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  • नक्सलवाद को हराती सरकारी नीतियां –Dr Neelam Mahendra

    नक्सलवाद को हराती सरकारी नीतियां –Dr Neelam Mahendra

    Dr Neelam Mahendra

    24 अप्रैल 2017 को जब “नक्सली हमले में देश के 25 जवानों की शहादत को व्यर्थ नहीं जाने देंगे” यह वाक्य देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था, तो देशवासियों के जहन में सेना द्वारा 2016 में  की गई सर्जिकल स्ट्राइक की यादें ताजा हो गई थीं। लेकिन नक्सलियों का कोई एक ठिकाना नहीं होना, सुरक्षा कारणों से उनका लगातार अपनी जगह बदलते रहना और सुरक्षा बलों के मुकाबले उन्हें  स्थानीय नागरिकों का अधिक सहयोग मिलना, जैसी परिस्थितियों के बावजूद ठीक एक साल बाद 22 अप्रैल 2018,को जब महाराष्ट्र के गढ़चिरौली क्षेत्र में पुलिस के सी-60 कमांडो की कारवाई में 37 नक्सली मारे जाते हैं तो यह समझना आवश्यक है कि यह कोई छोटी घटना नहीं है, यह वाकई में एक बड़ी कामयाबी है। इन नक्सलियों में से एक श्रीकांत पर 20 लाख और एक नक्सली सांईनाथ पर 12 लाख रुपए का ईनाम था।

    आज सरकार और सुरक्षा बलों का नक्सलवाद के प्रति कितना गंभीर रुख़ है इससे समझा जा सकता है कि 29 मार्च 2018 को सुकमा में 16 महिला नक्सली समेत 59 नक्सलियों ने पुलिस और सीआरपीएफ के समक्ष आत्मसमर्पण किया। इसी क्रम में पिछले दो सालों में सरकार द्वारा 1476 नक्सल विरोधी आपरेशन चलाए गए जिसमें  2017 में सबसे ज्यादा 300 नक्सली मारे गए  और 1994 गिरफ्तार किए गए। लेकिन इस सब के बीच नक्सलियों का आत्मसमर्पण वो उम्मीद की किरण लेकर आया है कि धीरे धीरे ही सही लेकिन अब इन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में  सक्रिय नक्सलियों का नक्सलवाद से मोहभंग हो रहा है।

    वर्तमान सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों में कहा गया है कि उसकी नीतियों के कारण 11 राज्यों के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की संख्या 126 से घटकर 90 रह गई है और अत्यधिक प्रभावित जिलों की संख्या भी 36 से कम होकर 30 रह गई है। सरकार के अनुसार भौगोलिक दृष्टि से भी नक्सली हिंसा के क्षेत्र में कमी आई है, जहाँ 2013 में यह 76 जिलों में फैला था वहीं 2017 में यह केवल 58 जिलों तक सिमट कर रह गया है।

    देश में नक्सलवाद की समस्या और इसकी जड़ें कितनी गहरी थी यह समझने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी का वो बयान महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने इसे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए “सबसे बड़ी चुनौती” की संज्ञा दी थी। उनका यह बयान व्यर्थ भी नहीं था। अगर पिछले दस सालों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो 2007 में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में पुलिस कैंप को निशाना बनाया था जिसमें 55 जवान शहीद हो गए थे। 2008 में ओड़िशा के नयागढ़ में नक्सली हमले में 14 पुलिस वाले और एक नागरिक की मौत हो गई थी।2010 में इन्होंने त्रिवेणी एक्सप्रेस और कोलकाता मुम्बई मेल को निशाना बनाया था जिसमें कम से कम 150 यात्री मारे गये थे। 2010 में ही पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के सिल्दा कैंप पर हमले में पैरामिलिटरी फोर्स के 24 जवान शहीद हो गए थे। इसी साल छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में अब तक के सबसे बर्बर नक्सली हमले में 2 पुलिस वाले और सीआरपीएफ के 74 जवान शहीद हो गए थे। 2011 में छत्तीसगढ़ के गरियबंद जिले में एक बारूदी सुरंग विस्फोट में एक एसएसपी समेत नौ पुलिस कर्मी मारे गए थे। 2012 में झारखंड के गरवा जिले में नक्सलियों द्वारा किए गए ब्लास्ट में एक अफसर सहित 13 पुलिस वालों की मौत हुई थी। 2013 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की दरभा घाटी में नक्सली हमले में काँग्रेस नेता महेंद्र कर्मा और छत्तीसगढ़ के काँग्रेस प्रमुख नंद कुमार पटेल सहित 27 लोगों की मौत हुई थी। सिलसिला काफी लंबा है।

    लेकिन अप्रैल 2017 में जब सुकमा में नक्सलियों ने घात लगाकर खाना खाते हमारे सुरक्षा बलों को निशाना बनाया तो सरकार ने नक्सलियों को मुँहतोड़ जवाब देने का फैसला लिया और आरपार की लड़ाई की रणनीति बनाई जिसमें इस की जड़ पर प्रहार किया।

    इसके तहत न सिर्फ शीर्ष स्तर पर कमांडो फोर्स और उनके मुखबिर तंत्र को मजबूत किया गया बल्कि नक्सल प्रभावित इलाकों के जंगलों को खत्म करके वहाँ सड़क निर्माण स्कूल एवं अस्पताल, मोबाइल टावर्स, अलग अलग क्षेत्रों में पुलिस स्टेशनों का निर्माण, सभी सुरक्षा बलों का आपसी तालमेल सुनिश्चित किया गया और यह सब हुआ केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के समन्वय से। इसके अलावा मनरेगा द्वारा इन नक्सल प्रभावित आदिवासी इलाकों के नागरिकों को न सिर्फ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का अभियान चलाया गया बल्कि विकास कार्यों से उन्हें मुख्य धारा में जोड़ कर उन्हें नक्सलियों से दूर करने का कठिन लक्ष्य भी हासिल किया।

    जी हाँ, लक्ष्य वाकई कठिन था क्योंकि जब 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी जिला दार्जिलिंग नामक स्थान से इसकी शुरुआत हुई थी तब चारू मजूमदार और कनु सान्याल जैसे मार्क्सवादियों ने भूस्वामियों की जमीन उन्हें जोतने वाले खेतिहर मजदूरों को सौंपने की मांग लोकर भूस्वामियों के विरुद्ध आंदोलन शुरु किए जिसे तत्कालीन सरकार ने 1500 पुलिस कर्मियों को नक्सलवाड़ी में  तैनात कर कुचलने का प्रयास किया। यही से वंचितों आदिवासियों खेतिहर मजदूरों के हक में सरकार के खिलाफ हथियार उठाने की शुरुआत हुई। धीरे धीरे यह आंदोलन देश के अन्य भागों जैसे ओड़िशा झारखंड मप्र छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र समेत देश के लगभग 40% हिस्से में फैलता गया। तत्कालीन सरकारों सुरक्षा बलों और सरकारी अधिकारियों के रवैये से एक तरफ इन इलाकों के लोगों का आक्रोश सरकारी मशीनरी के खिलाफ बढ़ता जा रहा था तो दूसरी तरफ उनका यह क्रोध नक्सलियों के  लिए सहानुभूति भी पैदा करता जा रहा था। स्थानीय लोगों के समर्थन से यह समस्या लगातार गहराती ही जा रही थी। लेकिन यह मोदी सरकार की बहुत बड़ी सफलता है कि अपनी नीतियों और विकास कार्यों के प्रति वह आज इन नक्सल प्रभावित क्षेत्र के लोगों का न सिर्फ विश्वास एवं समर्थन हासिल कर पाई बल्कि उन्हें नक्सलवाद के खिलाफ सरकार के साथ खड़ा होकर देश की मुख्यधारा के साथ जुड़ने के लिए भी तैयार कर पाई।

    उम्मीद की जा सकती है कि अब वो दिन दूर नहीं जब जैसा कि देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह जी ने कहा कि 2022 तक कश्मीर, आतंकवाद, नक्सलवाद और नार्थ ईस्ट में जारी विद्रोह भारत से पूर्ण रूप से साफ हो जाएगा।

    Dr Neelam Mahendra

  • भारतीय नौकरशाही का वीआईपी कल्चर : न जयप्रकाश आंदोलन कुछ कर पाया न ही अन्ना आंदोलन 

    भारतीय नौकरशाही का वीआईपी कल्चर : न जयप्रकाश आंदोलन कुछ कर पाया न ही अन्ना आंदोलन 

    डा० नीलम महेंद्र

    वीआईपी कल्चर खत्म करने के उद्देश्य से जब प्रधानमंत्री मोदी द्वारा मई 2017 में वाहनों पर से लालबत्ती हटाने सम्बन्धी आदेश जारी किया गया तो सभी ने उनके इस कदम का स्वागत किया था लेकिन एक प्रश्न रह रह कर देश के हर नागरिक के मन में उठ रहा था, कि क्या हमारे देश के नेताओं और सरकारी विभागों में एक लाल बत्ती ही है जो उन्हें ‘अतिविशिष्ठ’ होने का दर्जा  या एहसास देती है?
    हाल ही में रेल मंत्री श्री पीयूष गोयल ने अपने अभूतपूर्व फैसले से 36 साल पुराने प्रोटोकॉल को खत्म करके रेलवे में मौजूद वीआईपी कल्चर पर गहरा प्रहार किया। 1981 के  इस सर्कुलर को अपने नए आदेश में तत्काल प्रभाव से जब उन्होंने रद्द किया तो लोगों का अंदेशा सही साबित हुआ कि इस वीआईपी कल्चर की जड़ें बहुत गहरी हैं और इस दिशा में अभी काफी काम शेष है।

    मंत्रालय के नए आदेशों के अनुसार  किसी भी अधिकारी को अब कभी गुलदस्ता और उपहार भेंट नहीं दिए जाएंगे। इसके साथ ही रेल मंत्री पीयूष गोयल ने वरिष्ठ अधिकारियों से एक्सेक्यूटिव श्रेणी के बजाय स्लीपर और एसी थ्री टायर श्रेणी के डब्बों में यात्रा करने को कहा है।रेलवे में मौजूद वीआईपी कल्चर यहीं पर खत्म हो जाता तो भी ठीक था लेकिन इस अतिविशिष्ट संस्कृति की जड़ें तो और भी गहरी थीं। सरकारी वेतन प्राप्त रेलवे की नौकरी पर लगे कर्मचारी रेलवे ट्रैक के बजाय बड़े बड़े अधिकारियों के बंगलों पर अपनी ड्यूटी दे रहे थे।

    लेकिन अब रेल मंत्री के ताजा आदेश से सभी आला अधिकारियों को अपने घरों में घरेलू कर्मचारियों के रूप में लगे रेलवे के समस्त स्टाफ को मुक्त करना होगा। जानकारी के अनुसार वरिष्ठ अधिकारियों के घर पर करीब 30 हजार ट्रैक मैन काम करते हैं, उन्हें अब रेलवे के काम पर वापस लौटने के लिए कहा गया है। पिछले एक माह में तकरीबन 6 से 7 हजार कर्मचारी काम पर लौट आए हैं और शीघ्र ही शेष सभी के भी ट्रैक पर अपने काम पर लौट आने की उम्मीद है।

    क्या अभी भी हमें लगता है कि रेलवे में स्टाफ की कमी है ?
    क्या हम अभी भी ट्रैक मेन्टेनेन्स के अभाव में होने वाले रेल हादसों की वजह जानना चाहते हैं?
    एक आम आदमी और उसकी सुरक्षा के प्रति कितने उत्तरदायी हैं ये अधिकारी इसका उत्तर जानना चाहते हैं?

    इस प्रकार की वीआईपी संस्कृति या फिर कुसंस्कृति केवल एक ही सरकारी विभाग तक सीमित हो ऐसा भी नहीं है।
    देश के एक प्रसिद्ध अखबार के अनुसार मप्र के एक लैंड रिकॉर्ड कमिश्नर के बंगले पर 35 से ज्यादा सरकारी कर्मचारी उनका घरेलू काम करने में लगे थे जबकि इनका काम आरआई के साथ सीमांकन में मदद करना होता है। कोई आश्चर्य नहीं कि उस राज्य में सीमांकन का काफी काम लम्बित है।

    क्या इन अधिकारियों का यह आचरण ‘सरकारी काम में बाधा’ की श्रेणी में नहीं आता?

    भारत की नौकरशाही को ब्रिटिश शासन के समय में स्थापित किया गया था जो उस वक्त विश्व की सबसे विशाल एवं सशक्त नौकरशाही थी। स्वतंत्र भारत की नौकरशाही का उद्देश्य देश की प्रगति,जनकल्याण,सामाजिक सुरक्षा,कानून व्यवस्था का पालन एवं सरकारी नीतियों का लाभ आमजन तक पहुँचाना था। लेकिन सत्तर अस्सी के दशक तक आते आते भारतीय नौकरशाही दुनिया की  ‘भ्रष्टतम’ में गिनी जाने लगी। अब भ्रष्टाचार,पक्षपात,,अहंकार जैसे लक्षण नौकरशाही के आवश्यक गुण बनते गए।

    न जयप्रकाश आंदोलन कुछ कर पाया न ही अन्ना आंदोलन।

    जो कानून, मानक विधियां और जो शक्तियां इन्हें कार्यों के सफल निष्पादन के लिए दी गई थीं, अब उनका उपयोग ‘लालफीताशाही ‘ अर्थात फाइलों को रोकने के लिए, काम में विलम्ब करने के लिए किया जाने लगा। नेताओं के साथ इनके गठजोड़ ने इन्हें  “वीआईपी” बना दिया।

    और आज की सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि जो लोग देश में नौकरियों की कमी का रोना रो रहे हैं वे सरकारी नौकरियों की कमी को रो रहे हैं क्योंकि प्रइवेट सेक्टर में तो कभी भी नौकरियों की कमी नहीं रही,लेकिन इन्हें वो नौकरी नहीं चाहिए जिसमें काम करने पर तनख्वाह मिले इन्हें तो वो नौकरी चाहिए जिसमें हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा ही चोखा। कोई आश्चर्य नहीं कि  हमारे समाज के नैतिक मूल्य इतने गिर गए हैं आज लोग अपने बच्चों को नौकरशाह बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं,देश की सेवा अथवा उसकी प्रगति में अपना योगदान देने के लिए नहीं बल्कि अच्छी खासी तनख्वाह के अलावा मिलने वाली मुफ्त सरकारी  सुविधाओं के बावजूद किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही न होने के कारण।

    आखिर पहले पांचवां वेतन आयोग फिर छठा वेतन आयोग और अब सातवाँ वेतन आयोग, इन सभी में सुनिश्चित किया गया कि इनके वेतन और सुविधाएं इस प्रकार की हों कि इनके ईमानदारी से काम करने में कोई रुकावट न हो लेकिन क्या इनकी जवाबदेही भी निश्चित की गई?

    पहले लाल बत्ती हटाना और अब रेल मंत्री का यह कदम स्वागत योग्य है किन्तु तब तक अधूरा है जब तक हर सरकारी पद पर बैठे  नेता या फिर अधिकारी की जवाबदेही तय नहीं की जाती।

    इन सभी को टारगेट के रूप में काम दिए जाएं जिनमें समय सीमा का निर्धारण कठोरता हो।

    तय समय सीमा में कार्य पूरा करने वाले अधिकारी को तरक्की मिले तो समय सीमा में काम न कर पाने वाले अधिकारी को डिमोशन।
    कुछ ऐसे नियम इनके लिए भी तय किए जाएं ताकि

    जबतक वे उन नियमों का पालन नहीं करेंगे तबतक उन्हें कोई अधिकार भी न दिए जाएं।

    जिस प्रकार देश के व्यापारी से सरकार हर साल असेसमेन्ट लेती है और अपने व्यापार में वो पारदर्शिता अपनाए इसकी अपेक्षा ही नहीं करती बल्कि कानूनों से सुनिश्चित भी करती है, नेताओं को भी हर पांच साल में जनता के दरबार में जाकर परीक्षा देनी पड़ती है, उसी प्रकार हर सरकारी कर्मचारी की सम्पत्ति का भी सालाना एसेसमेन्ट किया जाए, उनके द्वारा किए जाने वाले मासिक खर्च का उनकी मासिक आय के आधार पर आंकलन किया जाए, उनके बच्चों के देसी या विदेशी स्कूलों की फीस, उनके ब्रांडेड कपड़े और फाइव स्टार कल्चर, महंगी गाड़ियों को कौन स्पान्सर कर रहा है इसकी जांच हर साल कराई जाए। कुछ पारदर्शिता की अपेक्षा सरकारी अधिकारियों से भी की जाए तो शायद वीआईपी संस्कृति का जड़ सहित नाश हो पाए।

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  • क्या यह पूरा न्याय है

    डा० नीलम महेंद्र

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    ‘व्यापम’ अर्थात व्यवसायिक परीक्षा मण्डल, यह उन पोस्ट पर भर्तियाँ या एजुकेशन कोर्स में एडमिशन करता है जिनकी भर्ती मध्यप्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन नहीं करता है जैसे मेडिकल इंजीनियरिंग पुलिस नापतौल इंस्पेक्टर शिक्षक आदि। साल भर पूरी मेहनत से पढ़कर बच्चे इस परीक्षा को एक बेहतर भविष्य की आस में देते हैं। परीक्षा के परिणाम का इंतजार दिल थाम कर करते हैं। वह बालक जो अपनी कक्षा और कोचिंग दोनों ही जगह हमेशा अव्वल रहता है  तब निराश हो जाता हैं जब पता चलता है कि मात्र एक नम्बर से वह अनुत्तीर्ण हो गया लेकिन उसे आज पता चला कि वह एक नम्बर नहीं बल्कि चन्द रुपयों से अनुत्तीर्ण हुआ था। यह परीक्षा बुद्धि बल की  नहीं धन बल की थी। आज ऐसे अनेकों बच्चे यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि जिस डिग्री के लिए वे सालों मेहनत करते हैं  वो पैसे से खरीदे गए एक कागज के टुकड़े से अधिक क्या है जिस पर कुछ खरीदे गए शब्द लिखे जाते हैं। जब एक होनहार बालक को उसके हक से महरूम किया जाता है तो केवल वो बालक नहीं बल्कि पूरा देश पीछे चला जाता है क्योंकि जो योग्य है वो परिस्थितियों के आगे हार जाता है और जो अयोग्य है वो परिस्थितियों को खरीद लेता है लेकिन इस खरीद फरोख्त में देश का विकास रुक जाता है। आप खुद सोचिए कि आपका इलाज ‘व्यापम’ की देन एक अयोग्य डाक्टर बेहतर करता जिसने अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिए डिग्री खरीदी या फिर वो योग्य बालक जो अपने स्वप्न को पूरा करने के लिए डाक्टर बनना चाह रहा था लेकिन बन न सका।

    कहते हैं सच्चाई की हमेशा जीत होती है तो शिक्षा के क्षेत्र में देश के इस सबसे बड़े घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट का बहुप्रतीक्षित फैसला आखिर आ ही गया। फैसले में 2008 से 2012 के बीच प्रवेश पाने वाले 634 मेडिकल छात्रों के दाखिले निरस्त किए गए हैं और जो डाक्टर बन चुके हैं उनकी डिग्री छीन ली जाएगी। जस्टिस खेहर की अगुवाई वाली पीठ का कहना है कि विद्यार्थी जालसाजी को स्वीकार कर चुके हैं इसलिए वे किसी राहत की पात्रता नहीं रखते।

    सही भी है आखिर किसी योग्य छात्र का हक मारा गया होगा, किसी होनहार विद्यार्थी का भविष्य दांव पर लगा होगा, किसी पिता के अपने पुत्र के लिए देखे गए सपने को कुचला गया होगा, किसी माँ का अपने बच्चे के लिए माँगी गई मन्नतों पर से विश्वास उठा होगा, कुछ मुठ्ठी भर रसूखदार और पैसे वालों के द्वारा कितने होनहारों और देश दोनों के भविष्य से खेला गया।

    लेकिन चूंकि  “बुरे काम का बुरा नतीजा  ” होता है तो कल तक पैसे के दम पर  किसी के सपनों की लाश पर अपने भविष्य का महल बनाने वालों का खुद का भविष्य आज दांव पर लग गया है। कहने को न्याय हुआ लेकिन क्या यह पूर्ण न्याय है? जिस सिस्टम में यह सब सम्भव हो पाया उस सिस्टम का क्या? जिन अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया उनका क्या? जिन नेताओं के सरंक्षण में इस घोटाले को अंजाम दिया गया उन नेताओं का क्या? क्या इन सभी की सन्लिप्तता के बिना इतना बड़ा घोटाला 1990 के दशक से लेकर 2013 तक इतने सालों तक संभव है?

    बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी क्योंकि अगर सरकार की जानकारी के बिना यह प्रवेश हुए तो फिर सरकार क्या कर रही थी और अगर सरकार की जानकारी में हुए तो वो होने क्यों दे रही थी? दोनों ही स्थितियों में सरकार सवालों के घेरे से बच नहीं सकती। तो जिस दोषी सिस्टम और सरकारी तंत्र के सहारे पूरा घोटाला हुआ उस का कोई दोष नहीं उसे कोई सजा नहीं लेकिन जिसने इस सिस्टम का फायदा उठाया दोषी वो है और सजा का हकदार भी।

    तो यह समझा जाए कि सरकार की कोई जवाबदेही नहीं है न तो सिस्टम के प्रति न लोगों के प्रति, उसकी जवाबदेही है सत्ता और उसकी ताकत के प्रति यानी खुद के प्रति। लेकिन हम लोगों को भी शायद भ्रष्टाचार और उसकी देन घोटालों की आदत हो चुकी है तभी तो बड़े से बड़े घोटाले भी इस देश के नागरिक की तन्द्रा भंग नहीं कर पा रहे । अगर व्यापम घोटाले की ही बात करें तो इसमें 2000 से ज्यादा गिरफ़्तारियाँ हुई, 55 एफआईआर,26 चार्ज शीट दाखिल हुई, 42 संदिग्ध मौतें इस मामले से जुड़े लोगों की हुई और 2500 से ज्यादा आरोपी हैं।

    बात सिर्फ घोटाले तक सीमित नहीं है बात यह  है कि जिस परीक्षा की तैयारी के लिए ही छात्रों के माता पिता द्वारा स्कूल फीस के अलावा कोचिंग सेन्टर वालों को मोटी फीस दी जाती है, पहली बार में सेलेक्शन नहीं होने पर ड्राप लिया जाता है और छात्रों द्वारा जी तोड़ मेहनत की जाती है उस परीक्षा की विश्वसनीयता क्या रह जाती है। जो छात्र 25 से 40 लाख खर्च करके डाँक्टर या इंजीनियर बनता है क्या वह नौकरी लगने पर अपने द्वारा की गई इन्वोस्टमेन्ट वसूलने पर नहीं लगाएगा? तो फिर यह भ्रष्टाचार का चक्रव्यूह टूटेगा कैसे? और बात यह भी है कि जब तक योग्य व्यक्ति पदों पर नहीं होंगे तो देश आगे बढ़ेगा कैसे?

    हमारी ये परीक्षाएँ और इनमें बिकने वाली डिग्रियाँ माननीय प्रधानमंत्री जी के ‘मेक इन इंडिया ‘ और स्किल्ड इंडिया जैसे प्रोजेक्टों को आगे बढ़ाएँगीं ? किसी भी देश की तरक्की में शिक्षा और शिक्षित युवा का महत्वपूर्ण योगदान होता है लेकिन जब शिक्षा विभाग में ही भ्रष्टाचार की दीमक लग जाए तो युवा नहीं देश का भविष्य दांव पर लग जाता है।

    न्यायालय के फैसले से जिन छात्रों ने गलत तरीके से परीक्षा उत्तीर्ण की उन्हें सजा मिली लेकिन पूर्ण न्याय तभी होगा जब इस प्रकार के कदम उठाए जाएं जिससे भविष्य में न तो किसी छात्र के साथ अन्याय हो और न ही कोई छात्र अनुचित तरीके से डिग्री हासिल कर पाए क्योंकि भविष्य तो दोनों का ही दांव पर लगता है किसी का उसी समय किसी का कुछ समय बाद जैसे कि ये 634 छात्र।

     

  • घी गेहूँ नहीं रोज़गार चाहिए साहब

    डा० नीलम महेंद्र

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    भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और चुनाव किसी भी लोकतंत्र का महापर्व होते हैं ऐसा कहा जाता है। पता नहीं यह गर्व का विषय है या फिर विश्लेषण का कि हमारे देश में इन महापर्वों का आयोजन लगा ही रहता है । कभी लोकसभा  कभी विधानसभा तो कभी नगरपालिका के चुनाव। लेकिन अफसोस की बात है कि चुनाव अब नेताओं के लिए व्यापार बनते जा रहे हैं और राजनैतिक दलों के चुनावी मैनाफेस्टो व्यापारियों द्वारा अपने व्यापार के प्रोमोशन के लिए बाँटे जाने वाले पैम्पलेट ! और आज इन पैम्पलेट , माफ कीजिए चुनावी मैनिफेस्टो में  लैपटॉप स्मार्ट फोन जैसे इलेक्ट्रौनिक उपकरण  से  लेकर प्रेशर कुकर जैसे बुनियादी आवश्यकता की वस्तु बाँटने से शुरू होने वाली बात घी , गेहूँ और पेट्रोल  तक पंहुँच गई।

    कब तक हमारे नेता गरीबी की आग को पेट्रोल और घी से बुझाते रहेंगे? सबसे बड़ी बात यह कि यह मेनिफेस्टो उन पार्टीयों के हैं जो इस समय सत्ता में हैं। राजनैतिक दलों की निर्लज्जता और इस देश के वोटर की बेबसी दोनों ही दुखदायी हैं। क्यों कोई इन नेताओं से नहीं पूछता कि  इन पांच सालों या फिर स्वतंत्रता के बाद इतने सालों के शासन में तुमने क्या किया?

    उप्र की समाजवादी पार्टी हो या पंजाब का भाजपा अकाली दल गठबंधन दोनों को सत्ता में वापस आने के लिए या फिर अन्य पार्टियों को  राज्य के लोगों को आज इस प्रकार के प्रलोभन क्यों देने पड़ रहे हैं? लेकिन बात जब पंजाब में लोगों को घी बाँटने की हो तो मसला बेहद गंभीर हो जाता है क्योंकि पंजाब का तो नाम सुनते ही जहन में हरे भरे लहलहाते फसलों से भरे खेत उभरने लगते हैं और घरों के आँगन में बँधी गाय भैंसों के साथ खेलते खिलखिलाते बच्चे  दिखने से लगते हैं। फिर वो पंजाब जिसके घर घर में दूध दही की नदियाँ बहती थीं , वो पंजाब जो अपनी मेहमान नवाज़ी के लिए जाना जाता था जो अपने घर आने वाले मेहमान को दूध दही घी से ही पूछता था आज  उस पंजाब के वोटर को उन्हीं चीजों को सरकार द्वारा मुफ्त में देने की स्थिति क्यों और कैसे आ गई?

    सवाल तो बहुत हैं पर शायद जवाब किसी के पास भी नहीं। जब हमारा देश आजाद हुआ था तब भारत पर कोई कर्ज नहीं था तो आज इस देश के हर नागरिक पर औसतन 45000 से ज्यादा का कर्ज क्यों है? जब अंग्रेज हम पर शासन करते थे तो भारतीय रुपया डालर के बराबर था तो आज वह 68.08 रुपए के स्तर पर कैसे आ गया? हमारा देश कृषी प्रधान देश है तो स्वतंत्रता के इतने सालों बाद भी आजतक  किसानों को 24 घंटे बिजली एक चुनावी वादा भर क्यों है? चुनाव दर चुनाव पार्टी दर पार्टी वही वादे क्यों दोहराए जाते हैं? क्यों आज 70 सालों बाद भी पीने का स्वच्छ पानी,  गरीबी और बेरोजगारी जैसे बुनियादी जरूरतें ही मैनिफेस्टो का हिस्सा हैं? हमारा देश इन बुनियादी आवश्यकताओं से आगे क्यों नहीं जा पाया? और क्यों हमारी पार्टियाँ रोजगार के अवसर पैदा करके हमारे युवाओं को स्वावलंबी बनाने से अधिक मुफ्त चीजों के प्रलोभन देने में विश्वास करती हैं?

    यह वाकई में एक गंभीर मसला है कि जो वादे राजनैतिक पार्टियाँ अपने मैनिफेस्टो में करती हैं वे चुनावों में वोटरों को लुभाकर वोट बटोरने तक ही क्यों सीमित रहते हैं।चुनाव जीतने के बाद ये पार्टियाँ अपने मैनिफेस्टो को लागू करने के प्रति कभी भी गंभीर नहीं होती और यदि उनसे उनके मैनिफेस्टो में किए गए वादों के बारे में पूछा जाता है तो सत्ता के नशे में अपने ही वादों को  ‘चुनावी जुमले ‘ कह देती हैं। इस सब में समझने वाली बात यह है कि वे अपने मैनिफेस्टो को नहीं बल्कि अपने वोटर को हल्के में लेती हैं।

    आम आदमी तो लाचार है चुने तो चुने किसे आखिर में सभी तो एक से हैं। उसने तो अलग अलग पार्टी   को चुन कर भी देख लिया लेकिन सरकारें भले ही बदल गईं मुद्दे वही रहे। पार्टी और नेता दोनों  ही लगातार तरक्की करते गए लेकिन वो सालों से वहीं के वहीं खड़ा है। क्योंकि बात सत्ता धारियों द्वारा भ्रष्टाचार तक ही सीमित नहीं है बल्कि सत्ता पर काबिज होने के लिए दिखाए जाने वाले सपनों की है। मुद्दा वादों  को हकीकत में बदलने का सपना दिखाना नहीं उन्हें सपना ही रहने देना है।

    चुनाव आयोग द्वारा चुनाव से पहले आचार संहिता लागू कर दी जाती है। आज जब विभिन्न राजनैतिक दल इस प्रकार की घोषणा करके वोटरों को लुभाने की कोशिश करते हैं तो यह देश और लोकतंत्र दोनों के हित में है कि चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करे कि पार्टियाँ अपने चुनावी मेनिफेस्टो को पूरा करें और जो पार्टी सत्ता में आने के बावजूद अपने चुनावी मेनिफेस्टो को पूरा नहीं कर पाए वह अगली बार चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दी जाए।

    जब तक इन राजनैतिक दलों की जवाबदेही अपने खुद के मेनीफेस्टो के प्रति तय नहीं की जाएगी हमारे नेता भारतीय राजनीति को किस स्तर तक ले जाएंगे इसकी कल्पना की जा सकती है। इस लिए चुनावी आचार संहिता में आज के परिप्रेक्ष्य में कुछ नए कानून जोड़ना अनिवार्य सा दिख रहा है।

  • उस गुनाह की माफ़ी जो किया ही नहीं

    डा० नीलम महेंद्र

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    दंगल फ़िल्म में गीता फोगट का किरदार निभाने वाली जायरा वसीम द्वारा सोशल मीडिया पर माफी माँगने की खबर पूरे देश ने पढ़ी और सुनी। आम आदमी से लेकर क्रिकेट और कला जगत, हर क्षेत्र से उसके समर्थन में देश आगे आया लेकिन सरकार की ओर से किसी ठोस कदम का इंतजार केवल जायरा ही नहीं पूरे देश को है।

    याद कीजिए अपने जवानी के दिन! सोलह साल की उम्र, कालेज के वो दिन, जवानी का जोश, आँखों में भविष्य के अनगिनत सपने, कुछ कर गुजरने का जज्बा,और कुछ ऐसा विश्वास कि हम तो वो हैं जो दुनिया को बदल सकते हैं। उम्र का वो दौर जब कुछ यूँ महसूस होता था कि पूरा जहाँ ही हमारा है, काश हमारे पंख होते लेकिन फिर भी बिना पंख के ही उड़ लेते थे।

    लेकिन जरा सोचिए क्या बीती होगी उस बच्ची पर जिसके पंख उड़ने से पहले ही काट दिए गए?
    क्या हुआ होगा उसके उस विश्वास का जब उसका आसमां ही उससे छीन लिया गया हो?
    कैसे ज़ार ज़ार रोया होगा उसका दिल जब दुनिया को बदलने का जज्बा रखने वाली उम्र में उसने दुनिया से उस गुनाह की  माफी मांगी होगी जो उसने किया ही नहीं?
    क्या हम एक आजाद देश में रहते हैं? क्या इसी को लोकतंत्र कहते हैं? क्या हमारे देश में जनता द्वारा चुनी हुई सरकारों की कानून व्यवस्था पर पकड़ है?
    मुठ्ठी भर असामाजिक तत्व अराजकता भय एवं असुरक्षा का माहौल कैसे फैला लेते हैं?
    कब तक ‘आजादी’ के नाम पर आजादी का ही गला घोंटा जाएगा?
    कब तक धर्म के नाम पर लड़कियों के साथ भेदभाव होता रहेगा?

    कैसी विडम्बना है कि पर्दे पर एक ऐसी लड़की जो किसी सूरत में लड़कों से कम नहीं है, का किरदार जीवंत करने वाली जायरा आज बेबसी और लाचारी  का प्रतीक बन गईं हैं। वो लड़की जिसने 10 वीं की परीक्षा में 92% मार्क्स प्राप्त किए हों उसके द्वारा इस प्रकार माफी माँगना  उसके लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए शर्मनाक है। और जिस ‘आज़ादी की लड़ाई ‘ के हिमायती इस्लाम के नाम पर उससे माफी मंगवा रहे हैं, न सिर्फ वे बल्कि उनका समर्थन करने वाले भी सोचें कि उनकी इस कायराना हरकत से  ‘इस्लाम’ या फिर उनकी ‘लड़ाई’ दोनों ही किसी ‘बड़प्पन’ के नहीं केवल ‘कट्टरता’  का प्रतीक बनते जा रहे हैं।

    यह उनकी कायरता की ही भावना है कि बुरहान वाणी की जगह जब आज भारतीय सिविल सेवा को टाप करने वाले आईएस अधिकारी शाह फैजल या फिर भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल परवेज रसूल और अब जायरा अगर देश की मुख्यधारा में शामिल होकर  कश्मीरी युवाओं के रोल माडल बन  जाएंगे तो उनके हाथों से कहीं पत्थर और बन्दूकें  छूट न जांए। नहीं तो क्या वजह है कि कथित आज़ादी की मांग करने वाले महिलाओं के संगठन दुख्तरन ए मिल्लत की महिलाओं के लिए कोई पाबंदी या फतवे नहीं हैं लेकिन वहीं की महिलाएं अगर ‘प्रगाश’ नाम का एक म्यूजिकल बैंड बनाती हैं तो उन्हें इसी आजादी और इस्लाम के नाम पर उसे बन्द करना पड़ता है? क्यों मलाला यूसुफजई और तस्लीमा नसरीन  जैसी महिलाओं को इस्लाम के नाम पर  विरोध का सामना करना पड़ता है?

    आज जरूरत इस बात की है कि पढ़े लिखे और सभ्य मुसलमान इस बात को समझें कि कुछ मुठ्ठी भर लोगों के सनकीपन से पूरी कौम बदनाम हो रही है और वे सभी एक होकर इन असामाजिक तत्वों का विरोध करें। ऐसा कौन सा धर्म है जो किसी रचनात्मकता का विरोध करना सिखाए ? वो समाज कैसे आगे बढ़ सकता है जिसमें महिलाओं को अपनी आजादी के लिए संघर्ष करना पड़े? किस मुँह से हम स्वयं को सभ्य और मानव भी कहते हैं?

    आज जायरा, इससे पहले शमी की पत्नी ! जो लोग खुद सामने आए बिना सोशल मीडिया जैसे उदार माध्यम का दुरुपयोग ‘मज़लूम कौशर’ नाम का पेज बनाकर कट्टरता फैलाने का काम कर रहे हैं उन्हें इसका माकूल जवाब उसी माध्यम से जनता तो दे ही चुकी है लेकिन यह जवाब असरदार तभी होगा जब इस पर एक ठोस सरकारी मुहर भी लगे जिससे सरकार, कानून और प्रशासन नाम की कोई चीज़ है इसका अहसास न सिर्फ जायरा और पूरे देश को हो बल्कि इनकी ताकत का अंदाजा अलगाववादियों को भी हो।

    यह समझ से परे है कि क्यों वहाँ की सरकार न तो अपनी आवाम को उनकी सुरक्षा का एहसास करा पा रही है और न ही अलगाववादियों को भय का। क्यों एक तरफ कश्मीर का आम आदमी डर के साए में जीने को मजबूर है तो दूसरी तरफ इन कट्टरपंथियों के हौसले इतने बुलंद हैं?

  • सबको सम्मति दे भगवान

    डा० नीलम महेंद्र

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    यह सही है कि लफ्जों में इतनी ताकत होती है कि किसी पुरानी डायरी के पन्नों पर कुछ समय पहले चली हुई कलम आज कोई तूफान लाने की क्षमता रखती है लेकिन किसी डायरी के खाली पन्ने भी आँधियाँ ला सकते हैं ऐसा शायद पहली बार हो रहा है। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के 2017 के वो कैलेंडर और डायरी आज देश भर में चर्चा में हैं जिनके बारे में तो अधिकतर भारतीयों को शायद इससे पहले पता भी न हो। कारण है गाँधी जी की जगह मोदी की तस्वीर।

    पूरा देश गाँधी प्रेम में उबल रहा है कि गाँधी की जगह कोई नहीं ले सकता,केवल चरखे के पीछे बैठकर फोटो खिंचाने से कोई गाँधी नहीं बन सकता आदि आदि। सही भी है आखिर गाँधी जी इस देश के राष्ट्रपिता हैं और पूरा देश उनसे बहुत प्यार करता है और उनकी इज्जत करता है।
    लेकिन गाँधी जी को सही मायनों में हममें से कितनों ने समझा है?

    गाँधी जी कहते थे कि सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई भय और असुरक्षा जैसे तत्वों पर विजय पाना है। आज जो लोग गाँधी जी के नाम को रो रहे हैं इनमें से कितनों ने अपने भय या असुरक्षा की भावना पर विजय हासिल की है? यह असुरक्षा की भावना नहीं तो क्या है कि एक तरफ आप चिल्ला रहे हैं कि गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता और दूसरी तरफ इसे बेमतलब मुद्दा भी बना रहे हैं! क्योंकि आप केवल इन शब्दों को ‘कह’ रहे हैं, इनके सहारे जनमानस को बहकाने की असफल कोशिश कर रहे हैं। अगर आप अपने कहे शब्दों को ‘समझते’ तो इस बात को मुद्दा नहीं बनाते क्योंकि यह तो अटल सत्य है ही कि गाँधी जी की जगह कोई नहीं ले सकता।

    गाँधी जी ही हमारे गाँधी हैं और रहेंगे । लेकिन जो असली भावना आपको डरा रही है वो यह है कि आप ही की गलतियों के कारण आज मोदी भी उस मुकाम पर पँहुच गए हैं कि कोई उनकी जगह भी नहीं ले सकता।विपक्ष तो क्या सरकार या फिर खुद उनकी ही पार्टी में भी उनकी जगह लेने वाला कोई नहीं है कम से कम आज तो नहीं। गाँधी जी को आज जो रो रहे हैं और कह रहे हैं कि गाँधी को खादी से और खादी को गाँधी से कोई अलग नहीं कर सकता उन्होंने इतने साल गाँधी के लिए या फिर खादी के लिए क्या किया।

    दरअसल वो गाँधी को नहीं उस नाम को रो रहे हैं जिस नाम को उन्होंने अपने कापी राइट से अधिक कभी कुछ नहीं समझा। इतने सालों गाँधी जी के लिए कुछ किया गया तो यह कि देश भर में लगभग 64 सरकारी स्कीमें उनके नाम पर खोली गईं , 24 खेलों के टूर्नामेंट और ट्रोफी उनके नाम पर रखे गये,15 स्कालरशिप उनके नाम पर दी गई,19 स्टेडियम उनके नाम पर खोले गए,39 अस्पतालों का नाम उनके नाम पर रखा गया,74 बिल्डिंग और सड़कों के नाम उनके नाम पर रखे गए,5 एयरपोर्ट का नाम उनके नाम पर रखा गया आदि आदि लिस्ट बहुत लम्बी है। इसके अलावा 2 अक्तूबर को बापू की समाधि पर फूल चढ़ाकर उनके प्रिय भजनों का आयोजन और दूरदर्शन पर ‘गाँधी’ फ़िल्म का प्रसारण। बस कर लिया बापू को याद!

    क्या यहीं तक सीमित है हमारा ‘बापू प्रेम ‘?
    हमारे राष्ट्र पिता के प्रति इतनी ही है हमारी भक्ति ?
    यही सच्ची श्रद्धा है जिसके हकदार हैं हमारे बापू ?

    तो फिर वो क्या है जब देश का प्रधानमंत्री जिसके नाम के साथ गाँधी तो नहीं लगा लेकिन आजादी के 70 साल बाद जब देश की बागडोर अपने हाथों में लेता है तो गाँधी जी के सपने को यथार्थ में बदलने के उद्देश्य से ‘स्वच्छ भारत ‘ अभियान की शुरुआत करता है और उसका प्रतीक चिह्न गाँधी जी के चश्मे को रखता है?

    वो क्या है जब यही प्रधानमंत्री गाँधी जी की 150 वीं जयन्ति के अवसर पर 2019 तक पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त करने का बीड़ा उठाता है? यहाँ इस प्रश्न पर तो बात ही नहीं की जा रही कि इतने सालों जिस ‘गाँधीवादी’ पार्टी का शासन था उसने इस दिशा में क्या कदम उठाए या फिर आजादी के इतने सालों बाद भी किसी  प्रधानमंत्री को इस मूलभूत स्तर पर काम क्यों करना पड़ रहा है।

    वो क्या है जब प्रधानमंत्री ‘मन की बात ‘ में देशवासियों से ‘गाँधी की खादी’ अपनाने का आह्वान करते हैं तो खादी की बिक्री में 125% की बढोत्तरी दर्ज होती है (इंडिया टुडे की रिपोर्ट) ।

    वो क्या है जब मोदी नारा देते हैं  “खादी फार नेशन , खादी फार फैशन ” ?

    वो क्या है जब प्रधानमंत्री खादी के उन्नयन के लिए पंजाब में 500 महिलाओं को चरखा बाँटने वाले आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बनते हैं?

    गाँधी जी अपने बाथरूम की सफाई खुद ही करते थे तो आज जो गाँधी के नाम पर विलाप कर रहे हैं उनमें से कितने उनका अनुसरण करते हैं?
    और वो क्या है जब इस देश का प्रधानमंत्री उनका अनुसरण करते हुए न सिर्फ खुद हाथ में झाड़ू पकड़ कर सफाई अभियान की शुरुआत करते हैं बल्कि पूरे देश को प्रेरित करते हैं?

    लेकिन यह अजीब सी बात है कि जब प्रधानमंत्री के हाथों में झाड़ू होता है तो कोई सवाल नहीं करता लेकिन उन्हीं हाथों में चरखा आ जाता है तो मुद्दा बन जाता है?

    आपको इस तथ्य से कोई फर्क नहीं पड़ता कि खादी की बिक्री जो कि कांग्रेस के शासन काल के 50 सालों में 2 से 7% थी   पिछले दो वर्षों में बढ़कर 34% तक पहुँच गई। आपको इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि इससे पहले भी 6 बार जब बापू इस कैलेंडर में नहीं थे वो भी आप ही के शासन काल में 1996,2002,2005,2011,2012,2013, में तब आपने इसे मुद्दा नहीं बनाया था तो आपके लिए गाँधी जी की ही प्रिय प्रार्थना ‘आप सबको सम्मति दे भगवान ‘।

    गाँधी जी केवल चरखा और खादी तक सीमित नहीं हैं वो एक विचारधारा हैं जीवन जीने की शैली हैं नैतिकता सच्चाई दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस के साथ साथ अहिंसा के प्रतीक हैं। वे व्यक्ति नहीं अपने आप में एक संस्था हैं। इससे बड़ी बात क्या होगी कि वे केवल भारत में नहीं अपितु पूरे विश्व में अहिंसा के पुजारी के रूप में पूजे जाते हैं। जब भारत के गाँधी पर अमेरिका के जान ब्रिले  फिल्म लिखते हैं और रिचर्ड एटनबोरो निर्देशित करते हैं तो वे गाँधी को हमसे छीनते नहीं हैं बल्कि सम्पूर्ण विश्व को उनके व्यक्तित्व एवं विचारधारा से अवगत कराते हैं, उनकी सीमाएं भारत को लाँघ जाती हैं। तो जो लोग आज कैलेंडर की तस्वीर पर बवाल मचा रहे हैं वे अपनी असुरक्षा की भावना से बाहर निकल कर समझें कि गाँधी जी इतने छोटे नहीं कि किसी तस्वीर के पीछे छिपाए जांए ।

  • अनुशासन कि आड़ में कहीं शोषण तो नहीं

    डा० नीलम महेंद्र


     

    भ्रष्टाचार जिसकी जड़ें इस देश को भीतर से खोखला कर रही हैं उससे यह देश कैसे लड़ेगा? यह बात सही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काफी अरसे बाद इस देश के बच्चे बूढ़े जवान तक में एक उम्मीद जगाई है। इस देश का आम आदमी भ्रष्टाचार और सिस्टम के आगे हार कर उसे अपनी नियति स्वीकार करने के लिए मजबूर हो चुका था,उसे ऐसी कोई जगह नहीं दिखती थी जहाँ वह न्याय की अपेक्षा भी कर सके। लेकिन  आज वह अन्याय के विरुद्ध आवाज उठा रहा है।

    सोशल मीडिया नाम की जो ताकत उसके हाथ आई है उसका उपयोग वह सफलतापूर्वक अपनी आवाज प्रधानमंत्री तक ही नहीं, पूरे देश तक पहुँचाने के लिए कर रहा है। देखा जाए तो देश में इस समय यह एक आदर्श स्थिति चल रही है जिसमें एक तरफ प्रधानमंत्री अपनी मन की बात देशवासियों तक पहुंचा रहे हैं तो दूसरी ओर देशवासियों के पास भी इस तरह के साधन हैं कि वे अपनी मन की बात न सिर्फ प्रधानमंत्री बल्कि पूरे देश तक पहुंचा पा रहे हैं।

    शायद आम आदमी के हाथ आए सोशल मीडिया नामक इस हथियार के सहारे ही प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार पर काबू कर पांए  क्योंकि सिस्टम तो करप्ट है ही और जो लोग सिस्टम का हिस्सा हैं वे अपनी आदतों से मजबूर हैं तो कोई मजबूरी ही उन्हें अपनी सालों पुरानी आदतों से मुक्त कर पाएगी!

    हाल ही में बी.एस.एफ  के जवान तेज बहादुर यादव जो ऐच्छिक सेवा निवृत्ति के तहत 31 जनवरी को रिटायर हो रहे हैं  जाते जाते देश के सामने सेना में सैनिकों की दशा पर प्रश्नचिन्ह लगा गए। कटघड़े में न सिर्फ  वह सेना है  पर जिस पर पूरा देश गर्व करता है बल्कि सरकार के साथ साथ पूरा विपक्ष भी है क्योंकि आज जो विपक्ष में हैं कल वे ही तो सरकार में थे।

    तो 2010 में ही जब कैग ने अपनी रिपोर्ट में पाक और चीन सीमा पर तैनात जवानों को मिलने वाले  भोजन, उसकी  गुणवत्ता  और  मात्रा में भी निम्न स्तर के होने की  जानकार दी थी तो तब की सरकार ने, या फिर आज की सरकार ने 2016 की कैग की रिपोर्ट पर क्या एक्शन लिया?

    कटघड़े में तो सभी खड़े हैं।

    खैर उन्होंने अपनी और अपने साथियों की आवाज को प्रधानमंत्री तथा देशवासियों तक पहुंचाने के लिए इसी हथियार का इस्तेमाल किया।
    ‘भूखे भजन न होए गोपाला, यह रही तेरी घंटी माला’ की तर्ज पर उन्होंने प्रधानमंत्री से गुहार लगाई। उनका वीडियोसोशल मीडिया पर इतना  वाइरल  हुआ कि उनकी जो आवाज उनके सीनियर अधिकारी नहीं सुन पा रहे थे या सुनना नहीं चाह रहे थे उस आवाज को आज पूरा देश सुन रहा है।

    वह आवाज अखबारों की हेडलाइन और चैनलों की प्राइम टाइम कवरेज बन गई है। जो काम 6 सालों से कैग की रिपोर्ट नहीं कर पाई वो एक सैनिक की आवाज कर गई क्योंकि इसे सुनने वाले वो नेता या अधिकारी नहीं थे जिन्हें एक जवान के दर्द से कोई फर्क नहीं पड़ता बल्कि इसे सुनने वाला था वो आम आदमी जो एक दूसरे के दर्द को न सिर्फ समझता है बल्कि महसूस भी करता है। और चूँकि लोकतंत्र में सत्ता की चाबी इसी आम आदमी के हाथ है तो जो दर्द इस आदमी ने महसूस किया है उसका इलाज शायद सत्ताधारियों को अब ढूँढना होगा। खबर के वाइरल होते ही सरकार हरकत में आई जांच के आदेश दिए गए, सरकार अपनी जांच कर रही है और बी.एस.एफ. अपनी। जांच शुरू हो चुकी है और साथ ही आरोप प्रत्यारोंपों का दौर भी। कुछ ‘राष्ट्रवादियों’ का कहना है कि इस प्रकार सेना की बदनामी देश के हित में नहीं है और जो सैनिक दाल पर सवाल उठा रहा है पहले उसका इलाज जरूरी है। उन सभी से एक सवाल।

    देश क्या है? हम सब ही तो देश बनाते हैं। सेना क्या है? यह सैनिक ही तो सेना बनाते हैं। जिस देश की सेना अपने सैनिक के मूल भूत अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकती वह सैनिक उस देश की सीमओं की रक्षा कैसे करेगा? जिस देश की सेना में उसके सैनिक की रोटी तक भ्रष्टाचार के दानव की भेंट चढ़ जाती हो वह भी अपने ही उच्च पद के अधिकारियों के कारण उस देश में हम  किस राष्ट्रवाद की बातें करते हैं ?
    जो लोग सैनिक की इस हरकत को अनुशासनहीनता मान रहे हैं वे स्वयं दिल पर हाथ रखकर कहें कि ऐसे दुर्गम स्थान पर जहाँ जीवित रहने के लिए ही प्रकृति से पल पल संघर्ष  पड़ता है,  वहाँ जो भोजन वीडियो में दिखाया गया है उस भोजन के साथ वे 11 घंटे की ड्यूटी दे सकते हैं।
    जवान द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच जरूर की जानी चाहिए। अगर आरोप सही हैं तो दोषी अधिकारियों को सजा मिले और सैनिकों को न्याय। लेकिन अगर आरोप झूठे हैं तो सेना के कानून के तहत उस जवान पर कार्यवाही निश्चित ही होगी।

    दरअसल भ्रष्टाचार केवल सरकार के सिविल डिपार्टमेंट तक सीमित हो, ऐसा नहीं है, सेना भी इससे अछूती नहीं है। आपको शायद यह जानकार  आश्चर्य हो कि आजाद भारत में  जो सबसे पहला घोटाला सामने आया था वो 1955 में सेना का ही जीप घोटाला था। उसके बाद 1987 में बोफोर्स घोटाला, 1999 ताबूत घोटाला, 2007 राशन आपूर्ति घोटाला, 2009 आदर्श घोटाला, 2013अगस्तावेस्टलैंड घोटाला, यह सभी घोटाले सेना में हुए हैं। रिटायर्ड एयर चीफ एस पी  त्यागी को हाल ही में सीबीआई द्वारा अगस्तावेस्टलैंड घोटाले की जांच के अन्तर्गत  हिरासत में लिया गया है।

    इसके अलावा अभी कुछ समय पहले सेना में प्रोमोशन के सिलसिले में एक नया स्कैम भी सामने आया था जिसके लिए आर्म्ड फोर्स  ट्रिब्यूनल ने रक्षा मंत्रालय और सेना को सिस्टम में वायरस की तरह घुसते भ्रष्टाचार पर काबू करने के लिए कहा है। इसके साथ ही कोर्ट ने एक लेफ्टानेंट जनरल का प्रोमोशन भी रद्द कर दिया था।

    अगर हम वाकई में राष्ट्र हित के विषय मे सोचते हैं तो हमें कुछ ख़ास लोगों द्वारा उनके स्वार्थ पूर्ति के उद्देश्य से बनाए गए स्वघोषित आदर्शों और कुछ भारी भरकम शब्दों के साये से बाहर निकल कर स्वतंत्र रूप से सही और गलत के बीच के अंतर को समझना होगा। एक तथ्य यह भी है कि सेना में डिसिप्लिन सर्वोपरि होता है। हर सैनिक को ट्रेनिंग का पहला पाठ यही पढ़ाया जाता है कि अपने सीनियर की हर बात हर औडर को बिना कोई सवाल पूछे मानना है और यह सही भी है। बिना डिसिप्लिन के आर्मी की कल्पना भी असम्भव है। आप सोच कर सकते हैं कि युद्ध की स्थिति में कोई जवान अपने सीनियर की बात मानने से मना कर दे तो ऐसी इनडिसिप्लिनड  सेना  के कारण उस देश का क्या हश्र होगा। लेकिन एक सत्य यह भी है कि इसी अनुशासन की आड़ में काफी बातें जवान न तो बोलने की हिम्मत जुटा पाते हैं न विरोध कर पाते हैं।

    तो अनुशासन अपनी जगह है लेकिन डिसिप्लिन की आड़ में शोषण न तो  सैनिक के लिए अच्छा है न सेना के लिए।

  • नेता जी ने शायद ऐसा अन्त तो नहीं सोचा होगा

    डा० नीलम महेंद्र


    देश के सबसे बड़े प्रदेश  उत्तर प्रदेश के सबसे शक्तिशाली राजनैतिक परिवार में कुछ समय से चल रहा राजनैतिक ड्रामा लगभग अपने क्लाइमैक्स पर पहुंच ही गया ( कुछ कुछ फेरबदल के साथ )। दरअसल यू पी के  होने वाले चुनावों और मुलायम सिंह की छवि को देखते हुए  केवल उनके राजनैतिक विरोधी ही नहीं बल्कि लगभग हर किसी को उनकी यह पारिवारिक उथल पुथल महज एक ड्रामा ही दिखाई दे रहा था , वो क्या कहते हैं  न महज एक पोलीटिकल स्टंट आखिर वो पटकथा ही क्या जिसके केंद्र में कोई रोमांच न हो  !

    सबकुछ ठीक ही चल रहा था। एक पात्र था  अखिलेश , तो दूसरा  शिवपाल और जिस  को वो दोनों ही पाना चाहते थे , वह थी सत्ता की शक्ति। पटकथा भी बेहद सधी हुई , एक को नायक बनाने के लिए घटनाक्रम लिखे गए तो दूसरा खुदबखुद ही दर्शकों की नजरों में खलनायक बनता गया । 1992 में समाजवादी पार्टी के गठन से लेकर आज तक पार्टी पर नेताजी का पूरा कंट्रोल था ।भले ही अपने भाईयों के साथ उन्होंने इसे सींचा था लेकिन ‘नेताजी  ‘ तो एक ही थे जिनके बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता था। यह उन्हीं की पटकथा का कमाल था कि आज अखिलेश को पार्टी से निकाले जाने के बाद पार्टी के 200 से भी अधिक लगभग 90%  विधायक मुलायम शिवपाल नहीं अखिलेश के साथ हैं 2012 के चुनावी दंगल  में उन्होंने अखिलेश को पहली बार जनता के सामने रखा।

    मुलायम की कूटनीति और अखिलेश की मेहनत से समाजवादी पार्टी की साइकिल ने वो स्पीड पकड़ी कि सबको पछाड़ती हुई आगे निकल गई। शिवपाल की महत्वाकांक्षाओं और अपेक्षाओं के विपरीत अखिलेश को न सिर्फ सी एम की कुर्सी मिली बल्कि जनता को उनका युवराज मिल गया। उनके पूरे कार्यकाल में जनता को यही संदेश गया कि वे एक ऐसे नई पीढ़ी के युवा नेता हैं जो एक नई सोच और जोश के रथ पर यूपी को विकास की राह पर आगे ले जाने के लिए प्रयासरत हैं। वे ईमानदारी और मेहनत से प्रदेश के बुनियादी ढांचे में सुधार से  लाकर आम आदमी के जीवन स्तर को सुधारने के लिए प्रतिबद्ध  हैं  और अपनी इस  छवि निर्माण में  वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं।
    जिस रिकॉर्ड समय में आगरा लखनऊ एकस्प्रेस हाईवे बनकर तैयार हुआ है वह यूपी की नौकरशाही के इतिहास को देखते हुए अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। आज लखनऊ मेट्रो केवल अखिलेश का  ड्रीम प्रोजेक्ट नहीं रह गया है बल्कि उसने यूपी के हर आमोखास की आँखों में भविष्य के सपने और दिल को उम्मीदों की रोशनी से भर दिया है। अखिलेश के सम्पूर्ण कार्यकाल में मुलायम सिंह की सबसे बड़ी उपलब्धि  अखिलेश की यही छवि निर्माण रही।

    किसी भी नेता को जनता का इससे अधिक प्यार क्या मिलेगा कि विकास का जो भी काम हो रहा है उसका क्रेडिट लेने वाला वह अकेला हो लेकिन जो असफलताएं एवं अनुपलब्धियाँ हों वह किसी और के कारण हों । मसलन प्रदेश में गुंडा राज हो या भू माफिया हो अथवा कानून व्यवस्था पर कमजोर पकड़ हो सब अपने चाचा और अपने पिता के आगे एक आज्ञाकारी पुत्र के कुछ बोल न पाने के कारण हो। सार्वजनिक मंचों पर पिता द्वारा अपमानित होकर भी हंसते रहना और कहना कि वो कौन सा बेटा है जो पिता की डाँट खाए बगैर बड़ा हुआ है या फिर चाचा के सामने बेबस हो जाना। यह सभी उस पटकथा का हिस्सा था जिसके पात्रों को यह सब जी रहे थे।

    असली कहानी तब शुरू होती है जब शिवपाल के कहने पर मुलायम ,आजम खान और अमर सिंह से हाथ मिलाते  हैं तो अखिलेश विद्रोह करते हैं। जनता के दिल में अखिलेश के लिए सहानुभूति की लहर दौड़ जाती है और उनकी साफ सुथरी छवि पर जनता की मुहर लग जाती है। फिर  एक दिन मुलायम सपा के उम्मीदवारों की लिस्ट शिवपाल के ‘दबाव ‘ में घोषित करते हैं जिनमें अखिलेश समर्थकों की कोई जगह नहीं है तो दूसरे ही दिन अखिलेश अपनी लिस्ट घोषित करते हैं। लोगों तक स्पष्ट संदेश जाता है कि मुलायम  शिवपाल के ‘दबाव ‘ में हैं न भाई को छोड़ पा रहे हैं न बेटे को । और चूँकि वह लिस्ट अपराधिक तत्वों तथा बाहुबलियों से भरी थी, अखिलेश को मंजूर नहीं थी और ‘साफ सुथरी राजनीति ‘ के लिए वे ‘परिवार ‘ से ऊपर ‘पार्टी ‘ को रखते हैं । यह  अलग बात है कि जो लिस्ट अखिलेश ने जारी की बाहुबली  उसमें भी कम नहीं थे।

    शिवपाल भले ही न जानते हों कि वे क्या कर रहे हैं  (अखिलेश की छवि निर्माण में उनकी बलि ली जा रही है) ) लेकिन मुलायम भली भाँति जानते थे वे क्या कर रहे हैं । 2014 में उन्होंने जब अखिलेश को सी एम की कुर्सी दी थी तो कहा था कि प्रदेश बेटे के हाथों सौंप कर अब वह केंद्र में अपना ध्यान और शक्ति दोनों लगाएंगे। इस दिशा में उन्होंने प्रयास भी किए , लालू के साथ मिलकर महागठबन्धन भी बनाया जो कालांतर में महाठगबन्धन ही साबित हुआ।

    2014 के चुनावों में जनता ने जब सब कुछ कीचड़ कर दिया और पूरे देश में कमल खिला दिया तो वे समझ गए कि केंद्र में उनके पास तो क्या पूरे विपक्ष के पास आज करने के लिए कुछ ख़ास नहीं है तो वापस प्रदेश में ध्यान लगाया लेकिन अब तक लगभग दो साल बीत चुके थे और समय के साथ उन्हीं की दी साइकिल पर बैठ कर बेटा काफी आगे निकल चुका था। जबकि वो प्रदेश से निकल कर केंद्र में जाने की चाह में बहुत पीछे जा चुके थे , हवा के बहाव में वे वहाँ भी खड़े नहीं रह पाए जहाँ पर वह थे।

    दिल्ली तो शुरू से ही दूर थी लेकिन सैफई भी छूट जाएगी इसे जब तक मुलायम समझ पाते तब तक काफी देर हो चुकी थी। मुलायम सोचते थे कि आखिर तक कहानी में पटकथा वो ही चलती है जो लेखक लिखता है लेकिन शायद यह भूल गए कि फिल्म हो या कहानी उसकी पटकथा बेशक लेखक लिखता है लेकिन जिंदगी की पटकथा लिखने वाला तो एक ही है वो परमपिता परमेश्वर और उसके आगे अच्छे अच्छों की पटकथा फेल हो जाती है। जिन पात्रों और जिस पटकथा को ये सभी जी रहे थे उसके कैरेक्टर में सभी इतने इन्वोल्व हो गए कि कलाइमैक्स आते आते वे सभी अपने मूल व्यक्तित्व को भूल कर कैरेक्टर के रंग में रंग चुके थे। शिवपाल अब तक समझ चुके थे कि कुर्सी की डोर उनके हाथों से छूट चुकी है किन्तु हार नहीं मान रहे थे, अपने वफादारों को टिकट दिलवा कर हारी हुई लड़ाई जीतने की कोशिश रहे थे। अखिलेश को अब सत्ता पर किसी और का नियंत्रण  स्वीकार कतई नहीं था  और टिकट देने में स्वतंत्र हाथ चाहते थे।

    मुलायम जिन्होंने पटकथा लिखी थी और कहानी की शुरुआत में जो पात्र उनके हाथों की कथपुतली थे  आज अपनी अपनी डोर से मुक्त हो चुके थे। परदे के पीछे  अखिलेश और शिवपाल को यह याद दिलाने की उनकी हर कोशिश नाकाम होती गई कि वे सिर्फ कहानी के पात्र हैं डायरेक्टर तो स्वयं मुलायम हैं।  लेकिन न तो शिवपाल सुनने को तैयार थे और न ही अखिलेश। पार्टी परिवार और कहानी तीनों ही उनके हाथ से फिसल चुके थे  । जिस पटकथा के अन्त में अखिलेश शिवपाल को चारों खाने चित्त करके विजेता बनकर और मुलायम  एक बेबस भाई और पिता के बीच फंसे ‘ नेताजी ‘बन कर उभरते  जिन्हें जनता की सहानुभूति प्राप्त होती उसका अन्त अब बदल चुका था । बात चुनाव आयोग तक पहुँच गई । जिस अखिलेश ने यू पी के लोगों के दिलों के सहारे सत्ता तक की अपनी राह लगभग पक्की कर ली थी , आज उनका मुकाबला न सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के बाद बदले हुए परिदृश्य से है बल्कि चुनाव आयोग तक पहुँच चुकी सपा की ही अन्दरूनी फूट से भी है । वो चिंगारी कब खेलते  खेलते लौ बन गई खुद मुलायम भी नहीं समझपाए । जो समाजवादी पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने का माद्दा रखती थी आज कांग्रेस के साथ गठबंधन की ओर अग्रसर है।

    जिस राजनीति को मुलायम शतरंज कि बिसात समझ कर खेल रहे थे वे स्वयं उसका मोहरा बन जायेंगे यह तो शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा ।

  • किसका दोष है यह

    डॉ नीलम महेंद्र


    पता नहीं यह दुर्भाग्य केवल उस नौजवान का है या पूरे देश का जिसके झोले में डिग्री , जेब में कलम लेकिन हाथ में झाड़ू और फावड़ा हो ।
    कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में चपरासी अथवा सफाई कर्मचारी के पद के लिए सरकार द्वारा आवेदन मांगें गए थे जिसमें आवश्यकता  368 पदों की थी और योग्यता , प्राथमिक शिक्षा तथा साइकिल चलाना थी। इन पदों के लिए जो आवेदन प्राप्त हुए उनकी संख्या  23 लाख थी जिनमें से 25000 पोस्ट ग्रैजुएट , 255 पीएचडी   , इसके अलावा डाक्टर इंजीनियर और कामर्स विज्ञान जैसे विषयों से ग्रौजुएट शामिल थे।

    आइये अब चलते हैं   मध्यप्रदेश ,जहाँ  हवलदार के  पद के लिए भी कमोबेश इसी प्रकार की स्थिति से देश का सामना होता है, आवश्यकता  14000 पदों की है  ।शैक्षणिक योग्यता  हायर सेकन्डरी लेकिन आवेदक  9.24 लाख के ऊपर  जिनमें  1. www.oldhouseonline.com 19 लाख ग्रैजुएट हैं, 14562 पोस्ट ग्रैजुएट हैं  9629 इंजीनियर हैं 12 पीएचडी हैं ।

    ऐसी ही एक और परिस्थिति, जिसमें  माली के पद के लिए सरकार को लगभग 2000 पीएचडी धारकों के आवेदन प्राप्त हुए।
    जब सम्बन्धित अधिकारियों का ध्यान  पद के लिए आवश्यक योग्यता और आवेदकों की शैक्षणिक योग्यता के बीच इस विसंगति की ओर दिलाया गया   तो उनका कहना था कि हमारा काम परीक्षा कराना है आवेदकों की प्रोफाइल का निरीक्षण करना नहीं।

    इस सबके विपरीत, एक रिपोर्ट जिसके केंद्र में मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों के सरकारी विद्यालयों के  शिक्षक हैं।
    इनकी योग्यता  : देश के प्रधानमंत्री का नाम हो या राष्ट्रपति का नाम , किसी प्रदेश की राजधानी का नाम हो या सामान्य ज्ञान से जुड़ा कोई प्रश्न  , हर प्रश्न  अनुत्तरित  ! किसी भी प्रश्न का उत्तर देने में असक्षम ।

    कोई आश्चर्य नहीं कि इन प्रदेशों की परीक्षाओं के परिणाम  का उदाहरण बिहार माध्यमिक बोर्ड  ( दसवीं की परीक्षा ) में  दिखाई दिया जब बोर्ड को टॉप करने वाले विद्यार्थियों को उन विषयों तक के नाम नहीं पता जिनमें उन्होंने टाप किया है  ।

    लेकिन क्या यह घटनाएँ  हम सभी के लिए  , पूरे देश के लिए  , हमारी सरकारों के लिए एक चिंता का विषय नहीं होना चाहिए  ?
    न केवल समाज का हिस्सा होने के नाते अपितु स्वयं पालक होने के नाते , क्या यह हमारे बच्चों ही नहीं बल्कि इस देश के भी भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है?

    दोष किसे दिया जाए  ! उन्हें जो अयोग्य होते हुए भी अपना स्वयं का वर्तमान सुधारने के लिए शिक्षक के पद पर आसीन तो हैं किन्तु उन बच्चों के भविष्य पर प्रश्न चिह्न लगा रहे हैं जो कि कालांतर में स्वयं इस देश के भविष्य पर ही एक बड़ा प्रश्न चिन्ह बन जाएगा। या फिर उस सिस्टम को जिसमें प्रेतिभावन  युवा  अपने लिए अयोग्य पदों पर भी आवेदन करने के लिए मजबूर हैं और प्रतिभाहीन  व्यक्ति उन जिम्मेदार पदों पर काबिज है जिन पर देश के वर्तमान एवं भविष्य की जिम्मेदारी है।

    दोष उस बच्चे का है जिसे अपने विषय अथवा अपने पाठ्यक्रम का ज्ञान नहीं है अथवा उस शिक्षक का है जिस पर उसे पढ़ाने का जिम्मा है लेकिन स्वयं की अज्ञानता  के कारण उसे पढ़ा नहीं पाता। दोष उस शिक्षक का है जिसने  ‘ कुछ ले दे कर ‘ अथवा  ‘ जुगाड  ‘ से अपनी अयोग्यता के बावजूद किसी योग्य का हक मार कर नौकरी हासिल कर ली या फिर उस अधिकारी का जिसने आवेदक की योग्यता को ज्ञान के बजाय सिक्कों के तराज़ू में तोला! दोष उस अधिकारी का है जिसने अपने कर्तव्य का पालन करने के बजाय उस भ्रष्ट तंत्र के आगे हथियार डाल दिए या फिर उस भ्रष्ट तंत्र का जिसके बने बनाए सिस्टम में उस अधिकारी के पास एक ही रास्ता  होता है या तो सिस्टम में शामिल हो जाओ या फिर बाहर हो जाओ ।

    दोष आखिर किसका है हर उस पुरुष अथवा महिला का जिस पर अपने परिवार को पालने की जिम्मेदारी है जिसके लिए वह येन केन प्रकारेण कोई भी नौकरी पाने  की जुगत लगा लेता है और जो जीतता है वो सिकन्दर बन जाता है या फिर सदियों से चले आ रहे इस तथ्यात्मक सत्य की  कि जिसके पास लाठी होती है भैंस वही ले जाता है  ।

    डारविन ने अपनी “थियोरी आफ इवोल्यूशन ” में ‘सरवाइवल आफ द फिट्टेस्ट ‘ का उल्लेख किया है  अर्थात् जो सबसे ताकतवर होगा वही परिस्थितियों के सामने टिक पाएगा  किन्तु  ‘ताकत ‘ की परिभाषा ही जो समाज अपने लिए एक नई गढ़ ले  ! जहाँ ताकत बौद्धिक शारीरिक मानसिक अथवा आध्यात्मिक से इतर सर्वशक्तिमान ताकत केवल ‘धन’ की अथवा  ‘जुगाड़’ की हो तो दोष किसे दिया जाए  समाज को या  ‘ताकत ‘ को ! दोष किसे दिया जाए उस समाज को जिसमें यह विसंगतियाँ पनप रही हैं और सब खामोश हैं या फिर उस सरकार को जिसका पूरा तंत्र ही भ्रष्ट हो चुका है  ।

    दरअसल हमारे देश में न तो हुनर की कमी है न योग्यता की लेकिन नौकरी के लिए इन दोनों में से किसी को भी प्राथमिकता नहीं दी जाती  । यहाँ नौकरी मिलती है डिग्री से लेकिन डिग्री कैसे मिली यह पूछा नहीं जाता। इस देश और उसके युवा को उस सूर्योदय का इंतजार है जो उसके भविष्य के अंधकार को अपने प्रकाश से दूर करेगा, उसे उस दिन का इंतजार है जब देश अपनी प्रतिभाओं को पहचान कर उनका उचित उपयोग करेगा शोषण नहीं, जिस देश में अपने प्राकृतिक संसाधनों का और मानव संसाधनों दोनों का ही दुरुपयोग होता हो वह देश आगे कैसे जा सकता है  ?

    जहाँ प्रतिभा प्रभाव के आगे हार जाती हो वहाँ प्रभाव जीत तो जाता है लेकिन देश हार जाता है । इस देश के युवा को  उस दिन का इंतजार है जब योग्यता को उसका उचित स्थान एवं सम्मान मिलेगा। नौकरी और पद प्रभाव नहीं प्रतिभा से मिलेंगे  । न तो कोई पढ़ा लिखा बेरोजगार युवा मजबूर होगा अपनी कलम छोड़ कर झाड़ू पकड़ने के लिए न कोई अयोग्य व्यक्ति मजबूर होगा अपने परिवार की जरूरतों को पूरा  करने के लिए किसी योग्य व्यक्ति का हक मारने के लिए, न कोई बच्चा मजबूर होगा किसी अयोग्य शिक्षक से पढ़ने के लिए न कोई अधिकारी मजबूर होगा किसी अपात्र को पात्रता देने के लिए,जहाँ इस देश का युवा सिस्टम से हारने के बजाय सिस्टम को हरा दे जहाँ सिस्टम हार जाए और देश जीत जाए।

  • राष्ट्र गान देशभक्ती की चेतना अवश्य जगाएगा

    डॉ नीलम महेंद्र


    ” एक बालक को देशभक्त नागरिक बनाना आसान है बनिस्बत एक वयस्क के क्योंकि हमारे बचपन के संस्कार ही भविष्य में हमारा व्यक्तित्व बनते हैं।”

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला, सिनेमा हॉल में हर शो से पहले राष्ट्र गान बजाना अनिवार्य होगा। हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है और चूँकि हम लोग अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति बेहद जागरूक हैं और हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हासिल है तो हम हर मुद्दे पर अपनी अपनी प्रतिक्रिया देते हैं और किसी भी फैसले अथवा वक्तव्य को विवाद बना देते हैं, यही हमारे समाज की विशेषता बन गई है।

    किसी सभ्य समाज को अगर यह महसूस होने लगे कि उसके देश का राष्ट्र गान उस पर थोपा जा रहा है और इसके विरोध में स्वर उठने लगें तो यह उस देश के भविष्य के लिए वाकई चिंताजनक विषय है। “राष्ट्र गान” देश प्रेम से परिपूर्ण एक ऐसी संगीत रचना जो उस देश के इतिहास सभ्यता संस्कृति एवं उसके पूर्वजों के संघर्ष की कहानी अपने नागरिकों को याद दिलाती है। “राष्ट्र गान ” जिसे हम सभी ने बचपन से एक साथ मिलकर गाया है, स्कूल में हर रोज़ और 26 जनवरी 15 अगस्त को हर साल। इसके एक एक शब्द के उच्चारण में हम सभी ने एक गर्व, एक अभिमान इस देश पर अपने अधिकार एवं उसके प्रति अपने कर्तव्य, ऐसे अनेकों मिश्रित भावों से युक्त एक स्फूर्ति की लहर अपने भीतर से उठती हुई सी महसूस की है।

    हमारा राष्ट्र गान ‘जन गण मन ‘ जो मूलतः गुरुदेव रबीन्द्र नाथ ठाकुर ने बांग्ला भाषा में लिखा था, भारत सरकार ने 24 जनवरी 1950 को राष्ट्र गान के रूप में अंगीकृत किया था। यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर विश्व के एकमात्र व्यक्ति हैं जिनकी रचना को एक से अधिक देशों में राष्ट्र गान का दर्जा प्राप्त है। बांग्लादेश का राष्ट्र गान ‘आमार सोनार बांग्ला’ भी उन्हीं की रचना है।

    विश्व के हर देश का अपना राष्ट्र गान है और उसके सम्मान से जुड़े कानून। जैसे यूनाइटेड स्टेट्स में जब भी राष्ट्र गान बजता है, सभी को सावधान की मुद्रा में अपना दांयाँ हाथ अपने सीने (दिल ) पर रखकर अपने राष्ट्रीय ध्वज की ओर मुख करके खड़ा रहना होता है और अगर राष्ट्रीय ध्वज मौजूद न हो तो राष्ट्र गान के स्रोत की ओर मुख करके खड़ा होना आवश्यक है। थाइलैंड में हर रोज राष्ट्रीय टेलीविजन पर प्रात: 8 बजे और संध्या 6 बजे उनके राष्ट्र गान का प्रसारण होता है तथा स्कूलों में रोज बच्चे सुबह 8 बजे अपने राष्ट्रीय ध्वज के सामने राष्ट्र गान गाते हैं। इतना ही नहीं सरकारी कार्यालयों एवं सिनेमाघरों में भी इसे नियमित रूप से बजाया जाता है।

    रशिया में भी अपने राष्ट्र गान का अनादर करने पर आर्थिक दंड के साथ साथ जेल में डाल देने का प्रावधान है। अफ्रीका के एक देश ‘डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ काँगो’ का राष्ट्र गान अपने नागरिकों से पूछता है “एंड इफ वी हैव टू डाई , डज़ इट रीयली मैटर?” अर्थात् अगर हमें अपनी जान भी देनी पड़े तो भी क्या फर्क पड़ता है?

    यहाँ पर इन तथ्यों का उल्लेख इसलिए नहीं किया गया है कि चूँकि अन्य देशों में ऐसा होता है तो हमारे देश में भी होना चाहिए और ऐसा भी नहीं है कि अगर अन्य देशों में ऐसा कुछ नहीं है तो फिर हमारे देश में क्यों?

    दरअसल इन तथ्यों का उल्लेख इसलिए कि हम इस भावना के मूल को समझें कि जितना यह सत्य है कि दुनिया के हर देश के नागरिक अपने देश से प्रेम करते हैं और उनके ह्रदय में अपने देश के लिए अभूतपूर्व सम्मान की भावना होती है उतना ही बड़ा एक सत्य यह भी है कि जिस देश के नागरिक अपने देश से प्रेम एवं उसका सम्मान नहीं करते वह देश गुलामी की राह पर अग्रसर होने लगता है। हम सभी अपने माता पिता से प्रेम करते हैं उनका सम्मान करते हैं। हमारी संस्कृति हमें सिखाती है कि अपने दिन की शुरुआत हम अपने से बड़ों का आशीर्वाद लेकर करें और उनका स्मरण उनका आशीर्वाद लेने का कोई दिन अथवा समय निश्चित नहीं है हम जब भी चाहें ले सकते हैं किसी विशेष दिन का इंतजार नहीं करते कि अपने जन्मदिन पर ही लेंगे या फिर नए साल पर ही लेंगे तो फिर यह देश जो हम सबकी शान है हमारा पालनहार है उसके आदर उसके सम्मान के दिन सीमित क्यों हों उसके लिए केवल कुछ विशेष दिन ही निश्चित क्यों हों?

    एक तथ्य यह भी है कि आज के इस दौर में कोई भी व्यक्ति फिल्म देखने सप्ताह अथवा महीने में एक बार या अधिक से अधिक दो बार ही जाता होगा रोज रोज दिन में तीनों चारों शो तो शायद ही कोई देखता हो तो सप्ताह अथवा महीने में एक या दो बार भी हमें अपने राष्ट्र गान को सम्मान देने में कठिनाई हो रही है, यह एक विचारणीय विषय है।

    कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि जब हम फिल्म देखने जाते हैं तो हम मनोरंजन के लिए जाते हैं तो ऐसे में राष्ट्र गान और मनोरंजन दोनों मानसिक स्थितियाँ मेल नहीं खातीं तो एक उदाहरण का उल्लेख यहाँ उचित होगा।

    स्कूल के दिनों में बच्चे फ्री पीरियड या फिर गेम्स पीरीयड के लिए लालायित रहते हैं और इन पीरियड में वे निश्चिंत होकर खेलते हैं लेकिन अगर उस समय उनके सामने प्राचार्य या अध्यापक कोई भी आ जाता है तो वे अपना खेल रोककर उनका अभिवादन करना नहीं भूलते। वे यह नहीं कहते कि अभी तो हम खेल रहे हैं हम अपने मनोरंजन में बाधा नहीं डाल सकते इसलिए आपका अभिवादन बाद में करेंगे आखिर स्वतंत्रता और स्वछन्दता में एक महीन सा अन्तर होता है । वही पतंग आकाश में ऊँची उड़ान भर पाती है जो अपनी डोर से बंधी हो इसलिए नियमों के बन्धन ऊँची उड़ान के लिए आवश्यक होते हैं। आप मनोरंजन के लिए लाँग ड्राइव पर जा रहे हैं तो गाड़ी की स्पीड रोमांच और मनोरंजन दोनों देती है लेकिन आपकी कुशलता के लिए आपका अपनी गाड़ी की गति पर नियंत्रण आवश्यक है । अगर आपकी गाड़ी कहे कि इस समय तो मैं ऊँची उड़ान और तेज रफतार की मानसिक स्थिति में हूँ मैं ब्रेक नहीं लगने दूंगी तो आप अंदाज लगा सकते हैं आपकी क्या दशा होगी। तो आप मनोरंजन के लिए जाएं लेकिन फिल्म से पहले राष्ट्र गान के रूप में अपने राष्ट्र के गौरव को याद करने एवं उसके प्रति सम्मान का प्रदर्शन करने से आपके मनोरंजन में कोई कमी नहीं आएगी अपितु एक राष्ट्र प्रेम की चेतना अवश्य आ जाएगी।

    यहाँ कुछ व्यवहारिक परेशानी विकलांगों के साथ अवश्य हो सकती है तो सरकार एवं सिनेमाघर यह सुनिश्चित करें कि विकलांगों के बैठने की व्यवस्था अलग से की जाए ताकि राष्ट्र गान के समय न तो इन्हें असुविधा हो और न ही इनके खड़े न होने की स्थिति में वहाँ के वातावरण में अराजकता अथवा असंतोष की कोई अप्रिय स्थिति निर्मित हो।

    यहाँ पर यह जानकारी रोचक होगी कि चीन से युद्ध के बाद भारत के सिनेमाघरों में फिल्म खत्म होने के बाद राष्ट्र गान बजाने की परंपरा थी लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद लोगों के बाहर निकलने की जल्दी में राष्ट्र गान का अनादर होने की स्थिति में इस परम्परा को कालांतर में बन्द कर दिया गया था हालांकि एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली सरकार के मनोरंजन कर विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सिनेमाघरों को सरकार की ओर से कभी भी यह आदेश नहीं दिया गया कि राष्ट्र गान बन्द कर दिया जाए।

    तो 30 सितंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा निर्देश निश्चित ही सराहनीय हैं न सिर्फ देश के वर्तमान के लिए बल्कि उसके भविष्य के लिए भी लेकिन हर बात को विवाद बना देना न तो देश के वर्तमान के लिए अच्छा है न भविष्य के लिए।