुई होनी चाहिए। शैक्षणिक संस्थानों की प्रायोजित विशिष्टता देश व समाज के लिए दूरगामी रूप से बहुत ही अधिक हानिकारिक होती है और वास्तविक प्रतिभाओं को कुंठित करती है, प्रतिक्रियावादी बनाती है, असंवेदनशील बनाती है, हीन भावना से ग्रस्त करती है।

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    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org)
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)