Tag: Bhanwar Meghwanshi

  • युध्द, राष्ट्र और राजा

    युध्द, राष्ट्र और राजा

    Bhanwar Meghwanshi

    एक दौर की बात है,
    एक देश था,एक राजा था
    चुना हुआ प्रतिनिधि
    पर उसे राजा होने का
    गुमान था।

    देश के लिए,देश के नाम पर
    उसने सब कुछ किया।
    कुर्बानियां दी,बलिदान किये
    शहादतें करवाई।
    वैसे ही,जैसे हर राजा करवाता है ।

    राजा –
    मरवाता रहा सैनिक
    प्रजा –
    देती रही श्रद्धांजलियाँ

    रह रह कर
    उठता रहा ज्वार 
    राष्ट्रभक्ति का ..

    चलती रही गोलियां 
    होते रहे विस्फोट
    मरते रहे सैनिक
    बहता रहा लहू 
    चीखते रहे चैनल्स

    प्रजा 
    मनाती रही शोक
    शहीदों को चढ़ाती रही पुष्प

    राजा 
    करता रहा राज 
    इसके अलावा वह 
    कर भी क्या सकता था बेचारा ?

    शहादत का ज्वार 
    उठता रहा,गिरता रहा
    कूटनीति का वार
    चलता रहा,छलता रहा।

    देशभक्त जनता
    सड़कों पर आ गई
    आक्रोश कर गया हद पार 
    युद्ध करो,युद्ध करो
    के नारे गूंजने लगे।

    जब युद्ध का उन्माद 
    फैल गया पूरे राष्ट्र में 
    तब राजा ने
    दुखी राष्ट्र को संबोधित किया
    आक्रोशित राष्ट्र के नाम सन्देश दिया

    राष्ट्र से की
    अपने मन की बात
    राष्ट्र के नाम पर खरीदे हथियार
    राष्ट्र के नाम पर लड़ा गया चुनाव
    और राष्ट्र ही के नाम पर जीता भी

    राजा बड़ा नेक था
    और राष्ट्रभक्त भी
    उसने सब कुछ
    राष्ट्र के नाम पर किया

    तब से राष्ट्र और राजा में 
    कोई फर्क ही नहीं बचा
    राजा ही राष्ट्र हो गया 
    और राष्ट्र ही राजा 
    इस तरह अवतरित हुआ
    ” राष्ट्र राज्य .”

    उसके बाद 
    फिर वहां 
    न चुनाव की जरुरत पड़ी
    न लोकतंत्र की,
    और न ही संविधान की
    सारे झमेलों से
    मुक्त हो गया राष्ट्र
    इस तरह राष्ट्र के लिए
    बहुत उपयोगी साबित हुआ युद्ध

    Bhanwar Meghwanshi

  • गाय कटने से बाढ़ नहीं आती अंधभक्तों !

    गाय कटने से बाढ़ नहीं आती अंधभक्तों !

    Bhanwar Meghwanshi

    कुछ लोग केरल आपदा को गाय से जोड़ रहे है तो कुछ सबरीमाला मन्दिर में स्त्री प्रवेश से ।

    दोनो ही तरह के बंदबुद्धि भक्तों को यह समझना पड़ेगा कि ऐसी अवैज्ञानिक और मूर्खतापूर्ण बातें सिर्फ जबानी जुमलेबाजी करने तक ही ठीक हो सकती है ,वरना तर्क की कसौटी पर तो यह कतई खरी नहीं उतरती है ।

    इस भक्त प्रजाति को कहना चाहता हूं कि गायें सिर्फ केरल में ही नही कटती ,गोवा ,बंगाल और पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यो सहित विश्व भर के सैंकड़ों देशों में गौकशी होती है । वहां पर अभी सब कुछ सामान्य है ।

    जिन्हें लगता है कि यह सबरीमाला मन्दिर की वजह से हुआ है, उनको भी अपने मस्तिष्क को खोलना होगा कि दुनियाभर के तमाम मंदिरों व अन्य धर्मस्थलों में स्त्रियां प्रविष्ट होती है, वहां कोई दिक्कत नहीं है।

    केरल की बाढ़ अत्यधिक बारिश की वजह से है ,यह कुदरत का निजाम है, इसकी चपेट में आस्तिक नास्तिक सब है ,जो गाय को पूजते है वो भी डूब रहे है और जो गाय खाते हैं वो भी, जो मन्दिर जाते है वह भी मर रहे है और जो ईश्वर में यकीन नहीं रखते है वो भी, जो पानी के कहर से बचे हुये है, वो सभी आराम से जिंदा है।

    बाढ़ के वैज्ञानिक कारण है, यह गौहत्या अथवा सबरीमाला से जुड़ा हुआ मामला नहीं है, यह समय केरल के मुसीबतजदा भारतीयों की मदद करने का है, गाय और सबरीमाला के नाम पर मूर्खतापूर्ण बातें करने का नहीं है।

    यह बाढ़ केरल के हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, आस्तिक, नास्तिक, कम्युनिष्ट, कांग्रेसी, भाजपाई सबको लील रहा है, बिना विचारधारा का फरक किये, बिना धर्म, जाति पूछे। इसलिए अगर कुछ कर सके तो कीजिये, नहीं कर सकते है तो चुप रहिये, मगर ऐसी बेहूदी बातें मत कीजिये। यह वक़्त केरल के साथ खड़े होकर सच्चे भारतीय होने का फर्ज अदा करने का है, अपनी मूर्खता दिखाने का नहीं।

    Bhanwar Meghwanshi


    Bhanwar Meghwanshi

  • पाखंड की पाठशाला के प्राचार्य – सिंह साहब दी ग्रेट

    पाखंड की पाठशाला के प्राचार्य – सिंह साहब दी ग्रेट

    Bhanwar Meghwanshi

    पाखंड की पाठशाला के प्राचार्य सिंह साहब दी ग्रेट !

    लल्लू लाल पैदा तो गांव में ही हो गये थे ,पर मजाल कि गामड़पन उनको छू भी ले ।

    अपनी ग्रामीण पहचान से पिंड छुड़ाने के लिए उन्होंने उस जमाने में जैसे तैसे आठवीं पास की ,हुनरमंद इतने थे कि मास्टर के लिए पड़ौसी के खेत से ककड़ी ,भिंडी ,भुट्टे और बालियां चुराकर खुद के खेत की बता कर गुरुदक्षिणा दे आते थे।

    बालक लल्लू की इस दक्षता से प्रभावित मास्टरजी ने उसे 8 वी तक पास किया, बाद में महकमा ए पुलिस ऑफ राजस्थान में लल्लूजी को रंगरूट बनने का अवसर मिल गया।

    जब लल्लूजी बावर्दी हो गए, मूंछे बढ़ा ली ,तनख्वाह भी आने लगी ,शादी भी हो गई, हर चीज़ बदली तो लल्लू लाल जी ने ललन सिंह नाम रख लिया।

    ज़िंदगी बड़ी शान से कटने लगी,जल्दी ही पुलिसिया दांव पेंच और जरूरी कमीनगी उनमें आ गई, सब ठीक चल रहा था, पर घर जाने के मौके कम थे, पुलिस की सर्विस में नये नये भर्ती होने वाले रंगरूटों की शारिरिक भूख की चिंता किसे रहती है, ऊपर से इकहरे बदन के नवजवान ललन सिंह की ड्यूटी अक्सर अफसरों के घरों में लगाई जाने लगी।

    ललन सिंह जल भुनकर राख हो गये, ये भी कोई नौकरी है भला ,जिसमें अफसरों और ऊनकी बीबियों तक के चड्डी बनियान धोने सुखाने पड़ रहे हैं ।

    ललन सिंह ने विद्रोह कर दिया, पुलिस की हड़ताल में शामिल होने का विचार कर लिया,आला अधिकारियों तक बात पहुंची तो उनकी फील्ड पोस्टिंग हो गई, थाने में लगा दिया गया।

    ललन सिंह अफसरों के घरों की बेगारी से मुक्त होने की खुशी से सरोबार ही थे कि उनके जीवन में वो घटित हो गया जो घटना ही नही चाहिये, पर हो गया तो हो गया ,क्या कर सकते थे ।

    तो संतों ,कथा उस रात की है ,जब वर्दी लगाये, टोपी चढ़ाये, जूतों की फ़ीते कसकर बांधे, कांस्टेबल ललन सिंह हाथ में डंडा लिये रात्रि गश्त पर निकले, उनमें देशभक्ति और पत्नी से आसक्ति दोनों ही भाव हिलोरें मार रहे थे, पर वो संस्कारों के वशीभूत होकर आमजन की सुरक्षा में सन्नद्ध हुये एक गली में यहाँ वहाँ विचर रहे थे। तभी किसी सुघड़ गृहस्थ युगल ने रात्रि के प्रथम प्रहर का पहला राष्ट्रीय कार्यक्रम सम्पादित किया और स्वच्छ भारत की समझ से अनजान व्यक्ति की भांति सहायक सामग्री को खिड़की खोलकर गली में फेंक दिया, वो क्या जाने कि सड़क पर ललन सिंह की क्रांतिकारी रूह सदेह विचरण कर रही है।

    पुराना जमाना था, आज जितने फ़्लेवर की सहायक सामग्री कहाँ उपलब्ध होती थी, एक मात्र उपलब्ध साधन परिवार नियोजन वालों द्वारा प्रदत्त गुब्बारा ही था , जो बच्चों के हाथ लगता तो वे मुंह से फुला कर मनोरंजन कर लेते थे,बड़ो के हाथ लगता तो वे अपनी तरह से उसका उपयोग उपभोग करते थे ..

    …. तो महानुभावों, काम मे आया सफेद मटमैला लिजलिजा सा गुब्बारा सीधे ललन सिंह की टोपी पर गिरा और वहीं स्थिर हो गया, ललन शर्म और क्रोध के मारे थर थर कांपने लगे ,उन्होंने बगावत करने की ठान ली।

    वे इससे ज्यादा बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थे, सो अनुशासन फ़ासन को धत्ता बताते हुए सीधे हड़ताल में शरीक हो गये, सस्पेंड हुये और जल्दी ही टर्मिनेट भी हो गए, हालांकि जब समझ आई तो लिखित में माफी मांगी, टेसुए बहाये, नाक रगड़ी ,भीख मांगी ,दया की याचना की, पर कोई करतब काम न आया ,घर बैठना पड़ा।

    गांव लौटे तो खाने कमाने का संकट खड़ा हो गया,हराम की कमाई बन्द हो चुकी थी ,तब तक दो तीन शादियां कर चुके ,पहली छोड़कर भाग गई, दूसरी बीमारी से चल बसी ,उसकी मौत को 15 दिन भी नहीं बीते कि तीसरी औरत घर ला बिठाई ,दरअसल विषय भोग के मामले में ललन सिंह खुले सांड ही थे ,उन्हें बिना पत्नी जीवन सारहीन लगता था।

    वैसे भी पुलिस की नौकरी छोड़कर वे साईकल पर दूध बेचने वाले ‘कान्हा’ हो चुके थे ,ऐसे में शादी तो जरूरी थी,सो कर डाली ।

    दूध से भी भला कोई घर चलता है ? कितना ही पानी मिलाओ पानी का पैसा पानी में ही चला जाता है, इसलिये मजदूरी का काम भी करना शुरू कर दिया ,इसी दौरान किसी संस्था के सम्पर्क में आ गए ।

    अचानक ललन सिंह बड़ी बड़ी महान महान बातें करने लगे ,वो किसान नेता हो गये और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भाषण पेलने लगे, हारमोनियम तो बजा लेते ही थे ,भजन और गाने लगे ,इस तरह वे पुलिस, दूधिया ,कारीगर ,मजदूर ,किसान और आध्यात्मिक ,वैचारिक महापुरुष के रूप में स्थापित हो गये ।

    ओशो के एक्टिव मेडिटेशन से शुरू हो कर यू जी कृष्णमूर्ति तक होते हुये गोयनका जी की विपश्यना तक पहुंच गयेे। हालांकि इन सबके बावजूद भी ललन सिंह पक्के खल ,कुटिल और कामी तो बने रहे ।

    उन्होंने अपनी हर उद्दंडता को सिद्धांतों का सुंदर जामा पहनाना सीख लिया, अब वे लाल बाबा हो गये, प्रेम की विशुद्ध व्याख्या करने लगे ,उम्र 60 को पार कर रही थी, पर दैहिक ताप बढ़ता जा रहा था,प्रोटेस्ट ग्रंथि भी बढ़ रही थी, अनायास ही उनमें ‘काम गुरु’ बनने का भाव अत्यंत सघन हो गया, सामाजिक बदलाव के सपने को साकार करने आई मध्यवर्ती युवक युवतियों से वे काम गुरु के रूप में बर्ताव करने लगे,धीरे धीरे उनकी कामुक छवि काफी मजबूत हो गई तो संस्था ने उनसे पिंड छुड़ाने की तरकीब निकाली और ऐसे स्थान पर भेज दिया जहाँ पर वे अपनी ढलती उम्र के प्यार के साथ पूरी बेशर्मी से वक्त गुजारने लगे।

    लल्लू लाल जी उर्फ ललन सिंह उपाख्य लाल बाबा सदैव गांव, गरीबी , किसान ,मजदूरी ,धर्म अध्यात्म और निस्वार्थ भाव की करते पर साथ ही साथ कमीशन मिलने वाले बिजनेस भी कर लेते ,सरकार की हर योजना का फायदा गरीब से पहले उन्होंने उठाया ,खुलकर राजनीति की, समानता, संविधान और लोकतंत्र का हर बात में जिक्र करते,पर व्यवहार में पक्के जातिवादी तत्व थे, पूरी ज़िंदगी उन्होंने बहुत चालाकी से दोहरा जीवन जिया।

    इतना दोगलापन कि लोग उनके मुंह पर ही उन्हें पाखंड की पाठशाला का प्राचार्य कहने लगे पर उन्होंने इस बात का कभी बुरा नहीं माना, वे सतवादी हरिचन्द बन चुके थे ,झूठ को भी सच की भांति बोलने लगे थे और महिलाओं का यौन शोषण भी दैहिक स्वतंत्रता के नाम पर करते थे।बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम के वे जीवंत प्रतीक बन चुके थे।

    लाल सा इस सदी के सबसे महान सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक पाखंडी पुरुष साबित हुये, हालांकि इतिहास ने उनके साथ न्याय नहीं किया ,उनकी करतूतों पर कोई किताब नहीं लिखी गई।

    संतों ,वैसे तो इस काल्पनिक कथा का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से सीधे सीधे कोई संबंध नहीं है ,पर ऐसे लाल बुझक्कडों से सम्पूर्ण भारत भरा पड़ा है।

    Bhanwar Meghwanshi


    Bhanwar Meghwanshi

  • हीरे जैसा मोती लाल-लाल

    हीरे जैसा मोती लाल-लाल

    Bhanwar Meghwanshi

    हीरे जैसा मोती – लाल लाल !!

    सुना है कि भीलवाड़ा में कोई लाल मोती है ,आर टी आई का धंधा करता है ?

    उसका नाम ,पता और नम्बर किसी के पास हो तो मुहैया करवाएं ,किसी गैंडा स्वामी का पट्टशिष्य बताया जाता है ।

    वैसे तो बेचारा कट्टर अम्बेडकरवादी है ,पर अपनी निजी सगी पत्नी को भूत प्रेत से निजात दिलाने के लिए हर रोज पीर बाबजी की मजार पर धोक लगाता है ।

    क्रांतिकारी इतना कि एक बार टेशन पर भगवा जला दिया, पुलिस केस हो गया ,फिर थानेदार के पांव पकड़कर रोया ,तब जा कर छूटा।

    कभी कभी दलित आंदोलन चलाता है, जय मूलनिवासी भी करता है पर माइन्स में पार्टनर जैन को रखता है ।

    पक्का महिलावादी है ,पहली पत्नी को दहेज के लिए प्रताड़ित किया, केस चला ,दोस्तो की मदद से किसी तरह मुक्त हुआ, दूसरी लड़की को फांसा,शादी का झांसा देकर कुछ समय उसका देह लाभ लिया ,अंत में उसे भी छोड़ा और किसी और का पार्टनर बना ,जिससे सात फेरों के चक्कर लगाये, उसका चक्कर यह है कि उसे भूत बाबजी आते हैं।

    मार्केट में मोती बड़ा क्रांतिकारी है, मिशन की बात करता है, बाबा साहब के कारवां को आगे ले जाने का संकल्प करता है, पर व्यस्त रहता है, क्योंकि ज्यादातर टाईम घर मे भूत बनी पत्नी की चरण सेवा में लगा रहता है।

    यूँ बड़ा अच्छा लड़का है ,बड़े सामाजिक ठेकेदार का घोषित वारिस है ,आज तक जहां जहां से भी सूचना मांगी ,कार्यवाही नहीं करवाई, तोड़ बट्टा कर लिया ,इसीसे रोजी रोटी चलती है मोती की ।

    यह होनहार क्रांतिकारी युवक 7 मई शाम से करेड़ा कस्बे से गायब है, निकटवर्ती गोरधनपुरा के लोग उसकी खोज में लगे हैं, कहीं नजर आये तो जानकारी दीजियेगा।

    भैया मोती ,इस तरह नाराज़ नहीं होते ,तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा ,तुम जिले में अपना ” आर टी आई से कमाई ” का धंधा आराम से चला सकते हो।

    लौट आओ !!

    डिस्क्लेमर – इस कथा का किसी भी जीवित ,मृत या मूर्छित ,अर्धमूर्छित मोती लाल नामक व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है, मोती भक्त नाराज होकर खुद को और अपने आका को एक्सपोज न करें ।

    Bhanwar Meghwanshi


  • समझदारों की समझ

    Bhanwar Meghwanshi
    संपादक – शून्यकाल

    [themify_hr color=”red”]

    एक सेकुलर ने
    दूसरे सेकुलर को
    सेकुलरिज्म समझाया
    दूसरे को समझ में आ गया
    हालाँकि दोनों ही
    पहले से समझे हुए थे ।

    एक लोकतंत्र समर्थक ने
    दूसरे जम्हूरियत पसन्द इंसान को
    डेमोक्रेसी पर सहमत किया
    सहमति बन गयी
    क्योकि उनमे पहले से ही
    सहमति थी ।

    एक साम्राज्यवाद विरोधी ने
    दूसरे फासीवाद विरोधी को
    इंक़लाब भेजा।
    लौट आया तुरंत ही
    इंक़लाब,
    इस तरह देर तक
    गूंजते रहे
    इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे ।

    एक साम्यवादी ने
    दूसरे समाजवादी से की बात
    बात समझ गए दोनों
    बात बन गई
    इस तरह चलती रही
    जीवन भर बातें ही बातें ।

    एक एक्टिविस्ट ने
    दूसरे ग्रासरूट वर्कर से
    साझा किया
    एक्शन प्लान,
    करने लगे वे
    मिल कर काम
    करने के सिवा उन्हें
    कुछ भी नहीं था पता
    इसलिए करते रहे
    जीवन भर काम ।

    एक से दस तक
    दस से पचास तक
    एक ,दो ,तीन दशक
    लगभग आधी सदी तक
    वे सब मिलते रहे
    आपस में,
    करते रहे बातें
    पिलाते रहे भाषण
    एक दूसरे को।

    बेहद समझदार लोग थे
    हद दर्जे के समझदार
    नासमझी की हद तक पहुंचे
    वे समझदार लोग।

    ताज़िन्दगी उन्होंने
    सहमत लोगों को
    और सहमत किया।
    समझे हुओं को
    और समझाया।

    फासीवाद,ब्रह्मनवाद,
    साम्राज्यवाद,अन्धराष्ट्रवाद
    अधिनायकवाद, धर्मनिरपेक्षवाद
    जैसे भारीभरकम शब्द
    अलापते रहे।

    जन के बीच गये ही नहीं
    पर जनता के नाम पर
    किये सारे काम ।

    अंततः
    ड्राईंग रूमो ,सभा ,सम्मेलनों,
    सेमिनारों ,अकादमिक बहसों ,रिसर्चों
    तक सिमट गए।

    फिर वे सिरे से सहमत,
    निरे समझदार लोग
    एक दिन इतिहास बन गए,
    उनके धुर विरोधी
    सत्ता पर काबिज़ हो गए।
    और उन्होंने इतिहास ही
    बदल डाला।
    इस तरह वे स्मृति शेष
    हो गए।

    समझदारों का यह खेल
    आज भी जारी है ।
    उन्हीं पचास लोगों को
    पचास लोगों द्वारा
    पचास वर्षों से
    पचास बातों के ज़रिये
    कन्विन्स किया जा रहा है।
    ऑलरेडी कन्विन्स लोग
    फिर से कन्विंस हो रहे है।

    अन्ततः जब सब समझे हुयों ने
    पहले से ही समझदारों को
    और भयंकर समझा दिया।
    तो जाहिर है कि
    सबको समझ में भी
    आ ही गया।

    हालाँकि जिनको समझना था
    वे आज तक नहीं समझे।
    जिन पर समझाने की
    ज़िम्मेदारी थी
    वे खुद नहीं समझ पाये
    कि समझाना क्या है ?
    तो क्या खाक समझाते वो?

    .

  • पाखण्डी जातिवाद

    भंवर मेघवंशी


    मुझे कुछ कहना है
    जाति विरोधी
    मगर घनघोर
    जातिवादी एक्टिविस्टों से !

    जातिवादी गटर के
    घृणित कीड़ों
    तुमसे यह भी
    ना हुआ बर्दाश्त
    कि कोई दलित
    पहन ले
    तुमसे अच्छे
    कपड़े
    रहे तुमसे
    बड़े मकान में .

    तुम साईकिलो के
    मारते रहो पैडल
    या घसीटते रहो
    पग पैदल पैदल
    और तुम्हारा ही
    साथी दलित
    बैठने लगे
    गाड़ियों में .

    भले ही तुम
    सामाजिक कार्यकर्ता की
    खाल ओढ़ चुके हो
    पर हो जातिवादी भेड़िये
    तुमसे यह कैसे
    सहन हो सकता है
    कि कोई दलित
    डालकर
    तुम्हारी आँखों में
    आँखें
    करने लगे
    तुमसे तीखे सवाल.

    तुम बातें न्याय की
    मंत्र समानता के
    दोहराते रहते हो
    भले ही मंचो पर
    लेकिन
    असल जिन्दगी में
    तुमने कब जिया
    इन शब्दों को ?

    सिखाये शब्द
    दोहराना
    उन्हें जीना
    नहीं होता
    उधार के तोतों .

    जब कोई दलित
    करने लगता है
    तुमसे बराबरी
    बढ़ जाता है
    तुमसे आगे .

    तब तुम्हारा
    सारा लोकतंत्र
    हवा हो जाता है
    सारी महानता
    का उतरने लगता है
    अचानक आवरण.

    तब जातिवाद के
    विषैले सांपों
    तुम्हारी केंचुली
    उतरने लगती है
    यकबयक.

    तुम कितने भी
    संगठन बना लो
    या कर लो
    विपश्यना के ढोंग
    सतसंगों में गा लो
    भजन मीठे मीठे
    तुम कितनी ही
    कर लो बातों से
    अपनी काया को
    कंचन
    पर तुम्हारे भीतर
    जातिवाद का कीडा
    रेंगता ही रहता है
    हरदम ,हरवक्त.

    तुम्हारी धमनियों में
    जातिवाद बहता है
    रक्त बनकर
    समाजसेवा के
    नाम पर
    अपना पेट भर रहे
    निर्लज्ज निकम्मे
    जातिवादी रोटेडों,
    तुम सब कुछ
    हो सकते हो
    पर कभी भी
    नहीं बन सकते
    इंसान.

    तुम्हारी
    रग रग में
    भरा है जातिवाद
    जिससे आती
    सड़ान्ध अब
    असह्य
    हो चुकी है.

    इसलिये हे
    सिविल सोसायटी के
    स्वयम्भूं
    नैतिक पवित्रों ,
    हे एक्टिविस्ट
    प्रजाति के
    परम पाखण्डियों ,
    आज से मैं
    खारिज करता हूं तुमको
    तुम भी कर देना
    खारिज मुझको.

    मैं पूरे होशो हवाश में
    यह करता हूं दावा
    कि तुमसे कुछ भी
    नहीं बदला
    ना ही कुछ बदलेगा
    हरी घास के
    ग्रीन स्नेंकों .

    हम जो आज
    वंचित है ,दलित है
    पीडि़त है
    हम वक्त के
    सपेरे है ..
    बजायेंगे बीन
    ढूंढ़ लेंगे तुमको
    एक न एक दिन
    और कुचल देंगे
    तुम्हारा फन
    पूरी निर्ममता से…
    जाति की गहन गुफाओं
    को लगा देंगे आग
    वर्ण और जाति के
    बिलों में भर देंगे पानी
    हवा को कर देंगे
    धुंआ धुंआ .

    पक्का यकीं है
    हमको ,कि
    हम हर कीमत पर
    हरा देंगे
    तुम्हारे इस
    घृणित जातिवाद को.

     

  • महज इंसान

    भवंर मेघवंशी


    पैदा होना
    तुम्हारी जाति
    धर्म व देश में
    मेरे वश की
    बात ही कहां थी ?

    मेरा चयन
    नहीं था ये
    जानता हूं
    यह सिर्फ
    संयोगवश ही
    हुआ होगा
    फिर इन पर
    गर्व कैसा ?

    जाति की जकड़न
    धर्म की अकड़न
    देश की सिकुड़न
    सुहाती नहीं मुझको.

    स्वदेश
    स्वधर्म
    स्वजाति जैसे
    भारी भरकम शब्द
    लगते है
    बोझ से.

    मैं दिल से
    चाहता हूं कि
    खुद को मुक्त
    कर लूं इनसे.

    कृपया
    आप भी
    काट दे नाम मेरा
    अपनी जाति
    धर्म और देश की
    लिस्ट से.

    मैं रहना
    चाहता हूं
    महज एक
    इंसान बनकर .

     

  • क्रांतिकारी बदलाव

    भंवर मेघवंशी


    बैलगाड़ी से जाते हुये
    उन्होंने मेरे दादा से
    गांव की ही बोली में
    पूछी थी उनकी "जात"
    उन्होंने विनीत भाव से
    बता दी.

    वे नाराज हुये
    और चले गये
    उतार कर गाड़ी से उनको
    दादा ने इसको
    अपनी नियती माना.

    फिर एक दिन
    रेलयात्रा के दौरान
    उन्होंने मीठे स्वर में
    खड़ी बोली में जाननी चाही
    मेरे पिता से उनकी "जाति"
    पिता थोड़ा रूष्ट हुये
    फिर भी उन्होंने दे दी
    अपनी जाति की जानकारी.

    सुनकर वो खिन्न हो गये
    पर क्या कर सकते थे.
    रेल से नीचे
    उतरने से तो रहे
    सो रह गये
    मन मसोस कर .
    बैठे रहे साथ में चुपचाप.
    बात नहीं की फिर
    थोड़ा दूर खिसक लिये.

    हाल में उन्होंने
    धरती से मीलों उपर
    उड़ते हुये
    बड़े ही प्रगतिशील अंदाज में
    सभ्य अंग्रेजी में
    'एक्सक्यूज मी' कहते हुये
    पूछ ही ली मुझसे मेरी ' कास्ट '

    मेैने जवाब में घूरा उनको
    मेरी आँखों का ताप
    असहज कर गया उन्हें
    खामोशी ओढ़े
    बुत बन कर बैठे रहे वे
    धरती पर आने तक.

    मैं सोचता रहा
    आखिर क्या बदला
    तीन पीढ़ी के इस सफर में ?
    बदले है सिर्फ
    मॉड ऑफ ट्रांसपोर्टेशन
    भाषा और वेशभूषा .
    पर दिमाग में भरा भूसा
    तो जस का तस रहा.

    और अब वे कहते है
    कहां है जातिवाद आजकल ?
    कौन मानता है इस
    कालबाह्य चीज को .
    हालांकि वे जान लेना चाहते है
    किसी भी तरह जाति
    क्योंकि जाति जाने बिना
    कहां चैन पड़़ता है उनको ?

    इन दिनों
    वे चाह रहे है कि
    समाज में आये इस
    " क्रांतिकारी बदलाव" पर
    सहमति जताऊं
    और तालियां बजाऊं !
    क्या वाकई बजाऊं ?

    .

  • भ्रूण नहीं होते है अवैध

    भंवर मेघवंशी


    वैध या अवैध
    नहीं होते है भ्रूण
    वे तो सिर्फ भ्रूण होते है.

    नहीं होती है संतानें
    कभी भी नाज़ायज
    रिश्ते भी नहीं होते अवैध
    जुड़ना भला
    कैसे हो सकता है अवैध !

    जब जुड़ते है दो जन
    तब ही तो बनते है रिश्ते.
    धर्म,कानून,समाज
    प्रथाएं और खांपें होती है
    अवैध.

    भ्रूण तो कुदरती है
    और रिश्ते रूहानी होते है
    भ्रूण सजीवन होते है
    प्रारम्भ से,
    वे कभी नहीं होते है शून्य.

    भ्रूण ही तो थे हम सब
    पैदा होने से पहले
    नहीं जन्म पाते तो
    कैसे बनते स्त्री या पुरूष ?

    इसलिये हे शरीफ लोगो
    मत मारों भ्रूणों को,
    उनको पनपने दो
    जन्मने दो उनको.
    मत फैंको उनको
    नालियों,झाड़ियों
    सड़को और कचरा पात्रों में.

    जीवन का आरम्भ है भ्रूण
    सभ्यता का अवलम्ब है भ्रूण
    जीने दो उनको
    जन्मने के लिये.

    मत करो
    भ्रूणों की भ्रूण हत्या
    क्योॆकि
    भ्रूण नहीं होते है
    कभी भी अवैध.

    -भँवर मेघवंशी
    (स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता )

  • राष्ट्र के नाम पर

    भंवर मेघवंशी


    राजा –
    मरवाता रहा सैनिक
    प्रजा –
    देती रही श्रद्धांजलियाँ
    रह रह कर
    उठता रहा ज्वार
    राष्ट्रभक्ति का ..

    चलती रही गोलियां
    मरते रहे इन्सान
    बहता रहा लहू
    चीखते रहे चेनल्स
    प्रजा
    मनाती रही जश्न
    शहीदों को चढ़ाती रही पुष्प
    राजा
    करता रहा राज
    इसके अलावा वह
    कर भी क्या सकता था बेचारा

    युद्ध चलता रहा
    सैनिक मरते रहे
    राष्ट्र बहुत खुश था
    जब युद्ध का उन्माद
    फैल गया पूरे राष्ट्र में
    तब राजा ने
    राष्ट्र को संबोधित किया
    राष्ट्र के नाम सन्देश दिया
    राष्ट्र से की
    अपने मन की बात
    राष्ट्र के नाम पर खरीदे हथियार
    राष्ट्र के नाम पर लड़ा चुनाव
    राष्ट्र ही के नाम पर जीता भी

    राजा बड़ा नेक था
    और राष्ट्रभक्त भी
    उसने सब कुछ
    राष्ट्र के नाम पर किया

    तब से राष्ट्र और राजा में
    कोई फर्क ही नहीं बचा
    राजा ही राष्ट्र हो गया
    और राष्ट्र ही राजा
    इस तरह अवतरित हुआ
    " राष्ट्र राज्य ."

    उसके बाद
    फिर वहां
    न चुनाव की जरुरत पड़ी
    न लोकतंत्र की,
    और न ही संविधान की
    सारे झमेलों से
    मुक्त हो गया राष्ट्र
    इस तरह राष्ट्र के लिए
    बहुत उपयोगी साबित हुआ युद्ध