पाखंड की पाठशाला के प्राचार्य सिंह साहब दी ग्रेट !
लल्लू लाल पैदा तो गांव में ही हो गये थे ,पर मजाल कि गामड़पन उनको छू भी ले ।
अपनी ग्रामीण पहचान से पिंड छुड़ाने के लिए उन्होंने उस जमाने में जैसे तैसे आठवीं पास की ,हुनरमंद इतने थे कि मास्टर के लिए पड़ौसी के खेत से ककड़ी ,भिंडी ,भुट्टे और बालियां चुराकर खुद के खेत की बता कर गुरुदक्षिणा दे आते थे।
बालक लल्लू की इस दक्षता से प्रभावित मास्टरजी ने उसे 8 वी तक पास किया, बाद में महकमा ए पुलिस ऑफ राजस्थान में लल्लूजी को रंगरूट बनने का अवसर मिल गया।
जब लल्लूजी बावर्दी हो गए, मूंछे बढ़ा ली ,तनख्वाह भी आने लगी ,शादी भी हो गई, हर चीज़ बदली तो लल्लू लाल जी ने ललन सिंह नाम रख लिया।
ज़िंदगी बड़ी शान से कटने लगी,जल्दी ही पुलिसिया दांव पेंच और जरूरी कमीनगी उनमें आ गई, सब ठीक चल रहा था, पर घर जाने के मौके कम थे, पुलिस की सर्विस में नये नये भर्ती होने वाले रंगरूटों की शारिरिक भूख की चिंता किसे रहती है, ऊपर से इकहरे बदन के नवजवान ललन सिंह की ड्यूटी अक्सर अफसरों के घरों में लगाई जाने लगी।
ललन सिंह जल भुनकर राख हो गये, ये भी कोई नौकरी है भला ,जिसमें अफसरों और ऊनकी बीबियों तक के चड्डी बनियान धोने सुखाने पड़ रहे हैं ।
ललन सिंह ने विद्रोह कर दिया, पुलिस की हड़ताल में शामिल होने का विचार कर लिया,आला अधिकारियों तक बात पहुंची तो उनकी फील्ड पोस्टिंग हो गई, थाने में लगा दिया गया।
ललन सिंह अफसरों के घरों की बेगारी से मुक्त होने की खुशी से सरोबार ही थे कि उनके जीवन में वो घटित हो गया जो घटना ही नही चाहिये, पर हो गया तो हो गया ,क्या कर सकते थे ।
तो संतों ,कथा उस रात की है ,जब वर्दी लगाये, टोपी चढ़ाये, जूतों की फ़ीते कसकर बांधे, कांस्टेबल ललन सिंह हाथ में डंडा लिये रात्रि गश्त पर निकले, उनमें देशभक्ति और पत्नी से आसक्ति दोनों ही भाव हिलोरें मार रहे थे, पर वो संस्कारों के वशीभूत होकर आमजन की सुरक्षा में सन्नद्ध हुये एक गली में यहाँ वहाँ विचर रहे थे। तभी किसी सुघड़ गृहस्थ युगल ने रात्रि के प्रथम प्रहर का पहला राष्ट्रीय कार्यक्रम सम्पादित किया और स्वच्छ भारत की समझ से अनजान व्यक्ति की भांति सहायक सामग्री को खिड़की खोलकर गली में फेंक दिया, वो क्या जाने कि सड़क पर ललन सिंह की क्रांतिकारी रूह सदेह विचरण कर रही है।
पुराना जमाना था, आज जितने फ़्लेवर की सहायक सामग्री कहाँ उपलब्ध होती थी, एक मात्र उपलब्ध साधन परिवार नियोजन वालों द्वारा प्रदत्त गुब्बारा ही था , जो बच्चों के हाथ लगता तो वे मुंह से फुला कर मनोरंजन कर लेते थे,बड़ो के हाथ लगता तो वे अपनी तरह से उसका उपयोग उपभोग करते थे ..
…. तो महानुभावों, काम मे आया सफेद मटमैला लिजलिजा सा गुब्बारा सीधे ललन सिंह की टोपी पर गिरा और वहीं स्थिर हो गया, ललन शर्म और क्रोध के मारे थर थर कांपने लगे ,उन्होंने बगावत करने की ठान ली।
वे इससे ज्यादा बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थे, सो अनुशासन फ़ासन को धत्ता बताते हुए सीधे हड़ताल में शरीक हो गये, सस्पेंड हुये और जल्दी ही टर्मिनेट भी हो गए, हालांकि जब समझ आई तो लिखित में माफी मांगी, टेसुए बहाये, नाक रगड़ी ,भीख मांगी ,दया की याचना की, पर कोई करतब काम न आया ,घर बैठना पड़ा।
गांव लौटे तो खाने कमाने का संकट खड़ा हो गया,हराम की कमाई बन्द हो चुकी थी ,तब तक दो तीन शादियां कर चुके ,पहली छोड़कर भाग गई, दूसरी बीमारी से चल बसी ,उसकी मौत को 15 दिन भी नहीं बीते कि तीसरी औरत घर ला बिठाई ,दरअसल विषय भोग के मामले में ललन सिंह खुले सांड ही थे ,उन्हें बिना पत्नी जीवन सारहीन लगता था।
वैसे भी पुलिस की नौकरी छोड़कर वे साईकल पर दूध बेचने वाले ‘कान्हा’ हो चुके थे ,ऐसे में शादी तो जरूरी थी,सो कर डाली ।
दूध से भी भला कोई घर चलता है ? कितना ही पानी मिलाओ पानी का पैसा पानी में ही चला जाता है, इसलिये मजदूरी का काम भी करना शुरू कर दिया ,इसी दौरान किसी संस्था के सम्पर्क में आ गए ।
अचानक ललन सिंह बड़ी बड़ी महान महान बातें करने लगे ,वो किसान नेता हो गये और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भाषण पेलने लगे, हारमोनियम तो बजा लेते ही थे ,भजन और गाने लगे ,इस तरह वे पुलिस, दूधिया ,कारीगर ,मजदूर ,किसान और आध्यात्मिक ,वैचारिक महापुरुष के रूप में स्थापित हो गये ।
ओशो के एक्टिव मेडिटेशन से शुरू हो कर यू जी कृष्णमूर्ति तक होते हुये गोयनका जी की विपश्यना तक पहुंच गयेे। हालांकि इन सबके बावजूद भी ललन सिंह पक्के खल ,कुटिल और कामी तो बने रहे ।
उन्होंने अपनी हर उद्दंडता को सिद्धांतों का सुंदर जामा पहनाना सीख लिया, अब वे लाल बाबा हो गये, प्रेम की विशुद्ध व्याख्या करने लगे ,उम्र 60 को पार कर रही थी, पर दैहिक ताप बढ़ता जा रहा था,प्रोटेस्ट ग्रंथि भी बढ़ रही थी, अनायास ही उनमें ‘काम गुरु’ बनने का भाव अत्यंत सघन हो गया, सामाजिक बदलाव के सपने को साकार करने आई मध्यवर्ती युवक युवतियों से वे काम गुरु के रूप में बर्ताव करने लगे,धीरे धीरे उनकी कामुक छवि काफी मजबूत हो गई तो संस्था ने उनसे पिंड छुड़ाने की तरकीब निकाली और ऐसे स्थान पर भेज दिया जहाँ पर वे अपनी ढलती उम्र के प्यार के साथ पूरी बेशर्मी से वक्त गुजारने लगे।
लल्लू लाल जी उर्फ ललन सिंह उपाख्य लाल बाबा सदैव गांव, गरीबी , किसान ,मजदूरी ,धर्म अध्यात्म और निस्वार्थ भाव की करते पर साथ ही साथ कमीशन मिलने वाले बिजनेस भी कर लेते ,सरकार की हर योजना का फायदा गरीब से पहले उन्होंने उठाया ,खुलकर राजनीति की, समानता, संविधान और लोकतंत्र का हर बात में जिक्र करते,पर व्यवहार में पक्के जातिवादी तत्व थे, पूरी ज़िंदगी उन्होंने बहुत चालाकी से दोहरा जीवन जिया।
इतना दोगलापन कि लोग उनके मुंह पर ही उन्हें पाखंड की पाठशाला का प्राचार्य कहने लगे पर उन्होंने इस बात का कभी बुरा नहीं माना, वे सतवादी हरिचन्द बन चुके थे ,झूठ को भी सच की भांति बोलने लगे थे और महिलाओं का यौन शोषण भी दैहिक स्वतंत्रता के नाम पर करते थे।बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम के वे जीवंत प्रतीक बन चुके थे।
लाल सा इस सदी के सबसे महान सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक पाखंडी पुरुष साबित हुये, हालांकि इतिहास ने उनके साथ न्याय नहीं किया ,उनकी करतूतों पर कोई किताब नहीं लिखी गई।
संतों ,वैसे तो इस काल्पनिक कथा का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से सीधे सीधे कोई संबंध नहीं है ,पर ऐसे लाल बुझक्कडों से सम्पूर्ण भारत भरा पड़ा है।