Tag: Indian-Social-Activism

  • सामाजिक परिवर्तन व नेतृत्व के मुद्दे पर शार्टकट हमेशा ही नुकसान दायी होता है जो हम प्रायोजित कर चुके होते हैं उससे लौटना या उसको लौटाना संभव नहीं होता —— भारत को किसी भी परिस्थिति में आदिवासी/दलित/शूद्र नेतृत्व व दिशा की जरूरत है

    हमें विभिन्न आर्थिक, राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा प्रायोजित नेतृत्वों को परिवर्तनकारी नेतृत्व के रूप में स्वीकारने की आत्मश्लाघा व प्रवंचना से बाहर आने की जरूरत है भले ही प्रायोजित नेतृत्व तात्कालिक तौर पर यह कितना भी अधिक लाभप्रद व परिवर्तनकारी दिख रहा हो।

    मूल बात कहने के पहले एक सच्चा घटनाक्रम सुनाना चाहता हूं। तब फेसबुक जैसी सोशल साइटें जीवन का अभिन्न अंग नहीं हुआ करतीं थीं। ईमानदारी की चोचलेबाजी या विकास के मसीहागिरी की चोचलेबाजी या लच्छेदार स्वादिष्ट भाषणों या कुछ समय की न्यायिक हिरासतें या पुलिस की दो चार लाठियाँ आदि किस्म की आम आदमी द्वारा झेली जाने वाली सामान्य व रोजमर्रा वाली घटनाएं रातोंरात राष्ट्रीय नेता व देश के परिवर्तन का कर्णधार नहीं बनाया करतीं थीं। उसी समय की बात है।

    भारत देश में एक राज्य है उसका नाम है केरल। उसी केरल राज्य की एक गांव की ग्राम सभा ने दुनिया में पेयपदार्थों की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक की नाक में नकेल कसने व अपने गांव का भूलज व कृषि अर्थव्यवस्था बचाने के लिए उस कंपनी द्वारा उस गांव में स्थापित व संचालित बाटलिंग प्लांट बंद कराने का प्रस्ताव पारित किया।

    उस कंपनी ने ग्राम सभा के इस प्रस्ताव को केरल राज्य के हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की एक बेंच ने अपने बयान में कहा कि ग्रामसभा को ऐसे प्रस्ताव पारित करने का अधिकार है, पानी सामाजिक संपत्ति है।

    फिर क्या था, भारत में आंदोलनों के लिए बने विभिन्न संगठनों के राष्ट्रीय स्तर के लोग, मैगसेसे पुरस्कृत कुछ लोग, फंडेड NGO वाले लोग आदि ने हाईकोर्ट की बेंच की उस बयान की कापियां निकलवाईं, उनके दस्तावेज बनाए, बुकलेट बनवाईं और देश भर में घूम घूम कर खूब बांटा। खूब प्रेस कांफ्रेस कीं। लग रहा था जैसे कि भारत में अब सामाजिक स्वामित्व सुदृढ़ हो जाएगा।

    इन लोगों ने हजारों प्रेस कांफ्रेस की होगीं, जहां जाते वहीं प्रेस कांफ्रेस करते और हाईकोर्ट की भूजल पर सामाजिक स्वामित्व की बात करते, चिल्ला चिल्ला कर हाईकोर्ट के शान में कसीदे पढ़ते।

    इन सभी क्रियाकलापों से एक घटना हुई कि लोगों के दिलोदिमाग में बैठ गया कि कोर्ट हमेशा सही व समाज के लिए कल्याणकारी निर्णय देता है। कोर्ट पानी को सामाजिक संपत्ति मानता है। कोर्ट ग्रामसभा व ग्रामीण लोगों के प्रस्तावों का आदर देता है, महत्व देता है। दिलोदिमाग में यह सब बैठाया सामाजिक आंदोलनों के विभिन्न संगठनों के लोगों ने, मैगसेसे पुरस्कार पाने वालों आदि ने वह भी जागरूकता व चेतनशीलता आदि के नाम पर।

    अब देखते हैं आगे की घटना-

    लगभग एक या दो साल या कम ज्यादा समय के बाद केरल की उसी हाईकोर्ट ने अपनी बात पलट दिया।

    सामाजिक आंदोलनों के संगठनों के लोग, NGO  वाले लोग, मैगसेसे पुरस्कृत लोग आदि तो देश भर में यह बता चुके थे कि पानी सामाजिक संपत्ति है और ऐसा हाईकोर्ट कहता है। देश भर में घूम घूम कर लाखों करोड़ों लोगों के दिलोदिमाग में बहुत कुछ बैठा चुके थे। उसी कोर्ट ने अपनी बात बिलकुल पलट दिया।

    अब ये लोग जो लोगों के सामने ढेरों बातें दावे से ठोंकते हुए कर चुके थे। फिर से कैसे जाते उतने व उन्हीं लोगों के बीच यह कहने कि कोर्ट का निर्णय उचित नहीं, समाज के लिए कल्याणकारी नहीं। मान लीजिए यदि उन्हीं व उतने ही लोगों के पास किसी तरह जाना संभव भी होता तो भी लोग इनकी विरोधाभासी बातों पर विश्वास क्यों करते?

    केरल के गांव की घटना जो भारत में भूजल के सामाजिक स्वामित्व के मसले पर बहुत बड़ा परिवर्तनकारी आंदोलन का आधार बन सकती थो। उसकी बिना सोचे बिचारे तात्कालिक लाभ के लिए की जाने वाले क्रियाकलापों के कारण भ्रूण हत्या हो गई।

    लोगों के NGO को मिलने वाली ग्राँटों की राशि बढ़ गई, लोगों के नाम व पहचान बढ़ गई, लोग देश विदेश घूम लिए, लोगों सेलिब्रिटी बन गए, बहुत सारे पुरस्कारों का आदान प्रदान हो गया, लोगों को क्रांतिकारी होने का तमगा मिल गया।

    लेकिन आम समाज वहीं का वहीं रहा या यूं कहें कि भूजल पर सामाजिक स्वामित्व वाला मसला पीछे चला गया। अब कोई न तो केरल के गांव की बात करता है न ही भूजल पर सामाजिक स्वामित्व की बात होती है।

    भारत में फेसबुक जैसी साइटों के आने से एक बात हुई है कि हम रातोंरात किसी को भी छुटपुट, टटपुंजिया, तात्कालिक व प्रायोजित घटनाओं के कारण सामाजिक बदलाव व परिवर्तन का मसीहा मान लेते हैं। सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन का नेतृत्व मान कर अपना समर्पण दे देते हैं, हममें से बहुत लोग अंध भक्त भी बन जाते हैं जो कुछ भी सुनने समझने तक को तैयार नहीं होते।

    पता नहीं क्यों हम किसी तात्कालिक व अस्थाई लाभ के लिए परिवर्तनकारी नेतृत्वों के प्रायोजन में जुट पड़ते हैं, स्वयं को अंध समर्पित भी कर देते हैं। फिर कहते हैं कि दगा हो गया, समझ नहीं पाए।

    दरअसल सामाजिक प्रतिबद्धता व जीवन मूल्यों को लेकर जितने सतही व खोखले हम होते हैं। हमारी कल्पना का परिवर्तन भी उतना ही सतही व खोखला होता है। यही कारण होता है कि हम सतही व खोखले आधारों पर परिवर्तन के लिए प्रायोजित नेतृत्वों के लिए अपने आपको समर्पित कर देते हैं।

    जिनको हम प्रायोजित करते हैं उनकी तो मौज हो जाती है, लेकिन हम व हमारा देश वहीं का वहीं खड़ा रहता है या पीछे चला जाता है। यह बिलकुल वैसे ही है जैसे जब चिड़ियाँ खेत चुग जाती हैं तब हम चिल्लाते हैं कि खेत नहीं बचा पाए। लेकिन हम फिर वही गलती करते हैं, नई चिड़ियों पर विश्वास करते हैं, जो हमारे खेत फिर से चुगती हैं। हम फिर से ठगा महसूस करते हैं। कसमें खाते हैं मूर्ख न बनने की। लेकिन फिर हम नए प्रयोजनों में फंस कर नए बहाने व तर्कों को गढ़ने लगते हैं और फिर से ठगे जाते हैं। 

    भारत में पिछले कुछ वर्षों में मीडिया व सोशल साइट्स के द्वारा बहुत ही कम समय में कई परिवर्तनकारी नेतृत्वों को विभिन्न घटनाओं को आधार बना कर तेज गति से प्रायोजित किया गया है। उनको बिना सवाल सत्ताएं भी सौपी गईं लेकिन उनका वास्तविक चरित्र क्या रहा यह बाद में मालूम पड़ा और लोगों ने ठगा महसूस किया।

    कितनी बार हम मूर्ख बनेंगे कब तक ऐसा करते रहेंगे। हमें शार्ट कट बंद करने होगें। हमें बिना खुद को बदले हुए परिवर्तन देखने की लिप्सा से ऊपर उठना होगा।

    पहले हमको समझदार बनना होगा, प्रवंचना कभी भी अपने लिए समझदार नेतृत्व की खोज या निर्माण नहीं कर सकती। बेईमानी कभी भी अपने लिए ईमानदार नेतृत्व की खोज या निर्माण नहीं कर सकती।

    सामाजिक परिवर्तन व नेतृत्व के मुद्दे पर शार्टकट हमेशा ही नुकसान दायी होता है जो हम प्रायोजित कर चुके होते हैं उससे लौटना या उसको लौटाना संभव नहीं होता।

    हमें ठोस होने की जरूरत है और हमें परिवर्तन के लिए दीर्घकालिक रास्तों को चुनने की जरूरत है। वास्तविक सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन कभी भी शार्टकट व टटपुंजिए तौर तरीकों से संभव नहीं।

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    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org)
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)
  • JNU जैसे संस्थानों की विशिष्टता विशेष अनुदानों, अनुग्रहों व संसदीय कानूनों की शक्तियों की देन है न कि अर्जित की हुई

    IIM, Calicut

    IIM, Calicut

     

    JNU, New Delhi

    JNU, New Delhi

    जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की स्थापना करना अच्छा निर्णय था। तत्कालीन प्रधानमंत्री व भारत सरकार की दूरगामी सोच का परिणाम था। JNU की स्थापना करने की मंशा में कोई दुर्भाव नहीं था, वरन् भारत देश की बेहतरी निहित थी। JNU ने विशिष्टता अर्जित नहीं की है। JNU की स्थापना में JNU की स्थापना के क्षण से मिलने वाले विशेष अनुदानों व अनुग्रहों का बहुत बड़ा योगदान है। JNU की विशिष्टता सरकार से मिले इन्हीं विशिष्ट अनुदानों व अनुग्रहों के आधारभूत स्तंभों पर खड़ी है।

     

    JNU, New Delhi

    JNU, New Delhi

     

    • भारतीय संसद में JNU की स्थापना व विशिष्ट दर्जा देने के लिए कानून बना जो JNU को शक्ति देता है। JNU को संसदीय कानून का यह विशिष्ट स्तर स्थापना के समय से प्राप्त है। JNU ने यह स्तर अर्जित नहीं किया। सरकारी अनुग्रह था।
    • दिल्ली जैसी सघन जनसंख्या वाली राजधानी में एक यूनिवर्सिटी के लिए लगभग 1000 एकड़ जैसी बड़ी जमीन का अधिग्रहण किया गया।
    • छात्रों के रहने के लिए पर्याप्त से अधिक संख्या में सुविधा संपन्न छात्रावासों का निर्माण किया गया।
    • पढ़ाई, छात्रावास व भोजनालय की फीसें इतनी कम रखी गईं कि एक तरह से मुफ्त जैसा ही माना जा सकता है।
    • ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों के छात्रों के लिए प्रवेश परीक्षा में विशेष अंक देने का प्रावधान रखा गया ताकि गांवों के छात्र JNU में पहुंच सकें।
    • छात्रों का विकास हो, उनकी सोच दूरगामी हो, वे चिंतनशील बनें इसलिए समृद्ध व सुविधा संपन्न पुस्तकालयों व वाचनालयों की स्थापना की गई।
    • छात्रों की राजनैतिक चेतनशीलता का विकास हो इसलिए JNU के छात्रसंघ की स्थापना भी विशिष्ट रूप से की गई।
    • भारत में उपलब्ध योग्य लोगों का चयन शिक्षकों के रूप में किया गया।
    • शिक्षकों को बेहतर वेतन व सुविधाएं दी गईं।
    • आदि।

    भारत देश को JNU ने नहीं बनाया। भारत की आजादी में JNU का कोई योगदान नहीं। भारत के विकास में JNU का विशिष्ट योगदान नहीं। सामाजिक संसाधनों व संसदीय कानून रूपी विशिष्ट अनुग्रहों के आधारों पर JNU वजूद बना व खड़ा है। JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई नही है।

    फेसबुक में JNU के ऊपर लिखी गई मेरी पोस्टों पर JNU के लोगों की अधिकतर टिप्पणियां बेबुनियाद तर्कों पर रही हैं। JNU के शिक्षकों, छात्रों व भूतपूर्व छात्रों का यह कहना कि भारत में JNU सबसे अधिक लोकतांत्रिक है, पूरी तरह बेबुनियाद व फिजूल बात है।

    जब JNU ने अपनी विशिष्टता अर्जित ही नहीं की है तो JNU के लोगों के अंदर लोकतांत्रिक समझ विकसित होने की बात कैसे हो सकती है। JNU को स्थापित करने वाले लोगों की सोच व दूरदृष्टि लोकतांत्रिक थी, जिसके कारण JNU का ढांचा ऐसा बना कि यह लोकतांत्रिक संस्थान हो जाता है।

    बने हुए ढांचे में जीने का मतलब उस ढांचे की समझ होने की अनिवार्यता नहीं है। JNU के लोगों में यदि लोकतांत्रिक समझ होती तो JNU भारत में “सामाजिक समता” व “जाति-व्यवस्था के अंत” आदि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपना सक्रिय योगदान करता होता। JNU के लोगों में यदि लोकतांत्रिक समझ होती तो JNU भारत के गावों व किसानों के आर्थिक विकास की व्यवहारिक व धरातलीय योजनाएं बनाता होता। और भी बहुत करता होता।

    भारत में पिछले कुछ वर्षों से एक अजीब व बेहद घटिया फैशन चल गया है जो शायद भारत के मीडिया के कारण उत्पन्न हुआ है। भारत में कुकरमुत्तों की तरह टीवी चैनल्स बने हैं जिनका काम सिर्फ बरसाती मेढ़कों की तरह शोर मचाते हुए टर्राना है। इस मीडिया का अधिकतर अर्थात लगभग 98% हिस्सा भारत के मेट्रों शहरों तक ही सीमित है, इस 98% प्रतिशत में भी बहुत बड़ा हिस्सा राजधानियों तक ही सीमित है। नेशनल मीडिया का तो मतलब ही दिल्ली राजधानी है।

    इसी मूर्खता भरे फैशन के कारण ही JNU को भारत की सभी विश्वविद्यालयों का प्रतिनिधि मान लिया गया है। मानो JNU ही पूरे भारत का विश्वविद्यालय है। मानो JNU ही भारत की विचारशीलता, चिंतनशीलता, सामाजिक सोच, सामाजिक प्रतिबद्धता, सामाजिक कर्मठता व राजनैतिक परिवर्तनों का केंद्र है।

    जैसे दिल्ली भारत नहीं है, भारत जैसे बड़े देश का केवल एक शहर है। बिलकुल वैसे ही JNU का मतलब भारत के सारे विश्वविद्यालय नहीं है। JNU भारत के अनेकों विश्वविद्यालयों में से एक विश्वविद्यालय है। चूंकि JNU दिल्ली में है जहां सारा मीडिया है और JNU की स्थापना विशिष्ट सरकारी व संसदीय अनुदानों व अनुग्रहों के द्वारा हुई है, इसलिए JNU में छींक आने का भी हंगामा होता है। वास्तव में हमारे, हमारे तंत्र व मीडिया का यह चरित्र देश के अन्य विश्वविद्यालयों व उनके छात्रों को कुंठित करता है, उनकी योग्यता, कार्यक्षमता व प्रतिभा को खंडित करता है।

    भारत के किसी भी विश्वविद्यालय को उसकी स्थापना के पहले क्षण से ऐसी विशिष्ट संसदीय व सरकारी अनुग्रह व अनुकंपाएं मिल जाएं तो उसका स्तर JNU के स्तर से कतई कम नहीं होगा भले ही उसको किसी बीहड़ में स्थापित किया जाए। इसकी संभावनाएं भी बहुत हैं कि ऐसे विश्वविद्यालयों का स्तर JNU के स्तर से बेहतर ही हो।

    JNU के लोगों को यह मूल्यांकन करना चाहिए कि जितना उनको भारत ने दिया है उसके एवज में वे भारत को क्या दे रहे हैं। यदि इसका मूल्यांकन हो तो यदि JNU के लोग ईमानदार होगें तो उनको शर्म आएगी। बिना अर्जित की हुई विशिष्टता पर अहंकार करना, दूसरों को अपने से हीन समझने की मानसिकता आदि JNU कितना लोकतांत्रिक है, कितना सामाजिक सोच का है, कितना स्वतंत्र चिंतक है, खुद ब खुद प्रमाणित कर देते हैं। धिक्कार पैदा होती है JNU के शिक्षकों व छात्रों के अहंकार व बड़बोलेपन को देखकर। भारत के लोगों ने JNU बनाया है, इसलिए भारत के लोग JNU से अधिक लोकतांत्रिक, सामाजिक व स्वतंत्र चिंतन के हुए। यदि JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई होती तब यह माना जा सकता था कि JNU को संस्थान के रूप में लोकतांत्रिक समझ है।

    देश में देश को बनाने व दिशा देने के लिए JNU से बड़े व गंभीर मुद्दे हैं। लेकिन चूंकि मीडिया कभी उन पर ध्यान नहीं देता। लोगों के वेस्टेड इंटरेस्ट व महात्वाकांक्षाओं के लिए उनकी कोई वैल्यू नहीं होती इसलिए वे मुद्दे हमेशा किनारे ही पडे रहते हैं। इसके बावजूद यह दावा किया जाता है कि देश के लिए सोचा व किया जाता है।

    देश के बहुत लोगों की दृष्टि में JNU पूरा भारत होगा, लेकिन मेरी दृष्टि में JNU सिर्फ और सिर्फ एक यूनिवर्सिटी है जिसकी स्थापना देश के विचारशील व दूरदृष्टिवान लोगों ने इस विश्वास से की थी कि इसके लोग सामाजिक विकास के लिए चिंतन करेंगें, निर्माण करेंगें, सामाजिक चेतनशीलता पैदा करेंगें न कि केवल नौकरी, पैसा, ग्लैमर, अय्याशी व कैरियर के पीछे ही भागेंगें। यदि JNU का उद्देश्य यही सब होना था तो संसद में JNU के लिए अलग से कानून बनाकर विशिष्टता देने की जरूरत ही क्या थी।

    भारत में सैकड़ों यूनिवर्सिटीज हैं जहां के छात्र अपना हर दिन दर्द में गुजारते हैं। मैं अपने जीवन में कई ऐसे छात्र नेताओं से मिला हूं जिनको पुलिस की पिटाई ने जीवन भर के लिए अपंग कर दिया और ये छात्र नेता JNU के छात्रसंघ अध्यक्ष की तुलना में बहुत ही बेहतर व दर्दीला भाषण देने की क्षमता व योग्यता रखते थे। भारत की इन सैकड़ों अनजानी यूनिवर्सिटीज के सैकड़ों हजारों छात्र नेता अपने जीवन में ढेरों फर्जी मुकदमें झेलते हैं।

    इन छात्रनेताओं व छात्रों का क्या? लेकिन कभी कहीं से कोई आवाज नहीं उठती इन छात्र नेताओं के लिए। क्यों नहीं उठी। केवल इसलिए नहीं उठी क्योंकि वे ऐसे विश्वविद्यालयों से नहीं थे जिनको हर वर्ष अरबों रुपए की सरकारी अनुदान मिलता हो और जिनको संसद में विशेष कानून द्वारा संरक्षण व विशिष्टता प्राप्त हो। क्या दोष है इन विश्वविद्यालयों का और इनमें पढ़ने वाले छात्रों का?

    हमारी संवेदनशीलता, जागरूकता इन विश्वविद्यालयों के छात्रों के साथ क्यों नहीं जुड़ती है? क्या ये लोग भारत देश के नहीं है? क्या ये विश्वविद्यालय भारत देश के अंदर नहीं है। यदि JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई होती तो बात समझ आ सकती थी कि JNU ने विशिष्टता अर्जित की है।

     

    IIM, Kozhikode

    IIM, Kozhikode

    जैसे JNU की विशिष्टता प्रायोजित है, अनुदान, अनुकंपा व अनुग्रहों के स्तंभों पर स्थापित है। तो ऐसा भारत के हर विश्वविद्यालय के साथ क्यों नहीं? एक ही देश के अंदर इतना भेदभाव क्यों? buy provigil south africa yanginstitute.com modafinil kup online इसीलिए मैं चाहता हूं कि या तो भारत के हर जिले में कम से कम एक JNU, IIT, IIMAIIMS आदि हो जिनको वैसी ही विशिष्ट अनुदान, अनुग्रह व संसदीय कानून की शक्ति आदि मिले जो JNU, IIT, IIM व AIIMS जैसे संस्थानों को इनकी स्थापना के क्षण से प्राप्त है। 

    JNU ने विशिष्टता अर्जित नहीं किया है, विशिष्टता प्रायोजित है, मिथक है। इसलिए देश के हर जिले में JNU(s) की स्थापना किया जाना कोई बड़ी बात नहीं। देश के लाखों करोड़ों युवाओं को हक है JNU जैसी विशिष्टता को भोगने का, उनको भी हक है खुद को लोकतांत्रिक, सामाजिक व स्वतंत्र चिंतक मानने व कहलवाने का।

     

    देश का लाखों करोड़ों युवा पैदा होते ही केवल नौकरी पैसा व ग्लैमर पाने के लिए अंतहीन चूहादौड़ में झोंक दिए जाते हैं। कोचिंग सेंटर्स लूटते हैं, बच्चे आत्महत्याएं करते हैं, कुंठित होते हैं, हीन भावना से ग्रस्त होते हैं। प्रतिक्रिया वादी बनते हैं। इन्हीं प्रायोजित विशिष्टता वाले संस्थानों में पहुंचना ही बचपन से अपना मकसद चुन लेते हैं। कितना ओछा व छोटा मकसद होता है जीवन का। जो पहुंच गए वे आजीवन स्वयं को दूसरों की तुलना में विशिष्ट मानने के अहंकार में जीते हैं। जबकि यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो इन संस्थानों में प्रवेश पाने में रटने की योग्यता के अतिरिक्त कौन सी वास्तविक योग्यता होती है। किंतु चूंकि ऐसे संस्थानों की संख्या भारत की जनसंख्या के अनुपात में नगण्य है तथा अन्य संस्थानों को सरकारी विशिष्ट अनुग्रह मिलते नहीं हैं इसलिए एक मिथक स्थापित हो गया है कि जो भी इन संस्थानों में प्रवेश पाता है वह बहुत योग्य है, विशिष्ट है। 

     

    भारत के सुनहरे भविष्य के लिए शैक्षणिक संस्थानों की प्रायोजित विशिष्टता की स्थापना करने की प्रवृत्ति अब खतम कर देना चाहिए। भारत की संसद से हर उस कानून को खतम कर देना चाहिए जो किसी शैक्षणिक संस्थान को देश के अन्य संस्थानों की तुलना में विशिष्टता देता हो। क्योंकि भारत के किसी संस्थान ने विशिष्टता अर्जित नहीं की है। भारत की संसद ने ऐसे संस्थानों की स्थापना के पहले क्षण से ही उनको संवैधानिक रूप से विशिष्ट संस्थान होने की शक्ति दी है। 

     

    शैक्षणिक संस्थानों की विशिष्टता अर्जित की हुई होनी चाहिए न कि किसी राजकीय व संवैधानिक शक्ति व अनुग्रह के प्रायोजन से प्राप्त हुई होनी चाहिए। शैक्षणिक संस्थानों की प्रायोजित विशिष्टता देश व समाज के लिए दूरगामी रूप से बहुत ही अधिक हानिकारिक होती है और वास्तविक प्रतिभाओं को कुंठित करती है, प्रतिक्रियावादी बनाती है, असंवेदनशील बनाती है, हीन भावना से ग्रस्त करती है।

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    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org)
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

  • क्या मैं अंदर आ सकती हूं, भगवन् :: आराधनास्थलों में प्रवेश के लिए महिलाओं का संघर्ष

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    शनि मंदिर शिंगणापुर, महाराष्ट्र
    शनि मंदिर
    शिंगणापुर, महाराष्ट्र

    यह अजीब संयोग है कि इन दिनों मुसलमान और हिन्दू समुदायों की महिलाओं को एक ही मुद्दे पर संघर्ष करना पड़ रहा है- आराधनास्थलों में प्रवेश के मुद्दे पर। जहां ‘भूमाता बिग्रेड‘ की महिलाएं, शनि शिगनापुर (अहमदनगर, महाराष्ट्र) मंदिर में प्रवेश का अधिकार पाने के लिए संर्घषरत हैं वहीं मुंबई में हाजी अली की दरगाह तक फिर से पहुंच पाने के लिए महिलाएं कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मसला तो गरमाया हुआ है ही। अनुकरणनीय साहस प्रदर्शित करते हुए हाल में बड़ी संख्या में महिलाएं कई बसों में शनि शिगनापुर मंदिर पहुंची परंतु उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बल प्रयोग किया।

    Haji Ali Dargah Mumbai, Maharashtra
    Haji Ali Dargah
    Mumbai, Maharashtra

    शनि शिगनापुर में पुरूषों को तो चबूतरे पर चढ़ने का अधिकार है परंतु महिलाओं के लिए इसकी मनाही है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि चबूतरे पर चढ़ने वाली महिलाओं को शनि महाराज की बुरी नजर लग जाएगी। इस तरह यह दावा किया जाता है कि महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के पीछे आध्यात्मिक कारण हैं। दक्षिणपंथी दैनिक ‘सनातन प्रभात‘ ने लिखा कि हिन्दू परंपराओं की रक्षा के लिए महिलाओं के आंदोलन को रोका जाना चाहिए। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ ने मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को उचित ठहराया। भूमाता ब्रिग्रेड की तृप्ति देसाई के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर ने महिलाओं के संगठनों और मंदिर के ट्रस्टियों के बीच मध्यस्थता करने की पहल की। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ की यह राय है कि वर्तमान में लागू किसी भी नियम को बदलने के पूर्व, संबंधित धर्मस्थलों की परंपरा और प्रतिष्ठा का संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

    सबरीमला के बारे में तर्क यह है कि मंदिर के अधिष्ठाता देव ब्रम्हचारी हैं और प्रजनन योग्य आयु समूह की महिलाओं से उनका ध्यान बंटेगा। हम सबको याद है कि कुछ वर्षों पहले एक महिला आईएएस अधिकारी, जो अपनी आधिकारिक हैसियत से मंदिर की वार्षिक तीर्थयात्रा के लिए इंतजामात का निरीक्षण करने पहुंची थी, को भी मंदिर में नहीं घुसने दिया गया था। मुंबई की हाजी अली दरगाह के मामले में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नामक संगठन ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर यह मांग की है कि वहां महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को बहाल किया जाए। दरगाह में महिलाओं का प्रवेश सन् 2012 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। महिला समूहों ने संविधान के विभिन्न प्रावधानों को उद्धत किया है जो लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करते हैं। दरगाह के ट्रस्टियों का यह कहना है कि यह प्रतिबंध महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से लगाया गया है। यह तर्क निहायत बेहूदा है। उसी तरह, सबरीमला के बारे में पहले यह तर्क दिया जाता था कि मंदिर तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम है और महिलाओं के लिए उसे तय करना मुश्किल होगा। बाद में देवस्वम् बोर्ड त्रावणकोर ने यह स्पष्टीकरण दिया कि महिलाओं का प्रवेश इसलिए प्रतिबंधित है क्योंकि भगवान अय्यपा ब्रम्हचारी हैं। मंदिर के संचालकों का कहना था कि प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं की उपस्थिति से ब्रम्हचारी भगवान का मन भटकेगा।

    brunei-masjidमस्जिदों में प्रवेश के मामले में महिलाओं की स्थिति अलग-अलग देशों में अलग-अलग है। इस संदर्भ में दक्षिण एशिया के देश सबसे खराब और तुर्की आदि सबसे बेहतर हैं। हिन्दू मंदिरों में भी एक से नियम नहीं हैं। आराधनास्थलों में महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित या सीमित करने के लिए कई बहाने किए जाते हैं। कई देशों में कानूनी तौर पर महिलाओं और पुरूषों को समान दर्जा प्राप्त है परंतु परंपरा के नाम पर इन आराधनास्थलों के संचालकगण महिलाओं को पूर्ण पहुंच देने से बचते आए हैं। आराधनास्थलों में पितृसत्तात्मकता का बोलबाला है।

    चर्चों के मामले में स्थिति कुछ अलग है। वहां महिलाओं के प्रवेश पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है परंतु महिलाओं को पादरियों के पदक्रम में उच्च स्थान नहीं दिया जाता। उसी तरह, हिन्दू मंदिरों और मुस्लिम मस्जिदों में महिलाएं पंडित व मौलवी नहीं होतीं। अगर एकाध जगह ऐसा है भी तो वह अपवादस्वरूप ही है।

    constitution-of-indiaहमारा संविधान महिलाओं और पुरूषों की समानता की गारंटी देता है। परंतु हमारे कानून शायद आराधनास्थलों पर लागू नहीं होते, जिनके कर्ताधर्ता अक्सर दकियानूसी होते हैं। सामान्यतः, भारत में आराधनास्थलों के संचालकमंडलों में महिलाओं को कोई जगह नहीं मिलती। हिन्दुओं के मामले में जाति एक अन्य कारक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यावहारिक तौर पर मुसलमानों और ईसाईयों में भी जातियां हैं परंतु इन धर्मों के आराधनास्थलों के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। इसके विपरीत, बाबा साहेब आम्बेडकर को दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलवाने के लिए कालाराम मंदिर आंदोलन चलाना पड़ा था और अंततः वे इतने निराश हो गए कि उन्होंने हिन्दू धर्म ही त्याग दिया। उनका कहना था कि हिन्दू धर्म, ब्राम्हणवादी धर्मशास्त्र पर आधारित है व मूलतः पदानुक्रमित है। सच तो यह है कि अधिकांश धर्मों के सांगठनिक ढांचे में पदानुक्रम आम है।

    Trupti Desai Bhumata Brigade
    Trupti Desai
    Bhumata Brigade

    अगर हम संपूर्ण दक्षिण एशिया की बात करें तो मस्जिदों, दरगाहों और मंदिरों में महिलाओं के मामले में कई कठोर नियम हैं। इन्हें परंपरा के नाम पर थोपा जाता है। यद्यपि विभिन्न धर्मों में इस मामले में कुछ अंतर हैं परंतु जहां तक महिलाओं के साथ व्यवहार का प्रश्न है, सभी धर्म उनके साथ भेदभाव करते हैं। इस भेदभाव की गहनता इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित राष्ट्र या क्षेत्र कितना धर्मनिरपेक्ष है। यहां धर्मनिरपेक्षता से अर्थ है जमींदारों और पुरोहित वर्ग के चंगुल से मुक्ति। यद्यपि यह सभी के बारे में सही नहीं है परंतु समाज का एक बड़ा वर्ग महिलाओं को पुरूषों से कमतर और पुरूषों की संपत्ति मानता है। इस दृष्टि से महिलाओं द्वारा आराधनास्थलों में प्रवेश का अधिकार हासिल करने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन स्वागत योग्य हैं।

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    Bhumata Brigade
    Bhumata Brigade

    लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यात्रा को हमेशा दकियानूसी तत्वों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है। दकियानूसी तत्व, जाति और लिंग के सामंती पदक्रम को बनाए रखना चाहते हैं। चाहे वह बीसवीं सदी की शुरूआत का अमरीका का ईसाई कट्टरवाद हो या अफगानिस्तान, ईरान या पाकिस्तान का इस्लामिक कट्टरवाद या भारत में हिन्दू साम्प्रदायिकता के बढ़ते कदम – ये सभी महिलाओं को पराधीन रखना चाहते हैं। हमें आशा है कि इन समस्याओं और रोड़ों के बावजूद, लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यह यात्रा तब तक जारी रहेगी जब तक कि उन्हें पुरूषों के समकक्ष दर्जा और अधिकार हासिल न हो जाएं।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)
    Dr Ram Puniyani Rtd Prof, IIT Bombay
    Dr Ram Puniyani
    Rtd Prof, IIT Bombay
  • भारत के मेट्रो शहर में झोलाछाप डा० मद्रासी द्वारा खूनी बवासीर का शर्तिया इलाज

    सामाजिक यायावर

    2016-02-09-bavasir-shartiya-ilaj-02

    यह लेख भारत में सत्य घटनाओं पर आधारित है। सरकारी नौकरी करने वाला एक इंजीनियर कई वर्षों से बवासीर से परेशान था। उसके किसी मित्र ने बताया कि उसी शहर में एक मद्रासी है जो बवासीर का शर्तिया इलाज करता है। इंजीनियर मद्रासी का पता लेकर पहुंचता है। पॉश एरिया में कई मंजिला घर, लंबी कारें घर के सामने खड़ी हुईं। इंजीनियर अंदर गया। अंदर कई पढ़ी लिखी खूबसूरत लड़कियां भी अपनी-अपनी बारी आने के इंतजार में बैठी हुईं। इंजीनियर भी अपनी बारी के इंतजार में एक कुर्सी पर बैठ गया।

    इंजीनियर भी उस चलताऊ मनोविज्ञान से पीड़ित था जिसमें अंग्रेजी में गिटगिटाने व कांवेँट में पढ़ने को जागरूकता, योग्यता व बुद्धिमत्ता की कसौटी माना जाता है। अंग्रेजी में गिटगिटाती कांवेंट की पढ़ी हुईं खूबसूरत लड़कियों को मरीजों के रूप में देखकर इंजीनियर को लगा कि अब बवासीर का इलाज शर्तिया हो ही जाएगा।

    इंजीनियर साहब देखते कि जब भी कोई स्त्री या पुरुष पर्दे के अंदर दूसरे कमरे में जाता तो डाक्टर की “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो” जैसी दबंग आवाजें आतीं, फिर कराहने की आवाजें आने लगतीं। 15-20 मिनट बाद वह स्त्री या पुरुष पर्दे वाले कमरे से बाहर आते और चुपचाप बाहर चले जाते।

    काफी देर तक यह प्रक्रिया देखते रहते हुए इंतजार करने के बाद इंजीनियर साहब का नंबर आया। इंजीनियर साहब उस मद्रासी से पहली बार मिल रहे थे। मद्रासी ने इंजीनियर साहब से यह तक नहीं पूछा कि इनको कौन सी बीमारी है मानो मद्रासी को पता ही था कि यहां आने वाला हर बीमार बवासीर का ही बीमार है।

    मद्रासी ने कहा “खोलो”। इंजीनियर साहब बिलकुल नहीं समझ पाए कि ये क्या खोलें? इंजीनियर साहब ने पूछा कि क्या खोलें? मद्रासी बोला कि आप यहां क्यों आएं हैं, इंजीनियर साहब बोले कि बवासीर के इलाज के लिए। मद्रासी बोला कि बवासीर कहां होता है? इंजीनियर साहब चुप हो गए। मद्रासी बोला कि इसमें शर्माने की क्या बात है बताइए कि बवासीर गांड़ में होता है। इसलिए जब मैंने कहा कि खोलो तो इसका मतलब हुआ कि आप अपनी पैंट व अंडरवियर उतार कर मेरे सामने अपनी गांड़ खोलकर दिखाइए।

    इंजीनियर साहब वहीं पड़े एक तखत पर लेट गए और अपनी गांड़ खोल कर मद्रासी को दिखाने लगे। मद्रासी ने अपनी उंगली बिना किसी दस्ताने के सीधे इंजीनियर साहब के गुदाद्वार में डालने लगे। मद्रासी बोला “और खोलो” अरे भई “और फैलाकर खोलो”। इंजीनियर साहब ने “और खोला” उसके बाद “और फैलाकर खोला”। उंगली डालते हुए मद्रासी बोला कि मुह खोलकर हवा निकालिए जगह बनाइए तभी तो उंगली अंदर जाएगी, इंजीनयर साहब ने कराहते हुए मुंह खोला। मद्रासी ने पहले एक उंगली फिर दो उंगलियां गुदाद्वार में पूरी तरह डाल कर अंदर खूब अच्छे से घुमाते हुए इंजीनियर साहब को हुए बवासीर का कारण जाना व समझा। 

    इंजीनियर साहब के गुदा में जीवन में पहली बार कोई उंगली गई थी। मद्रासी का भारी हाथ और भारी हाथ की भारी उंगलियां। इंजीनियर साहब को बेइंतहा दर्द था लेकिन करें तो करें क्या। आखिर शर्तिया इलाज जो करवाना था। इंजीनियर साहब कुछ और समझे हों या न समझे हों लेकिन अंदर से बाहर आती “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो” व कराहने जैसी आवाजों का मतलब बखूबी समझ चुके थे। 

    इंजीनियर साहब की इसी हालात में मद्रासी से बवासीर का शर्तिया इलाज करवाने के पैकेजों में बातचीत शुरू हुई। मद्रासी बोला कि कोई चिंताजनक बात नहीं है, बवासीर ठीक हो जाएगा। इंजीनियर साहब ने कुछ महीने का 30 हजार रुपए वाला पैकेज पसंद किया। इस पैकेज में इंजीनियर साहब को कुछ महीनों तक रोज मद्रासी के पास आना था और मद्रासी की उंगलियों को अपनी गुदा के भीतर लेते हुए गुदा नली में कोई मलहम वगैरह लगवाना था।

    इंजीनियर साहब बिना नागा रोज मद्रासी के पास आते। मद्रासी “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो” जैसे आदेश देता, इंजीनियर साहब के मुंह से कराहने की आवाजें आतीं और मद्रासी उंगलियां डालकर अच्छे से चारों तरफ घुमाते हुए कोई मलहम लगाता। इस पूरी प्रक्रिया के बाद इंजीनियर साहब कई घंटे चलने के काबिल नहीं रहते लेकिन बवासीर के शर्तिया इलाज के लिए सब प्रकार का दर्द झेलते।

    भगंदर :

    लगभग एक महीने बाद मद्रासी ने इंजीनियर साहब को सूचित किया कि इनको भयंकर वाला भगंदर (फिस्टुला) है। इसलिए इलाज लंबा चलेगा। इंजीनियर साहब ने मद्रासी के पैर पकड़े और बोले कि हमको ठीक कर दीजिए, बहुत तकलीफ है। मद्रासी ने बताया कि भगंदर का पैकेज बवासीर के पैकेज से अतिरिक्त लेना पड़ेगा। इंजीनयर साहब सहमत हुए। अब बवासीर व भगंदर का इलाज चलने लगा। मद्रासी उसी तरह रोज इंजीनियर साहब के गुदा में उंगलियां डालकर अच्छे से घुमाते हुए कोई मलहम लगाता रहा। लेकिन अब बवासीर के साथ-साथ भगंदर का भी इलाज हो रहा था। इंजीनियर साहब यह मानकर चल रहे थे कि मलहम बदल गया होगा। नया बदला हुआ मलहम बवासीर व भगंदर के इलाज के लिए होगा। अब इंजीनियर साहब का कांबो इलाज चलने लगा।

    मछली की आंख से बनी गुदा रिंग :

    फिर लगभग एक महीने बाद मद्रासी ने इंजीनियर साहब को एक नई सूचना दी कि गुदा को सिकोड़ने फैलाने वाली उनकी गुदा रिंग टूटी हुई है, बदलनी पड़ेगी। इंजीनियर साहब बोले कि कैसे बदलेगी? मद्रासी बोला कि मछली की आंख से बनती है और बढ़िया काम करती है, चिंता वाली कोई बात नहीं है।

    गुदा रिंग बदलवाने के लिए इंजीनियर साहब के सहमत होने पर मद्रासी ने बताया कि रिंग का खर्चा बवासीर वाले पैकेज के अतिरिक्त होगा। इंजीनियर साहब ने मछली की आंख से बनी गुदा रिंग का अतिरिक्त खर्चा दिया।

    मद्रासी ने एक दिन “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो” के साथ-साथ “ऐसे ही फैलाकर खोले रहो” वाला वाक्य भी बोला और इंजीनियर साहब 30-40 मिनट तक अपनी गुदा अपने हाथों से पकड़ कर खींच कर फैलाते हुए खोले रहे और मद्रासी बिना दस्तानों के अपनी मोटी-मोटी उंगलियों को इंजीनियर साहब की गुदा के अंदर डालते निकालते रहने के बाद बोला कि लो भई आपकी गुदा रिंग बदल गई अब मछली की आंख से बनी गुदा-रिंग लग चुकी है।

    न कोई आपरेशन, न कोई चीर फाड़। मद्रासी ने इंजीनियर साहब की गुदा में अपनी मोटी मोटी उंगलियां डालने और निकालने की प्रक्रिया लगभग 30-40 मिनट तक दुहराई और मछली की आंख से बनी गुदा-रिंग जादुई तरीके से डाल दी। इंजीनियर साहब बहुत खुश हैं कि बिना आपरेशन व चीर-फाड़ के उनकी गुदा-रिंग बदल गई और मछली की आंख से बनी गुदा-रिंग लग गई।

     

    चलते-चलते :

    इंजीनियर साहब व मद्रासी की बातें खुल कर होनें लगीं थीं। मद्रासी ने उनको बताया कि उसने अपने जीवन में एक से बढ़कर एक हजारों स्त्रियों के यौनांग देखे और उनकी गुदाओं में महीनों उंगलियां डाली और मलहम लगाते हुए इलाज किए।

    मद्रासी बहुत कम पढ़ा लिखा है, शायद पांचवी या छठवीं तक ही पढ़ा है, लेकिन बहुत पढ़े लिखे लोगों के बवासीर, भगंदर व गुदा-रिंग आदि का शर्तिया इलाज “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो”, मोटी मोटी बिना दस्तानों की उंगलियों, मलहम व मछली की आंख आदि से बनी गुदा-रिंगो आदि-आदि पैकेज के साथ करता है।

    मद्रासी की संताने अमेरिका में पढाई करतीं हैं, उनकी पढ़ाई का सारा खर्चा मद्रासी अपने द्वारा किए गए शर्तिया इलाज की कमाई से उठाता है। करोड़ों का घर है, करोड़ों के कई प्लाट हैं। आलीशान कारे हैं। पत्नी के पास लाखों रुपयों के गहने हैं। और भी बहुत कुछ है।

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  • धार्मिक कथाएं व ग्रंथ, इतिहास व इतिहासकार

    सामाजिक यायावर
    सामाजिक यायावर
    किसी भी धर्म की अधिकतर पौराणिक कथायें, उस धर्म के लोगों को स्थायी रूप से मानसिक गुलाम रूपी अनुगामी बनाने के लिए लिखी गईं हैं। ताकि धर्मों की अमानवीयता, ऋणात्मकता व शोषण वाले गहरे तत्वों पर कभी सवाल न खड़ा हो पाए।
     
    यही कारण है कि पौराणिक कथायें, कथाओं में सत्य तथ्यों के अस्तित्व का भ्रामक अनुभव कराती हुई, मनुष्य सभ्यता के विकास का दावा करते हुए उसको अपनी अनुकूलता की घेरेबंदी में मजबूती से बंद रखती हैं।
     
    एक उदाहरण स्वरूप यदि वैदिक काल के समय के दावेदार साहित्य, महाग्रंथों, महाकव्यों आदि में उद्धत कथाओं को यदि संज्ञान में लिया जाए तो वैदिक काल के बारे में यही साबित होता है कि उस काल्पनिक काल में मानव समाज एक आदर्श समाज था, जीवन मंगलमय था, व्यवस्था कल्याणकारी थी, सब कुछ संतुलित व व्यवस्थित था और धर्म, विज्ञान, तकनीक व मानव का विकास अपने चरम पर था।
     
    जब भी धार्मिक कल्पनाओं व कर्मकांडों को जबरदस्ती सही साबित करना होता है तो ऐतिहासिक शोधों की बात की जाती है।
     
    ऐसे मामलों में जिसे ऐतिहासिक शोध कहा जाता है यदि उस शोध का आधार वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है, तो वह ऐतिहासिक शोध कल्पनाओं, काल्पनिक कथाओं व इन पर आधारित ग्रंथों, महाग्रंथों, काव्यों व महाकाव्यों आ्दि की बेसिरपैर की खिचड़ी के अलावे कुछ भी और नहीं होता है।
     
    भारत के बहुत इतिहासकार जिनकी किताबें पढ़ीं जातीं हैं और जिनके नाम की तूती बोलती रही है या बोलती है। जिनके नामों को सबूत के तौर पर दिया जाता है। वे दरअसल इतिहास के शोधों के नाम पर ऐसी ही खिचड़ियां बनाते, पकाते व परोसते रहे हैं।
     
    यही सबकुछ पढ़ कर हजारों लाखों ने PhD कर ली, यूनिवर्सिटीज में प्रोफेसर हो गए, देश के ऊंचे नौकरशाह हो गए। इसी सब घालमेल ने देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा व दशा की और शिक्षा व्यवस्था की खामी के लिए गाली देने के लिए लार्ड मैकाले जैसे कुछ लोग अनंतकाल के लिए भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए राक्षस घोषित कर दिए गए।
     
    बेसिकली हमारा देश ऐसे ही खोखले व सतही आधारों पर खड़ा है। हमें ही तय करना है कि हम खुद को, अगली पीढ़ी को, समाज को, देश को क्या देना चाहते हैं और कैसा बनते देखना चाहते हैं ….
     
     
     
     
  • प्रतिक्रिया के कारण हो रही सामाजिक चेतनशीलता के लिए भाजपा, सहयोगी संगठन व भक्तगण धन्यवाद के पात्र हैं

    सामाजिक यायावर

    समाज में बने बनाए ढर्रों, मान्यताओं, परंपराओं, धारणाओं आदि पर सवाल उठना किसी न किसी कारक के कारण शुरू होता है। उत्प्रेरक कारक न होने पर सड़ांध के स्तर का होने के बावजूद ढर्रे, मान्यताएं, धारणाएं आदि ढोई जाती रहतीं हैं।

    2014 में भाजपा की केंद्र सरकार आने के बाद भाजपा, सहयोगी संगठनों व भक्तगणों के बयानों, व्यवहारों व क्रियाकलापों के कारण लोग प्रतिक्रिया स्वरुप सवाल खड़ा करने लगे हैं। धर्म जाति के मकड़जाल के प्रति आम लोगों की धारणाएं मान्यताएं ढहने लगी हैं। लोग धर्म जाति पर सवाल खड़ा करने लगे हैं, बहस करने लगे हैं। भले ही यह प्रतिक्रियात्मक हो लेकिन यह चिंगारी का काम कर रही है।

    इस चिंगारी में घी का काम टीवी, अखबार जैसा मीडिया व सोशल मीडिया महत्वपूर्ण किरदार निभा रहा है। टीवी व अखबार का मीडिया तो लार चुआते लालची व पालतू कुत्ते की तरह व्यवहार करने व खुद को किंग-मेकर मानने के नशे व अहंकार के कारण सरकार बनने के बाद भी अब भी चुनाव प्रचार में ही लगा हुआ है। इस मीडिया की हैसियत दरबार के भांट जैसी हो गई है। जिसे सत्ता की शान में गाना गाना ही है नहीं तो लतियाकर दरबार से बाहर फेंक दिया जाएगा।

    भला हो 2G जैसे घोटालों का जिनके कारण आम आदमी के हाथों में सस्ते मोबाइल व सस्ता इंटरनेट पहुंच गया और लोगों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। टीवी व अखबार में कुछ आया, नेताओं/धर्मगुरुओं आदि किसी ने कोई बयान दिया, इधर लोगों ने अपनी अपनी समझ, सोच व स्वार्थ के अनुसार उस पर अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी।

    टीवी में किसी कार्यक्रम के लिए तैयारी करनी पड़ती है। अखबार छापना पड़ता है। लेकिन सोशल मीडिया में सिर्फ कुछ बटनें दाबनी पड़तीं हैं और बात जंगल में आग की तरह फैलती है। सोशल मीडिया में लोग परस्पर विरोधी विचारों को पढ़ते, देखते, सुनते, समझते हैं। वै जैसे भी हैं वैसे ही खुद को व्यक्त कर लेते हैं।

    सोशल मीडिया में जो ढोंगी है वह बहुत अधिक बड़ा ढोंग कर लेता है। जो झूठ बोलता है वह बहुत अधिक बड़ा झूठ बोल लेता है। जो मक्खनबाज है वह बहुत अधिक बड़ी मक्खनबाजी कर लेता है। जो अंदर से हिंसक है वह मानसिक हिंसा कर लेता है। जो जैसा है और जो करना चाहता है वह सोशल मीडिया का वैसे ही प्रयोग करता है। लोग अपने जैसों के साथ जुड़ते हैं। जो जैसा है उसको वैसे लोग मिल जाते हैं। उसकी बात वाहे ऋणात्मक हो या धनात्मक हो, बुरी हो या अच्छी हो, उसकी पहुंच का दायरा बहुत गुना बढ़ जाता है।

    भले ही कितना हो हल्ला हो, उपहास उड़ाया जाए, बेढंगे तर्क दिए जाएं लेकिन अब लोगों के अंदर की धार्मिक व जातीय धारणाओं व मान्यताओं को ढहने से बचा पाना असंभव है। ज्यों ज्यों सोशल मीडिया का दायरा बढ़ता जाएगा त्यों त्यों लोग अपना दर्द व झेला हुआ यथार्थ आपस में साझा करना शुरू करेगा। 

    चूंकि आम समाज के लोग अपने जीवन में बहुत कुछ झेलते हैं यही कारण है कि प्रतिक्रिया सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत तेजी से फैलती है। झेला हुआ दर्द आपस में एक बांड बन जाता है। ज्यों ज्यों दबे कुचले व शोषित जातियों के लोग भी अधिक से अधिक इंटरनेट व सोशल मीडिया का प्रयोग करना सीखते जाएंगें। प्रतिक्रियात्मक बदलावों की आग बढ़ती जाएगी। इसके लिए धरना प्रदर्शन, कैंडल मार्च में लोगों की संख्या का होना या न होना महत्व नहीं रखता है। क्योंकि सारा खेल तो उसके मन के भीतर चल रहा उठापटक का है। 

    स्त्रियां मंदिरों के लिए आंदोलन करने लगीं हैं। दलित छात्र एकजुट होने लगा है। ऐसा दिख रहा है कि आगे आने वाले समय में दलित व पिछड़ा भी एकजुट हो सकता है।

    भले ही यह प्रतिक्रियास्वरूप हो लेकिन दीवारें तो ढहने लगी हैं। सबसे जरूरी बात है धारणाएं मान्यताएं टूटना, उन पर सवाल खड़ा होना। इतना शुरू हो जाए तो फिर बहुत कुछ अपने आप टूटने लगेगा। मैं इसको समाज के लिए लंबी दूरी के लिए बेहतर मानता हूं।

    चलते-चलते

    2014 के चुनावों में लोगों ने अपने जीवन में बदलाव के लिए सत्ता सौपी थी। आम लोगों को उनके जीवन में आमूलचूल बदलाव का बहुत बड़ा सपना भी दिखाया गया था। मैंने 2014 में चुनावों के बाद एक पोस्ट में लिखा था कि अब भाजपा को मीडिया का प्रयोग अगले लोकसभा चुनाव तक नहीं करना चाहिए। क्योंकि अब भाजपा की सरकार है और यदि मीडिया फिजूल में जबरन सरकार की प्रशंसा करेगा तो लोग नाराज होना शुरू हो जाएंगें क्योंकि लोग धरातल में रहते हैं। सरकार यदि कुछ अच्छा करती है तो उसका प्रभाव व असर लोगो को अपने जीवन में दिखता है। इसके लिए मीडिया के ढोल मजीरे की जरूरत नहीं होती है। लेकिन मीडिया के प्रयोग को लोगों का माइंडसेट बनाने के लिए ब्रह्मास्त्र मानने की गलती लगातार व बारबार दुहराई जा रही है। अन्य राजनैतिक दलों के लोग भी यही पद्धति प्रयोग करना शुरू कर चुके हैं। यह सब जो भी हो रहा है वह भारत के लोगों की चेतनशीलता के लिए बहुत ही लाभदायक है।

    कोई बड़ी बात नहीं कि आगामी पांच दस वर्षों में ही भारत के लोग भारत की मुख्य मीडिया व वर्तमान राजनैतिक दलों, जातियों व धार्मिक मान्यताओं व धारणाओं को बिलकुल ही गिराकर ढहाना शुरू कर दें।

    कुछ भी हो समाज में ऐसी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करने के लिए भाजपा, सहयोगी संगठनों व भक्तों को जबरदस्त क्रेडिट जाता है।

    सामाजिक यायावर

     

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  • स्त्री का शरीर व शरीर के अंग भड़काऊ नहीं होते, स्तन व योनि जैसे यौनांग भी नहीं

    सामाजिक यायावर

    शुचिता के नाम पर, संस्कार के नाम पर, संस्कृति के नाम पर, शालीनता के नाम पर, सौंदर्य के नाम पर स्त्रियों के पहनावे आदि पर सवाल खड़े करना बहुत अधिक आम बात है। यहां तक कि बलात्कार, छेड़खानी व बदतमीजी आदि का ठीकरा भी स्त्री के पहनावे पर ही फोड़ दिया जाता है।

    बकवास, कुतर्क, मानसिक विकृति, वैचारिक विकृति व बेहूदगी के आवेश/आवेग में कहा कुछ भी जाए लेकिन यह एक तथ्य है कि यदि कोई पुरुष स्त्री को भोग्या के तौर पर नहीं देखता है तो उसके सामने यदि स्त्री निर्वस्त्र भी खड़ी है तो उस पुरुष में कामवासना का भाव नहीं आएगा। वह स्त्री के शरीर को एक साधारण वस्तु के रूप में सहजता से ही स्वीकारेगा।

    जब बचपन से ही लड़कों के अंदर लड़की को यौन रूप से पुरुष के द्वारा भोग्या और लड़कियों के अंदर खुद को यौन भोग्या माने जाने के रूप में जबरन ठूंस दिया जाता है। तो लड़के की मानसिक कंडीशनिंग लड़की को भोग्या के रूप में देखने की और लड़की की मानसिक कंडीशनिंग खुद को भोग्या के रूप में देखने की हो जाती है। बहुत गहरे अंदर अवचेतन में यह कंडीशनिंग पैठ बना लेती है और मन के भावों व विचारों को नियंत्रित करने लगती है।

    स्त्री के पहनावे आदि की बात की जाती है। किंतु जिनको स्त्री को भोग्या के रूप में देखना होता है वे पूरे कपड़े पहने स्त्री को भी ऐसे देखते हैं जैसे कि कपड़ों को भेदकर स्त्री का हर अंग देख लेगें और पकड़ कर भंभोड़ डालेंगें। इसको समझने के लिए के लिए बहुत बड़ी बहस की जरूरत नहीं है, सहजता से समझा जा सकता है। 

    स्त्री के स्तन जो ब्रा व ब्लाउज से ढके रहते हैं, ऊपर से पल्लू रहता है तब भी देखने वाला पुरुष ऐसे देखता है जैसे सबकुछ दिख रहा है। स्तनों को मसलने तक की कल्पनाएं कर लेता है। ब्रा, ब्लाउज व पल्लू आदि की बात छोड़िए। स्त्री यदि रजाई से ढकी भी लेटी हो और उसका कोई अंग न दिख रहा हो, केवल पुरुष को यह मालूम पड़ जाए कि रजाई के अंदर स्त्री है तब भी उसके सारे अंगों की कल्पना वैसे ही करेगा जैसे कि सामने देख रहा हो। सारे यौनांगों की कल्पनाएं कर डालेगा। स्त्री पैंटी पहने होगी, पैंटी के ऊपर सलवार या पैंट या साड़ी या लहंगा या कुछ और। लेकिन देखने वाला पुरुष स्त्री द्वारा पहने गए दो तीन परतों के कपड़ों को भेदकर भी योनि व चूतड़ों को देखने और भभोड़ने की कल्पना कर लेता है।

    यदि स्त्री के यौनांग पुरुष में कामुकता पैदा करते हैं तो एक नवजात बच्ची की योनि के द्वारा या एक बहुत वृद्ध महिला के अंग भी कामुकता पैदा करने चाहिए। किशोर व युवा उम्र की स्त्रियों के अंगों से कामुकता पैदा होती है ऐसा क्यों?

    यदि स्तन व योनियां पुरुष में कामुकता पैदा करती हैं तो गाय, भैंस, बिल्ली, बकरी, भेंड़, कुतिया, गदही, घोड़ी, हथिनी, ऊंटनी आदि पशुओं की मादाओं के पास भी स्तन व योनियां होती हैं और ये मादाएं बिना कपड़े पहने खुलेआम घूमती रहती हैं, तब पुरुषों में कामुकता क्यों नहीं पैदा होती है जबकि इन पशु-मादाओं की योनि की बाहरी बनावट लगभग मनुष्य स्त्री की योनि के जैसी होती है। 

    पुरुष अपनी बकरियों, भैंसों, गायों, भेड़ों, घोड़ी, गदही, ऊँटनी आदि को पशु पुरुष के पास गर्भाधान के लिए लेकर खुद जाता है, पशु उसके सामने ही यौन क्रिया करते हैं इसके बावजूद पुरुष के अंदर बकरी, भैंस, गाय, भेंड़, गदही, घोड़ी आदि से सेक्स करने की इच्छा क्यों नहीं पैदा होती है जबकि उसकी आंख के सामने ही पशु मादा की योनि में पशु पुरुष अपने शिश्न को प्रवेश कराता है, यौन क्रिया करते हुए योनि के अंदर वीर्यपात करता है।   

    मैं ऐसे कई आदिवासी समाजों से मिल चुका हूं जहां आज भी स्त्रियां अपने स्तनों को नहीं ढकती हैं। उन समाजों के पुरुषों के अंदर तो स्त्री के स्तन देखकर कामुकता या वासना नहीं पैदा होती है। आदिवासी समाज में बलात्कार नहीं होते हैं। आदिवासी समाज में छेड़खानी नहीं होती है। जबकि स्त्री तो अर्धनग्न रहती है। स्त्री पुरुष दोनो दारू पीते हैं। स्त्री अर्धनग्न, स्त्री पुरुष दोनो दारू के नशे में लेकिन फिर भी नहीं बहकते हैं, बलात्कार नहीं होते हैं, यौन छेड़खानी की बेहूदीगियां नहीं होती हैं। जो पुरुष स्त्री को भोग्या के रूप में न देखकर अपने ही जैसे मनुष्य के रूप में देखता है उसको क्या फर्क पड़ता है कि स्त्री ने कपड़े पहने हैं या नहीं पहने हैं।

    वास्तविक तथ्य तो यही है कि वासना मानसिक होती है। वासना किसी शारीरिक अंग के आकार प्रकार पर निर्भर नहीं होती है। दरअसल पुरुष के द्वारा स्वयं की वासना कामुकता के लिए स्त्री को गुलाम बनाने या प्रतिबंधित करने की जरूरत नहीं है। यदि जरूरत है तो खुद के अंदर स्त्री को अपने जैसा ही मनुष्य स्वीकारने की, स्त्री के स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकारने की।  

    स्त्री को यौन भोग्या के रूप में देखना, स्त्री शरीर के प्रति कामुक बने रहना मानसिक यौन विकृति है। वैसे ही जैसे मानसिक यौन विकृत पिता अपनी पुत्री व भाई अपनी बहन से संभोग करता है। हमारे समाज में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं भले ही इन घटनाओं के सच को दबा दिया जाता हो।

    मैं तो कहता हूं कि जिन लोगों को यह लगता है कि स्त्री के अंग स्तन व योनि कामुकता बढ़ाते हैं उन लोगों को बकरी, कुतिया, घोड़ी, गदही, भेंड़, भैंस व गाय आदि के साथ भी यौन क्रिया करना चाहिए। योनि ही तो है क्या फर्क पड़ता है किस प्रजाति के जीव की है। सभी योनियां चमड़ी, नसों व धमनियों आदि से ही तो निर्मित होती है। 

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  • किताब की प्रस्तावना :: देश व समाज का निर्माण मनुष्य का दायित्व है

    मनुष्य के बिना देश हो ही नहीं सकता, और जहां कहीं भी मनुष्य होगा वहां देश होगा ही होगा। मनुष्य बड़ा है देश से, क्योंकि मनुष्य बनाता है देश। देश की सत्ता, मूल्य, नियम-कानून, रीति-रिवाज, खानपान, रहन-सहन, भाषा, लिपि, धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कृति सभी कुछ मनुष्य ही बनाता व निर्धारित करता है। मनुष्य है तो देश है, बिना मनुष्य के देश का कोई अस्तित्व नहीं। यही सहज सामाजिक तथ्य है, शेष तर्क व परिभाषायें राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा अपने वर्तमान अस्तित्व के लिये तोड़मरोड़ कर उनके अपने निहित-स्वार्थों के लिये थोपी गयीं परिभाषायें व तर्क हैं।

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है। देश मनुष्य की अपनी जीवंतता व उसके जीवन में व्याप्त परस्परता की जीवंतता से बनता है, इसलिये देश राजनैतिक सीमाओं की निर्जीव-वस्तु न होकर, जीवंत-वास्तविकता होता है जिसका निर्माता मनुष्य होता है। मनुष्य और देश का गूढ़ गतिशील, चारित्रिक व जीवंत-रचनात्मक संबंध होता है।

    जिस दिन भारत का मनुष्य यह यथार्थ समझ जायेगा कि देश मूलरूप से मनुष्यों से बनता है, न कि निर्जीव कानूनों, कानून की किताबों, संविधानों, धार्मिक सत्ताओं या राजनैतिक सत्ताओं से; उस दिन भारत का मनुष्य अपने देश का पूरा का पूरा चरित्र एक झटके में बदल लेगा।

    यही बदलाव का दिन वास्तविक व व्यापक परिवर्तन का दिन होता है। सत्ता को चलानें वाले वैयक्तिक-समूहों, दलगत-समूहों को बदलना वास्तविक व व्यापक परिवर्तन नहीं होता है।

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है, इस यथार्थ को समझना व चारित्रिक रूप से जीना ही मनुष्य का लोकतांत्रिक होना है। मनुष्य की इस लोकतांत्रिकता के द्वारा ही उसका देश लोकतांत्रिक बनता है। किसी देश को उस देश को बनाने वाले मनुष्य लोकतांत्रिक बनाते है, दूसरे शब्दों में लोकतांत्रिक मनुष्य ही देश को लोकतांत्रिक बनाता है, न कि देश का कानून, संविधान व सत्ता प्रणाली। सत्ता प्रणाली राजतंत्रीय होते हुये भी देश व देश का मनुष्य लोकतांत्रिक हो सकता है।

    मनुष्य देश का निर्माण करता है। देश का निर्माण धार्मिक समूहों, राजनैतिक समूहों व आर्थिक तंत्रों आदि पर न तो निर्भर करता है और न ही इन सब से देश निर्माण की अपेक्षा ही की जानी चाहिये।

    देश निर्माण मनुष्य की जिम्मेदारी है। धार्मिक समूह, राजनैतिक समूह व आर्थिक तंत्र आदि मनुष्य द्वारा निर्मित देश के विभिन्न अवयव होते हैं, जिनको वर्तमान प्रासांगिकतानुसार परिवर्तित किया जा सकता है। मनुष्य देश निर्माण की प्रक्रिया में विभिन्न अवयवों का निर्माण करता है, फिर उन्हें परिवर्तित करता है। अवयवों के निर्माण व परिवर्तन की प्रक्रिया में वह सीखता है और बेहतर निर्माता बनता है। और यही बनाना और सीखना ही मूलरूप में लोकतांत्रिक होना होता है…. यही है लोकतंत्र का मूलभाव।

    देश मूल रूप में मनुष्य की सामाजिकता की गतिशील-जीवंत-चारित्रिक रचनात्मकता है। इसलिये जैसा मनुष्य होगा वैसा ही देश होगा। मनुष्य जब चाहे तब देश का नाम, देश की परंपरायें, देश के कानून, देश का संविधान, देश का भूगोल, यहां तक कि देश का नाम तक बदल सकता है।

    सत्ताओं में व्यापक-सामाजिक-परिवर्तन का कोई सामाजिक-अवतार नहीं होता
    सामाजिक-अवतार राजनैतिक, धार्मिक व आर्थिक सत्ताओं से इतर आम-मनुष्य के समाज में होते हैं

    राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक व नौकरशाही तंत्रों में कोई भीसामाजिक-अवतार नहीं होता जो सामाजिक-अवतार जैसे दिखते हैं वे सभी किसी न प्रकार से व किसी न किसी स्तर पर प्रायोजित ही होते हैं। सामाजिक-अवतार तो आम समाज से अंकुरित व पुष्पित होते है और मनुष्य निर्मित सत्ताओं के बिना रहते हैं। क्योंकि यदि सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित सत्ताओं के द्वारा समाधान की शक्ति प्राप्त करते हैं, तो ऐसे सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित उन्ही तंत्रों के ही अधीन हुये, जिन तंत्रों को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थिति में तंत्रों की सत्ताओं के विरुद्ध जानें का साहस व दृष्टि हो ही नही सकती है।  इसीलिये तंत्रों द्वारा प्रायोजित सामाजिक-अवतार कभी भी सामाजिक समाधान व परिवर्तन की ओर नहीं चल पाते है, ऐसे सामाजिक-अवतारों की उपलब्धियाँ भी प्रायोजित ही होती हैं।

    भारतीय समाज में तो कुत्ता, बिल्ली, चूहा, सुअर, चिड़िया, सांप, कछुआ, गाय, बैल आदि जैसे गैर-मानव योनि जीव भी सामाजिक-अवतारों के रूप में प्रतिस्थापित किये गये हैं। इनको किसी भी प्रकार की मानव निर्मित सत्ताओं की ताकत नहीं मिली।

    सामाजिक-अवतार यदि सत्ताधीश है तो वह वास्तव में आम मानव का वास्तविक सक्रिय आदर्श नहीं हो सकता क्योंकि मानव निर्मित सत्ताओं की रूप-रेखा शुंडाकार-स्तंभ (पिरामिड) की तरह होती है, जिसमें सबसे नीचे का आधार सबसे चौड़ा और सबसे ऊपर की चोटी सबसे नुकीली और सबसे कम चौड़ी होती है।

    मानव निर्मित सत्ताओं में जो जितना ऊपर होगा वह उतना ही कम चौड़ा और अधिक नुकीला होगा और अपने से बहुत ही अधिक लोगों को दबाकर व दबाये रहते हुये ही और ऊपर पहुँचता है। इसीलिये मानव निर्मित तंत्रों के सत्ताधीश लोग कभी भी आम मनुष्य के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते, व्यापक-समाधान की दृष्टि नही रख पाते हैं। यही कारक है जिनके कारण ऐसे लोग सामाजिक परिवर्तन व समाधान के सामाजिक-अवतार नहीं हो पाते हैं। सामाजिक-अवतार तो बहुत सहज, सामान्य व मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के बिना ही हो पाते हैं।

    विश्व में अ-आयुधनिक सहज वैज्ञानिक-आविष्कार, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विकास, वैचारिक क्रांतियां आदि आम समाज से निकले आम मनुष्यों द्वारा मनुष्य-निर्मित धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि सत्ताओं का विरोध व प्रताड़ना झेलकर ही हुये हैं।

    यह किताब धन, मोहकता व मीडिया आदि के प्रायोजन के कारण बड़े दिखने वाले अदूरदर्शी व तात्कालिक लक्ष्य वाले कामों की चर्चा को नहीं करेगी या अत्यधिक प्रासांगिक होने पर ही करेगी। किताब मे ईमानदार व दूरदृष्टि वाले प्रयासो की चर्चा की गई है। जिनसे वास्तव मे समाज का वास्तविक विकास हो सकता है, दिखा है, हुआ है। इनमें से लगभग सभी कामों को या तो मैने नजदीक से देखा है, या मै खुद सक्रिय रूप से भागीदार रहा हूँ। यह किताब उद्योगपति, नौकरशाह, किसान, सामाजिक-संस्था आदि के द्वार आम-मनुष्य के तौर पर किये गये कार्यों व प्रयासों की बात करती है, जिनने देश व समाज को उत्तमता की ओर बढ़ने की दिशा दी, प्रेरित किया, गति दी।

    यह किताब उन लोगों के लिये बहुत कुछ लिये हुये है, जो लोग भारतीय समाज के विकास व समाधान के लिये ईमानदार सोच व प्रतिबद्धता रखते हैं।

    यह किताब ऐसे ही मनुष्यों को समर्पित है, ऐसे ही लोगों की चर्चा करती है, जो संज्ञानता या बिना-संज्ञानता के देश के निर्माण, पोषण व उत्तमता की ओर ले जाने के लिये विचार करते हैं, प्रयास करते हैं, कर्म करते हैं।

    —–
    द्वारा
    विवेक ग्लेंडेनिंग उमराव ‘नोमेड’
    www.nomadhermitage.groundreportindia.org

  • बड़का किस्म के सेलिब्रेटी समाज सेवी लोगों/ मैगसेसे पाने के कुछ बेहतरीन नुस्खे/ टोटके

    बड़का किस्म के सेलिब्रेटी समाज सेवी लोगों/ मैगसेसे पाने के कुछ बेहतरीन नुस्खे/ टोटके

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग 

    (भारतीय समाज की सामाजिक क्षेत्र की हकीकतों पर कटाक्ष-व्यंग्य)

    प्रबुद्ध पाठकों इस लेख में कोई कमी बेसी हो तो जरूर बताईयेगा, मैं भी प्रयास करूंगा कि इस लेख को और परिष्कृत कर पाऊँ ताकि यह व्यंग्य लेख सत्य घटनाओं के आधार पर लिखा होने के बावजूद किसी को सीधी चोट नहीं पहुचाता हुआ नही लगे।

    हजारों लाखों नौजवान साथियों से अनुरोध हैं कि यदि आप सच में भारतीय आम समाज के प्रति ईमानदार हैं तो इन बड़े बड़े टोटका गुरुओं कों अपना आदर्श नहीं मानें, आपनी आँखें खोलें और अपने अंदर की आत्मा की आवाज को सुने और समाज में काम करते रहें।  भारत में पचासों मैगसेसे वाले हो चुके हैं, हर साल और भी विदेशी पुरस्कार लोगों को मिलते रहते हैं, इनमें से अधिकतर ऐसे ही टोटका गुरु हैं।  यदि ये टोटका गुरु लोग सच मे ही भारत के लोगों के प्रति इमानदार होते तो आज भारत की दशा ही कुछ और होती।  भारत की ऐसी तैसी करने में नेताओं और ब्योरोक्रेट्स के साथ साथ इन टोटका गुरुओं का भी कोई कम हाथ नहीं।  ये टोटका गुरु लोग कभी अपने आप को नहीं बदलेंगें, टोटका गुरु होना भी एक उच्चस्तरीय स्थापित अभिजात्यीय रोजगार है जो कि ग्लोबाल ईकोनोमी की देन है और एक बड़ा मजबूत व्यवस्थित तंत्र है।  इसलिये टोटका गुरुओं से वास्तविक सामाजिक ईमानदारी व प्रतिबद्धता की अपेक्षा करना आखें होते हुये भी अंधे बनने जैसा ही है।   साथियों आप अपने ऊपर विश्वास करना सीखिये और इन टोटका गुरुओं को अपना आदर्श मानना छोड़ें,  ये लोग भारतीय सामाजिक क्षेत्र की वे जोंकें हैं जो हमारा आपका ही खून चूस-चूस कर खुद को बिना कुछ किये ही बड़ा बनाते हैं।

    विशेष-
    यह लेख सत्य पात्रों पर आधारित है, किंतु पात्रों के नाम बदले जा रहे हैं।  जिन महापुरुष की कहानी दी जा रही है वह बहुत आदरणीय हैं और हम सभी के टोटका गुरू हैं, सोनिया गांधी जी ने भी कुछ नुस्खे इन्हीं टोटका गुरु से ही सीखे हैं, लेख पढ़िये मालुम पड़ेगा।  टोटका गुरु बहुत ही बड़े वाले असली किसम के महापुरुष हैं।  जो कि विनम्रता की प्रतिमूर्ति हैं और साथ ही साथ बहुत ही बड़का वाले कर्मठ हैं और दलितों के मसीहा  हैं, इन्ही गुरु जी के प्रताप से आज घूमंतू पिटारा यह नुस्खे पेश कर पा रहा है।

    टोटका गुरु के टोटके/ नुस्खे-

    टोटका गुरू जी यदि आप मेरे सौभाग्य से यह पिटारा पढ़ रहे हैं तो मुझे उम्मीद है कि आप मुझे मन ही मन आशीर्वाद दे रहे होगें क्योंकि आपकी टोटका कला का लाभ हजारों लाखों लोग उठायेगें और आपको दुवायें मिलेंगी।

    यह सारे नुस्के और टोटके अपने टोटका गुरू के खुद के आजमाये हुये हैं।  बहुतों को इनसे फायदा मिला है, कुछ लोगों कों मैगसेसे अवार्ड मिला है, इनमें से कुछ तो नोबल के जुगाड़ में लगे हैं, घूमंतू पिटारे को पूरी उम्मीद है कि इनमें से टोटका गुरु को तो नोबल जरूर मिलेगा ही मिलेगा।  बहुत से लोग कई साल से टोटका कर रहे हैं।  ये लोग हार नहीं मानें उम्मीद की जाती है कि भविष्य में ग्लोबल ईकॅानोमी बड़ने के साथ साथ ऐसी व्यवस्था भी बनेगी कि सभी टोटका करने वालों की जेब में दो चार मैगसेसे या इस किसम के अवार्ड पड़ें रहेंगें जिससे अखबार में छपते समय या विदेश जाने के समय या फंड पाने के समय या फंड के लिये किसी को रेको देते समय या खुद को इमानदार या किसी को बेईमान सिद्ध करते समय या बड़ी किसम की मीटिंगों में जाते रहने के लिये या हवाई यात्राओं को करते रहने जैसे अति महत्वपूर्ण अवसरों में जरूरत पड़ने पर तुरंत जेब से निकाल कर दिखाये जा सकने रुपी भोकाल टाईट करने का सुभीता भी रहेगा।

    आपका अमेरिका से पढ़ा हुआ होना बहुत जरूरी है वरना लोग आपको त्यागी, ईमानदार, प्रगतिशील और बौद्धिक नही मानेंगें, और फिर बड़े व विदेशी पुरस्कारों की सेटिंग तो अमेरिका में आपके साथी कितना आपके बारे में ढोल मजीरा बजा पाते हैं इन सब बातों पर ही निर्भर करता है।  अब अपने टोटका गुरु को ही लीजिये, इन्होनें आज तक कोई भी काम जमीन में नहीं किया है फिर भी जमीनी नेता होने के सबूत  के तौर पर मिला मैगसेसे अवार्ड जेब में पड़ा रहता है।   यह टोटका बिलकुल भारत की अदालतों की तरह है मसलन आप बीच चौराहे में किसी की हत्या कर दीजिये भले ही आपको हत्या करते हुये हजारों लोगों ने देखा हो किंतु यदि आपके पास ऊँचे जुगाड़ हैं अौर सेटिंग करके आपने अदालत में सबूत दे दिया कि आपने हत्या नहीं की तो फिर अाम आदमी की गवाही का कोई मतलब नहीं होता,  बिलकुल उसी  तरह आपके जेब में आपके जमीनी नेता और ईमानदार होने का एक ऐसा सबूत पड़ा होना बहुत जरूरी है जो कि आम आदमी की पहुंच से बहुत दूर हो ताकि जरूरत पड़ने पर आप उस सबूत को पटाक से दिखा सकें जबकि आम आदमी क्या दिखायेगा, लीजिये आप बाजी मार गये।

    सबूत के फेवर में टोटका गुरु एक बहुत बड़ी किसम वाली बात और कहते हैं, उनका कहना है कि आपके पास सबूत है यह बड़ी बात है, आप काम क्या करते हैं या नहीं करते हैं इस बात का कोई मतलब नहीं।  टोटका गुरू अपने इस टोटके के फेवर मेँ बहुत ही लाजवाब तर्क पेश करते हैं, उनका कहना है कि यदि दो लोग हैं, एक काम करता है जबकि दूसरे के पास काम करने का सबूत है तो अब दुनिया भर के वे बड़का लोग जो कि आपके जमीनी होने का, आपके ईमानदार होने का, आपके कर्मठ होने का बड़का किसम का उच्चस्तरीय सबूत देते हैं, उनके पास इतना टाईम और संसाधन कहां हैं कि वे करोंड़ों-अरबों लोगों के पास जायें और जांचें कि कौन क्या कर रहा है असलियत में।  इसलिये जरूरी यह है कि सबूत जेब में आ जाये,  तो सारा दिमाग, सारा तिकड़म, सारी ऊर्जा केवल और केवल उन नुस्खों और टोटकों में लगानी चाहिये जिनसे सबूत मिल सके।   सबूत होता है काम्पैक्ट, जेब में डाल लिया जिससे जरूरत पड़ने पर जेब से निकाल कर तुरंत दिखाया जा सकता है।   अब काम को कैसे लेके घूंमा जा सकता है, जितना अधिक गहरा जमीनी काम होगा उतना ही दिखाने में दिक्कत दिखायें तो दिखायें कैसे,  इसलिये काम्पैक्ट होने और बनाने की तकनीक को भी खास नुस्खों के रूप में आजमाना बेहतर रहता है और असल में यही असली किसम वाली प्रगतिशीलता है,  बाकी सारी प्रगतिशीलतायें कथित किसम वाली प्रगतिशीलतायें होतीं हैं।

    टोटका गुरु के जीवंत उदाहरण से प्रेरणायें ली जा सकें, नुस्खे लिये जा सकें, असली किसम वाली ईमानदारी/प्रतिबद्धता/प्रगतिशीलता सीखी व समझी जा सके इसलिये जरूरी है कि इनके बारे में अौर भी जाना जाये।

    तकरीबन 20 साल पहले टोटका गुरु ने एक बहुत ही छोटे से दलितों के गांव (गांव क्या कहियेगा, इसको एक छोटा पुरवा कहिये) में अपने रिश्तेदारों से जुगाड़ लगा के अपनी ही जाति के लोगों मतलब ब्राम्हण लोगों से कुछ जमीन ली थी।    हुया यूँ कि अपने टोटका गुरु का ब्राम्हण होना बहुत लाभकारी हुआ,  क्योकि एक मात्र ब्राम्हण ही तो है जो कि केवल किसी दलित को छू ले या दलित को अपने बराबर में बैठा ले या दलित के घर में खाना खा ले या दलित से हाथ मिला ले तो बड़का क्रान्तिकारी हो जाता है।    टोटका गुरु भी इन्हीं नुस्खों से बड़का क्रान्तिकारी के रूप में लिये जाने लगे।  मेधा पाटकर जी से गहरे पारिवारिक संबंध होना भी बहुत काम आता है,  आप कहीं एक पाखानाघर बनवाईये और मेधा जी को बुला लीजिये उद्घाटन के लिये, कुछ पत्रकारों कों बुला लीजिये थोड़ा टीम टाम खड़ा कर लीजिये, मेधा जी भी खुश पत्रकारों को देखकर इधर आपका टोटका फिट हो गया बहुत बड़े किसम के काम करने का पक्का सबूत, इन्हीं सबूतों को जमा करते जाईये और फिर किसी विदेशी टाईप के बड़े सबूत के लिये आवेदन करिये या करवा दीजिये और लाईन में लग जाईये।

    एक बात जरुर ध्यान रखें कि किसी को बतायें नहीं कि आपने किसी विदेशी अवार्ड के लिये पक्का जुगाड़ लगा रखा है, अवार्ड मिलने पर कुछ ऐसी बेहतरीन नौटंकी कीजिये कि भोले भाले लोगों को लगे कि दुनिया भर में छानबीन करने के बाद खूब खोजने के बाद आप जैसे महापुरुष का चुनाव किया गया है। विश्वास कीजिये यह नुस्खा काम आता है, टोटका गुरु के जीवन में तो यह नुस्खा बहुत ही काम आया है।   यदि आपको मैगसेसे जैसे किसम का कोई अवार्ड मिल जाये तो अपने साथियों से मैगसेसे अवार्ड को एशिया का नोबल अवार्ड इस किसम की कोई भोकालबाजी करवाते रहिये तो भोलेभाले लोग आपको परमानेन्ट देवता मानते रहेंगें।    अब यदि मैगसेसे अवार्ड यदि सच में ही एशिया का नोबल होता तो फिर सभी को पता ही होता कि यह एशिया का नोबल अवार्ड है जैसे कि नोबल के बारे में सबको पता रहता है कि यह नोबल अवार्ड है।  लेकिन यदि यह एशिया का नोबल ना भी हो तो भी चूंकि आपको आगे नोबल अवार्ड के लिये टोटकें करनें हैं तो अपने खास साथियों से एशिया का नोबल जरूर कहलवातें रहें, इस नुस्खे से फायदा यह होता है कि नोबल के लिये आपकी दावेदारी मजबूत होती है भोले भाले लोगों को भी यह महसूस होता है कि चूंकि आपको छोटका वाला नोबल मिल चुका है तो अब बड़का वाला आज नहीं तो कल मिल ही जायेगा।  तो लोग आपके पीछे लगे रहते हैं कि जब आपको बड़ी चासनी मिलेगी तो उनको भी कुछ बचा खुचा मिलेगा ही मिलेगा।  तो इस प्रकार के लोगों की भीड़ को भी आप अपने बड़का जमीनी नेता होने के सबूत के तौर पर पेश कर सकते हैं,  आपने “इसकी टोपी उसके सर” वाली प्रसिद्ध हिन्दी फीचर फिल्म तो देखी ही होगी।   यदि दुर्भाग्यवश नहीं देखी है तो जरूर देख लेंवें क्योकि अपने टोटका गुरु ने बहुत बार देखी है।

    टोटका गुरु को कई साल पहले एक पैरा ऊपर वाले नुस्खे को करते रहने से मैगसेसे अवार्ड मिल गया था।   किसम किसम के नुस्खों के असर के कारण टोटका गुरु को इस दलित-गांव और दलित सशक्तीकरण के नाम पर पचासों लाख रुपये तो मैगसेसे के पहले ही मिल चुके थे, जबकि पता नहीं क्यों बिचारे इस दलित गांव और इसके गांव वालों की हालतें 20 साल से दिन ब दिन पहले से और बदतर ही होती जा रही हैं।  यहां टोटका गुरु का काम्पैक्ट नुस्खा कितना काम आता है, क्योंकि असलियत देखने कौन आता है, असलियत देखने की जरूरत ही नही पड़ती क्योकि टोटका गुरु की जेब में बहुत सारे बड़का किसम वाले सबूत जो पड़े हुये हैं, जहां जो सबूत फिट हो सकता है टोटका गुरु फटाक से जेब से निकाल कर तुरंत फिट कर देते हैं।   अब सोचिये कि ये नुस्खे कितने बेहतरीन हैं। बताया तो कि खुद टोटका गुरु के अपने खुद के जीवन में अपनाये हुये टोटके हैं।

    टोटका गुरू एक फंडिग एजेंसी के जन्मदाता भी है तो अब जो दाता है उसको को दूसरे का मूंल्यांकन करने का अधिकार तुरंत बैठे बिठाये मिल जाता है सो अपने टोटका गुरु इसी चलताऊ नुस्खे का इस्तेमाल करते हुये सामाजिक क्षेत्र में उतरने के पहले ही दिन से दूसरों का ही मूल्यांकन करते आ रहे हैं कि कौन बेईमान है, कौन ईमानदार है, कौन काम करता है या कौन काम नहीं करता है।  अब चूंकि टोटका गुरु पैसा फंड करते हैं तो अब कौन माई का लाल था जो कि टोटका गुरु से पूछे कि टोटका गुरु खुद कौन सा काम करते हैं।   चूंकि टोटका गुरु फंड भी देते हैं इसलिये भारत की बेरोजगारी में 10-50 लोगों की भीड़ फंड की चूसनी दिखा कर जमा करना कौन सी बड़ी बात इसलिये  इन्होने एक नया नुस्खा निकाला कि जब मन आ जाये धरना करो, उपवास करो और यह सब करने में किराये की भीड़ तो उन लोगों से ही आ जायेगी जिनको कि ये फंड देते हैं या फंड की चूसनी दिखाते हैं।  अब यदि साल में 10-20 बार सिर्फ 10-20 आदमी की भीड़ जमा करने से हर एक को लाखों रुपये का फंड हर साल मिल जाये तो फिर किसको दिक्कत है कहीं भी भीड़ ले कर पहुंच जाने में फिर किराया भाड़ा कौन सा अपनी जेब से लगना है।  किराया-भाड़ा तथा और खर्चे के मामलों के लिये टोटका गुरु के अलग विशेष नुस्खे हैं जिनकों कि आप सरल भाषा में अकाऊंट ऐडजेस्टमेंट के रुप में जान सकते हैं।

    यहां थोड़ा सा हिंट लीजिये कि क्यूं टोटका गुरु नें अपनी संस्था को चलाने वाले लोग सिर्फ और सिर्फ अपने ही देखे भाले अपनी ही जाति के अपने ही रिश्तेदार लोग बना रखे हैं।   यह भी एक लाजवाब नुस्खा है कि मसीहा बनो दलितों के, अवार्ड चापो दलितों के लिये काम को दिखा कर,  लाखों करोंड़ों का फंड चापो दलितों के नाम पर किंतु पैसे का सारा मामला रखो अपनी ही खास जाति के अपने ही रिश्तेदार लोगों के हाथों।    कोई इस बात को मुद्दा नही बनाये इसलिये दिखावटी लोकतंत्र का ढकोसला भी संस्था के अंदर करते रहना भी एक लाजवाब टोटका है।   तो यही सब दिखा दिखा के और मीडिया मैनेज करके, टोटका गुरु ने खुद को बिना जमीन में कुछ किये ही खुद को दुनिया भर में बड़का जमीनी नेता सिद्ध करवा दिया।    इनकी खुद की ईमानदारी पर कभी कोई प्रश्न उठाने की हिम्मत ना कर सके इसलिये समय समय पर दूसरों को बेईमान कहना तथा अपनी जेब में पड़े सबूतों को भी निकाल निकाल के दिखाते रहना भी इनके नुस्खे हैं।

    टोटका गुरू तो जानते ही नही थे कि मैगसेसे के बाद भारत में किसी को कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती इसलिये इनको भी खुद धरने प्रदर्शन करने की जरुरत नही है इसलिये मैगसेसे मिलने के बाद भी कुछ समय तक तो खुद ही धरना प्रदर्शन किया करते रहे।  फिर धीरे धीरे जब समझ में आया कि धरना करने की खुद कोई जरूरत नहीं है, क्योकि धरना प्रदर्शन का टोटका तो टोटकागुरु मीडिया का ध्यानाकर्षण करने के लिये करते थे और अब तो मीडिया खुद ही खोजते हुये आता है क्योकि टोटका गुरु की जेब में मैगसेसे जो पड़ा है।   मीडिया में इनका  भोकाल बना रहे इसलिये हर साल किसी ना किसी बहाने से अमेरिका घूम आते हैं इनके घूमने का खर्चा भी अपने प्रबुद्ध अप्रवासी भारतीय लोग उठाते हैं और खुद को गौरवांवित भी महसूसते हैं।    है ना अपने लाजवाब टोटका गुरु का लाजवाब टोटका।

    बढ़ती उम्र के साथ साथ टोटका गुरु ब्रह्मज्ञानी भी होते जा रहे हैं, अब टोटका गुरु भारत की छोड़िये दुनिया की कोई भी बड़ी समस्या हो उसके लिये दो चार ठो प्रेस कान्फेरेन्स करके समाधान का कोई नुस्खा दे देते हैं और प्रेस वार्ता करते ही समाधान हो जाता हैं।  यदि एक बार में समाधान नही मिलता तो कुछ महीने बाद फिर दो चार ठो प्रेस कान्फेरेन्स कर देते हैं।  अब चूंकि ये हैं एक फंडिग एजेन्सी के जन्मदाता तो बहुत बेरोजगार लोग इनको मक्खन लगाते रहते हैं जिसने बड़िया प्रेस कान्फरेन्स कर दी या इनके लिये 100-50 की भीड़ जमा दी  तो  उसके लिये अमेरिका दो चार ठो ई-मेल मार कर पहले तो बड़का क्रान्तिकारी बताते हैं फिर कुछ तन्ख्वाह मंगा लेते हैं।  अलग अलग कामों के लिये इनके पास अलग अलग किस्म के चेले हैं, जिसके उपर गुस्सा हो गये उसको बेईमान बता दिया या यह बता दिया कि फलाने अब कुछ कम कमिटेड हैं, तो तुरंत तन्ख्वाह बंद।

    टोटका गुरु बिचारे समाज के लिये इतने अधिक कमिटेड हैं कि इनको कही भी कोई समस्या सुनने को मिल जाये जिसमें कि दो चार ठो प्रेस कान्फेरेन्स का जुगाड़ का टोटका बनता हो तुरंत पहूंच जाते हैं।   टोटका गुरु नार्थ ईस्ट की समस्या का समाधान करने के लिये वहां दो चार प्रेस कान्फेरेन्स कर चुके हैं हो सकता हो कि दो चार NGO को फंड भी दे रहे हों ताकि प्रेस कान्फेरेऩस करते रहने का स्थायी जुगाड़ बन जाये।   बिहार में 2008 में बहुत भीषढ़ बाढ़ आयी थी, टोटका गुरु लगभग 3 महीने बाद बाढ़ देखने गये थे और कुछ घंटे रुके थे और अपने वेतनभोगी लोगों से कुछ गपशप और हसीठठ्ठा टाईप की बातचीतें किये थे और फिर अपने घर लौट गये थे, घर लौटते ही बहुत लंबी रिपोर्ट लिखी थी और एक सच्ची रिपोर्ट कहते हुये अमेरिका के अप्रवासी भारतीयों को भेजी थी।   तो टोटका गुरु इतने बड़े वाले ब्रह्मज्ञानी होते जा रहे हैं कि कुछ घंटे में गपशप मारकर ही सारी बातें समझ जाते हैं और समाधान भी पेश कर देते हैं, जबकि इन्हीं बातों कों समझने के लिये हमारे आप जैसे लोगों को महीनों खपाने पड़ते हैं और बहुत सारी दिक्कतें झेलते हुये बहुत जगह जाना पड़ता है और बहुत लोगों से मिलना जुलना पड़ता है।  टोटका गुरु के किसम का मतलब बड़का किसम का ब्रह्मज्ञानी होने का यह भी एक काम्पैक्ट किसम का फायदा है।

    बहुत सालों से टोटका गुरु केवल मीटिंग करते रहते हैं या मीटिंग में भाग लेते हैं, इनकी मीटिग को मीटिग भी ना कहा जाये बल्कि प्रेस कान्फेरेन्स करने के लिये मीटिंग कहा जाये तो नुस्खा बेहतर तरीके से समझ में आयेगा।    भारत में ही नही अमेरिका वगैरह देशों में भी मीटिंग कर आते हैं।  मीटिगों में इतना व्यस्त की महीना में कई कई बार तो हवाई यात्रायें करनी पड़ती हैं।   ना ना ये कोई बिजनेसपरसन नही हैं यह  तो खुद को बहुत बड़का वाला जमीनी कार्यकर्ता कहते हैं केवल कहते ही नहीं हैं इनके पास देश विदेश के बहुत सारे प्रूफ भी हैं जो इनको जमीनी सामाजिक कार्यकर्ता सिद्ध करते हैं।

    नोबल अवार्ड पाने की जुगत में लगे टोटका गुरु ने एक नया नुस्का निकाला है, जितने भी मुद्दे भारत में हैं जिसमे प्रेस कान्फेरेन्स का टोटका बनता हो, उन सभी में ये पहुंचने का प्रयास करते हैं, केवल कुछ काम्पैक्ट किसम की बेहद जरूरी चीजें अपनी जेब में डाल लेते हैं, मसलन मैगसेसे, फंड का जुगाड़, अमेरिका के ईमानदार किसम के असली किसम के प्रगतिशील भारतीय पत्रकारों का जुगाड़ और पहुच जाते हैं, अब चूकि बहुत सारे समाधान करने होते है तो तुरंत एक प्रेस कान्फेरेन्स करते हैं और समाधान करके अगले ही दिन या उसी दिन किसी और मुद्दे में किसी दूसरी प्रेस कान्फेरेन्स में समाधान देने के लिये निकल जाते हैं।   हमको तो पूरा उम्मीद है कि इनके लिये एक विशेष नोबल निकाला जायेगा जिसका नाम होगा  “प्रेस कान्फेरेन्स करके समाधान करने की विशिष्ट तकनीक”  क्षेत्र का नोबल।

    टोटका गुरु तो बीसियों सालों से दलितों के बहुत बड़े मसीहा के रूप में खुद को एक से बड़कर एक नुस्खों के दम पर प्रायोजित किये हुयें हैं,। जब कहीं कोई मुद्दा नहीं मिलता है प्रेस कान्फेरेन्स करने को तो अपनी जेब में इसी प्रकार की जरूरी ईमरजेन्सी में प्रयोग करने के लिये पड़े दलितों से जुड़े किसी मुद्दे में दो चार ठो लेख लिख मारते हैं और लेख लिखते समय मैगसेसे भी जेब से झलका देते हैं।   यह भी सब खुद को दलित मसीहा साबित करने का टोटका हैं, जो कि टोटका गुरु जमाने से सफलतापूर्वक आजमाते आ रहे हैं।

    टोटका गुरु का कहना है कि यदि आप कुछ ऐसा नुस्खा आजमायें कि लोगों को लगे कि आप बहुत कुछ बड़ा छोड़ रहे हैं जबकि वास्तव में आप कुछ भी ना छोड़ रहे हों,  तो टोटकों का असर जल्दी होता है।  अपने टोटका गुरु इस कला के बहुत बड़े खिलाड़ी हैं।   टोटका गुरु का कहना है कि लोग आपको महापुरुष मानते रहें और कभी आपके द्वारा खेले जा रहे खेलों की ओर ध्यान ना ले जा पावें, इसलिये समय समय पर कुछ ऐसा दिखाते रहना बहुत जरूरी है कि आप कुछ बहुत बड़ा त्याग कर रहे हैं जबकि वास्तव में आप कुछ भी ना छोड़ रहे हों।

    लोग कहते हैं कि सोनिया गांधी जी ने कोई पद ना लिये हुये भी सत्ता का मुख्य केंद्र बने रहने का नया नुस्खा ईजाद किया है।  यह सरासर अपने टोटका गुरु का भीषण अपमान है, सुनते हैं कि टोटका गुरु इस मुद्दे पर कापी राईट का कोई बड़ा बवाल मचाने वाले हैं जिसमें कि उनको पूरा भरोसा है कि जैसे उनकी हर बात को ब्रह्मा जी की बात मानकर उनके अप्रवासी मित्र लोग ढोल मजीरा बजाते रहते हैं और नोबल दिलवानें के जुगाड़ में कई सालों से रात दिन लगे हुये हैं, वे लोग इस मुद्दे को भी एचीवमेंट के रूप में नोबल के जुगाड़ में जरूर पेश करेंगें।   टोटका गुरु ने अपने खास अमरीकी साथियों से कह रखा है कि वे लोग जब भी टोटका गुरु के बारें में कोई बात करें तो ऐसे करें जिससे लोगों को यह लगे कि ये लोग टोटका गुरु से कोई खास जुड़ाव नहीं रखते हैं।     सच तो यह है कि  सोनिया जी ने कुछ बेहतरीन नुस्खे अपने टोटका गुरु से ही सीखे है।   टोटका गुरु ने अपनी संस्था कागजी लिखापढ़ी में छोड़ी हो लेकिन ये तो टोटका गुरु के ही टोटकों का जुगाड़ तंत्र है कि संस्था के अंदर एक पत्ता भी टोटका गुरु की मर्जी के बिना नहीं हिलता।  सोनिया जी का नुस्खा तो फेल हो सकता है क्योकि उन्होनें तो किसी गैर पर विश्वास किया है।

    टोटका गुरु ने भले ही अपनी संस्था दलितों के विकास के लिये बनाई हो किंतु संस्था को चलाने के लिये टोटका गुरु ने केवल और केवल अपनी खास जाति और अपने ही रिश्तेदारों पर ही भरोसा किया हैं, अब जहां लाखों करोड़ों रुपये का मामला हो, सामाजिक सत्ता के ग्लैमर को भोगने का मामला हो तो किसी दलित पर कैसे विश्वास किया जाता है, इस प्रकार के अभिजात्यीय विश्वास तो सिर्फ और सिर्फ अपनी ब्राह्मण जाति और अपने रिश्तेदारों मे ही किया जाना चाहिये ऐसा अपने टोटका गुरु का मानना है, और यह टोटका उन्होनें बीसियों सालों से लागू कर रखा है, भले ही उन्होने दलित उत्थान के नाम पर मैगसेसे अवार्ड किसी जुगाड़ से हड़प लिया हो किंतु उनकी अपनी संस्था में कोई दलित उत्थान टोटका गुरु ने नहीं होने दिया है, क्योकि यदि संस्था में दलित उत्थान हो गया तो उनका अपना उत्थान रुक जायेगा।

    टोटका गुरु लगातार इन्ही नुस्खों से खुद को भारतीय समाज में स्थापित किये हुये हैं और सामाजिक क्षेत्र के ग्लैमर का आनंद लिये जा रहे हैं।  किसी की हिम्मत नहीं कि उनको छेड़े या उनसे कुछ पूंछे, क्योंकि उनके पास हर बात के लिये एक टोटका है  और प्रेस कान्फेरेन्स का करने के बहाने खोजने के जुगाड़ हैं।   वह एक निहायत चतुर खिलाड़ी हैं।    ये तो सिर्फ एक टोटका गुरु की पूरी कहानी के कुछ हिस्से मात्र हैं।  इन्ही एक टोटका गुरु की बहुत लंबी कहानी है और  भारत में इन जैसे बहुत टोटका गुरु मौजूद हैं।


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  • गाँधी होना कितना अासान ?

    सामाजिक यायावर

    यह लेख उन लोगों के लिये बहुत ही लाभदायक है जो कि गाँधी होना चाहते है, सिर्फ चाहते ही नही हैं, गाँधी होने का प्रमाणपत्र भी चाहते हैं अौर प्रमाणपत्र से प्राप्त होने वाली विभिन्न सुविधाअों का, वाहवाही का भोग भी करना चाहते हैं।  चौंकिये मत ऐसे बहुत दुकानदार हैं भारत में जो गाँधी होने का प्रमाणपत्र देते हैं अौर उनके प्रमाणपत्रों के अाधार पर ही भारत का मीडिया, विदेशी मीडिया अौर अप्रवासी भारतीय लोगों के महान होने, सामाजिक प्रतिबद्ध होने या ना होने का मूल्यांकन करते हैं।  चूँकि ये दुकानदार लोग पूरी तरह व्यवसायिक हैं अंग्रेजी में इन्हे प्रोफेशनल कहा जा सकता है।  जैसे कि भारत मे हर गली कूचे में खुलने वाले इंजीनियरिंग कॅालेज के मालिक लोग इन कॅालेजों मे पढ़ने वाले छात्रों मे से कुछ की नौकारियों का जुगाड़ करते हैं ताकि इन कॅालेजों मे अाने वाले छात्रों में इन कॅालेजों के प्रति अास्था बनी रहे उसी तरह गाँधी होने का प्रमाणपत्र देने वाले प्रोफेशनल्स अपने कस्टमर लोगों के लिये मीडिया कवरेज, प्रायोजित अान्दोलनों, विदेशों से अाने वाला फंड तथा विभिन्न प्रकार के पुरस्कारों का भी पूरा इन्तजाम करते हैं।

    जैसे कि व्यवसायिक कॅालेजों के छात्रों के कोइ रिश्तेदार यदि किसी बड़ी कंपनी में अच्छी पोस्ट मे हुये तो भले ही कैसी भी योग्यता हो केवल डिग्री होने के अाधार पर अच्छी कंपनी में अच्छी नौकरी लग जाती है, जुगाड़ मे अासानी होती है।  बिलकुल इसी तरह यदि अापके या अापकी पत्नी के रिश्तेदारों में किसी ने कभी किसी ऐसी संस्था में काम करने के बदले वेतन पाया हो जो कि गांधी के नाम पर चलती हो या गांधीवादी होने का प्रमाणपत्र रखती हो तो अापको गांधी होने का या गांधीवादी होने का प्रमाणपत्र मिलने अौर बेहतर सुविधायें प्राप्त करने मे अासानी होती है, यदि अाप भाग्य से ब्राम्हण जाति के हों तो समझिये कि अापकी दशों उंगलियां घी में अौर सिर कढ़ाहे में अाप खुद ही एक दुकानदार बन जाइये।  दुकानदार बनने के लिये बड़े अौर स्थापित दुकानदारों से संबद्धता लेनी होती है जो कि उन लोगों के प्रायोजित अान्दोलनों मे भाग लेने से या उनके लिये कुछ कस्टमरों का इन्तजाम कर देने से अासानी से मिल जाती है।  यदि अाप ब्राम्हण हैं अापके या अापकी पत्नी के कोई ऐसे रिश्तेदार हैं भी हैं जिन्होने कभी कुछ क्षणों के लिये गांधी जी के किसी अाश्रम मे जाकर कुछ देर बैठ लिया हो या कुछ चने चबा लिये हों या पानी पी लिया हो या दूर से ही गांधी जी की अावाज सुनने को पा लिये हों तब तो अापने अभी तक अपनी क्षमता पहचानी ही नही है अाप को तो गांधीवादियों का नेतृत्व संभालना चाहिये क्योकि जो योग्यतायें खुद गांधी जी को अपनी खुद की नैसर्गिक संतानों मे नही दिखी थीं वह योग्यतायें अापमें हैं अापको जरुरत है तो बस एक स्थापित दुकानदार से गांधी या गांधीवादी होने के प्रमाणपत्र की।

    अब चूंकि दुनिया में बहुत बदलाव हो रहे है दुनिया के बाजार विकास के नाम पर अार्थिक विकास के नाम पर, अार्थिक स्वातंत्र्य के नाम पर संभ्रान्त वर्ग की विलासिता वाली चीजों को अाम लोगों की पहुच तक ला रहें हैं तो गांधीवाद के क्षेत्र में भी कुछ प्रगतिशील दुकानदार गांधी-बाजार का वैश्वीकरण करने के लिये अागे अा रहें हैं, इनमे से अधिकतर लोग हैं तो ब्राम्हण जाति के लोग किन्तु अमेरिका में बहुत सालों तक रहकर प्रगतिशीलता को जाने समझे, लोकतंत्र को समझे, जनान्दोलनों का असली मर्म समझे, अमेरिका में बैठ के वहाँ की अति उन्नत तकनीक की बनी अाम समाज को जानने समझने वाली विशेष किस्म की दूरबीनों से भारत के असली समाज को जाने अौर समझे हैं।  तो ऐसे लोगों ने पहले तो खुद तो पुराने दुकानदारों से खुद के गांधी होने के प्रमाण लिये फिर थोड़ा जुगाड़ तगाड़ कर के अपनी खुद की दुकानें जमा ली, ये नये प्रगतिशील किस्म के दुकानदार पुराने दुकानदारों से बेहतर हैं क्योकि ये लोग जाति के अाधार पर प्रमाणपत्र नहीं देते बल्कि प्रायोजित अान्दलोनों की जरुरतों के अाधार पर, या फंड के जुगाड़ के अाधार पर या मीडिया में सुर्खियां लाने मे कौन कितना सहयोगी हो सकता है इन सब की गणित के अाधार पर देतें हैं।  कुछ न्यूनतम अहर्तायें अति अावश्यक है वे यह हैं कि अापके पास धन की, संसाधनों की कमी नही होनी चाहिये यदि अाप करोड़ों का फंड लाते रहे हों तो अापकी योग्यता अौर भी बढ़ जाती है अौर अापके अन्दर सामाजिक प्रतिबद्धता, अन्दर की असली वाली ईमानदारी नही होनी चाहिये।  यही योग्यतायें अागे चल कर अापको कोई विदेशी पुरस्कार भी दिलवा सकतीं हैं जिनकी बड़ी मांग रहती है भारत में अौर भारतीय मीडिया इन पुरस्कारों में खूब हवा भी भरे रहता है।

    जैसे कि कॅालेजों में लोग लाईन लगा के डिग्री लेने जाते हैं, कुछ सुनिश्चित किताबें होती हैं उनको रटते रहिये अौर डिग्रियां लेते जाईये अौर योग्य बनते जाईये।  जैसे कि अाजकल चल रही विभिन्न प्रकार की अाध्यात्मिक किस्म वाली दुकानों मे जाईये कुछ दिनों वाले शिविर कीजिये तो अाप समझदार हो जायेगें यदि अाध्यात्मिक शिक्षक होना चाहते हैं तो लगातार इन शिविरों को करते जाईये अौर शब्दों को रट कर वैसे ही दोहराते जाने की कला सीख लीजिये, लीजिये अब अाप अाम बेवकू्फ किस्म के नही रहे अाप समझदार हो चुकें हैं अौर अाध्यात्मिक शिक्षक होने का चोला पहन लीजिये, अापको बने बनाये चेले मिल जायेंगें अौर 5 हजार से 15-20 हजार रुपये हर महीने उपर से तन्खवाह ऊपर से मिलेगी (अाजकल के यही रेट चल रहे हैं, वेतनमान का कम या अधिक होना अापकी विदेशी भाषाअों मे पकड़ तथा कम्प्यूटर के ज्ञान पर निर्भर करता है)।  बिलकुल इसी प्रकार से अाप कुर्ता पायजामा पहन लीजिये, लुंगी पहनें तो अौर बढ़िया, गांधी जी टाईप धोती पहन लें तो सबसे बढ़िया, कुछ सुनिश्चित किस्म की शब्दावली का प्रयोग सदैव करते रहें जिसमे कि ग्राम स्वराज, स्वावलंबन, अहिंसा, लोकतंत्र इत्यादि किस्म की शब्दावली अौर इस लेख में बताये गये किस्म के लोगों से प्रमाणपत्र जरूर ले लें नही तो सारा किया धरा बेकार।

    क्या कहा अापने कि अापकी पहुंच नही इन बड़े लोगों तक, अापके पास संसाधन नहीं; अाप चिन्ता ना करें अाप इनकी पत्नियों अौर बच्चों के पास जाकर कुछ दिन रहें अौर घरेलू कामकाज करें, बच्चों को नहलायें धुलायें, परिवार के कपड़े धोयें, घर की साफ सफाई करें अौर इन लोगों के घरों मे रहते हुये भी अपने लिये खाना या तो खुद बनायें या खुद इन्तजाम करें। क्या कहा यह भी अापके बस का नहीं तो फिर इन लोगों के दृश्य/अदृश्य प्रबंधकों के पास जायें, अौर उन लोगों को मक्खन लगायें या सेटिंग बैठायें; नहीं समझे अाप, प्रबंधक का मायने वे लोग जो धन का सारा अावागमन देखतें हैं लेखा जोखा दुरुस्त रखते हैं, यदि अापने अपनी चतुराई से इन लोगों का भी मन मोह लिया तो कम से कम छोटा टाईप के गांधी अाप हो ही जायेंगें। अाप क्या इतनी बड़ी दुकानों को चलाने वालों को हलके मे लेते हैं, पहले ही बताया गया कि कहीं चूक नहीं पूरे के पूरे प्रोफेशनलन हैं ये लोग, छोटे मोटे लोगों को तो ये लोग फूंक मार कर उड़ा देते हैं अौर उड़ने वाले को पता भी नहीं चलता, अाप चिन्ता ना करें इन लोगों के पास वेतनभोगी लोगों की पूरी फौज है जो इन लोगों के एक ईशारे मे दुनिया के किसी भी कोने मे धरना प्रदर्शन व मीडिया बाजी के लिये पूरी तैयार रहती है, जरूरत पड़ने पर अमरीका वगैराह देशों से पत्रकार लोग भी अा जाते हैं जो कि इन लोगों के ही द्वारा स्थापित लोग हैं इसलिये वे लोग गम्भीर सामाजिक मुद्दों मे कभी नही अाते किन्तु इन लोगो के छोटे से छोटे से मुद्दों को भी अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बताने के लिये दौड़े चले अाते हैं।

    इसलिये अाप बिलकुल भी चिन्ता ना करें ये दुकानदार देखे भाले हैं, साख वाले हैं अौर हल्ला मचाना भी जानते हैं, अौर पूरे साल नये नये प्रायोजित अान्दोलनों की संभावनायें खोजने मे लगे रहते हैं, यदि संभावनायें नही मिल पाती तो जोर जबरदस्ती से भी अान्दोलनों को प्रायोजित करना जानते हैं।  इनको लाखों करोड़ो सिर्फ इन्ही बातों के लिये अाते हैं कि ये लोग अौर अधिक बलात्कार कर सकें अाम समाज की अास्थाअों के साथ उनके विश्वासों के साथ।  इन दुकानदारों का एक बहुत मजबूत तंत्र है जो कि अदृश्य रूप मे बहुत गहरे जुड़ा हुअा है अौर एक दूसरे के वेस्टेड इन्टेरेस्ट्स की केवल चिन्ता करता है।

    क्या बोले अाप, कि इन लोगों के जमीनी भी काम भी हैं क्या?  नही धरती की असलियत मे तो इनके काम जमीन मे नही किन्तु ये लोग जमीनी कामों के प्रमाण खूब रखते हैं।  अापस मे ही प्रमाणों के अादान प्रदान करते हैं।  अाम लोगो के बीच एक भ्रम बनाये रखने के लिये नये नये ढोंग रचते हैं, जरूरत पड़ने पर पुरस्कारों का भी व्यापार कर लेते हैं।  फिर से याद दिलाता हूं कि पूरे प्रोफेशनल हैं, अापको इनके तंत्रों मेम चूकें बहुत कम मिलेगीं तभी तो अाम समाज की हालत बद से बदतर होती जा रही है। अाम समाज की हालत तो यह है कि विश्वास करे तो किस पर।  बेचारा भारतीय अाम समाज।

    यदि ये हल्ला मचाने वाले समाज के ठेकेदार लोग सच मे ही समाज के प्रति ईमानदार होते, सच मे ही जमीन मे काम करने वाले लोग होते तो क्या गाँधी जैसे महापुरुष के नाम के साथ बलात्कार इतनी अासानी से करते जाते, जो खुद गांधी के व्यक्तित्व की गहराई की प्रारम्भिक वर्णमाला नही जानते वे लोग दूसरों को गांधी होने या ना होने का प्रमाणपत्र बांटते हैं।  यदि इतनी ही शर्म होती इन दुकानदारों मे तो अाज भारत के असली समाज की स्थिति ही कुछ अौर होती।

    सोचा कि हमको तो बाजारों की भाषायें अाती नहीं, तो क्यों ना दुकानदारों मे ही कुछ लिख मारा जाये, कम से कम अपनी खुद की अक्षमता की भड़ास निकल जायेगी।