मानव-निर्मित धर्म और बाबाओं का बाजार

“मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” साभार – पृष्ठ संख्या  242 से 245  मैंने कॉफी पीते मित्र से कहा कि सच्चे बाबाओं/गुरूओं/संतों को छोड़कर शेष बाबाओं के लिए  भारत विश्व का सबसे बड़ा बाजार है। मित्र : आपका मतलब भारत में कई प्रकार के बाबा होते हैं। नोमेड : जी, बाबाओं के कई चारित्रिक प्रकार है। जैसे गरीबों के बाबा, मध्यवर्ग के बाबा, उच्च-मध्यवर्ग के बाबा, उच्चवर्ग के बाबा, व्यापारियों के… Continue reading

हम, हमारी स्मार्टनेस बनाम भारत में प्रस्तावित रेडीमेड स्मार्ट सिटी – (भाग 01)

यह लेख-श्रंखला गंभीर, विचारशील, चिंतनशील व सामाजिक मुद्दों की धरातलीय हकीकत को समझने की दृष्टि रखने वाले लोगों के लिए है। भावनात्मक आवेग, धार्मिक/जातीय प्रतिक्रियाओं/आवेशों, राजनैतिक पूर्वाग्रहों व संरेखणों, अतथ्यात्मक/कुतर्क/वितर्क बहसबाजी करने वाले व वास्तविक विकास की समझ न रखने वाले महानुभावों के स्वाद के लिए इस लेख-श्रंखला में शायद ही कुछ हो। मेरा प्रयास सदैव यही रहता है कि मैं कोरी भावुकता, भावनात्मक आवेग, धार्मिक या जातीय उन्माद/प्रतिक्रिया, खोखले… Continue reading

स्त्री का शरीर व शरीर के अंग भड़काऊ नहीं होते, स्तन व योनि जैसे यौनांग भी नहीं

सामाजिक यायावर शुचिता के नाम पर, संस्कार के नाम पर, संस्कृति के नाम पर, शालीनता के नाम पर, सौंदर्य के नाम पर स्त्रियों के पहनावे आदि पर सवाल खड़े करना बहुत अधिक आम बात है। यहां तक कि बलात्कार, छेड़खानी व बदतमीजी आदि का ठीकरा भी स्त्री के पहनावे पर ही फोड़ दिया जाता है। बकवास, कुतर्क, मानसिक विकृति, वैचारिक विकृति व बेहूदगी के आवेश/आवेग में कहा कुछ भी जाए… Continue reading

दिल्ली जिंदा लाशों का मरता हुआ जहरीला शहर है

सामाजिक यायावर लगभग 11 वर्ष पूर्व सन् 2005 की बात है। मैं दिल्ली के बसंतकुंज इलाके में एक वैज्ञानिक मित्र के यहां अतिथि था। पास के बाजार में गया हुआ था। वहीं एक व्यापारी के यहां अचानक ही चर्चा शुरू हो गई, चर्चा को मोड़कर मैं पानी पर ले आया। मेरे अतिरिक्त चार-पांच लोग थे, सभी अमीर व पढ़े लिखे, करोड़ों का कारोबार करने वाले लोग।   इन सबका कहना… Continue reading

वर्तमान भारत में जाति का अंत करना ही असली समाजवाद

सामाजिक यायावर मेरे पिता के एक ब्राह्मण मित्र ने चमार जाति की लड़की से शादी की। पति पत्नी दोनो लड़ते झगड़ते व प्रेम करते हुए संतानों को पालते पोषते एक दूसरे के साथ आर्थिक विपन्नता के बावजूद जीवन जीते आ रहे हैं। मुझे कभी महसूस ही नहीं हुआ कि उनमें से एक ब्राह्मण व एक चमार है, जबकि मैं लगभग एक वर्ष तक उन्हीं की गाय का दूध उनके घर से… Continue reading

जाति-व्यवस्था और राजनीति

“मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” साभार- सामाजिक यायावर की किताब (पृष्ठ संख्या 260-261) www.books.groundreportindia.org हमें एक बात समझने का प्रयास करना होगा कि भारत में लोकतंत्र ठीक से स्थापित हो पाता, इसके पहले ही लोकतंत्र को भारत के लोगों ने ही उपेक्षित करना प्रारंभ कर दिया। शोषक जातियों ने राजतंत्र व कबीलातंत्र खत्म होते ही आजादी के बाद भरपेट मलाई खाने में खुद को व्यस्त किया और भ्रष्टाचार की… Continue reading

जाति-व्यवस्था ने शोषक व शोषित दोनों ही वर्गों की जातियों को जड़ता व कुंठा के विद्रूप स्तर तक पहुंचाया है

सामाजिक यायावर सैकड़ों सालों तक शोषक जातियों ने अपना अधिकांश जीवन/मानसिक/सामाजिक ऊर्जा समाज के बहुसंख्य को अघोषित दास बनाए रखने में लगाया।  इससे पूरा समाज जड़ हो गया। शोषक जातियाँ भी और शोषित जातियाँ भीं। यदि मानवीयता व सामाजिकता के व्यापक संदर्भों में सूक्ष्मता से देखा जाए तो जाति-व्यवस्था ने शोषक व शोषित दोनों ही वर्गों की जातियों को जड़ता व कुंठा के विद्रूप स्तर तक पहुंचाया है। किंतु शोषक… Continue reading

रोहित वेमुला को मेरी श्रद्धांजलि – आखिर कितनी मौतों के बाद हम सामाजिक संवेदनशील व ईमानदार होगें

सामाजिक यायावर तब तक हम जाति के घिनौनेपन से नहीं लड़ सकते हैं और परंपरा में अगली पीढ़ियों के बच्चों की हत्याओं या आत्महत्याओं द्वारा समाज की विभूतियों को खोते रहेंगें। शाब्दिक, तात्कालिक व क्षणिक भावुकता से कुछ देर के लिए अपने बच्चों की हत्याओं व आत्महत्याओं पर आंसू बहा देने भर से कोई समाधान नहीं होने वाला। वास्तव में जाति-व्यवस्था ही हमारे समाज की जड़ता, कुंठा, भ्रष्टाचार, भीड़तंत्र, सामाजिक दासत्व व… Continue reading

भाषा

जोनाथन की माता जी मतलब हमारी साली साहिबा ने हमसे कहा कि मैं जोनाथन से हिंदी में बात किया करूं ताकि उसके मस्तिष्क में हिंदी के शब्द भी उसकी अपनी सहज भाषा के रूप में स्थापित होना शुरू हों। जोनाथन अभी भाषा का प्रयोग नहीं कर पाते हैं लेकिन हम लोगों की बातें समझने लगे हैं और बिना भाषा के ही हमारी बातों का प्रतिउत्तर देते हैं। मुझे बहुत अच्छा लगा… Continue reading

पंचायत चुनावों में पढ़ाई को अनिवार्य बनाना लोकतांत्रिक व मौलिक अधिकारों का हनन

साभार – http://panchayatkhabar.com स्कूली पढ़ाई किसी व्यक्ति की समझदारी का मापदंड नहीं हो सकती है। निरक्षर व्यक्ति भी बहुत अधिक समझदार व बहुत बेहतर जनप्रतिनिधि हो सकता है। बहुत ऊंची डिग्रीधारी व्यक्ति भी बहुत धूर्त जनप्रतिनिधि हो सकता है। पंचायती चुनावों में ही नहीं किसी भी प्रकार के जनभागीदारी वाले चुनावों में देश के हर आदमी को चुनाव लड़ने का हक वैसे ही होना चाहिए जैसे कि देश के हर आदमी… Continue reading