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  • बायो गैस संयंत्र ने बदली ज़िन्दगी — Firdaus Khan

    बायो गैस संयंत्र ने बदली ज़िन्दगी — Firdaus Khan

    बायो गैस ने लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बना दिया है. देश के अनेक गांवों में अब महिलाएं लकड़ी के चूल्हे पर खाना नहीं पकातीं, क्योंकि उनकी रसोई में अब बायो गैस पहुंच चुकी है. मध्य प्रदेश को ही लें. यहां के शहडोल ज़िले के कई गांवों में अब चूल्हे बायो गैस से ही जल रहे हैं. जंगल को बचाने के लिए सरकार ने आदिवासी बहुल इस ज़िले के गांवों में जागरुकता मुहिम शुरू की. नतीजतन, गांव महरोई समेत कई गांवों में बायो गैस संयंत्र लगाए गए और फिर बायो गैस चूल्हे जलने लगे. अब आदिवासी महिलाओं को ईंधन की लड़की लेने के लिए जंगल में नहीं जाना पड़ता, जिससे वे काफ़ी ख़ुश हैं.

    उत्तर प्रदेश के लखनऊ ज़िले के गांव बिजनौर के जय सिंह को बायो गैस संयंत्र से दिन-रात बिजली मिल रही है, जिससे वह अपनी डेयरी की सभी मशीनें चलाते हैं. उनका कहना है कि उनका 140 घन मीटर का गैस संयंत्र है, जिसे लगवाने में तक़रीबन 22 लाख रुपये ख़र्च हुए. उनके पास 150 पशु हैं, जिनसे रोज़ लगभग एक हज़ार लीटर दूध मिलता है. साथ ही रोज़ लगभग 1500 किलो गोबर मिलता है. इस गोबर को वह बिजली बनाने में इस्तेमाल करते हैं. बायो गैस संयंत्र से मिली गैस से 30 किलोवॉट का जेनरेटर चलाकर 24 घंटे बिजली पैदा करते हैं. अपने संयंत्र से बनाई गई बिजली से ही वह पशुओं का दूध दुहने वाली स्वचालित मिल्किंग मशीन, पशुओं के चारा काटने की मशीन और दूध की पैकिंग करने की मशीन को संचालित करते हैं. इसी बिजली से उन्होंने गेहूं पीसने की बड़ी मशीन भी लगा रखी है, जिसमें पूरे गांव का गेहूं पीसा जाता है. इसके अलावा उन्हें खाद भी मिल रही है. इसमें कोई दो राय नहीं कि बायो गैस संयंत्र किसानों और ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हो रहे हैं. इनसे जहां रसोईघरों को ईंधन मिल रहा है, बिजली के रूप में रौशनी मिल रही है, वहीं खेतों को खाद भी मिल रही है. आज देशभर में छोटे स्तर पर तक़रीबन 33 लाख बायो गैस संयंत्र काम कर रहे हैं.

    राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले के की सीमलवाड़ा भेमईगांव में महिलाएं बायो गैस के चूल्हे पर ही खाना बनाती हैं. गांव के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन है. इसीलिए हर घर में पशु हैं. पहले महिलाएं गोबर के उपले बनाकर चूल्हे में जलाती थीं. जहां उपले बनाने में उन्हें काफ़ी मेहनत करनी पड़ती थी, वहीं इन्हें चूल्हें में जलाने पर धुआं भी होता था. नब्बे की दहाई में गांव में बायो गैस क्रांति आई. ज़िला परिषद के ज़रिये गांव में बायो गैस संयंत्र लगाए गए. ग्रामीणों का कहना है कि लकड़ी और एलपीजी के मुक़ाबले बायो गैस बेहद सस्ती है. इससे उन्हें अच्छी खाद भी मिल रही है. मध्‍यप्रदेश के खंडवा ज़िले के ग्राम बड़गांव पिपलौद ऐड़ा का युवक शुभम बायो गैस से आटा चक्की चला रहा है.

    कुछ महीने पहले दुग्ध संघ ने ग्राम बड़गांव पिपलौद में डेयरी समिति बनाई गई. इसमें 20 सदस्यों को नर्मदा झाबुआ ग्रामीण बैंक के माध्यम से दुग्ध उत्पादन के लिए गाय दी गई हैं. इसी समिति के सदस्य आत्मराम परसराम तिरोले ने भी चार गाय लेकर दूध उत्पादन शुरू किया. इन गायों से रोज़ काफ़ी गोबर जमा हो जाता था. उनके बेटे शुभम ने बायो गैस संयंत्र लगवा लिया, जिससे उन्हें रसोई के लिए बायो गैस मिलने लगी. फिर उसने कबाड़े में से एक डीज़ल इंजन और आटा चक्की ख़रीदी और इन्हें ठीक करा लिया. अब वह बायो गैस से इंजन चला रहा है और इस इंजन से आटा चक्की चल रही है. बायो गैस से ही वह चारा काटने की मशीन भी चला रहा है.

    पिछ्ले जून माह में दिल्ली जल बोर्ड ने कोंडली में सीवरेज शोधन संयंत्र में बायोगैस से बिजली का उत्पादन शुरू कर दिया है. सीवरेज के शोधन से निकलने वाली बायो गैस का इस्तेमाल अब बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा. इससे दिल्ली जल बोर्ड को अपने सालाना 20 करोड़ रुपये के बिजली के बिलों से राहत मिलेगी. बायो गैस से बिजली उत्पादन करने की इस प्रक्रिया को मॉडल के तौर पर शुरू किया गया है. अगर यह प्रयोग कामयाब रहता है, तो आने वाले वक़्त में जल बोर्ड अपने सभी सीवरेज शोधन संयंत्रों में बायो गैस से बिजली उत्पादन का काम शुरू करेगा. यह ईको फ्रेंडली तरीक़ा प्रदूषण के स्तर में भी कमी लाएगा. कोंडली में बायो गैस से 10 हज़ार किलोवाट बिजली पैदा की जा रही है. इससे जल बोर्ड अपनी बिजली की 35 फ़ीसद ज़रूरत पूरी कर पा रहा है.

    ग़ौरतलब है कि देश में बायो गैस संयंत्रों को बढ़ावा देने के लिए साल 1981-82 में राष्ट्रीय बायो गैस परियोजना शुरू की गई. यह अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत विभाग की महत्वपूर्ण परियोजना है. इसका मक़सद ग्रामीण क्षेत्रों में अपारंपरिक ऊर्जा के नये विकल्पों को बढ़ावा देकर पर्यावरण की सुरक्षा करना है. इसके अलावा बायो गैस संयंत्र की स्थापना में सहायता देकर ऊर्जा संरक्षण पर ज़ोर देना, ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को धुएं से होने वाली बीमारियों से बचाना और उच्च कोटि की गोबर खाद के उत्पादन में बढ़ोतरी कर कृषि को बढ़ावा देना भी इसके उद्देश्यों में शामिल है. इसके कार्यक्रम के तहत घरेलू और सामुदायिक दो प्रकार के संयंत्रों की स्थापना की जाती है. यह कार्यक्रम राज्य सरकारों और केन्द्रशासित प्रदेशों के प्रशासनों, राज्यों के निगमित व पंजीकृत निकायों आदि द्वारा चलाया जा रहा है. ग़ैर सरकारी संगठन भी इसके क्रियान्वयन में मदद कर रहे हैं. वाणिज्यिक और सहकारी बैंक बायो गैस संयंत्रों की स्थापना के लिए क़र्ज़ मुहैया करा रहे हैं. जिन ग्रामीणों के पास चार से ज़्यादा बड़े पशु जैसे भैंस, गाय या बैल हों, इस संयंत्र के लिए आवेदन कर सकते हैं. इसके लिए इच्छुक व्यक्ति को बायो गैस संयंत्र लगाने का प्रार्थना पत्र ग्राम पंचायत विकास अधिकारी/ खंड विकास अधिकारी को पूरे विवरण के साथ देना होता है

    बायो गैस पर्यावरण के अनुकूल है और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी है. बायो गैस के इस्तेमाल से लकड़ी की बचत होती है और पेड़ कटने से बच जाते हैं. महिलाओं को चूल्हे के धुएं से निजात मिल जाती है, जिससे उनकी सेहत ठीक रहती है. बायो गैस के उत्पादन के लिए ज़रूरी कच्चे माल यानी गोबर आदि की आपूर्ति गांवों से ही पूरी हो जाती है.

    विशेषज्ञों के मुताबिक़ बायो गैस संयंत्र लगवाते वक़्त सावधानी बरतनी चाहिए. बायो गैस से छोटे से छोटा प्लांट लगाने के लिए कम से कम दो या तीन पशु होने चाहिए. गैस संयंत्र का आकार गोबर की दैनिक मिलने वाली मात्रा को ध्यान में रखकर करना चाहिए. बायो गैस संयंत्र गैस इस्तेमाल करने की जगह के नज़दीक स्थापित करना चाहिए, ताकि गैस अच्छे दबाव पर मिलती रहे. बायो गैस संयंत्र लगवाने के लिए निर्माण सामग्री जैसे सीमेंट और ईंटें बढ़िया क़िस्म की होनी चाहिए. छत से किसी तरह की लीकेज नहीं होनी चाहिए. बायो गैस संयंत्र किसी प्रशिक्षित व्यक्ति की देखरेख में ही बनवाना चाहिए. यह भी ध्यान रहे कि बायो गैस संयंत्र की 15 मीटर की परिधि में कोई पेयजल स्रोत न हो. गैस पाइप और अन्य उपकरणों की समय-समय पर जांच करते रहना चाहिए. गोबर की सूखी परत बनने से रोकने के लिए गोबर डालने और गोबर निकलने का पाइप ढका रहना चाहिए. यह संयंत्र निर्देशानुसार चलाने से वर्षों तक चल सकते हैं, जिससे गैस और खाद दोनों काफ़ी मात्रा में उपलब्ध होते हैं.

    बायो गैस संयंत्र की स्थापना के बाद इसे गोबर और पानी के घोल से भर दिया जाता है. इसके बाद गैस की निकासी का पाइप बंद करके 10-15 दिन छोड़ दिया जाता है. जब गोबर की निकासी वाली जगह से गोबर बाहर आना शुरू हो जाता है, तो हर रोज़ संयंत्र में ताज़ा गोबर सही मात्रा में डाला जाता है. इस तरह बायो गैस और खाद तैयार होती है. बायो गैस संयंत्र में गोबर की क्रिया के बाद 25 फ़ीसद ठोस पदार्थ गैस के रूप में बदल जाता है और 75 फ़ीसद खाद बन जाता है. यह खाद खेती के लिए बहुत उपयोगी है. इसमें नाइट्रोजन डेढ़ से से दो फ़ीसद फ़ास्फ़ोरस एक और पोटाश भी एक फ़ीसद तक होता है. बायो गैस संयंत्रों से मिलने वाली गैसों में 55 से 66 फ़ीसद मीथेन, 35 से 40 फ़ीसद कार्बनडाई ऒक्साइड और अन्य गैसें होती हैं. ये खाद खेतों के लिए बेहद उपयोगी है. इससे उत्पादन में काफ़ी बढ़ोतरी होती है.

    कोड़े-कर्कट से भी बायो गैस बनाई जा सकती है. देशभर की सब्ज़ी मंडियों में हर रोज़ बहुत-सा कूड़ा जमा हो जाता है, जिनमें फल-सब्ज़ियों के पत्ते, डंठल और ख़राब फल- सब्ज़ियां शामिल होती हैं. ज़्यादातर मंडियों में ये कचरा कई-कई दिन तक पड़ा सड़ता रहता है. अगर इनका इस्तेमाल बायो गैस बनाने में किया जाए, तो इससे कई फ़ायदे होंगे. इससे जहां कचरे से निजात मिलेगी, वहीं बायो गैस और खाद भी प्राप्त होगी. पंजाब कांग्रेस कमेटी के सचिव मंजीत सिंह सरोआ ने पंजाब सरकार को सलाह दी है कि वह हर सब्ज़ी मंडी के समीप बायोगैस प्लांट लगाए, जिससे पैदा हुई बायो गैस की सप्लाई मंडी की दुकानों या आसपास के रिहायशी इलाक़ों में की जा सके.

    काबिले-ग़ौर है कि ऊर्जा के पेट्रोलियम, कोयला जैसे पारंपरिक स्रोत सीमित हैं. इसलिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, और जैव-ऊर्जा जैसे ग़ैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. बायो गैस संयंत्र के अनेक फ़ायदे हैं. इसे लगाने से किसानों को ईंधन और खाद दोनों की बचत होती है. बेरोज़गार युवा बायो गैस संयंत्र लगाकर स्वरोज़गार अर्जित कर सकते हैं. इससे डेयरी उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, दूध बढ़ेगा और आमदनी बढ़ेगी. है न बायो गैस संयंत्र फ़ायदे का सौदा.

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    Firdaus Khan

    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’. 

  • अहंकार हार गया और राहुल जीत गए –Firdaus Khan

    अहंकार को एक दिन टूटना ही होता है। अहंकार की नियति ही टूटना है। इतिहास गवाह है कि किसी का भी अहंकार कभी ज़्यादा वक़्त तक नहीं रहा। इस अहंकार की वजह से बड़ी-बड़ी सल्तनतें नेस्तनाबूद हो गईं। किसी हुकूमत को बदलते हुए वक़्त नहीं लगता। बस देर होती है अवाम के जागने की। जिस दिन अवाम बेदार हो जाती है, जाग जाती है, उसी दिन से हुक्मरानों के बुरे दिन शुरू हो जाते हैं, उनका ज़वाल (पतन) शुरू हो जाता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी यही तो हुआ। यहां अहंकार हार गया और विनम्रता जीत गई। चुनाव नतीजों वाले दिन शाम को हुई प्रेस कॊन्फ़्रेंस में राहुल गांधी ने कहा कि हम किसी को देश से मिटाना नहीं चाहते। हम विचारधारा की लड़ाई लड़ेंगे। मैं मोदी जी का धन्यवाद करता हूं, जिनसे मैंने यह सीखा कि एक पॉलिटिशियन होने के नाते मुझे क्या नहीं कहना या करना चाहिए।

    ये राहुल गांधी का धैर्य, विनम्रता और शालीनता ही है कि उन्होंने विपरीत हालात का हिम्मत से मुक़ाबला किया। जब भारतीय जनता पार्टी द्वारा उनके नेतृत्व पर सवाल उठाए गए, चुनावों में नाकामी मिलने पर उनका मज़ाक़ उड़ाया गया, उनके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन राहुल गांधी ने कभी अपनी तहज़ीब नहीं छोड़ी, अपने संस्कार नहीं छोड़े। उन्होंने अपने विरोधियों के लिए भी कभी अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने मिज़ोरम और तेलंगाना में जीतने वाले दलों को मुबारकबाद दी। चुनावों में जीतने वाले सभी उम्मीदवारों को शुभकामनाएं दीं। अहंकार कभी उन पर हावी नहीं हुआ। विधानसभा चुनावों में जीत का श्रेय उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को दिया। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकर्ता बब्बर शेर हैं। राहुल गांधी में हार को क़ुबूल करने की हिम्मत भी है। पिछले चुनावों में नाकामी मिलने पर उन्होंने हार का ज़िम्मा ख़ुद लिया। ये सब बातें ही तो हैं, जो उन्हें महान बनाती हैं और ये साबित करती हैं कि उनमें एक महान नेता के सभी गुण मौजूद हैं।

    अमूमन देखा जाता है कि जब कोई पार्टी सत्ता में आ जाती है, तो उसे घमंड हो जाता है। राजनेता बेलगाम हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि सत्ता उनकी मुट्ठी में है, वे जो चाहें कर सकते हैं। उन्हें टोकने, रोकने वाला कोई नहीं है। साल 2014 के आम चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे। उन्हें ख़ूब सब्ज़ बाग़ दिखाए थे, लेकिन सत्ता में आते ही अपने वादों से उलट काम किया। भारतीय जनता पार्टी ने महंगाई कम करने का वादा किया था, लेकिन उसके शासनकाल में महंगाई आसमान छूने लगी। भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर रोक लगाने का वादा किया था, लेकिन आए-दिन महिला शोषण के दिल दहला देने वाले मामले सामने आने लगे। भारतीय जनता पार्टी ने किसानों को राहत देने का वादा किया था, लेकिन किसानों के ख़ुदकुशी के मामले थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। किसानों को अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने पर मजबूर होना पड़ा। भारतीय जनता पार्टी ने युवाओं को रोज़गार देने का वादा किया था, लेकिन रोज़गार देना तो दूर, नोटबंदी और जीएसटी लागू करके जो उद्योग-धंधे चल रहे थे, उन्हें भी बंद करने का काम किया है। जो लोग काम कर रहे थे, वे भी रोज़ी-रोटी के लिए तरसने लगे। भारतीय जनता पार्टी की सरकार जो भी फ़ैसले ले रही है, उनसे सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों को ही फ़ायदा हो रहा है। ऑक्सफ़ेम सर्वेक्षण के मुताबिक़ पिछले साल यानी 2017 में भारत में सृजित कुल संपदा का 73 फ़ीसद हिस्सा देश की एक फ़ीसद अमीर आबादी के पास है। राहुल गांधी ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल भी किया था। ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राओं और उनकी सरकार पर अमीरों के लिए काम करने और उनके कर्ज़ माफ़ करने को लेकर लगातार हमला करते रहे हैं। इतना ही नहीं भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुए राफ़ेल लड़ाकू विमान सौदे पर भी राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं।

    दरअसल, एक तरफ़ केन्द्र की मोदी सरकार अमीरों को तमाम सुविधाएं दे रही है, उन्हें करों में छूट दे रही है, उनके कर माफ़ कर रही है, उनके क़र्ज़ माफ़ कर रही है। वहीं दूसरी तरफ़ ग़रीब जनता पर आए दिन नये-नये कर लगाए जा रहे हैं, कभी स्वच्छता के नाम पर, तो कभी जीएसटी के नाम पर उनसे वसूली की जा रही है। खाद्यान्नों और रोज़मर्रा में काम आने वाली चीज़ों के दाम भी लगातार बढ़ाए जा रहे हैं। मरीज़ों के लिए इलाज कराना भी मुश्किल हो गया है। दवाओं यहां तक कि जीवन रक्षक दवाओं और ख़ून के दाम भी बहुत ज़्यादा बढ़ा दिए गए हैं। ऐसे में ग़रीब मरीज़ कैसे अपना इलाज कराएंगे, इसकी सरकार को ज़रा भी फ़िक्र नहीं है। सरकार का सारा ध्यान जनता से कर वसूली पर ही लगा हुआ है। वैसे भी प्रधानमंत्री ख़ुद कह चुके हैं कि उनके ख़ून में व्यापार है।

    ऐसे मुश्किल दौर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अवाम के साथ खड़े हैं। वे लगातार बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की दुर्दशा, महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसक वारदातों और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अलख जगाए हुए हैं। अवाम को भी समझ में आ गया है कि उनसे झूठे वादे करके उन्हें ठगा गया। इसलिए अब जनता उन वादों के बारे में सवाल करने लगी है। जनता पूछने लगी कि कहां हैं, वे अच्छे दिन जिसका इंद्रधनुषी सपना भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें दिखाया था। कहां हैं, वह 15 लाख रुपये, जिन्हें उनके खाते में डालने का वादा किया गया था। कहां है वह विदेशी काला धन, जिसके बारे में वादा किया गया था कि उसके भारत में आने के बाद जनता के हालात सुधर जाएंगे।

    अवाम अब जागने लगी है। इसी का नतीजा है कि उसने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी को उखाड़ फेंका और कांग्रेस को हुकूमत सौंप दी। अवाम राहुल गांधी पर यक़ीन करने लगी है। वह समझ चुकी है कि कांग्रेस ही देश की एकता और अखंडता को बनाए रख सकती है। कांग्रेस के राज में ही सब मिलजुल कर चैन-अमन के साथ रह सकते हैं, क्योंकि कांग्रेस विनाश में नहीं, विकास में यक़ीन रखती है। जनता अब बदलाव चाहती है।

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    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’. 

  • देश को मज़बूत विपक्ष चाहिए –Firdaus Khan

    देश को मज़बूत विपक्ष चाहिए –Firdaus Khan

    किसी भी देश के लिए सिर्फ़ सरकार का मज़बूत होना ही काफ़ी नहीं होता।  देश की ख़ुशहाली के लिए, उसकी तरक़्क़ी के लिए एक मज़बूत विपक्ष की भी ज़रूरत होती है। ये विपक्ष ही होता है, जो सरकार को तानाशाह होने से रोकता है, सरकार को जनविरोधी फ़ैसले लेने से रोकता है। सरकार के हर जन विरोधी क़दम का जमकर विरोध करता है। अगर सदन के अंदर उसकी सुनवाई नहीं होती है, तो वह सड़क पर विरोध ज़ाहिर करता है। जब सरकार में शामिल अवाम के नुमाइंदे सत्ता के मद में चूर हो जाते हैं और उन लोगों की अनदेखी करने लगते हैं, जिन्होंने उन्हें सत्ता की कुर्सी पर बिठाया है, तो उस वक़्त ये विपक्ष ही तो होता है, जो अवाम का प्रतिनिधित्व करता है। अवाम की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाता है। आज देश की यही हालत है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार तानाशाही रवैया अख़्तियार किए हुए। सत्ता में आने के बाद जिस तरह से कथित जन विरोधी फ़ैसले लिए गए, उससे अवाम की हालत दिनोदिन बद से बदतर होती जा रही है। यह फ़ैसला नोटबंदी का हो या जीएसटी का, बिजली और रसोई गैस की क़ीमतें बढ़ाने का हो या फिर बात-बात पर कर वसूली का। इस सबने अवाम को महंगाई के बोझ तले इतना दबा दिया है कि अब उसका दम घुटने लगा है। कहीं मिनिमम बैंलेस न होने पर ग्राहकों के खाते से मनमाने पैसे काटे जा रहे हैं, तो कहीं आधार न होने के नाम पर, राशन कार्ड को आधार से न जोड़ने के नाम पर लोगों को राशन से महरूम किया जा रहा है।

    देश की अवाम पिछले काफ़ी वक़्त से बुरे दौर से गुज़र रही है। जनमानस ने जिन लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद में, विधानसभा में भेजा था, वे अब सत्ता के नशे में हैं। उन्हें जनमानस के दुखों से, उनकी तकलीफ़ों से कोई सरोकार नहीं रह गया है। ऐसे में जनता किसके पास जाए, किसे अपने अपने दुख-दर्द बताए। ज़ाहिर है, ऐसे में जनता विपक्ष से ही उम्मीद करेगी। जनता चाहेगी कि विपक्ष उसका नेतृत्व करे। उसे इस मुसीबत से निजात दिलाए। ये विपक्ष का उत्तरदायित्व भी है कि वे जनता की आवाज़ बने, जनता की आवाज़ को मुखर करे।

    संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की प्रमुख व कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी  देश के हालात को बख़ूबी समझ रहे हैं। सोनिया गांधी अवाम को एक मज़बूत विपक्ष देना चाहती हैं, वे देश को एक जन हितैषी सरकार देना चाहती हैं। इसीलिए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू कर दी है। दिल्ली में हुए कांग्रेस के महाधिवेशन में उन्होंने कहा कि पिछले चार साल में कांग्रेस को तबाह करने के लिए अहंकारी और सत्ता के नशे में मदमस्त लोगों ने कोई कसर बाक़ी नहीं रखी। साम-दाम-दंड-भेद का पूरा खेल चल रहा है, लेकिन सत्ता के अहंकार के आगे ना कांग्रेस कभी झुकी है और ना कभी झुकेगी। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के तानाशाही तौर तरीक़ों, संविधान की उपेक्षा, संसद का अनादर, विपक्ष पर फ़ज़्री मुक़दमों और मीडिया पर लगाम लगाने का कांग्रेस विरोध कर रही है।

    राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के उन्नाव और जम्मू कश्मीर के कठुआ में हुई बलात्कार की घटनाओं के विरोध में गुरुवार आधी रात को इंडिया गेट पर कैंडल मार्च निकाला।

    ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सोनिया गांधी ने भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ गठजोड़ बनाने के लिए विपक्षी दलों को रात्रिभोज दिया। सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ पर हुए इस रात्रिभोज में विपक्षी दल के नेता शामिल हुए, जिनमें समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेइटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ़) के नेता बदरुद्दीन अजमल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के शरद पवार और तारिक अनवर, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव और मीसा भारती, जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला, झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन और बाबूलाल मरांडी, राष्ट्रीय जनता दल के अजित सिंह और जयंत सिंह, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मोहम्मद सलीम, द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (डीएमके) के कनिमोई, बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्रा, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सुदीप बंदोपाध्याय, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतनराम मांझी, जनता दल-सेक्युलर (जेडी-एस) के कुपेंद्र रेड्डी, रेवलूशनेरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के रामचंद्रन और केरल कांग्रेस के नेता भी शामिल हुए। कांग्रेस के नेताओं में राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गु़लाम नबी आज़ाद, अहमद पटेल,  एके एंटोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे, रणदीप सुरजेवाला आदि नेताओं ने शिरकत की।

    सोनिया गांधी बख़ूबी समझती हैं कि इस वक़्त कांग्रेस को उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। जब भी पार्टी पर कोई मुसीबत आई है, तो सोनिया गांधी ढाल बनकर खड़ी हो गईं। देश के लिए, देश की जनता के लिए, पार्टी के लिए हमेशा उन्होंने क़ुर्बानियां दी हैं। देश का शासन उनके हाथ में था, प्रधानमंत्री का ओहदा उनके पास था, वे चाहतीं, तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं या अपने बेटे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने डॊ। मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। उनकी अगुवाई में न सिर्फ़ कांग्रेस एक मज़बूत पार्टी बनकर उभरी और सत्ता तक पहुंची, बल्कि भारत विश्व मंच पर एक बड़ी ताक़त बनकर उभरा। 

    राहुल गांधी को कांग्रेस की बागडौर सौंपने के बाद सोनिया गांधी आराम करना चाहती थीं। अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही उन्होंने सियासत से दूरी बना ली थी। राहुल गांधी ही पार्टी के सभी अहम फ़ैसले कर रहे थे। लेकिन पार्टी को मुसीबत में देखकर उन्होंने सियासत में सक्रियता बढ़ा दी है। फ़िलहाल वे विपक्ष को एकजुट करने की क़वायद में जुटी हैं।  वह भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत गठजोड़ बनाना चाहती हैं।  क़ाबिले-ग़ौर है कि जब-जब कांग्रेस पर संकट के बादल मंडराये, तब-तब सोनिया गांधी ने आगे आकर पार्टी को संभाला और उसे मज़बूती दी। उन्होंने कांग्रेस की हुकूमत में वापसी के लिए देशभर में रोड शो किए थे। आख़िरकार उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने साल 2004 और 2009  का आम चुनाव जीतकर केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनाई थी। उस दौरान देश के कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आई। लेकिन जब से अस्वस्थता की वजह से सोनिया गांधी की सियासत में सक्रियता कम हुई है, तब से पार्टी पर संकट के बादल मंडराने लगे। साल 2014 में केंद की सत्ता से बेदख़ल होने के बाद कांग्रेस ने कई राज्यों में भी शासन खो दिया। हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी ने ख़ूब मेहनत भी की, लेकिन उन्हें वह कामयाबी नहीं मिल पाई, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी। 

    अगले साल आम चुनाव होने हैं। उससे पहले इसी साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस के पास बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है। सोनिया गांधी ने रात्रिभोज के बहाने विपक्षी द्लों को एकजुट करने की कोशिश की है। अगर सोनिया गांधी इसमें कामयाब हो जाती हैं, तो इससे जहां देश को एक मज़बूत विपक्ष मिलेगा, वहीं आम चुनाव में पार्टी की राह भी आसान हो सकती है।

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    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’. 

  • आंदोलन और सरकार की नाकामी –Firdaus Khan

    आंदोलन और सरकार की नाकामी –Firdaus Khan

    जनतंत्र में, लोकतंत्र में जनता को ये अधिकार होता है कि वे अपनी मांगों के समर्थन में, अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन कर सकती है,  सरकार की ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकती है। लेकिन आंदोलन के दौरान, प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने की इजाज़त किसी को भी नहीं दी जा सकती। सरकार को भी ये अधिकार नहीं है कि वे शांति से किए जा रहे आंदोलन को कुचलने के लिए किसी भी तरह के बल का इस्तेमाल करे। बल्कि सरकार की ये ज़िम्मेदारी होती है कि वह आंदोलन कर रहे प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा मुहैया कराए। इस बात का ख़्याल रखे कि कहीं इस आंदोलन की आड़ में असामाजिक तत्व कोई हंगामा खड़ा न कर दें। अगर आंदोलन में किसी भी तरह की हिंसा होती है, तो उस पर क़ाबू पाना, उसे रोकना भी सरकार की ही ज़िम्मेदारी है। लेकिन केंद्र की बहुमत वाली भारतीय जनता पार्टी की मज़बूत सरकार इस मामले में बेहद कमज़ोर साबित हो रही है।

    हाल में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को लेकर पहले दलितों ने भारत बंद किया था। उसके बाद सर्वणों ने आरक्षण के ख़िलाफ़ जवाबी आंदोलन शुरू कर दिया। ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग पर चिंता ज़ाहिर करते हुए गिरफ़्तारी और आपराधिक मामला दर्ज किए जाने पर रोक लगा दी थी। क़ाबिले-ग़ौर है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को ख़त्म करने और उन्हें इंसाफ़ दिलाने के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम लाया गया था। संसद द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम को 11 सितम्बर, 1989 को पारित किया था। इसे 30 जनवरी, 1990 से जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूरे में लागू किया गया। यह अधिनियम उस हर व्यक्ति पर लागू होता हैं, जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं और वह इस तबक़े के सदस्यों का उत्पीड़न करता हैं। इस अधिनियम में पांच अध्याय और 23 धाराएं शामिल हैं।  इस क़ानून के तहत किए गए अपराध ग़ैर- ज़मानती, संज्ञेय और अशमनीय हैं। यह क़ानून अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों पर अत्याचार करने वालों को सज़ा देता है। यह पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार देता है और मामलों के जल्द निपटारे के लिए अदालतों को स्थापित करता है। इस क़ानून के तहत भारतीय दंड संहिता में शामिल क़ानूनों में ज़्यादा सज़ा दिए जाने का प्रावधान है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर होने वाले अमानवीय और अपमानजनक बर्ताव को अपराध माना गया है।  इनमें उन्हें जबरन अखाद्य पदार्थ मल, मूत्र इत्यादि खिलाने, उनका सामाजिक बहिष्कार करने जैसे कृत्य अपराध की श्रेणी में शामिल किए गए हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्य से कारोबार करने से इनकार करता है, तो इसे आर्थिक बहिष्कार माना जाएगा।  इसमें किसी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्य के साथ काम करने या उसे काम पर रखने/नौकरी देने से इनकार करना, इस तबक़े के लोगों को सेवा प्रदान न करना या उन्हें सेवा प्रदान नहीं करने देना आदि इसमें शामिल हैं।

    लेकिन सर्वोच्च न्यालाय के फ़ैसले से दलितों पर अत्याचार करने वाले लोगों की गिरफ़्तारी बेहद मुश्किल हो जाएगी, क्योंकि सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की गिरफ़्तारी के लिए उसके नियोक्ता की मज़ूरी लेना ज़रूरी है। अगर दोषी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी नहीं है,  तो एसएसपी स्तर के पुलिस अधिकारी की सहमति के बाद ही उसकी गिरफ़्तारी हो सकेगी। इतना ही नहीं, अदालत ने अग्रिम ज़मानत का भी प्रावधान कर दिया है और एफ़आईआर दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच को भी ज़रूरी कर दिया है। यानी दलितों पर अत्याचार के मामले में आरोपी की गिरफ़्तारी और उन पर कोई मामला दर्ज करना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा। ऐसी हालत में दलितों पर अत्याचार के मामलों में इज़ाफ़ा होगा, इसमें कोई दो राय नहीं है। सख़्त क़ानून होने के बावजूद आए दिन देश के किसी न किसी हिस्से से दलितों के साथ अमानवीय बर्ताव करने के मामले सामने आते रहते हैं। अब जब क़ानून ही कमज़ोर हो जाएगा, तो हालात बद से बदतर होने में देर नहीं लगेगी।  

    ये भी बेहद अफ़सोस की बात है कि आंदोलन न सिर्फ़ उग्र रूप धारण कर रहे हैं, बल्कि अमानवीयता की भी सारी हदें पार कर रहे हैं। बंद के दौरान कई जगह हिंसा की वारदातें हुईं। आगज़नी हुई, दुकानें जलाई गईं, वाहन फूंके गए, फ़ायरिंग हुई। लोग ज़ख़्मी हुए, कई लोगों की जानें चली गईं।  मरने वालों में पुलिस वाले भी शामिल थे, जो अपनी ड्यूटी कर रहे थे। जगह-जगह रेलें रोकी गईं, पटरियां उखाड़ दी गईं।  चक्का जाम किया गया। रास्ते बंद कर दिए गए। किसी को इस बात का ख़्याल भी नहीं आया कि बच्चे स्कूल से कैसे सही-सलामत घर लौटेंगे ? जो लोग सफ़र में हैं, वे कैसे अपने घरों को लौटेंगे या गंतव्य तक पहुंचेंगे? इस झुलसती गरमी में रेलों में बैठे यात्री बेहाल हो गए। बच्चे भूख-प्यास से बिलखते रहे। जो लोग बीमार थे, अस्पताल तक नहीं पहुंच पाए। अमानवीयता की हद ये रही कि बिहार के हाजीपुर में एंबुलस में बैठी महिला अपने बीमार बच्चे की ज़िन्दगी का वास्ता देती रही, प्रदर्शनकारियों के आगे हाथ जोड़ती रही, मिन्नतें करती रही, लेकिन किसी को उस पर तरस नहीं आया। किसी ने एंबुलेंस को रास्ता नहीं दिया, नतीजतन इलाज के अभाव में एक बच्चे की मौत हो गई, एक मां की गोद सूनी हो गई।

    देश में बंद के दौरान हालात इतने ख़राब हो गए कि सेना बुलानी पड़ी। कई जगह कर्फ़्यू लगाया गया, जिससे रोज़मर्राह की ज़िन्दगी बुरी तरह मुतासिर हुई। आंदोलन के दौरान न सिर्फ़ सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया गया, बल्कि निजी संपत्तियों को भी नुक़सान पहुंचाया गया। आंदोलनकारी जिस सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाते हैं, वे जनता की अपनी संपत्ति है। ये संपत्ति जनता से लिए गए कई तरह के करों से ही बनाई जाती है। यानी इसमें जनता की ख़ून-पसीने की कमाई शामिल होती है। सरकार इस नुक़सान को पूरा करने के लिए जनता पर करों का बोझ और बढ़ा देती है। जिन लोगों की निजी संपत्ति को नुक़सान पहुंचता है, वे ताउम्र उसकी भरपाई करने में गुज़ार देते हैं। आबाद लोग बर्बाद हो जाते हैं। ये सच है कि कोई भी आंदोलन एक न एक दिन ख़त्म हो ही जाता है।  उस आंदोलन से हुई माली नुक़सान की भरपाई भी कुछ बरसों में हो ही जाती है, लेकिन किसी की जान चली जाए, तो उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाती। 

    दरअसल, देश में किसी भी तरह की हिंसा के लिए सरकार की सीधी जवाबदेही बनती है। देश में चैन-अमन क़ायम रखना, जनमानस को सुरक्षित रखना, उनके जान-माल की सुरक्षा करना सरकार की ही ज़िम्मेदारी है। सरकार के पास पुलिस है, सेना है, ताक़त है, इसके बावजूद अगर हिंसा होती है, तो इसे सरकार की नाकामी ही माना जाएगा। शासन और प्रशासन दोनों ही इस मामले में नाकारा साबित हुए हैं। केंद्र सरकार न तो दलितों के अधिकारों की रक्षा कर पा रही है और न ही क़ानून व्यवस्था को सही तरीक़े से लागू कर पा रही है। ऐसी हालत में जनता किसे पुकारे?

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    Firdaus Khan

    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’. 

  • मोहम्मद रफ़ी साहब की जयंती 24 दिसम्बर पर विशेष : तुम मुझे यूं भुला न पाओगे  –Firdaus Khan

    मोहम्मद रफ़ी साहब की जयंती 24 दिसम्बर पर विशेष : तुम मुझे यूं भुला न पाओगे –Firdaus Khan

    Firdaus Khan

    बहुमुखी संगीत प्रतिभा के धनी मोहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 को पंजाब के अमृतसर ज़िले के गांव मजीठा में हुआ। संगीत प्रेमियों के लिए यह गांव किसी तीर्थ से कम नहीं है। मोहम्मद रफ़ी के चाहने वाले दुनिया भर में हैं। भले ही मोहम्मद रफ़ी साहब हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ रहती दुनिया तक क़ायम रहेगी। साची प्रकाशन द्वारा प्रकाशित विनोद विप्लव की किताब मोहम्मद रफ़ी की सुर यात्रा मेरी आवाज़ सुनो मोहम्मद रफ़ी साहब के जीवन और उनके गीतों पर केंद्रित है। लेखक का कहना है कि मोहम्मद रफ़ी के विविध आयामी गायन एवं व्यक्तित्व को किसी पुस्तक में समेटना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव है, फिर भी अगर संगीत प्रेमियों को इस पुस्तक को पढ़कर मोहम्मद रफ़ी के बारे में जानने की प्यास थोड़ी-सी भी बुझ जाए तो मैं अपनी मेहनत सफल समझूंगा। इस लिहाज़ से यह एक बेहतरीन किताब कही जा सकती है। 

    मोहम्मद ऱफी के पिता का नाम हाजी अली मोहम्मद और माता का नाम अल्लारखी था। उनके पिता ख़ानसामा थे। रफ़ी के बड़े भाई मोहम्मद दीन की हजामत की दुकान थी, जहां उनके बचपन का काफ़ी वक़्त गुज़रा। वह जब क़रीब सात साल के थे, तभी उनके बड़े भाई ने इकतारा बजाते और गीत गाते चल रहे एक फ़क़ीर के पीछे-पीछे उन्हें गाते देखा। यह बात जब उनके पिता तक पहुंची तो उन्हें काफ़ी डांट पड़ी। कहा जाता है कि उस फ़क़ीर ने रफ़ी को आशीर्वाद दिया था कि वह आगे चलकर ख़ूब नाम कमाएगा। एक दिन दुकान पर आए कुछ लोगों ने ऱफी को फ़क़ीर के गीत को गाते सुना। वह उस गीत को इस क़दर सधे हुए सुर में गा रहे थे कि वे लोग हैरान रह गए। ऱफी के बड़े भाई ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। 1935 में उनके पिता रोज़गार के सिलसिले में लाहौर आ गए। यहां उनके भाई ने उन्हें गायक उस्ताद उस्मान ख़ान अब्दुल वहीद ख़ान की शार्गिदी में सौंप दिया। बाद में रफ़ी ने पंडित जीवन लाल और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां जैसे शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों से भी संगीत सीखा। 

    Mohammad Rafi

    मोहम्मद रफ़ी उस वक़्त के मशहूर गायक और अभिनेता कुंदन लाल सहगल के दीवाने से और उनके जैसा ही बनना चाहते थे। वह छोटे-मोटे जलसों में सहगल के गीत गाते थे। क़रीब 15 साल की उम्र में उनकी मुलाक़ात सहगल से हुई। हुआ यूं कि एक दिन लाहौर के एक समारोह में सहगल गाने वाले थे। रफ़ी भी अपने भाई के साथ वहां पहुंच गए। संयोग से माइक ख़राब हो गया और लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया। व्यवस्थापक परेशान थे कि लोगों को कैसे ख़ामोश कराया जाए। उसी वक़्त रफ़ी के बड़े भाई व्यवस्थापक के पास गए और उनसे अनुरोध किया कि माइक ठीक होने तक रफ़ी को गाने का मौक़ा दिया जाए। मजबूरन व्यवस्थापक मान गए।

    रफ़ी ने गाना शुरू किया, लोग शांत हो गए। इतने में सहगल भी वहां पहुंच गए। उन्होंने रफ़ी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि एक दिन तुम्हारी आवाज़ दूर-दूर तक फैलेगी। बाद में रफ़ी को संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी के मार्गदर्शन में लाहौर रेडियो में गाने का मौक़ा मिला। उन्हें कामयाबी मिली और वह लाहौर फ़िल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने की कोशिश करने लगे। उस दौरान उनकी रिश्ते में बड़ी बहन लगने वाली बशीरन से उनकी शादी हो गई। उस वक़्त के मशहूर संगीतकार श्याम सुंदर और फ़िल्म निर्माता अभिनेता नासिर ख़ान से रफ़ी की मुलाक़ात हुई। उन्होंने उनके गाने सुने और उन्हें बंबई आने का न्यौता दिया। ऱफी के पिता संगीत को इस्लाम विरोधी मानते थे, इसलिए बड़ी मुश्किल से वह संगीत को पेशा बनाने पर राज़ी हुए। रफ़ी अपने भाई के साथ बंबई पहुंचे। अपने वादे के मुताबिक़ श्याम सुंदर ने रफ़ी को पंजाबी फ़िल्म गुलबलोच में ज़ीनत के साथ गाने का मौक़ा दिया। यह 1944 की बात है।

    इस तरह रफ़ी ने गुलबलोच के सोनियेनी, हीरिएनी तेरी याद ने बहुत सताया गीत के ज़रिये पार्श्वगायन के क्षेत्र में क़दम रखा। रफ़ी ने नौशाद साहब से भी मुलाक़ात की। नौशाद ने फ़िल्म शाहजहां के एक गीत में उन्हें सहगल के साथ गाने का मौक़ा दिया। रफ़ी को सिर्फ़ दो पंक्तियां गानी थीं-मेरे सपनों की रानी, रूही, रूही रूही। इसके बाद नौशाद ने 1946 में उनसे फ़िल्म अनमोल घड़ी का गीत तेरा खिलौना टूटा बालक, तेरा खिलौना टूटा रिकॉर्ड कराया। फिर 1947 में फ़िरोज़ निज़ामी ने रफ़ी को फ़िल्म जुगनूं का युगल गीत नूरजहां के साथ गाने का मौक़ा दिया। बोल थे- यहां बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है। यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ। इसके बाद नौशाद ने रफ़ी से फ़िल्म मेला का एक गीत ये ज़िंदगी के मेले गवाया। इस फ़िल्म के बाक़ी गीत मुकेश से गवाये गए, लेकिन रफ़ी का गीत अमर हो गया। यह गीत हिंदी सिनेमा के बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है।

    इस बीच रफ़ी संगीतकारों की पहली जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम के संपर्क में आए। इस जोड़ी ने अपनी शुरुआती फ़िल्मों प्यार की जीत, बड़ी बहन और मीना बाज़ार में रफ़ी की आवाज़ का भरपूर इस्तेमाल किया। इसके बाद तो नौशाद को भी फ़िल्म दिल्लगी में नायक की भूमिका निभा रहे श्याम कुमार के लिए रफ़ी की आवाज़ का ही इस्तेमाल करना पड़ा। इसके बाद फ़िल्म चांदनी रात में भी उन्होंने रफ़ी को मौक़ा दिया। बैजू बावरा संगीत इतिहास की सिरमौर फ़िल्म मानी जाती है। इस फ़िल्म ने रफ़ी को कामयाबी के आसमान तक पहुंचा दिया। इस फ़िल्म में प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खां साहब और डी वी पलुस्कर ने भी गीत गाये थे। फ़िल्म के पोस्टरों में भी इन्हीं गायकों के नाम प्रचारित किए गए, लेकिन जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो मोहम्मद रफ़ी के गाये गीत तू गंगा की मौज और ओ दुनिया के रखवाले हर तरफ़ गूंजने लगे। रफ़ी ने अपने समकालीन गायकों तलत महमूद, मुकेश और सहगल के रहते अपने लिए जगह बनाई।

    रफ़ी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने तक़रीबन 26 हज़ार गाने गाये, लेकिन उनके तक़रीबन पांच हज़ार गानों के प्रमाण मिलते हैं, जिनमें ग़ैर फ़िल्मी गीत भी शामिल हैं। देश विभाजन के बाद जब नूरजहां, फ़िरोज़ निज़ामी और निसार वाज्मी जैसी कई हस्तियां पाकिस्तान चली गईं, लेकिन वह हिंदुस्तान में ही रहे। इतना ही नहीं, उन्होंने सभी गायकों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा देशप्रेम के गीत गाये। रफ़ी ने जनवरी, 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के एक माह बाद गांधी जी को श्रद्धांजलि देने के लिए हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में राजेंद्र कृष्ण रचित सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी गीत गाया तो पंडित जवाहर लाल नेहरू की आंखों में आंसू आ गए थे।

    भारत-पाक युद्ध के वक़्त भी रफ़ी ने जोशीले गीत गाये। यह सब पाकिस्तानी सरकार को पसंद नहीं था। शायद इसलिए दुनिया भर में अपने कार्यक्रम करने वाले रफ़ी पाकिस्तान में शो पेश नहीं कर पाए। ऱफी किसी भी तरह के गीत गाने की योग्यता रखते थे। संगीतकार जानते थे कि आवाज़ को तीसरे सप्तक तक उठाने का काम केवल ऱफी ही कर सकते थे। मोहम्मद रफ़ी ने संगीत के उस शिखर को हासिल किया, जहां तक कोई दूसरा गायक नहीं पहुंच पाया। उनकी आवाज़ के आयामों की कोई सीमा नहीं थी। मद्धिम अष्टम स्वर वाले गीत हों या बुलंद आवाज़ वाले याहू शैली के गीत, वह हर तरह के गीत गाने में माहिर थे। उन्होंने भजन, ग़ज़ल, क़व्वाली, दशभक्ति गीत, दर्दभरे तराने, जोशीले गीत, हर उम्र, हर वर्ग और हर रुचि के लोगों को अपनी आवाज़ के जादू में बांधा। उनकी असीमित गायन क्षमता का आलम यह था कि उन्होंने रागिनी, बाग़ी, शहज़ादा और शरारत जैसी फ़िल्मों में अभिनेता-गायक किशोर कुमार पर फ़िल्माये गीत गाये। 

    वह 1955 से 1965 के दौरान अपने करियर के शिखर पर थे। यह वह व़क्त था, जिसे हिंदी फ़िल्म संगीत का स्वर्ण युग कहा जा सकता है। उनकी आवाज़ के जादू को शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। उनकी आवाज़ में सुरों को महसूस किया जा सकता है। उन्होंने अपने 35 साल के फ़िल्म संगीत के करियर में नौशाद, सचिन देव बर्मन, सी रामचंद्र, रोशन, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, ओ पी नैयर, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, सलिल चौधरी, रवींद्र जैन, इक़बाल क़ुरैशी, हुस्नलाल, श्याम सुंदर, फ़िरोज़ निज़ामी, हंसलाल, भगतराम, आदि नारायण राव, हंसराज बहल, ग़ुलाम हैदर, बाबुल, जी एस कोहली, वसंत देसाई, एस एन त्रिपाठी, सज्जाद हुसैन, सरदार मलिक, पंडित रविशंकर, उस्ताद अल्ला रखा, ए आर क़ुरैशी, लच्छीराम, दत्ताराम, एन दत्ता, सी अर्जुन, रामलाल, सपन जगमोहन, श्याम जी-घनश्यामजी, गणेश, सोनिक-ओमी, शंभू सेन, पांडुरंग दीक्षित, वनराज भाटिया, जुगलकिशोर-तलक, उषा खन्ना, बप्पी लाह़िडी, राम-लक्ष्मण, रवि, राहुल देव बर्मन और अनु मलिक जैसे संगीतकारों के साथ मिलकर संगीत का जादू बिखेरा। 

    रफ़ी साहब ने 31 जुलाई, 1980 को आख़िरी सांस ली। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। जिस रोज़ उन्हें जुहू के क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया, उस दिन बारिश भी बहुत हो रही थी। उनके चाहने वालों ने उन्हें नम आंखों से विदाई दी। लग रहा था मानो रफ़ी साहब कह रहे हों-

    हां, तुम मुझे यूं भुला न पाओगे
    जब कभी भी सुनोगे गीते मेरे
    संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे…

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    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’.