समझदारों की समझ

Bhanwar Meghwanshi संपादक – शून्यकाल [themify_hr color=”red”] एक सेकुलर ने दूसरे सेकुलर को सेकुलरिज्म समझाया दूसरे को समझ में आ गया हालाँकि दोनों ही पहले से समझे हुए थे । एक लोकतंत्र समर्थक ने दूसरे जम्हूरियत पसन्द इंसान को डेमोक्रेसी पर सहमत किया सहमति बन गयी क्योकि उनमे पहले से ही सहमति थी । एक साम्राज्यवाद विरोधी ने दूसरे फासीवाद विरोधी को इंक़लाब भेजा। लौट आया तुरंत ही इंक़लाब, इस… Continue reading

पाखण्डी जातिवाद

भंवर मेघवंशी मुझे कुछ कहना है जाति विरोधी मगर घनघोर जातिवादी एक्टिविस्टों से ! जातिवादी गटर के घृणित कीड़ों तुमसे यह भी ना हुआ बर्दाश्त कि कोई दलित पहन ले तुमसे अच्छे कपड़े रहे तुमसे बड़े मकान में . तुम साईकिलो के मारते रहो पैडल या घसीटते रहो पग पैदल पैदल और तुम्हारा ही साथी दलित बैठने लगे गाड़ियों में . भले ही तुम सामाजिक कार्यकर्ता की खाल ओढ़ चुके… Continue reading

महज इंसान

भवंर मेघवंशी पैदा होना तुम्हारी जाति धर्म व देश में मेरे वश की बात ही कहां थी ? मेरा चयन नहीं था ये जानता हूं यह सिर्फ संयोगवश ही हुआ होगा फिर इन पर गर्व कैसा ? जाति की जकड़न धर्म की अकड़न देश की सिकुड़न सुहाती नहीं मुझको. स्वदेश स्वधर्म स्वजाति जैसे भारी भरकम शब्द लगते है बोझ से. मैं दिल से चाहता हूं कि खुद को मुक्त कर… Continue reading

क्रांतिकारी बदलाव

भंवर मेघवंशी बैलगाड़ी से जाते हुये उन्होंने मेरे दादा से गांव की ही बोली में पूछी थी उनकी "जात" उन्होंने विनीत भाव से बता दी. वे नाराज हुये और चले गये उतार कर गाड़ी से उनको दादा ने इसको अपनी नियती माना. फिर एक दिन रेलयात्रा के दौरान उन्होंने मीठे स्वर में खड़ी बोली में जाननी चाही मेरे पिता से उनकी "जाति" पिता थोड़ा रूष्ट हुये फिर भी उन्होंने दे… Continue reading

भ्रूण नहीं होते है अवैध

भंवर मेघवंशी वैध या अवैध नहीं होते है भ्रूण वे तो सिर्फ भ्रूण होते है. नहीं होती है संतानें कभी भी नाज़ायज रिश्ते भी नहीं होते अवैध जुड़ना भला कैसे हो सकता है अवैध ! जब जुड़ते है दो जन तब ही तो बनते है रिश्ते. धर्म,कानून,समाज प्रथाएं और खांपें होती है अवैध. भ्रूण तो कुदरती है और रिश्ते रूहानी होते है भ्रूण सजीवन होते है प्रारम्भ से, वे कभी… Continue reading

राष्ट्र के नाम पर

भंवर मेघवंशी राजा – मरवाता रहा सैनिक प्रजा – देती रही श्रद्धांजलियाँ रह रह कर उठता रहा ज्वार राष्ट्रभक्ति का .. चलती रही गोलियां मरते रहे इन्सान बहता रहा लहू चीखते रहे चेनल्स प्रजा मनाती रही जश्न शहीदों को चढ़ाती रही पुष्प राजा करता रहा राज इसके अलावा वह कर भी क्या सकता था बेचारा युद्ध चलता रहा सैनिक मरते रहे राष्ट्र बहुत खुश था जब युद्ध का उन्माद फैल… Continue reading