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  • देश, समाज, मनुष्य व सामाजिक नेतृत्व :: स्त्री, जाति व सामाजिक विद्रूपता

    देश, समाज, मनुष्य व सामाजिक नेतृत्व :: स्त्री, जाति व सामाजिक विद्रूपता

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    यह लेख “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक का अंश है, जिसमें लेखक “सामाजिक यायावर” सामाजिक-नेतृत्व व सामाजिक-आविष्कारों की बात करता है।

    देश, समाज व मनुष्य

    मनुष्य के बिना परिवार, समाज व देश नहीं हो सकता; जहां कहीं भी मनुष्य होगा वहाँ परिवार, समाज व देश होगा ही होगा। मनुष्य परिवार, समाज व देश से बड़ा है, क्योंकि वह निर्माता है। देश व समाज की सत्ता, जीवन-मूल्य, नियम-कानून, रीति-रिवाज, खानपान, रहन-सहन, भाषा, लिपि, धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कृति सभी कुछ मनुष्य ही निर्मित, निर्धारित व परिवर्तित करता है। यही सहज सामाजिक तथ्य है; शेष राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा अपने अस्तित्व के लिए  तोड़मरोड़ कर निहित-स्वार्थों के लिए थोपी गयीं परिभाषायें व तर्क हैं। 

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है। देश मनुष्य की अपनी जीवंतता व उसके जीवन में व्याप्त परस्परता की जीवंतता से बनता है, इसलिए   देश राजनैतिक सीमाओं की निर्जीव-वस्तु न होकर, जीवंत-वास्तविकता होता है, जिसका निर्माता स्वयं मनुष्य होता है। मनुष्य और देश का गूढ़, गतिशील, चारित्रिक व जीवंत-रचनात्मक संबंध होता है। देश मूल रूप में मनुष्य की सामाजिकता की गतिशील-जीवंत-चारित्रिक रचना है। इसलिए जैसा मनुष्य होगा वैसा ही देश होगा। मनुष्य जब चाहे तब देश का नाम, देश की परंपरायें, देश के कानून, देश का संविधान, देश का भूगोल, यहां तक कि देश का नाम तक बदल सकता है।  परिवार, देश व समाज का निर्माण व विकास करना मनुष्य की जिम्मेदारी है।

    जिस दिन भारत का मनुष्य यह यथार्थ समझ जायेगा कि देश मूलरूप से मनुष्यों से बनता है, न कि निर्जीव कानूनों, कानून की पुस्तकों, संविधानों, धार्मिक सत्ताओं या राजनैतिक सत्ताओं से; उस दिन भारत का मनुष्य अपने देश का पूरा का पूरा चरित्र एक झटके में बदल लेगा। यही वास्तविक व व्यापक परिवर्तन होगा। मानव निर्मित सत्ता तंत्रों को चलाने वाले वैयक्तिक-समूहों, दलगत-समूहों को बदलना वास्तविक व व्यापक परिवर्तन नहीं होता है। 

    नेतृत्व

    “मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के द्वारा व्यापक सामाजिक-परिवर्तन के लिए  सामाजिक-नेतृत्व प्रस्फुटित नहीं होता; सामाजिक-नेतृत्व राजनैतिक, धार्मिक व आर्थिक सत्ताओं से इतर आम समाज की मौलिकता व गुणवत्ता से स्वतःस्फूर्त रूप में प्रस्फुटित होता है“

    राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक व नौकरशाही तंत्रों में कोई भी सामाजिक-अवतार नहीं होता। जो सामाजिक-अवतार जैसे दिखते हैं वे सभी किसी न प्रकार से व किसी न किसी स्तर पर प्रायोजित ही होते हैं। क्योंकि यदि सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित सत्ताओं के द्वारा समाधान की शक्ति प्राप्त करते हैं, तो ऐसे सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित उन्हीं तंत्रों के ही अधीन हुये, जिन तंत्रों को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थिति में तंत्रों की सत्ताओं के विरुद्ध जाने का साहस व दृष्टि हो ही नहीं सकती है। इसीलिए तंत्रों द्वारा प्रायोजित सामाजिक-अवतार कभी भी सामाजिक समाधान व परिवर्तन की ओर नहीं चल पाते हैं। ऐसे सामाजिक-अवतारों की उपलब्धियाँ भी प्रायोजित ही होती हैं।

    सामाजिक-अवतार यदि सत्ताधीश है तो वह कभी भी मानव समाज का वास्तविक सक्रिय आदर्श नहीं हो सकता। क्योंकि मानव निर्मित सत्ताओं की रूप-रेखा शुंडाकार-स्तंभ (पिरामिड) की तरह गढ़ी गईं है, जिनमें सबसे नीचे के आधार सबसे चौड़े और सबसे ऊपर की चोटियाँ सबसे नुकीली व सबसे कम चौड़ी होती हैं।

    मानव निर्मित सत्ताओं में जो जितना ऊपर होगा वह उतना ही कम चौड़ा और अधिक नुकीला होगा और अपने से बहुत ही अधिक लोगों को दबाते हुए, निरंतर दबाए रहते हुए ही और ऊपर पहुँचता है। इसीलिए मानव निर्मित तंत्रों के सत्ताधीश लोग कभी भी आम मनुष्य के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते, न ही व्यापक-समाधान की दृष्टि रख पाते हैं। यही कारक है जिनके कारण ऐसे लोग सामाजिक परिवर्तन व समाधान के सामाजिक-अवतार नहीं हो पाते हैं। सामाजिक-अवतार तो बहुत सहज, सामान्य व मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के बिना ही हो पाते हैं।

    भारतीय समाज में तो कुत्ता, बिल्ली, चूहा, सुअर, चिड़िया, सांप, कछुआ, गाय, बैल आदि जैसे गैर-मानव योनि जीव भी सामाजिक-अवतारों के रूप में प्रतिष्ठापित किए गए हैं। इनको किसी भी प्रकार की मानव निर्मित सत्ताओं की ताकत नहीं मिली।

    विश्व में अन-आयुधिक सहज वैज्ञानिक-आविष्कार, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विकास, वैचारिक क्रांतियां आदि आम समाज से निकले आम मनुष्यों द्वारा मनुष्य-निर्मित धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि सत्ताओं का विरोध व प्रताड़ना झेलते हुए ही अस्तित्व में आए हैं।

    सामाजिक-नेतृत्व

    सामाजिक-परिवर्तन व निर्माण कर पाने में सक्षम नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण मौलिकता, गुणवत्ता, दूरदर्शिता, स्वतः स्फूर्ति के मिथकों के प्रयोजन बिना ही होता है। भारत जैसे बड़े देश व समाज में स्वतः स्फूर्त व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपन्न सामाजिक-नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण न हो पाने के प्रमुख कारण जाति-व्यवस्था, ईश्वरीय अवतारों व इन अवतारों का धरती पर ईश्वरीय व्यवस्था के प्रयोजन के कारण अवतरित होने की अवधारणाएं, साहित्यिक काव्यों/ग्रंथों को संपूर्ण ज्ञान व ईश्वरीय मानने की अवधारणा, पोथियाँ, पौराणिक कथाएं व सामंतवादी मानसिकता आदि रहे हैं।

    — जाति

    जाति-व्यवस्था के कारण सामाजिक-नेतृत्व का मूल-आधार पुरुषार्थ, कर्म व क्षमता आदि जैसे तत्व नहीं हो पाये। ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य जाति के लोगों के पास ही सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक नेतृत्व के जन्मजात अधिकार रहे। इसीलिए नेतृत्व की दावेदारी समाज की मौलिकता व गुणवत्ता के बजाय जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था के कारण समाज के बहुत ही छोटे हिस्से में संकुचित रही।  जन्मजात नेतृत्व की दावेदारी करने वाले समाज के इस हिस्से की अधिकतर ऊर्जा जाति-व्यवस्था को ईश्वरीय प्रयोजन सिद्ध करते रहने के लिए कपोल कल्पित ईश्वरीय गाथाएं, मिथक व कपोल कल्पित ईश्वरीय अवतार प्रायोजित करने व गढ़ने में ही लगती रही। 

    सामाजिक-नेतृत्व के सतही व अवैज्ञानिक होने, ढोंग व मिथकों आदि के द्वारा प्रायोजित होते रहने के कारण मौलिक, गुणवान् व दृष्टिवान् सामाजिक-नेतृत्व की संभावनाओं का भ्रूण भी नहीं पनप पाया।

    सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग की अवधारणा, जन्मजात जाति-व्यवस्था, धर्म का क्षय होने पर धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर के द्वारा अवतार लेने की अवधारणा, मंत्रों व ईश्वरीय नाम के जाप द्वारा सुविधा/प्रतिष्ठा/समृद्धि आदि का मनचाहा वरदान या सिद्धि प्राप्त कर पाने की अवधारणा, सृष्टि के प्रारंभ में मनुष्य सत्य में देवतुल्य था; आदि आदि जैसी विभिन्न अवैज्ञानिक अवधारणाओं ने भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व की भ्रूण-संभावना को ही नष्ट कर दिया और भ्रूण-संभावना का यह नष्टीकरण परंपरा में हजारों वर्षों तक व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक मानसिकता आदि के विभिन्न स्तरों में गहरे अनुकूलन को प्रायोजित व स्थापित करने के साथ होता रहा।

    ज्ञान व सामाजिक-नेतृत्व के लिए ब्राह्मण जाति में पैदा होकर पोथियाँ, पुराण, महाकाव्य, काव्य आदि रट कर उनको मुंह से बोलना व उनमें बताए हुए कर्मकांड आदि को करना ही पर्याप्त रहा। मिथकों के प्रायोजन; व प्रायोजित मिथकों पर शाब्दिक व साहित्यिक विशेषज्ञता आदि के आधार पर सामाजिक-नेतृत्व का स्तर व प्रतिष्ठा निर्धारित होती रही। ब्राह्मण वर्ग की अधिकतर ऊर्जा इन्ही सबमें लगती रही और ऐसा करने को ही संस्कृति, संस्कार, पुरुषार्थ, ज्ञान, योग्यता आदि का नाम दे दिया गया।

    भारत की सैकड़ों वर्षों की राजनैतिक गुलामी का सबसे प्रमुख कारण यही रहा कि क्षत्रिय वर्ग को दरबारी भाटों, चाटुकारों व मिथक-साहित्य विशेषज्ञों ने झूठी कहानियाँ व मिथक गढ़ कर ही ईश्वरत्व रूप में जन्मजात पुरुषार्थी, निर्भय, रक्षक, शासक, राजनैतिक दूरदर्शिता व दृष्टिकोण आदि से संपन्न प्रायोजित कर दिया। गढ़े हुए मिथकों की पुष्टि करने के लिए ब्राह्मण वर्ग ने अनेकों पौराणिक कथाएं परंपरा में सत्य कथाओं के रूप में प्रायोजित करके, राजनैतिक सत्ता से अपना संबंध स्थापित करने के लिए क्षत्रिय वर्ग के द्वारा राजनैतिक सत्ता के भोग को ईश्वरीय प्रावधान के दायित्व का निर्वहण प्रायोजित कर दिया।

    यदि पौराणिक कथाओं को संज्ञान में लिया जाए तो मानव समाज की समस्यायें समाधानित करने के लिए, मानव समाज को विकास की ओर गतिमान करने के लिए ईश्वर खुद अवतार के रूप में आवश्यकता पड़ने पर बारंबार सामाजिक-नेतृत्व करने आता रहा। इस प्रकार सामाजिक-नेतृत्व मनुष्य के वास्तविक पुरुषार्थ एवम् समझ की क्षमता से अर्जित न होकर ईश्वरीय योजनाओं के निर्वाहक या परिपूरक के रूप में प्रायोजित व स्थापित रहा। इन मिथकों से भारतीय समाज में अकर्मण्यता प्रतिष्ठित हुई और मौलिक-गुणवत्ता की निरंतर भ्रूणहत्या होती रही।

    समय के साथ अवतारों के बजाय अवतारों की गाथाएं गढ़ने वाले, अवतारों की चर्चा करने वाले, ग्रंथों/महाकाव्यों/काव्यों आदि को रटने वाले, धार्मिक अनुष्ठानों व कर्मकांडों आदि को करने वाले ही सामाजिक-नेतृत्व के रूप में प्रायोजित व स्थापित किए जाने लगे। ब्राह्मण व क्षत्रिय को सिर्फ जाति विशेष में पैदा होने के कारण ही ‘सामाजिक-नेतृत्व’ की मान्यता दी जाती रही। परिणामस्वरूप ‘सामाजिक-नेतृत्व’ भी जन्म के आधार पर प्रायोजित होता रहा।

    भारत में ‘सामाजिक नेतृत्व’ लोगों में ‘आभामंडल-सत्ता’ स्थापित करने का और विभिन्न सत्ताओं द्वारा प्रायोजित होने का ही रहा है, इसीलिये ‘सामाजिक नेतृत्व’ और ‘सत्ताओं’ का आपस में बहुत गहरा व विश्वसनीय रिश्ता रहा है। यही कारण रहा कि भारत में शताब्दियों के बाद आज तक भी भारतीय समाज में स्वत: स्फूर्त ‘सामाजिक नेतृत्व’ आकार नहीं ले पाया।

    चूंकि समाज में जाति-व्यवस्था के कारण स्वतः स्फूर्त, वास्तविक-गुणवान् व मौलिक नेतृत्व विकसित होने की परंपरा नहीं बनने दी गई इसीलिए समाज के लोग धूर्त, मक्कार, स्वार्थी, परजीवी, लंपट, भोगवादी, कामचोर और अवसरवादी आदि होते चले गए, क्योंकि जाति-व्यवस्था के निरंतर स्थापना-प्रयोजन के लिए यही आधारभूत मूल्य व तत्व होते हैं।  जाति-व्यवस्था के कारण भारतीय समाज कभी देश व समाज के प्रति ईमानदार व प्रतिबद्ध नहीं हो पाया केवल व्यक्तिगत लिप्साओं, स्वार्थों, भोगों, विलासिताओं, बाजार के उपभोक्तवाद पर आधारित उपभोक्ता बने रहने की व्यक्तिगत आर्थिक सुरक्षा आदि स्वार्थ-केंद्रित महात्वाकांक्षाओं के लिए प्रयत्न करना ही जीवन के मायने मान लिया गया।

    भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व की वास्तविकता समझने के लिए एक कहानी को ही समझना पर्याप्त है। महान् गुरू के रूप में स्थापित द्रोणाचार्य ने अद्वितीय प्रतिभाशाली किशोर एकलव्य के दाहिने हाथ का अगूँठा केवल इसलिए कटवा दिया क्योंकि एकलव्य आदिवासी था और द्रोणाचार्य अपने शिष्य, जो एक बहुत बड़े राज्य का राजकुमार था, को महान् धनुर्धारी के रूप में प्रायोजित करना चाहते थे। यह कहानी उस समाज की है जो गुरू-शिष्य परंपरा की संस्कृति की बात करता है और जिस समाज ने द्रोणाचार्य को महानतम गुरू का स्थान दे रखा है। द्रोणाचार्य बहुत कुशल धनुर्धारी हो सकते थे लेकिन उन्होंने सामाजिक गुरू होने के मूल्यों का ही पतन किया और भारतीय समाज को एकलव्य जैसे अद्वितीय धनुर्धारी से वंचित कर दिया। भारतीय समाज ने विभिन्न स्तरों व क्षेत्रों में अगणित एकलव्यों के अगूँठे काटे हैं। काश! यदि इन एकलव्यों के अगूँठे नहीं काटे गए होते, काश! विभिन्न स्तरों पर प्रायोजित लोग स्थापित नहीं किए गए होते तो आज भारत को प्राचीन-काल की गाथाएं गाकर खुद को महान् सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती, न ही भारत सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहता और न ही आज पिछलग्गू होता।

    — स्त्री

    समाज का बहुत बड़ा हिस्सा शूद्र-वर्ण में रखा गया, जिसको जीवन के मौलिक अधिकार पशुओं जैसे तक नहीं थे। शूद्र-वर्ण के अतिरिक्त जो वर्ण थे, उन वर्णों की भी लगभग आधी जनसंख्या अर्थात् स्त्री को पशु और वस्तु की श्रेणी में रख दिया गया। इस प्रकार समाज का पाँच में से चार जैसा बहुत बड़ा हिस्सा परंपरा में अपनी मौलिकता की भ्रूण-हत्या व अघोषित दासता का बर्बर-शोषण ही झेलता रहा। बचा-खुचा एक-पाँचवा हिस्सा परंपरागत मूर्खतापूर्ण सीमा में ही तथाकथित सामाजिक-नेतृत्व देता रहा।

    प्रायोजित सामाजिक-नेतृत्व ने स्त्री, जो जीवंत व चेतनशील मनुष्य है, उसको वस्तु के रूप में प्रायोजित कर दिया। मनुष्य के रूप में स्त्री के अस्तित्व व चेतनशीलता का कोई वजूद ही नहीं रहने दिया गया। स्त्री को पुरुष की अघोषित संपत्ति बना दिया गया। स्त्री जिस पुरुष की संपत्ति है, उस पुरुष के अस्तित्व में ही अपने अस्तित्व को बिना सवाल विलीन करने व ऐसा करने में अपने जीवन का लक्ष्य, सफलता व गौरव मानने के लिए निरंतर अनुकूलित किया जाता रहा।

    जो संस्कृति स्त्री को देवी मानने का दावा करती है उसी के समाज में स्त्री को प्रेम करने से वंचित कर दिया गया, अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के अधिकार नहीं दिए। यहाँ तक कि स्त्री को अपना पति तक चुनने का अधिकार नहीं रहा। जिस स्त्री को देवी कहा गया उसी को पर्दे में धकेल दिया गया, शिक्षा से वंचित रखा गया व संपत्ति में अधिकार नहीं दिए गए ताकि वह सदैव पुरुष की दासी बनी रहे। स्थिति की भयावहता की कल्पना इस बात से की जा सकती है कि आज भी प्रतिवर्ष लाखों स्त्रियों की हत्या माता के गर्भ में ही खुद उनके ही माता-पिता द्वारा कर दी जाती है। आज भी हजारों स्त्रियों की हत्या उनके ही माता-पिता व परिवार के द्वारा केवल इसलिए कर दी जाती है, क्योंकि स्त्री अपने माता-पिता व परिवार की इच्छा के विरुद्ध जाकर अपनी इच्छा से प्रेम-विवाह करना चाहती है। 

    स्त्री जिसे देवी कहा गया वही स्त्री प्रेम करे तो वह चरित्रहीन व कुलटा, वही स्त्री पर्दा न करे तो वह चरित्रहीन व कुलटा, वही स्त्री पुरुष की उपस्थिति में खुलकर खिलखिलाकर हँस ले तो वह चरित्रहीन व कुलटा।  स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया लेकिन स्त्री के द्वारा पुरुष के अस्तित्व में ही अपना अस्तित्व देखने को ही उसका देवी होना प्रायोजित कर दिया गया। स्त्री के द्वारा परिश्रम से अर्जित संपत्ति का मालिक भी पुरुष और पुरुष के परिश्रम से अर्जित संपत्ति का मालिक भी पुरुष, फिर भी स्त्री पुरुष की अर्धांगिनी। स्त्री के गृहस्थ कार्यों को श्रम की श्रेणी में नहीं रखा गया जबकि वह संतान की जननी व पालन पोषण करने वाली भी है। स्त्री की कर्मशीलता को पुरुष के कारण होना मान लिया गया परिणामस्वरूप स्त्री के द्वारा सामाजिक-नेतृत्व की संभावनाओं के भ्रूण की भी संभावना की स्थिति समाप्त हो गई। यही कारण हैं कि बलात्कार होने पर या स्त्री के साथ दुर्व्यवहार होने पर, समाज स्त्री को ही दोषी ठहराता रहा है। चूंकि स्त्री को मनुष्य माना ही नहीं गया, इसीलिए स्त्री के पहनावे या बोलचाल या व्यवहार के तरीके को बलात्कार का कारण ठहराया जाता है। इसको कुछ इस रूप में देखा जाए जैसे कोई वस्तु यदि रात में घर के बाहर पड़ी है तो कोई भी उसे चुराकर ले जा सकता है, उसी प्रकार स्त्री यदि रात में घर से बाहर है तो कोई भी उसके साथ बलात्कार कर सकता है। कोई महंगी वस्तु यदि छिपाकर न रखी जाए तो उस पर चोरों की नजर पड़ी रहेगी और वे चुराने का प्रयास करेंगे, वैसे ही स्त्री यदि छोटे कपड़े पहने है तो पुरुष स्त्री का स्त्रीत्व चुराएगा। एक समाज जो स्त्री को देवी मानता है, वही समाज स्त्री के बारे में सब कुछ बहुत ही अधिक वीभत्सपूर्ण घिनौनेपन और असंवेदनशीलता से तय करता है, जैसे स्त्री निर्जीव-वस्तु हो।

    — शाब्दिक/कृत्रिम तार्किकता व प्रायोजित विद्वता बनाम कर्मकांड व संस्कृति 

    प्रकृति व ईश्वर को समझने का दावा करके प्रतिपल कर्मकांडों को रचने व महिमामंडित करने वाली संस्कृति वास्तव में केवल दर्शन की शाब्दिक व कृत्रिम तार्किकता की अव्यावहारिक विद्वत्ता ही होकर रह गई। यदि भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था नहीं होती, स्त्री को मनुष्य माना गया होता और दर्शन को शाब्दिक तार्किकता व कृत्रिमता आदि से ऊपर उठकर समझने व जीने की चेष्टा की गई होती तो भारतीय समाज एक ढोंगी, कुंठित व पिछलग्गू समाज होने के बजाय विश्व के वास्तविक सर्वश्रेष्ठ समाजों में से होता और वास्तव में ही विश्व को विकास व समृद्धि के सार्थक मायने समझाते हुए समाधानित कर रहा होता। 

    भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व आज तक भी मौलिकता, गुणवत्ता व पुरुषार्थ से इतर अवसरवादिता, छद्म, ढोंग, मोहकता व आकर्षण आदि के प्रायोजन से देश, समाज व आने वाली पीढ़ियों की कीमत पर, पूरी निर्लज्जता और निरंकुशता के साथ प्रायोजित किये जाते हैं।

    सामाजिक-नेतृत्व को परंपरा में विभिन्न सत्ता केंद्रों द्वारा प्रायोजित व स्थापित करते रहने के कारण भारतीय समाज अपने लिए  ही क्रूरता की हद तक असंवेदनशील समाज के रूप में दृढ़ होता गया। बचपन से ही अपनी कमजोरियों को देखने, उनके कारणों को समझने और उनको दूर करने की चेष्टा करना सिखाए जाने के बजाय ढोंगो व सतही प्रायोजनो से दूसरों को निर्दयता व असंवेदनशीलता पूर्वक अपने से खराब साबित करके खुद को अच्छा एवम् कर्म व पुरुषार्थ साबित करने की तकनीक सिखाई जाती है। यह मानसिकता ही बचपन से ही जाने-अनजाने चाहे-अनचाहे समाज में भ्रष्टाचार, असंवेदनशीलता, क्रूरता व सामंतवादिता के बीज को पोषित करती रहती है। 

    हम यदि खुद के जीवन को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि हमारा अपना पूरा का पूरा जीवन ही झूठ और दिखावे का पुलिंदा है।  हमें बचपन से ही दिखावे की पुनरुक्ति के लिए इस तरह का अभ्यास करवाया जाता है कि हम खुद अपने आपको ही भूल जाते हैं और अपने ढोंग, खोखलेपन, निर्दयता, असंवेदनशीलता, अवैज्ञानिक-तर्कशीलता व अतथ्यात्मकता आदि को ही अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकता और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि व उद्देश्य मानने लगते हैं। हमें पता ही नहीं  चलता और हम सड़ने लगते हैं।  जब हमें अपने सड़ने की बदबू आती है, हम बदबू का कारण बाहर खोजते हैं।  हम बदबू का कारण बाहर इसलिए नहीं खोजते क्योंकि हमें बदबू का कारण वास्तव में खोजना होता है।  ढोंगो और प्रायोजन के आदी हम वास्तव में अपने से अधिक बदबूदार को खोजना चाहते हैं ताकि खुद को उसकी तुलना में खुशबूदार साबित करके खुद को बेहतर प्रायोजित कर खुद को महान् मान लें। यही कारण है कि हम दिन-प्रतिदिन और अधिक सड़ते जाते हैं लेकिन फिर भी दूसरों की तुलना में खुद को खुशबूदार मानते हैं। 

    — स्वयं के प्रति असंवेदनशीलता

    यह हमारी स्वयं के प्रति घोर निर्दयता व असंवेदनशीलता ही है कि हम वास्तविक खुशबू में जीने के प्रयास करने के बजाय अपनी सड़ाँध व बदबू को ही खुशबू के रूप में प्रायोजित करने में अपनी ऊर्जाएं लगाते हैं। हम पूरा जीवन नशे व बेहोशी में जीते हैं, और बेहोशी में जीवन जीने को हम जीवन की व्यावहारिकता कहते व साबित करते हैं; जबकि  वास्तव में यह हमारा अपने खुद के प्रति ही और अधिक असंवेदनशील होना ही है। 

    हम स्वयं को विकसित करने के लिये, स्वयं को बेहतर बनाने के लिए  कर्म, प्रयास या चेष्टा नहीं करना चाहते हैं। स्व-निर्माण की प्रसव पीड़ा नहीं झेलना चाहते हैं।  इसीलिए  हम अपने जीवन के लिए , परिवार के लिए , समाज के लिए  व देश के लिए  ऐसे सामाजिक-नेतृत्व प्रायोजित करते हैं; जो हमारे जैसे ही हों। सामाजिक-नेतृत्व छोड़िए हमने तो अपने ईश्वर भी अपने ही जैसे बना रखे हैं। 

    सामाजिक-नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण वास्तविक कर्म से हुआ करता है। ढोंग व सतहीपन से युक्त विभिन्न स्तरों पर अनुकूलताओं के प्रयोजन से नहीं। भारत में पारंपरिक रूप से सामाजिक-नेतृत्व समाज की बेहतरी के लिए  किए गए पुरुषार्थ, कर्म, सक्रिय चिंतन, जीवंत कर्म-अनुभव आदि मूल्यों के आधार पर नहीं स्वीकृत किए गए हैं। परिणामस्वरूप भारतीय समाज ज्ञान, विज्ञान, सामाजिक विकास व वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि में बहुत ही पीछे रह गया। शताब्दियों तक राजनैतिक गुलाम रहा और आज भी मानसिक गुलाम है।

    — स्वतः स्फूर्त सामाजिक-नेतृत्व की आवश्यकता

    भारत सामाजिक रूप से बहुत अधिक विद्रूपताओं और विविधताओं का देश है। इसलिए  भारत का राष्ट्रीय सामाजिक-नेतृत्व वही कर सकता है जो भारत को भारत की विद्रूपता और विविधताओं के साथ स्वीकारे और फिर सबको साथ लेकर चलते हुए बढ़े।  सामाजिक नेतृत्व का सामाजिक सरोकारों से बहुत गहरा व स्पष्ट संबंध होता है, बिना सामाजिक सरोकारों व सामाजिक संबंधों को समझे कोई भी सामाजिक नेतृत्व नहीं हो सकता है।  भारतीय समाज को शताब्दियों के अनुकूलन से बाहर आकर अपनी वास्तविक स्थिति, गति को स्वीकारते हुए विभिन्न स्तरों पर वास्तविक परिवर्तकों को “सामाजिक-नेतृत्व” के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता है।

    शाब्दिक व दार्शनिक तर्कशीलता के मानदंडों में अद्वितीय व विलक्षण संस्कृति वाला समाज व्यावहारिक धरातल की वास्तविकता में बहुत ही अधिक अमानवीयता व खोखलेपन को ही पोषित करता व जीता रहा। दर्शन को व्यवहारिक-जीवंतता के स्थान पर केवल शाब्दिक तर्कशीलता तक ही सीमित किया जाता रहा। वास्तव में भारतीय समाज की सबसे बड़ी ऋणात्मकताएं ढोंग, अमानवीयता व असंवेदनशीलता हैं और ये तत्व ही मूलभूत कारण हैं कि भारतीय समाज बहुत ही वीभत्सता के स्तर तक आंतरिक रूप से सड़ा हुआ है। फिर भी समाज के लोग जो खुद अपने ही जीवन में खोखले होते हैं, रटे-रटाए दर्शन की कृत्रिम शाब्दिक-तार्किकता से अपने को व अपनी संस्कृति को जबरन महान् सिद्ध करने में ही अपनी ऊर्जा लगाने में गौरव का अनुभव करते हैं। गीता को महान् बताने वाला समाज, कर्म को ही उपेक्षित रखता आया है।

    यदि भारत को वास्तव में आगे बढ़ना है तो पूरी कठोरता व इच्छाशक्ति के साथ बिना लाग-लपेट के सामाजिक-नेतृत्व के प्रायोजनों की परंपरा व अनुकूलता से दृढ़तापूर्वक बाहर निकलकर वास्तविक स्वतः स्फूर्त सामाजिक-नेतृत्व के प्रस्फुटीकरण का बीजारोपण करना होगा। इसके अतिरिक्त कोई विकल्प भी नहीं।

    यह लेख “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक का अंश है, जिसमें लेखक “सामाजिक यायावर” सामाजिक-नेतृत्व व सामाजिक-आविष्कारों की बात करता है।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • स्त्री के प्रति हमारा नजरिया और शुचिता का आडंबर

    स्त्री के प्रति हमारा नजरिया और शुचिता का आडंबर

    Vivek “सामाजिक यायावर” 
    मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक से

    स्त्री को माहवारी झेलना पड़ता है, स्त्री गर्भवती होती है, स्त्री अपने गर्भ में बच्चे को नौ महीने पालती है और एक दिन स्त्री बच्चे को अपने यौनांग से धरती पर अवतरित कराती है। जीवन देने की क्षमता के कारण स्त्री के आंतरिक शरीर की बनावट पुरुष से भिन्न होती है। इसलिए पुरुष व स्त्री दोनो को ही स्त्री शरीर के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, यह संवेदनशीलता स्त्री शरीर के प्रति समुचित जानकारी के बिना नहीं आ सकती है।

    देश की अधिकतर महिलाएं किसी न किसी स्त्री रोग से पीड़ित रहती है और अपने ही परिवार में संकोचवश, लज्जावश कुछ कह नहीं पाती हैं क्योंकि परंपरा में उनको यह बताया गया है कि स्त्री व स्त्री के गुप्तांग इतने दूषित होते हैं कि उन अंगों का नाम लेना भी टुच्चापन है। बिचारी महिला आजीवन शारीरिक कष्ट केवल इस कारण भोगती है क्योंकि स्त्री गुप्तांगों का नाम लेना ओछापन, अभद्रता व कुसंस्कार है। पुरुष को स्त्री अंगों की जानकारी नहीं होती और उसे बताया जाता है कि स्त्री दूषित है, स्त्री अंग दूषित हैं इसलिए वह स्त्री के प्रति संवेदनशील भी नहीं हो पाता।

    यकीन मानिए यदि हम यौनांगों को दूषित मानने की बजाय शरीर का महत्वपूर्ण अंग मानना शुरु कर दें, तो हमें गुप्तरोगों के हाशमी दवाखानों, गुप्तरोगों के जैन क्लीनिकों, सुहागरात की रात में सैकड़ों रुपए की कीमत का पलंगतोड़-पान खाने व दूध का गिलास पीने आदि की जरूरत नहीं रहेगी।

    संस्कृति, संस्कार, संभ्रांतता व भद्रता आदि के कारण के यौनांगों का नाम लेने को दूषित मानने की परंपरा के कारण बच्चे से लेकर वृद्ध तक अपनी शारीरिक परेशानियों को खुल कर व्यक्त न करने वाले हम लोगों के सामाजिक मूल्यों को जीने के दावों की, तो हम जानते हैं कि – हमने अपवाद छोड़ हर गाली स्त्री अंगों व स्त्री के रिश्तेदारों तक ही सीमित कर रखी है। हम दुनिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बनने का दैवीय सौभाग्य प्राप्त करने जा रहे हैं। हम दलित महिलाओं को नंगा करके बीच चौराहे घुमा देते हैं, भले ही महिला के यौनांग का नाम अपने मुंह से न लेते हों। हम छोटी-छोटी बच्चियों का बलात्कार करके उनके नंगे शरीर के चीथड़े चौराहों में छोड़ देते हैं ताकि हम लोग फोटो लेकर सोशल साइट्स में साझा कर सकें और महिला शोषण पर अपने क्रांतिकारी विचार रख सकें।

    हमारे समाज में सामाजिक शुचिता को जीना बड़ा आसान है। शुचिता के लिए कर्मशील होना जरूरी नहीं, शब्दों के आडंबर को जीना जरूरी है। अपने रिश्तेदारों या परिवार की किसी बच्ची का यौन शोषण करने वाला भी शाब्दिक ढकोसलेबाजी करके खुद को आजीवन शुचिता का ठेकेदार साबित करता रह सकता है जबकि एक दिल का साफ आदमी केवल इस कारण चरित्रहीन घोषित किया जा सकता है क्योंकि वह लोगों के सामने स्थानीय भाषा में स्त्री गुप्तागों का नाम ले लेता है।

    हमारे देश में शुचिता का ढोंग इस कदर जिया जाता है कि स्त्री अंगों का नाम लेना भी गुनाह माना जाता है जबकि ऐसे हजारों सच्चे किस्से हैं जिनमें पिता अपनी पुत्री से बलात्कार करता है, भाई अपनी बहन से बलात्कार करता है, न केवल बलात्कार करते हैं बल्कि स्थायी रूप से उनको अपनी हवस का शिकार बनाते हैं। भारत में लड़कियों की कुल जनसंख्या की आधी से बहुत अधिक संख्या, किसी न किसी प्रकार का यौन-शोषण झेलती है और अधिकतर अपने परिवार के सदस्यों या निकट रिश्तेदारों से ही झेलती है। लेकिन कभी अपना विरोध नहीं दर्ज करा पाती है। बहुत सारे ऐसे ढोंगी लोग होगें जिन्होने किसी न किसी न बच्ची का किसी न किसी प्रकार से यौन शोषण किया होगा, लेकिन समाज के सामने शुचिता के ठेकेदार व लंबरदार बने घूमते हैं।

    क्या हमें संस्कृति व संस्कारों के दिखावों व ढोंगों को बंद नहीं कर देना चाहिए? हमें अपने वास्तविक चरित्र, सोच व मानसिकता के यथार्थ को स्वीकार करते हुए स्वयं में बदलाव का प्रयास करते हुए स्त्री के प्रति हमें वास्तव में संवेदनशील होने का प्रयास नहीं करना चाहिए। समाज की नैतिकता या संस्कृति की समृद्धि शाब्दिक ढोंगों से नहीं होती लोगों के कर्म व वास्तविक चरित्र से होती है।

  • भारतीय जाति-व्यवस्था ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने वाली सामाजिक-दासत्व व्यवस्था है

    भारतीय जाति-व्यवस्था ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने वाली सामाजिक-दासत्व व्यवस्था है

    Vivek “सामाजिक यायावर” 

    भारतीय जाति-व्यवस्था कर्म आधारित व्यवस्था न होकर, श्रम को तिरस्कृत मानने वाली सामाजिक दासत्व को स्थापित करने वाली व्यवस्था थी। दरअसल जाति-व्यवस्था कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था हो ही नहीं सकती थी। वास्तव में जाति-व्यवस्था समाज की जड़ता, कुंठा, भ्रष्टाचार, भीड़तंत्र, सामाजिक दासत्व व श्रमशीलता को तिरस्कृत करने की मानसिकता का आधारभूत पोषक तत्व है। भारतीय जाति-व्यवस्था के नियम, विधियां व मान्यतायें आदि ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने के आधार पर स्थापित थे, और आज भी कमोवेश वैसे ही है। शारीरिक परिश्रम करने वाले लोगों को उपेक्षित व तिरस्कृत जातियों में रखा गया, उनके सामाजिक संपत्तियों पर अधिकार नगण्य थे, व्यक्तिगत संपत्ति रखने के, शिक्षा प्राप्त करके विद्वान् बनने के सहज, सरल व समान अधिकार नहीं थे। समाज की मुख्यधारा में उनका कोई स्थान नहीं था। वे शारीरिक श्रम करने वाले, मुख्य सामाजिक व्यवस्था से अलग तिरस्कृत सामाजिक-दास व्यवस्था में रहने के लिए  विवश सामाजिक-गुलाम थे।

    मानव समाज का विकास और सामाजिक कुरीतियों व समस्याओं आदि का उन्मूलन व समाधान आदि  बिना वैज्ञानिक दृष्टि आधार के नहीं प्राप्त किया जा सकता है।  किसी सामाजिक व्यवस्था की मूल अवधारणा की प्रामाणिकता को उसके विभिन्न तत्वों के आधार पर ही विश्लेषित किया जा सकता है। अवधारणा की प्रामाणिकता को जबरन साबित करने के लिए  सुविधानुसार मनचाहे तत्वों व तथ्यों को ही प्रमाणिक मान लेने से वास्तविक तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं हो पाता है। शोषक वर्ग द्वारा प्रायोजित व लिखित ग्रंथों में जो लिखा है उसको ही प्रमाणित मानने के स्थान पर यदि व्यावहारिकता व तर्कों के आधार पर यह स्वीकारते हुए कि मानव व मानव समाज समय के साथ सीखता है और परिपक्वता की ओर गति करता है, तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाए तो यह साफ दिखने लगता है कि जाति-व्यवस्था ईश्वरीय व प्राकृतिक व्यवस्था न होकर, मनुष्य-निर्मित बहुत ही सोची समझी, चतुराई व कपट के साथ स्थापित सामाजिक दासत्व की कपटी व्यवस्था थी।

    जाति-व्यवस्था के मूलभूत-कारकों को समझने के लिए , हमें जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति का मूल्यांकन करना पड़ेगा। जाति-व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था मानने का मतलब है कि बहुत सारे ऊलजुलूल, अव्यावहारिक व मनगढ़ंत तथ्यों को, भलीभांति जानते हुए कि वे नितांत ही अपुष्ट व निराधार तथ्य हैं, स्वीकारना पड़ेगा।

    वर्तमान पीढ़ी ही भविष्य की पीढ़ियों की समझ का आधार होती है। हम जो बीज आज बोते हैं, जिन व्यवस्थाओं का निर्माण करते हैं, उनके आधार पर भविष्य की पीढ़ियां अपने जीवन में सामाजिक-अनुकूलन स्वीकारती हैं। इसलिए   जाति-व्यवस्था रूपी सामाजिक-दासत्व की व्यवस्था के स्थापना काल में ऐसे नियम व विधियाँ बनाइ गईं; ऐसा साहित्य व इतिहास आदि लिखा व प्रायोजित किया गया कि सामाजिक-दासत्व की यह व्यवस्था शोषक वर्ग द्वारा स्थापित व्यवस्था के स्थान पर ईश्वरीय प्रावधान व मनुष्य के पूर्व-जन्मों के कर्मों की नियति-व्यवस्था प्रमाणित हो।

    धूर्ततापूर्ण चतुराई के साथ प्रायोजित व स्थापित सामाजिक-दासत्व व्यवस्था को समय के साथ पूर्व में रही कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था मान लिया गया। चूंकि समाज के बहुसंख्यक ‘अवर्णों’ के पास संपत्ति, शिक्षा, ज्ञान व आत्मसम्मान के अधिकार नहीं थे, और बहुसंख्यक अवर्णों के परिश्रम के उत्पाद पर अल्पसंख्यक सवर्णों का अधिकार होता था, लालच व स्वार्थ के कारण सवर्णों ने जाति-व्यवस्था को और मजबूत ही किया और कालांतर में यह व्यवस्था पूर्व-जन्म के कर्मों पर आधारित दैवीय प्रयोजन व व्यवस्था के रूप में स्वीकृत व प्रमाणित मान ली गई।

    जाति-व्यवस्था के घिनौनेपन में कमी का आना

    जाति-व्यवस्था की वीभत्सता व घिनौनापन महापुरुष बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर, महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी, अंग्रेजों आदि के कारण कुछ औंस कम हुई। फिर भारत की राजनैतिक आजादी के बाद समाज के सबसे दबे-कुचले शोषित वर्ग के लिए  शिक्षा व सरकारी नौकरियों में संवैधानिक आरक्षण के कारण, कुछ आर्थिक व राजनैतिक शक्ति मिलने से स्थितियां पहले से बेहतर हुईं। जाति-व्यवस्था के घिनौनेपन में जो कुछ अंतर अभी आ रहे हैं, उसके तीन प्रमुख कारण हैं। जिनके परिणामस्वरूप, शोषक समाज को शोषित वर्ग के साथ अपने व्यवहारों में दिखावटी तौर पर ही सही लेकिन कुछ अंतर, न चाहते हुए भी करने के लिए  विवश होना पड़ा।

    एक- संवैधानिक आरक्षण के कारण शोषित समाज के लोगों की बढ़ती आर्थिक व राजनैतिक शक्ति। 

    दो- शिक्षा व ज्ञान के अवसरों के कारण बढ़ती जागरूकता।

    तीन- विकसित देशों में रहकर उच्चशिक्षा ग्रहण करने वाले सवर्णों में से ऐसे ईमानदार मानवीय व सामाजिक सोच के लोग जिनकी समझ में आ गया कि जाति-व्यवस्था दैवीय प्रावधान न होकर सामाजिक दासत्व की व्यवस्था है – का भारत के शोषित समाज के उत्थान के लिए  काम करने का प्रयत्न करना। भले ही ऐसे लोगों का प्रतिशत नगण्य हो।

    इन तीन कारकों के कारण शोषित समाज की शक्ति व दावेदारी मुख्य रूप से बढ़ी और जाति-व्यवस्था के घिनौनेपन में कुछ कमी आई।


    यह लेख मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर पुस्तक से लिया गया है।


  • पौराणिक मनगढ़ंत दैवीय कथाएं व वैदिक-काल की तथाकथित महानता बनाम मनुष्य की कर्मशीलता

    पौराणिक मनगढ़ंत दैवीय कथाएं व वैदिक-काल की तथाकथित महानता बनाम मनुष्य की कर्मशीलता

    हर सभ्यता व धर्म की अपनी पौराणिक कथायें होती हैं, जो काल्पनिक होती हैं। सभ्यता के लोग काल्पनिक कहानियों को सच मानकर अपनी सभ्यता की गति अवरुद्ध कर देते हैं कभी-कभी तो गति का यह ठहराव उन लोगों को हिंसक तक बना बना देता है। किसी भी सभ्यता या धर्म की अधिकतर पौराणिक कथायें, उस सभ्यता के लोगों के मानसिक अनुगमन व भावनात्मक आस्था के अनुकूलन की स्थापना के लिए ही लिखी जाती हैं। यही कारण है कि पौराणिक कथायें, कथाओं में सत्य तथ्यों के अस्तित्व का भ्रामक अनुभव कराती हुई, मनुष्य सभ्यता के विकास का दावा करते हुए उसको अपनी अनुकूलता की घेरेबंदी में मजबूती से बंद रखती हैं। वैदिक काल के समय के दावेदार साहित्य, महाग्रंथों, महाकव्यों आदि में उद्धत कथाओं को यदि संज्ञान में लिया जाए तो वैदिक काल में मानव समाज एक आदर्श समाज था, जीवन मंगलमय था, व्यवस्था कल्याणकारी थी, सब कुछ संतुलित व व्यवस्थित था। धर्म, विज्ञान, तकनीक व मानव का विकास अपने चरम पर था। 

    हवन-यज्ञ आदि समय समय पर होते रहने, हर घर में पूजापाठ होते रहने, मनुष्य के धार्मिक कर्मकांडों में रत रहने आदि  के कारण, मनुष्य का ईश्वरीय सत्ता व तंत्र से बेहतर संबंध थे। संबंधों की मधुरता का स्तर यह था कि आवाहन करने पर देवलोक व ब्रह्मलोक से देवगण और ईश्वर के प्रतिनिधि लोग मानवों से मिलने, उनके मुद्दों को समझने और ईश्वर की कल्याणकारी योजनाओं की स्थिति-गति जानने समझने के लिए आते रहते थे।

    ऐसा माना जाता है कि वैदिक काल में हम आज के पाश्चात्य विज्ञान की तुलना में हजारों लाखों साल आगे का उन्नत विज्ञान रखते थे। हमें यह तक पता था कि ब्रह्मा जी का एक दिन लगभग 4 अरब वर्ष का होता है और रात भी लगभग 4 अरब वर्ष की होती थी और ब्रह्मा जी का पूरा दिन (मतलब कुल लगभग 8 अरब साल) गुजरने पर “प्रलय” होती है। हमने हर बात की गणना कर रखी थी और हमारा दावा है कि सब कुछ वैज्ञानिकी था और सच्चे तथ्यों पर आधारित था।

    अपनी सभ्यता की श्रेष्ठता को प्रमाणित करने के लिए इन दावों को करते हुये, हम एक तथ्य भूल जाते हैं कि लगभग हमारा पौराणिक साहित्य, महाग्रंथ, महाकाव्य आदि की लगभग प्रत्येक घटना दैवीय व ईश्वरीय इच्छा, संबंध व सहयोग पर निर्भर थी। छोटी से छोटी बात अर्थात् निंद्रा के लिए बिस्तर किस धातु का बना हो, किस दिशा में हो, पैर व सिर किस दिशा में हो से लेकर परमाणु आयुध व पुष्पक विमान आदि आदि तक प्रत्येक बात के लिए हमें दैवीय व ईश्वरीय निर्देश का पालन करना पड़ता था, हम पूरी तरह से ईश्वरीय व दैवीय सहायताओं पर ही निर्भर थे। आइए इस बात का विश्लेषण करते हुए समझने की चेष्टा की जाए।

    मान लीजिए किसी राजा को राक्षसों से अपने राज्य की रक्षा के लिए , अपने राज्य में शांति स्थापित करने के लिए  अत्याधुनिक आयुध चाहिये, तो उसको अपने राज्य में वैज्ञानिक संस्थानोंं, तकनीकी संस्थानोंं आदि की स्थापना करने की आवश्यकता नहीं है। राजा को या राजपरिवार के किसी व्यक्ति को जंगल में, पर्वत में, पानी में या कहीं और जाकर चुपचाप उस आयुध को धारण करने वाले देवता के नाम का जाप कई वर्ष तक करना है और देवता को प्रसन्न करके आयुध प्राप्त कर लेना है। पुष्पक विमान चाहिएतो उसको रखने वाले देवता के नाम का जाप रूपी तप कर लिया और पुष्पक विमान प्राप्त कर लिया। मनुष्य को जिस भी गुण, वस्तु, सुविधा आदि की इच्छा हुई तो उसको धारण करने वाले देवी या देवता जेसे कि बुद्धि नहीं है तो बुद्धि की देवी, धन नहीं है तो धन की देवी, यौवन नहीं है तो यौवन के देवता आदि को उपयुक्त धार्मिक कर्मकांड से प्रसन्न कर लीजिए और अपनी इच्छानुसार गुण, वस्तु व सुविधा आदि बना बनाया प्राप्त कर लीजिए। तात्पर्य यह कि हर चिल्लर बात के लिए भी दैवीय व ईश्वरीय सहायता उपलब्ध थी, बस धारण करने वाले देवता का नाम, पता और उसको प्रसन्न करने का कर्मकांड करना आता हो, मंत्र आता हो।

    कोई आदमी बीमार है उसे आक्सीजन चाहिए तो प्रतापी चिकित्सक महोदय ने मंत्र का जाप किया और “पवन” देवता आक्सीजन लेकर दरवाजे पर उपस्थित। आक्सीजन के निर्माण की प्रक्रिया जानने समझने की कोई आवश्यकता नहीं, आक्सीजन के लिए किसी यंत्र की कोई आवश्यकता नहीं। मनुष्य व देवताओं के मध्य संबंधों की प्रामाणिकता की वजह से पवन देवता मंत्रों व कर्मकांडों द्वारा आवाहन किएजाने पर आक्सीजन लेकर रोगी मनुष्य की सहायता के लिए  प्रस्तुत। 

    वर्षा नहीं हो रही है तो वर्षा के देवता का आवाहन कीजिए अपनी समस्या उनके समक्ष रखिए, देवता को प्रसन्न करने के लिए  यथोचित कर्मकांड कीजिए और देवता वर्षा करा देगा। दैवीय व्यवस्थाओं के कारण चूंकि वर्ष के कुछ महीनों के अतिरिक्त वर्षा का प्रबंध करना देवता के लिए  भी संभव नहीं तो नदियों को धारण करने वाले ईश्वरीय प्रतिनिधि के नाम का जाप करके प्रसन्न करके नदियों को देवलोक से धरती पर उतार कर लाया जा सकता था। वर्षा संग्रहण, जल संग्रहण आदि तकनीक को जानने, समझने व विकसित करने की आवश्यकता नहीं है।

    किसी महिला का पति नपुंसक है कोई बात नहीं। महिला मनचाहे देवता के आवाहन के लिए  मंत्र जाप व कर्मकांड  करती थी, और देवता उस महिला के साथ यौनसंबंध स्थापित करके संतान उत्पत्ति में भी सहयोग करने के लिए उपलब्ध।

    नदियां, पर्वत, समुद्र आदि परिवार वाले होते थे, उनके पति/पत्नी/पुत्र/पुत्री/भाई/बहन आदि होते थे और कभी कभार तो इनके पारिवारिक सदस्यों के विवाह व यौन संबंध मनुष्यों के साथ होते थे। मनुष्यों व पशुओं, मनुष्यों व पक्षियों, मनुष्यों व जलचरों आदि के मध्य यौनक्रिया हो सकती थी और संताने भी होती थी।

    यदि पौराणिक गाथाओं को सच भी मान लिया जाएतो इस तथाकथित उच्च-पराकाष्ठा वाली अति-उन्नति के पीछे का आधार मनुष्य की अपनी कर्मशीलता नहीं वरन् दैवीय व ईश्वरीय सहायता व प्रयोजन थे। मनुष्य हर छोटी-छोटी बात के लिए देवताओं व ईश्वर की सहायता पर निर्भर थे। लोग कुछ नहीं करते थे, लोग कुछ नहीं बनाते थे, कुछ निर्मित नहीं करते थे। लोग तो देवताओं व ईश्वरीय सहायता से बना बनाया प्राप्त करते थे।

    इतना सब कुछ मिलने के बदले में मनुष्य को हर क्षण ईश्वर भक्ति में लिप्त रहना पड़ता था। हर क्षण भक्ति में रहना पड़ता था। ईश्वर के विभिन्न नामों का जाप, प्रसन्न करने की विभिन्न विधियां, हवन-यज्ञ व बलि आदि का कर्मकांड निरंतर करते रहना पड़ता था। हर क्षण इस बात के लिए  सतर्कता रखनी पड़ती थी कि किसी छोटी सी त्रुटि से देवता क्रोधित न हो जायें।

    कर्मकांडों में किंचित भी मात्र त्रुटि न हो, इसलिए  कर्मकांडों के विशेषज्ञ रखे गए होगें। जिन्हे “ब्रह्म” के मामलों की विशेषज्ञता रखने के कारण “ब्राह्मण” कहा गया होगा। सांसारिक कामों के चक्कर में “ब्राह्मणों” को अपनी थोड़ी सी भी ऊर्जा का अपव्यय न करना पड़े, इसलिए  वे जिसके भी दरवाजे पहुंच जाते थे और जो भी बोल देते थे वह यजमान को करना ही होता था। और ऐसा न करने पर यजमान के लिए  दंड व प्रताड़ना का प्रावधान था। बहुत बार तो विशेषज्ञ लोग क्रोधित होकर देवताओं से यजमान को दंडित करवाते थे, जिसे उस समय की तकनीकी भाषा में “श्राप” देना कहा गया होगा। 

    ब्राह्मण को भी पारलौलिक सत्ता से संवाद व संपर्क में बने रहने के लिए हमेशा पवित्र रहना पड़ता था। इसलिए   दिन में कई बार नहाना, स्वच्छ वस्त्र पहनना, बदबूदार चीजों जैसे लहसुन व प्याज आदि नहीं खाना, अपनी टट्टी नहीं साफ करना इसलिए  उनकी टट्टी साफ करने वालों की अलग जमात बनाई गई और यह निर्धारित किया गया कि इस जमात के लोगों को चलते समय अपने पदचिन्हों को भी साफ करते हुए चलना पड़ेगा ताकि ब्राह्मण उन पदचिन्हों पर अपना पैर रखकर अपवित्र न हो जाए।

    माथे पर चंदन का लंबा तिलक ताकि मन में सुगंध व शीतलता व्याप्त रहे, जिससे देवताओं से संवाद करते समय व्यवहार में शीतलता रहे। सिर में लंबी चोटी रखना ताकि देवगणों व ईश्वरीय व्यवस्था से अदृश्य तरंगों द्वारा सीधा संपर्क व संवाद बना रहे। इन ब्राह्मणों ने देवताओं के साथ संपर्क व संवाद के अनुभवों के आधार पर ग्रंथ व पुराण लिखे। जिनमें विस्तार से वर्णन किया गया कि किस मामले का देवता कौन है, और किस देवता को किस समय और किन तरीको से कितनी देर के लिए किस काम के लिए आवाहित किया जा सकता है। ग्रंथ व पुराण पढ़िएऔर मनचाहे देवता को वर्णित कर्मकांड से आवाहित कीजिएऔर अपनी इच्छा पूर्ति कीजिए।

    मानव जीवन का हर एक क्षण देवताओं की दृष्टि, गणना व लेखे-जोखे में होता था। शादी हो, बच्चा पैदा हो, बच्चे का नामकरण हो, युवा-युवती पहली बार यौन-क्रीडा करने जा रहे हों, पति-पत्नी संतान प्राप्ति के लिए यौन-क्रिया करने जा रहे हों आदि आदि अर्थात् हर एक क्षण का लेखा जोखा देवगणों के पास।   जीवन की हर क्रिया के लिए देवताओं का आवाहान, ताकि कुछ ऊंचनीच मतलब मनचाहा न होने पर देवताओं के समक्ष दावे किए जा सके। आदि आदि हजारों उदाहरण हैं, जो पौराणिक कथाओं में मिलते हैं, जिनसे उस समय की मानव-सभ्यता कितनी उन्नत थी यह मानना होता है।

    यदि यह मान लिया जाए कि वैदिक काल आदर्श व अति-पराकाष्ठा तक उन्नत था। तो भी इसका श्रेय मनुष्य की कर्मशीलता को न जाकर देवताओं व ईश्वरों की कर्मशीलता व उनके अंदर मनुष्यों के प्रति अथाह प्रेम को जाता है। मनुष्य तो केवल उनको खुश करने के लिए पूजा पाठ करता था, कर्मकांड करता था। यह भी मानना पड़ेगा कि उस समय के देवगण और ईश्वर भी बहुत विनम्र और कर्मशील होते थे, मनुष्य जीवन की हर क्रिया के समय आवाहित किएजाने पर आने को तैयार। हर एक मनुष्य का जन्म-जन्मांतर का संपूर्ण सूक्ष्म विस्तृत लेखाजोखा रखते थे और जरूरत पड़ने पर प्रस्तुत करते थे, ताकि व्यवस्था में त्रुटि न हो।

    यदि वैदिक काल की अवधारणाओं को सत्य माना जाए तो यह भी स्वीकारना पड़ेगा कि इतनी बेहतरीन दैवीय आदर्श व्यवस्था; दैवीय व ईश्वरीय सहायताओं, सुविधाओं व सहयोगों वाले देवों व मनुष्यों के मध्य प्रमाणित व विश्वसनीय संबंध टूटे और पूरी तरह से हमेशा के लिए  टूटे। देवलोक में मनुष्यों की विश्वसनीयता पूरी तरह से इस प्रकार से समाप्त हुई कि देवों व मनुष्यों के संबंधों के पुनर्जीवित हो पाने की किसी संभावना के भ्रूण तक को नष्ट कर दिया गया।

    चूंकि मनुष्य ने दैवीय संपर्क व संवाद के लिए  विशेषाधिकार व विशेष सुविधाओं से संपन्न विशेषज्ञ लोग रख रखे हुए थे, इसके बावजूद मनुष्य व देवों के इतने प्रगाढ़ व विश्वसनीय संबंध पूरी तरह से टूट गए। तो इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि इन विशेषज्ञों ने एक से बढ़कर एक भयंकर अपराध लगातार किए। जिसके कारण देवगण मनुष्यों पर क्रोधित होते चले गए और मनुष्यों के संबंध हमेशा के लिए  टूट गए। और इन विशेषज्ञों ने अपने द्वारा किए गए भयंकार अपराधों के बारे में मानवीय समाज को जानकारी नहीं दी और पतन के कारणों को ईमानदारी से न स्वीकारते हुये, सारा दोष युग-काल परिवर्तन को दे दिया और युग-काल परिवर्तन को ईश्वरीय प्रावधान बता दिया।

    चूंकि ईश्वर व देवगण नाराज हो चुके थे तो उन्होंने मनुष्यों को उनके अपने ही कर्म के आधार पर छोड़ दिया। लेकिन चूंकि हम लोगों को केवल मंत्र जाप करके कुछ कर्मकांड करके बिना वास्तविक पुरुषार्थ भोगने की लत लग गयी थी, इसलिए  हम आज तक मंत्र जाप व कर्मकांडों को किएजा रहे हैं इस लालच में कि शायद कभी कुछ मामला फिट हो और जैकपाट लग जाए और विशेषज्ञ लोग अपने को मिलने वाली विशेषाधिकारों व विशेष सुविधाओं को भोगते रहने के लालच व स्वार्थ में, यह सत्य स्वीकारने को तैयार नहीं कि वे भी दूसरे मनुष्यों की तरह ही साधारण मनुष्य हैं। क्योंकि सत्य स्वीकारते ही उनको अपने द्वारा किए गए उन भयंकर अपराधों को भी स्वीकारना पड़ेगा जिनके कारण देवों व मनुष्यों के अत्यधिक प्रगाढ़ संबंध पूरी तरह से टूट गए।

    ऐसे अवैज्ञानिक व अतार्किक तथ्यों पर आधारित वैदिक काल की अवधारणा को सत्य मान भी लिया जाए और यह भी स्वीकार कर लिया जाए कि उस काल में बहुत ही गजब व उन्नत व्यवस्था थी। लेकिन इसमें वैज्ञानिकता कहीं नहीं है और न ही इस प्रक्रिया में समाज के मनुष्य की दृष्टि का कोई वैज्ञानिक विकास ही होता है। उल्टे अवैज्ञानिकता व अतार्कितता ही पोषित होती है।

    यदि वैदिक काल में सच में ही हमारा समाज अति-उन्नत होता तो भले ही हमारे समाज में सब कुछ भी होता लेकिन हमारे समाज में वर्णव्यवस्था कभी नहीं होती। क्योंकि ऐसा समाज जो समाज के सबसे बड़े हिस्से को जन्म लेते ही मानसिक व ज्ञान के विकास से अवरुद्ध कर देता हो, जिस समाज में मानवीय-संसाधन की कोई अहमियत नहीं हो। और जो है उसी को संपूर्ण माना जाता हो, वह समाज कभी भी वैज्ञानिक दृष्टि का समाज नहीं हो सकता है। जिस समाज में पोथियां रटने को ज्ञान माना जाता हो, पोथियों को रटकर बोल देना विद्वत्ता मानी जाती हो, जिस समाज के मानवों की अधिकांश जीवनी ऊर्जा विभिन्न कर्मकांडों को करने में ही व्यय हो जाती हो, वह समाज कैसा भी हो लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि का बिलकुल भी नहीं हो सकता है।

    विज्ञान करते हुएसीखने व समझने की निरंतर गतिशील प्रक्रिया है, न कि तथाकथित संपूर्णता के साथ ठहरे हुए ज्ञान को रटने की प्रक्रिया।

    वैदिक काल की अवधारणा को स्वीकारते ही, हम मनुष्य की कर्मशीलता को उपेक्षित व तिरस्कृत कर देते है। बिना वास्तविक पुरुषार्थ के भोग करने के हमारे चरित्र के कारण हममें कृतज्ञता का मूल्य पोषित नहीं हो पाया, इसीलिए  हम अपने जीवन की अधिकांश सुख व सुविधाएं भोगते तो पाश्चात्य देशों के ज्ञान व विज्ञान के कारण ही हैं, लेकिन उनके प्रति कृतज्ञता का भाव न रखकर उल्टे अपने भूतकाल की श्रेष्ठता की कुंठा व अहंकार को जबरन प्रमाणित बताते हुए रात दिन पाश्चात्य देशों व उनके लोगों को पानी पी-पीकर कोसते हैं, गरियाते हैं और अपने कुंठित व क्षुद्र अहंकार को तुष्ट करते हैं।

    निर्णय तो हमें ही लेना है कि हम कर्मशील बनकर अपना समाज व देश बेहतर बनायेंगें या सिर्फ भोगने की लत को ही जीते रहेंगें और कुतर्की बकवास करते रहेंगें।

    ईश्वर भी कर्मशीलता को प्यार करता है, कर्मकांड व मक्खनबाजी को नहीं। यह मानव-सभ्यताओं का बेबाक व ईमानदार अध्ययन करने से साफ साफ मालूम देता है।

  • जाति-व्यवस्था बनाम सोने की चिड़िया वाला सामाजिक-समृद्ध भारत

    जाति-व्यवस्था बनाम सोने की चिड़िया वाला सामाजिक-समृद्ध भारत

    मित्र : भारत में ऐसी मान्यता है कि भारत शताब्दियों पहले इतना अमीर था कि सोने की चिड़िया कहा जाता था। इस मुद्दे पर आपका क्या मत है? 

    नोमेड : भारत में बहुत ऐसी मान्यताएं हैं जिनमें शताब्दियों पहले भारत दुनिया का सर्वश्रेष्ठ देश था। मान्यताओं का क्या, जो भी प्रयोजित कर दिया जाए वही मान्यता बन जाती है। जिस भारत में कुल जनसंख्या के पाँच मे से चार हिस्सों को शिक्षा, समाज के लिए सोचने-विचारने, अभिव्यक्ति, मानव के रूप में प्रकृति से सहज भाव से प्राप्त मौलिक अधिकार आदि भी न रहे हों; वहाँ मान्यताएं क्या कहतीं हैं से क्या फर्क पड़ता है। मेरा मानना है कि भारतीय समाज में इतिहास व मान्यताओं के नाम पर अपवाद छोड़कर जो भी है, वह लगभग सब कुछ प्रायोजित ही है और सामाजिक-कपट व ढोंग के साथ प्रायोजित है। प्रायोजित तर्कों से ऊपर उठकर यदि सामाजिक प्रतिबद्धता व ईमानदारी से सोचिए, तो आप मेरे विश्लेषण कि जाति-व्यवस्था के होते हुए भारत के आर्थिक विकास व समृद्धि की कल्पना ही असंभव और अव्याहारिक है, से सहमत होगें।


    भारत के सैकड़ों जिलों के हजारों गाँवों के लाखों लोगों से संवाद करके उनको जीवन जीते देख कर, उनके विकास के लिए उनके ही जैसे होकर धरातलीय कार्यों को करते हुए, जो समझ व अनुभव हुए उनसे मैं इन्हीं निष्कर्षों पर पहुँचता हूँ। समाज के लोगों की वास्तविक जीवन-शैली, मान्यताओं, जीवन-मूल्यों और दर्शन आदि में भारी अंतर दिखता है। क्या आपको नहीं लगता कि भारत के लोग दोहरे चरित्र के होते हैं। उनकी कथनी, करनी व प्रस्तुतीकरण आदि में भयंकर व विरोधात्मक अंतर होता है। कभी-कभी तो विपरीत ध्रुवों जैसा अंतर होता है।


    मित्र : जी बिलकुल लगता है?

    नोमेड : क्योंकर लगता है, आपको?


    मित्र : जीवन को उनके साथ जीने की प्रक्रिया में स्पष्ट अनुभव होता है, इसलिए लगता है।

    नोमेड : सबको तो नहीं लगता है, आपको ही क्योंकर लगता है?


    मित्र : संभवतः मैं कारकों को देखने की चेष्टा करता हूं, इसलिए लगता है।

    नोमेड : संभवतः नहीं। यही यथार्थ है कि चूंकि आप कारकों को देखने की चेष्टा करते हैं या कारकों को समझना चाहते हैं, इसलिए आपको दिखना शुरु हो जाता है। वैसे ही मुझे भी जीवन जीने की प्रक्रिया में अनुभव होता है। मेरी व आपकी दृष्टि व समझ में अंतर सिर्फ मात्रा, गुणवत्ता व चरित्र आदि का हो सकता है। 


    मित्र : आप क्या मानते हैं कि भारत कभी सोने की चिड़िया रहा होगा?

    नोमेड : जी बिलकुल मानता हूँ कि भारत सोने की चिड़िया नहीं, सोने का डायनासोर रहा होगा। 


    मित्र : इसका मतलब भारत का समाज बहुत समृद्ध रहा होगा।

    नोमेड : बिलकुल नहीं।


    मित्र : ऐसा कैसे हो सकता है?

    नोमेड : क्यों नहीं हो सकता है। आज भारत में कुछ लोग बहुत अमीर हैं, दुनिया भर के ऐशोआराम में हैं, लेकिन समाज की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग पौष्टिक भोजन, अच्छे कपड़े व सामान्य स्तर का घर तक नहीं पाती है। 


    मित्र : जी सहमत हूँ, लेकिन तब भी ऐसा ही अंतर रहा होगा, ऐसा क्योंकर हो सकता है?

    नोमेड : तब तो और भी वीभत्स अंतर रहा होगा। अब तो जाति-व्यवस्था का अपवाद स्वरूप ही सही किंतु कुछ क्षय हो रहा है, तब तो जाति-व्यवस्था ही समाज व अर्थ-शास्त्र का मूल-आधार थी।


    मित्र : जी।

    नोमेड : दरअसल यदि भारत कभी भी समाज के रूप में समृद्ध समाज रहा होगा तो उसके कुछ अवशेष तो दिखने ही चाहिए। एक ऐसा समाज, जिसमे समाज की कुल जनसंख्या के बहुत बड़े प्रतिशत भाग को वैज्ञानिक प्रयोगों, आर्थिक व्यवस्था प्रयोगों, शोधों व प्रबंधनों को करने की बात तो छोड़िए खुद के परिश्रम के द्वारा उत्पादित संपत्ति पर ही अधिकार नहीं रहा हो, सामान्य जानकारियों को प्राप्त करने की शिक्षा का भी अधिकार नहीं रहा हो, अपने व अपने परिवार के विकास व प्रगति आदि के संदर्भ में विचार करने व अपने मन की बात की अभिव्यक्ति का अधिकार तक नहीं रहा हो, ऐसा समाज समृद्ध हो सकता है, इसका प्रश्न का ही कोई औचित्य नहीं है और आप समाज की समृद्धि की प्रासंगिकता की बात करना चाह रहे हैं।


    मित्र : अभी आप ही ने कहा कि भारत सोने की चिड़िया क्या डायनासोर रहा होगा। आपके ऐसा कहने का क्या तात्पर्य है?

    नोमेड : दरअसल भारत की अर्थव्यवस्था का आधार समाज में अच्छी अर्थ-व्यवस्था या संसाधनों का बेहतर प्रबंधन या वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि नहीं था। यदि होता तो अवशेष दिखाई पड़ते जैसे अन्य तत्वों के अवशेष दिखाई पड़ते हैं। अवशेष न भी दिखाई देते तो परंपराएं दिखाई पड़तीं, जैसे अन्य तत्वों की परंपराएं दिखाईं पड़ती हैं, भले ही विकृत रूप में दिखाई पड़तीं। 


    जाति-व्यवस्था के कारण शूद्र को दासों की तरह आजीवन लगातार परिश्रम करके उत्पादन करना पड़ता था और परिश्रम करके उत्पादित संपत्ति के एवज में पशुओं की तरह घिसटकर जी लेने लायक सामग्री ही प्राप्त होती थी; ताकि परिश्रम करने वाले दासों की संख्या कम न हो जाए। जाति-व्यवस्था के कारण व्यापार का अधिकार केवल व्यापारी वर्ग को रहा। इन सब तत्वों को जोड़कर देखने से यह मालूम होता है कि व्यापारी को किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं थी और उत्पादन के लिए व्यापारी को नगण्य के बराबर निवेश करना पड़ता था। इस तरह परंपरा में व्यापारी जाति-व्यवस्था के कारण बिना कुछ किए ही दूसरों के परिश्रम के उत्पादन से बैठे-बैठे व्यक्तिगत लाभ कमाने की अवस्था में रहा है। इस प्रकार के व्यापार से केवल व्यापारी और राज-सत्ताओं का ही लाभ हुआ। 


    शूद्र उत्पादन करता रहा और व्यापारी और राज-सत्ताएं शूद्र के आजीवन व अनवरत अवैतनिक-परिश्रम से भरपूर ऐश करतीं रहीं। इसीलिए भारत में व्यापारियों ने विज्ञान-तकनीक, शोध व मौलिक सोच आदि को प्रोत्साहित करने के बजाय कुंठित ही किया, ताकि दूसरों के परिश्रम के द्वारा भरपूर लाभ बटोरा जा सके। भारत के उद्योपतियों व व्यापारियों की मानसिकता आज भी ऐसी ही है। इसीलिए ये लोग पूरी निर्दयता, निरंकुशता व दृष्टिहीनता के साथ भारत के लोगों के परिश्रम व सामाजिक संसाधनो को कब्जाने व सभी स्तरों पर शोषणों के द्वारा अर्जित लाभ की तकनीक पर ही व्यापार करते हैं।

    लाभ का बटवारा व्यापारी-वर्ग व राज-सत्ताओं के मध्य होने की परंपरा आज भी वैसे की वैसी ही है। आम-आदमी के परिश्रम की उपेक्षा तब भी थी और आज भी है; आम-आदमी के हाथों में संसाधनों व उसके द्वारा अर्जित संपत्ति का अधिकार व नियंत्रण तब भी नहीं था और आज भी नहीं है। पहले जो केवल शूद्रों के साथ होता था, आज पूरे आम-समाज के लोगों के साथ हो रहा है, यदि इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो आज की स्थितियाँ और अधिक भयावह हैं और इन सबकी वीभत्सता व भयावहता आदि का आधार जाति-व्यवस्था ही है। यदि जाति-व्यवस्था नहीं होती तो समाज की मानसिकता व अनुकूलन ऐसा नहीं होता, जिनके कारण ऐसी भयावह परिस्थितियाँ निर्मित हो चुकी हैं। 


    मित्र : बहुत विचारक किस्म के लोगों से सुनता हूँ कि अंग्रेजो के पहले भारत के लोगों की स्थितियाँ बिलकुल ही भिन्न थीं। भारत के लोग बहुत समृद्ध थे और भारत के गाँवो में स्वावलंबन की बहुत ही अद्वितीय व्यवस्था थी। अंग्रजों ने भारत के इतिहास को तोड़-मरोड़ दिया ताकि विश्व में भारत की महानता नहीं सिद्ध हो सके।

    नोमेड : बिलकुल सही सुनते हैं आप, मैं भी यही सुनता आया हूँ। 


    मित्र : आपके क्या विचार हैं, इन सब मान्यताओं के बारे में?

    नोमेड : आधारहीन मान्यताएं हैं।


    मित्र : कैसे?

    नोमेड : इन मान्यताओं को मानते ही, यह मानना पड़ेगा कि भारत के प्रत्येक गाँव में अधिकतर लोगों के घर समृद्ध थे और सुविधाओं से संपन्न थे। मैंने भारत के लगभग पचास हजार छोटे-बड़े गाँवों को देखा है, खुद भी ग्रामीण परिवेश से हूँ, लगभग दो दशकों से भारत के अतिपिछड़े गाँवों के लिए धरातलीय काम कर रहा हूँ। गाँव में जमींदारों, लंबरदारों, व्यापारियों व राज-सत्ता के चाटुकारों आदि के अलावा किसके पास समृद्धि व सुविधा थी? लुहार, बढ़ई, माली, कहार आदि परंपरा में सैकड़ों वर्षों तक पीढ़ी दर पीढ़ी वही काम करते हुए भी कभी भी दो-जून की रोटी, जैसे तैसे तन ढकने वाले मांगकर लाए गए कपड़ों के टुकड़ों व जमींदार के तालाबों से खोद कर लाई गई मिट्टी के छोटे-छोटे घरों आदि से ऊपर न उठ पाए।


    जिस समाज में लोगों को पेट भरने के लिए सामाजिक कार्यक्रमों में बड़े लोगों द्वारा अपनी खाई हुई पत्तलों में अपना जूठा खाना इसलिए छोड़ने की घिनौनी परंपरा बनाई गई कि भूखे पेट लोग उस बचे-खुचे जूठे खाने को खाकर जूठा खाना छोड़ने वाले की उदारता के प्रति कृतज्ञता महसूस करेंगे और अवसर पड़ने पर उसके लिए बेगार करेंगे; ऐसी परंपराएं शोषित वर्ग के लोगों का आत्मविश्वास तोड़ने व अंतःमन में शोषण को ईश्वरीय प्रयोजन व अपने जीवन की नियति स्वीकारने के लिए बनाईं गईं। उनको सुंदर शाब्दिक तर्को से गढ़ा हुआ कृत्रिम किंतु सुंदर आवरण चढ़ा कर ढक दिया गया। स्वावलंबन व सुसंस्कृत संस्कृति की अजीबोगरीब कसौटियाँ और मानदंड हैं, जहाँ घोर अमानवीयता को भी निर्लज्जता के साथ महानता व संवेदनशीलता परिभाषित कर दिया जाता है।

    लुहार का बेटा लुहार, बढ़ई का बेटा बढ़ई, माली का बेटा माली, कहार का बेटा कहार आदि आदि का तथाकथित स्वावलंबन भीषण शोषण व दया पर आधारित था, न कि व्यवस्थित आर्थिक व्यवस्था पर। लुहार का बेटा सुनार नहीं बन सकता, सुनार का बेटा लुहार नहीं बन सकता। शोध, विकास व नई तकनीक आदि की दूर-दूर तक कोई भी संभावनाएं नहीं। जो है, जैसा है उसी को उटपटांग तरीके से या सुलझे हुए तरीके से आगे बढ़ाना।


    ऐसे इतने कुंठित व परतंत्र तंत्र को स्वावलंबन की अद्वितीय व्यवस्था कहा व सिद्ध किया जाता है। दरअसल जाति-व्यवस्था जन्म आधारित दास-व्यवस्था थी। लेकिन इसको कर्म-आधारित व्यवस्था मानने के मिथक को सही मान लिया गया है। इसे सही मानने के पीछे अनेकानेक निहित स्वार्थ, सामाजिक-कपट व दुर्भावनाएं पोषित होती हैं। किंतु यदि संवेदनशीलता, जातिगत दुर्भावना से ऊपर उठकर, सामाजिक-ईमानदारी व जीवन-मूल्यों के आधार पर विश्लेषण कीजिए, आपको समतामूलक स्वावलंबन कही नहीं दिखेगा। 


    यदि आपके द्वारा उद्धृत विचारक किस्म के लोगों की मान्यताएं मान ली जाएं तो यह भी मानना पड़ेगा कि अंग्रेजों ने हर गाँव में सैकड़ों सुविधा-संपन्न व समृद्ध घरों को उजाड़ कर खेती की लहलहाती जमीन को ऐसे बदल दिया मानो वहाँ कभी कुछ था ही नहीं और गाँवों में सुअर के गंदे बाड़ों जैसी मलिन-बस्तियाँ बना दीं। यदि अंग्रेजों के पास आज से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व भवनों को नष्ट करके उपजाऊ भूमि में बदलने की इतनी उन्नत तकनीक थी। तो आज हमें उनकी उस जमाने की इस अद्वितीय तकनीक को सीखने की जरूरत है क्योंकि भारत की आजादी के बाद जिस तरह से कृषि भूमि के विकास के नाम पर अधिग्रहण करके कंक्रीट के जंगल खड़े किए हैं; वह भी बिना किसी खास प्रयोग व प्रयोजन के। उनको तोड़ कर उपजाऊ कृषि भूमि में बदल कर देश के लोगों के सामने सुरसा जैसे मुँह बाए खड़ी खाद्य व भूजल की भयावह समस्या को हल करने की जरूरत सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता के रूप में है।   


    यदि कभी वास्तव में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता होगा, तो मैं इसका सिर्फ यह मतलब निकालता हूँ कि उस समय भारत के व्यापारियों व राजाओं आदि के पास खूब संपत्ति रही होगी। चूंकि भारत में सैकड़ों राज्य होते थे, जिनमें राजा, प्रधानमंत्री, दीवान, मंत्री, सेनापति, रिश्तेदार व चाटुकार आदि होते थे। राज्यों में व्यापारी होते थे। इसलिए समाज की अधिसंख्य जनसंख्या के शोषित होने के बावजूद, भारत सोने की चिड़िया लगा करता होगा। यदि वास्तव में भारत सोने की चिड़िया कहलाने लायक जैसा समृद्ध होता तो समाज की समृद्धि के अवशेष समाज की परंपराओं में मिलते। 


    कोई भी समाज जो सांस्कृतिक व आर्थिक रूप से समृद्ध होता है, वह अपने ही समाज के अधिसंख्य लोगों का शोषण बर्बरता से नहीं करता है और न ही खुद अपने ही समाज के अधिसंख्य लोगों से विद्रूपता के साथ घृणा ही करता है।

    पुस्तक “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” से लिया गया लेख (सामाजिक यायावर ‘विवेक उमराव’ द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारह महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

    —————

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • सामाजिक न्याय :: जाति-व्यवस्था-सामाजिक-आरक्षण बनाम संवैधानिक-आरक्षण

    सामाजिक न्याय :: जाति-व्यवस्था-सामाजिक-आरक्षण बनाम संवैधानिक-आरक्षण

    पुस्तक “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” से

    (सामाजिक यायावर ‘विवेक उमराव’ द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारहवें महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)


    मित्र : आप संवैधानिक आरक्षण के समर्थक हैं?

    नोमेड : जी बिलकुल।


    मित्र : क्यों?

    नोमेड : क्योंकि संवैधानिक-आरक्षण, शोषक-वर्गों द्वारा शोषित-वर्ग के साथ सैकड़ों वर्षों तक लगातार प्रति क्षण की गई क्रूरता व बर्बरता का सक्रिय माफीनामा है। और साथ ही एकमात्र औजार है, जिससे जाति-व्यवस्था के पारंपरिक अन्याय को सामाजिक-न्याय में बदला जा सकता है।


    मित्र : क्या आपकी रोजी-रोटी, व्यवसाय आदि में संवैधानिक आरक्षण का योगदान है?

    नोमेड : बिलकुल नहीं, मैं ऐसा कोई व्यवसाय नहीं करता,  मैं ऐसी कोई नौकरी नहीं करता जिस तक पहुंचने के लिए  मुझे संवैधानिक आरक्षण मिला हो। मेरी क्रियाशीलता, मेरी गतिविधियों, मेरी सोच, मेरी समझ, मेरे व्यक्तित्व आदि में संवैधानिक आरक्षण का कोई योगदान नहीं रहा। मैंने बचपन से लेकर आज तक संवैधानिक आरक्षण की रोटी व सुविधा नहीं खाई। मेरे पिता की रोजी-रोटी, आर्थिक-आय आदि में उनको कभी संवैधानिक आरक्षण नहीं मिला। मेरी पत्नी को नहीं मिला। मेरी संतानों को नहीं मिलेगा।


    मित्र : फिर भी आप संवैधानिक आरक्षण के समर्थक हैं, क्यों?

    नोमेड : क्योंकि मानवता, संवेदना, न्याय आदि तत्व समाज, देश, देश की भावी-पीढ़ियों के लिए  मानव-निर्मित राजनैतिक, आर्थिक व धार्मिक तंत्रों आदि को धनात्मक, कल्याणकारी, सृजनशील, ईमानदार व सामाजिक प्रतिबद्ध बनाए रखने में सबसे महत्वपूर्ण तत्व होते हैं। ध्यान से देखा जाए तो शक्तिशालियों, विजेताओं और तंत्रों को बनाने व चलाने वालों ने शोषक वर्ग व शोषक वर्ग के सहयोगी वर्गों के हितों के लिए जाति-व्यवस्था के रूप में “सामाजिक आरक्षणों” का स्थायी प्रबंध कर दिया।


    मित्र : सामाजिक आरक्षण किसको कह रहे हैं आप?

    नोमेड :  सामाजिक आरक्षणों का तात्पर्य यह कि समाज की शक्तियों, सत्ताओं, संपत्तियों व संस्कृति आदि पर जन्मजात केवल जाति विशेष का होने के कारण ही अधिकार मिल जाना। हर स्तर पर जन्म के आधार पर सामाजिक आरक्षण रहे और शताब्दियों तक रहे, यदि सतयुग से कलियुग तक के युग-चक्र की अवधारणा को सत्य मान लिया जाए तो लाखों वर्षों से ये सामाजिक आरक्षण निर्बाध रूप से आज तक लागू हैं।


    संपत्ति पर सामाजिक आरक्षण –

    खेतों में काम करके उत्पादन करने वाला शूद्र पूरे साल प्रतिदिन बिना अवकाश के भरपूर बेगार परिश्रम करने के बावजूद, उत्पादित संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रखता था। यहां तक कि उसे अपना व अपने परिवार का पेट भरने, तन पर कपड़े ढकने व टुटही झोंपड़ी के लिए  भी शोषक जाति के लोगों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था। परिश्रम का अर्थ तिरस्कार व कर्म का अर्थ शोषण करना/बर्बरता/क्रूरता/कब्जाना/हड़पना/प्रपंच/छल/छद्म आदि। परिश्रम व कर्मशीलता के कोई मायने ही नहीं। 


    शक्ति व सत्ता पर सामाजिक आरक्षण –

    चूंकि उत्पादित संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था, इसलिए   समाज की वास्तविक शक्ति व सत्ता पर कोई अधिकार नहीं रहा और न ही हो पाया। शूद्रों ने अपने बहुत ही सीमित, बिना स्वतंत्रता वाले कुंठित समाज में भी किसी तरह से कोई आंतरिक व सापेक्षिक सत्ता बना ली हो जो उनके अपने ही बीच में श्रेष्ठता को प्रायोजित कर सके तो इतर बात है।


    ज्ञान पर सामाजिक आरक्षण –

    शूद्रों को ज्ञान का अधिकार नहीं, वेदों-उपनिषदों की ऋचाएं यदि किसी शूद्र के कानों ने सुन लीं तो सुनने वाले कानों को बहरा कर देना।  किसी शूद्र ने भूलवश यदि मुंह से वेदों उपनिषदों की ऋचाएं टूटेफूटे तरीके से भी बोल दीं तो जीभ काट देना आदि आदि। यहां तक कि छोटे-छोटे बच्चों को भी नहीं छोड़ना।


    संस्कृति पर सामाजिक आरक्षण –

    ग्रंथ आदि लिखकर अपने स्वार्थों के लिए  पूर्वनिर्धारित कर्मकांड से भरी परंपराएं बना दी गईं। समाज के द्वारा सहज स्फूर्त तरीके से कला, संस्कृति को विकसित पल्लवित नहीं होने दिया गया, कुछ लोगों ने ही सबकुछ तय कर दिया। इसे तय करने में शूद्रों के लिए कोई आधार नहीं छोड़ा गया।


    मित्र : सामाजिक आरक्षणों से हुई क्षतियां कैसीं रहीं?

    नोमेड :  सैकड़ों वर्षौ की जाति-व्यवस्था ने भारतीय समाज की लाखों प्रतिभाओं की प्रतिवर्ष भ्रूण हत्या की है।


    मित्र :  प्रतिभाओं की भ्रूणहत्या, वह कैसे?

    नोमेड :  जन्म के आधार पर ही आदमी की व्यक्तिगत योग्यता, व्यक्तिगत चरित्र व सामाजिक प्रतिष्ठा तय करने की बर्बर व क्रूर जाति-व्यवस्था के कारण लाखों करोड़ों संभावित प्रतिभाओं की भ्रूण हत्या प्रतिवर्ष लगातार शताब्दियों तक कैसे होती रही, इस बात को समझने के लिए तथ्यों को खुले व साफ मन से समझने की आवश्यकता है।


    मित्र :  जी

    नोमेड : 

    • ब्राह्मण का पुत्र भले ही मूढ़-बुद्धि हो, उसे विद्वान, पवित्र व प्रतिष्ठित ही माना जाएगा। अपने पूरे जीवन में उसका काम सिर्फ और सिर्फ कुछ पोथियों को सीधा, उल्टा-पुल्टा या ऊटपटांग गलत तरीके से बांच देना है।  घोर से घोर मूढ़ को भी महानता व विद्वत्ता की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता के लिए केवल किसी ब्राह्मण के यहां जन्म लेना पर्याप्त।

    • इसी प्रकार घोर से घोर कायर को भी क्षत्रिय के यहां जन्म लेना मात्र ही उसके अद्वितीय बहादुर होने की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता के लिए  पर्याप्त।

    • वैश्य के पुत्र को व्यापार व प्रबंधन का ककहरा न आते हुए भी, व्यापार व प्रबंधन का पुरोधा होने की सामाजिक-स्वीकार्यता व प्रामाणिकता केवल उसका जन्म वैश्य जाति में होने मात्र से ही मान लिया गया।

    • शूद्र को जन्म से ही किसी लायक नहीं माना गया, उसको पशुओं से भी निकृष्ट माना गया।  जिस समाज में गाय को पूजा गया, सुअर को दैवीय अवतार माना गया।  उसी समाज में शूद्र को इतना निकृष्ट माना गया कि उसे अछूत कर दिया गया, शूद्र यदि ज्ञान को सुन भी ले तो ज्ञान अपवित्र मान लिया जाता था।  इसीलिए  शूद्र को ऊपर के तीन वर्णों के दास के रूप में जबरन स्थापित किया गया और इसको ईश्वरीय प्रयोजन साबित करके ईश्वरीय दंड-विधान आदि तय करके, जबरन थोपी गई सामाजिक-दासता को जन्म के आधार पर दैवीय-नियति के रूप में स्वीकारे जाने के लिए  समाज की मानसिकता को ही अनुकूलित कर दिया गया।

    बात ज्ञान के ऊपर दावेदारी की हो, पौरुष के ऊपर दावेदारी की हो या व्यापार-प्रबंधन की दावेदारी की हो। भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था ने लाखों-करोड़ों प्रतिभाओं की भ्रूण-हत्या हर साल लगातार हजारों वर्षों तक की है और पूरी धूर्तता, कपट व सामाजिक/शारीरिक/मानसिक क्रूर-हिंसा के साथ की है।


    मित्र :  जी

    नोमेड :  सोचिये, यदि शोषक जातियों के बच्चों को पैदा होते ही जन्म के आधार पर बिना कुछ किए बैठे बिठाए ही महान, विद्वान, विशेषज्ञ व प्रतिष्ठित न माना जाता होता; तो उनको अपने पुरुषार्थ से विद्वता, विशेषज्ञता व प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए  समाज के वास्तविक विकास के लिए  अपनी ऊर्जा का प्रयोग करना पड़ता न कि शोषित जातियों का शोषण करते रहने के लिए नित्य नए कपटों व धूर्तताओं में लगाना पड़ता। शोषित जातियों के लोगों को पैदा होते ही वे तिरस्कृत व अपमानित होने के लिए  ही पैदा हुए हैं ऐसा स्वीकारते हुए शोषक जाति के लोगों की सेवा करने को ही जीवन-धर्म मानने को विवश किया गया।


    शोषित जातियों के लोगों को अपनी प्रतिभा को दिखाने का अवसर मिला होता तो संभव है कि दुनिया के नामचीन वैज्ञानिक भारतीय समाज ने दे दिए होते। यदि जातियाँ न होतीं तो हो सकता है कि किसी ब्राह्मण जाति में पैदा होने वाले बच्चे की चमड़े के काम के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो संभव है कि उसने पता नहीं कितनी चीजों का आविष्कार किया होता। यदि क्षत्रिय जाति में पैदा होने वाले बच्चे की लुहार-गिरी के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो लौह-यंत्रों की पता नहीं कितनी चीजों का आविष्कार किया होता। ऐसे ही सैकड़ों-हजारों उदाहरण सोचे जा सकते हैं और बहुत ही सहजता से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि जाति-व्यवस्था ने कैसे प्रति वर्ष लाखों प्रतिभाओं की लगातार सैकड़ों हजारों वर्षों तक पूरी बेशर्मी व घिनौनी सामाजिक/शारीरिक हिंसा के साथ भ्रूण हत्याएं की।


    भारत में जाति-व्यवस्था के कारण योग्यता व प्रतिभा को कभी सहेजा ही नहीं गया, ऊंची जातियों के बहुत ही सीमित दायरे में यदि कोई तुलनात्मक रूप से कुछ बेहतर निकल गया तो उसको हीरो के रूप में प्रायोजित कर दिया गया और यही तरीका आज तक भी लागू है।


    इन सामाजिक आरक्षणों से अपूरणीय क्षतियां हुईं, पूरा भारतीय समाज सड़ गया। भारत में वैज्ञानिक आविष्कारों और भारत के लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास की संभावननाओं का पतन हुआ।  भारत सैकड़ों वर्षों की राजनैतिक गुलामी और फिर मानसिक गुलामी में फँस गया। 


    मित्र :  संवैधानिक आरक्षण का विरोध कौन करते हैं, क्यों करते हैं।

    नोमेड :  जाति-व्यवस्था के हजारों वर्षों के काल में जबकि शूद्रों को समाज में मनुष्य की तरह जीने के मौलिक अधिकार भी नहीं थे, सैकड़ों हजारों वर्षों तक जिन्होंने शूद्रों को कुचला है और उसी कुचलते जाने के परिणाम स्वरूप आज तक जो संसाधनों व विभिन्न सत्ताओं के भोग करने के मजे ले रहे हैं। हजारों साल तक पारंपरिक व सामाजिक भ्रष्टाचार को महिमामंडित करते हुए जिन्होंने उनकी मेहनत का शिद्दत के साथ बिना उत्तरदायित्व के खाया है। इस वर्ग के प्रति थोड़ी सी भी ईमानदारी और प्रेम उनके साथ साझा करने की मानवीयता न दिखा पाने की जड़ता व असंवेदनशीलता भी जाति-व्यवस्था से ही आई है।


    संवैधानिक आरक्षण का विरोध केवल असंवेदनशील व स्वार्थ में अंधे लोग करते हैं।  जिनकी सामाजिक दूर दृष्टि नहीं और जिनके लिए  मानवीयता, न्याय व सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों के कोई मायने नहीं। योग्यता के नाम पर संवैधानिक आरक्षण का विरोध किया जाता है। जिसको योग्यता कहा जाता है वह तथाकथित योग्यता का मापदंड सरकारी नौकरी प्राप्त करने जैसी वाहियात और बेफिजूल की कसौटियों के आधार पर किया जाता है। शताब्दियों के सामाजिक आरक्षणों का भोग करते हुए तो योग्यता का कोई प्रमाण कथा कहानियों व प्रायोजनों से आगे नहीं बढ़ा और सरकारी नौकरियों में संवैधानिक आरक्षण की बात आते ही, योग्यता का मुद्दा उठा दिया जाता है।


    दरअसल शोषक जातियों ने आज तक कभी शूद्रों को अपने समकक्ष मनुष्यों के रूप में स्वीकारा ही नहीं, कभी भी समाज को जाति-व्यवस्था से ऊपर उठकर देखने की चेष्टा ही नहीं की। जाति-व्यवस्था का विरोध केवल सरकारी नौकरियों में शूद्रों के हिस्से को खतम करने के लिए और राजनैतिक सत्ता में उनकी बढ़ती भागीदारी से डर कर किया जाता है। जो लोग इस दावे या भ्रम में जीते हैं कि भारत में सामाजिक रूप से “जाति-व्यवस्था” खतम हो रहा है, तो वे लोग खुद के ही बनाए हुए झूठों में जीते हैं और “जाति-व्यवस्था” जैसी सामाजिक विभीषिका को स्व-केंद्रित स्वार्थों से परे नहीं देखना चाहते हैं।


    ज्यों ज्यों शूद्र जातियाँ प्रशासनिक व राजनैतिक ताकत प्राप्त करतीं जा रहीं हैं, त्यों त्यों शोषक जातियों को समाज से “जाति-व्यवस्था” खतम होते दिख रहा है, इसलिए  “आरक्षण” व “जाति-व्यवस्था की राजनीति” का विरोध किया जाता है। दूर से देखने में भले ही सुंदर लगे कि यह विरोध “जाति-व्यवस्था” के विरोध में है। बहुत सुंदर तर्क भी दिए जाते हैं, किंतु यथार्थ में संवैधानिक आरक्षण के विरोध का आधार तो उनके अपने स्वार्थ ही हैं।


    मित्र : जी

    नोमेड :  सैकड़ों सालों तक शोषक जातियों ने अपना अधिकांश जीवन/मानसिक/सामाजिक ऊर्जा समाज के बहुसंख्य को अघोषित दास बनाए रखने में लगाया।  इससे पूरा समाज जड़ हो गया। शोषक जातियाँ भी और शोषित जातियाँ भीं। यदि मानवीयता व सामाजिकता के व्यापक संदर्भों में सूक्ष्मता से देखा जाए तो जाति-व्यवस्था ने शोषक व शोषित दोनों ही वर्गों की जातियों को जड़ता व कुंठा के स्तर तक पहुंचाया है। किंतु शोषक जातियों के लोग अपने विद्रूप अहंकारों और स्व-केंद्रित-स्वार्थ को जीवन का परम-लक्ष्य मानने के कारण, अब भी यह चिंतन करने को तैयार नहीं हैं कि भारतीय समाज भीषण रूप से जड़ हो चुका है, सड़ांध से भरपूर है। और इस सड़ांध के पराकाष्ठा तक पहुंचाने और समाज के लोगों की सोच, मानसिकता, मूल्यों व भावों को जड़ करने व जड़ता में ही बनाए रखने में केवल और केवल जाति-व्यवस्था की परम्परा का ही हाथ रहा है।


    शोषक जातियों को बिना वास्तविक पुरुषार्थ के ही उपलब्ध समस्त विलासिताओं को भोगने की बड़ी भयंकर लिप्सा हमेशा से रही है और आज भी है। और इसी लिप्सा-भोग प्राप्ति के लिए  किए जाने वाले विभिन्न प्रायोजनों को हम सामाजिक परिवर्तन, समाज निर्माण व देश का विकास आदि के लुभावने नामों से प्रायोजित करते आए हैं। यह लिप्सा ही सामाजिक आरक्षण अर्थात् जाति-व्यवस्था का मूलभूत कारण रही और आज भी हमारे समाज की जड़ता के मूलभूत कारकों में से है।


    दुखद है कि खुद को बहुत जागरूक मानने वाले और खुद को सामाजिक चेतनशील मानने वाले लोगों में, जो शोषक जातियों के हैं, अपने स्वार्थ की लिप्सा व जातिगत श्रेष्ठता का अहंकार इतना अधिक है कि वे शूद्रों के प्रति सिर्फ इसलिए  घृणा का भाव रखते हैं, क्योंकि शूद्र सत्ता में दावेदारी की बात करने लगा है और शोषक जातियों की महानता, ज्ञान और योग्यता में सवाल खड़े करने लगा है।


    मित्र :  समाधान कैसे होगा।

    नोमेड : समाधान तभी होगा जबकि जाति-व्यवस्था की विद्रूपता व गहरी जड़ों को ईमानदारी व बिना पूर्वाग्रह के सामाजिक उत्तरदायित्व पूर्वक न्यायपूर्ण भाव से समझने की चेष्टा की जाएगी। और ईमानदारी से समाधान की चेष्टा की जाएगी। बिना सामाजिक ईमानदारी के “जाति-व्यवस्था” का पत्ता भी नहीं हिलने वाला। शोषक जातियों की ओर से जब भी जाति-व्यवस्था के विरोध की बात आती है तो केवल दो मुद्दों तक ही सीमित रह जाती है- “ संवैधानिक-आरक्षण “ और “ जाति-व्यवस्था की राजनीति “।  दोनों ही मुद्दे शक्ति व सत्ता प्राप्त करने के अवयव हैं।


    यदि शोषक जातियाँ सच में ही सामाजिक ईमानदार होतीं और जाति-व्यवस्था को खतम करने के लिए थोड़ा सा भी गंभीर प्रयास करतीं तो जाति-व्यवस्था कब की खतम हो गई होती।  शोषक जातियों को केवल अपने अंदर से जाति-व्यवस्था की भावना वास्तव में खतम करनी है। इसके लिए बिना ढोंग के जीवंत रूप में जाति-व्यवस्था की भावना को गहरे से खींचकर खतम करने की जरूरत है। जो ईमानदार व मजबूत इच्छाशक्ति के साथ अपने अंदर गहरे जमी हुई घृणा व जाति-व्यवस्था की श्रेष्ठता के छुपे हुए अहंकार से खुद को बिना किसी ढोंग के बाहर निकालने से ही संभव है। जाति-व्यवस्था लोगों के मन में बहुत गहरे स्थापित है जो शाब्दिक भाषणों, परिभाषाओं, लिखावटों आदि से खतम नहीं होगी।


    जाति-व्यवस्था का समाधान संवैधानिक व सामाजिक दोनों ही स्तर पर एक साथ ईमानदार प्रयासों से ही संभव है, इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता भी नहीं ही है। यह समाधान ही नए समाज, नए देश व नए सामाजिक मूल्यों का निर्माण करेगा …. जो आज के मूल्यों से लाखों-करोड़ों गुना बेहतर व वास्तविक होगें और बिना कपट व धूर्तता के होगें।

    पुस्तक “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” से

    (सामाजिक यायावर ‘विवेक उमराव’ द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारह महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)

     

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • भारतीय-दाम्पत्य जीवन व परिवार के व्यवहारिक मूल्य

    सामाजिक यायावर

    जैसे हम मानव-निर्मित ईश्वर को वास्तविक ईश्वर माने हुए हैं, माने हुए हैं कि हमारी सभ्यता विश्व की सर्वश्रेष्ठ सभ्यता है। वैसे ही और भी बहुत कुछ हम यूं ही माने हुए हैं और माने हुए को मनवाने के लिए दूसरों को अपशब्द कहते हैं, अपमानित करते हैं। अपने द्वारा माने हुए को जबरन तथ्यपरक सिद्ध करने के लिए  दूसरों के प्रति स्वयं को हिंसक भी बनाते हैं। बिलकुल ऐसे ही हम, बस यूं ही मान बैठे हैं कि भारतीय संस्कृति के परिवार व पारिवारिक मूल्य विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं। यदि, बस यूं ही मान लेने की अनुकूलता व बंद-दिमाग की जिद से बाहर आकर परिवार व पारिवारिक मूल्यों का ठोस धरातल पर मूल्यांकन किया जाए; तो परिवार की नीव हिंसा, ढोंग, झूठ, बाजारूपन व उपभोक्तावाद से भरी हुई दिखती है।

    हम समाज व देश निर्माण, विश्वगुरू होने की संस्कृति आदि का दावा करते हैं लेकिन मनुष्य व समाज को जीवन मूल्य व संस्कार देने वाली मूलभूत ईकाई परिवार के प्रति कतई गंभीर व जिम्मेदार नहीं होते हैं। हमने परिवार व परिवार की मूलभूत ईकाई विवाह को बाजारू बना रखा है जो मनुष्य में जीवन मूल्यों व संस्कारों को समृद्ध करने के बजाय संभावना के भ्रूण को भी नष्ट करता है।

    हम अपने जीवन साथी तक के चुनाव में अंदर से ईमानदार नहीं होते जबकि हम समाज व देश के निर्माण, विकास व समृद्धि की बात करते हैं। हम भूल जाते हैं कि देश व समाज का निर्माण मनुष्यों के निर्माण से होता है और मनुष्य के निर्माण की मूलभूत इकाईयाँ परिवार व विवाह हैं। जहां परिवार नहीं, वहां समाज नहीं; जहां समाज नही, वहां देश नहीं। खोखलेपन, दोहरेपन व सतहीपन आदि से व्यक्ति, परिवार, समाज व देश कुछ भी न तो निर्मित होता है और न ही समृद्ध होता है।

    यदि ईमानदारी व सूक्ष्मता से पारिवारिक मूल्यों के तत्वों को देखा जाए तो देश व समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की नीव जाति-व्यवस्था के साथ-साथ भारतीय परिवार भी है।

    परिवार में संस्कार व संस्कृति के मायने :

    संस्कृति बोलचाल की भाषा, कपड़े पहनने व भोजन करने के तौर तरीको, त्योहारों व पूजापाठ के कर्मकांडो आदि तक ही संकुचित होती है। वास्तविक जीवन मूल्यों व आंतरिक भाव संवेदना का कोई औचित्य नहीं होता है, उल्टे तिरस्कृत किए जाते हैं।

    संस्कारित स्त्री का तात्पर्य कि निर्धारित किए गए कपड़े पहने, किसी पुरुष से मित्रता न करे, प्रेम की स्वतंत्रता की मांग न करे। किसी पुरुष से कल्पना में भी भावात्मक प्रेम भी न करे। विवाह अर्थात् माता पिता जिस पुरुष से शारीरिक संभोग करने के लिए  निर्धारण करें केवल उसी पुरुष से शारीरिक संभोग करे और उस पुरुष के लिए  संताने पैदा करे। बचपन से विवाह तक माता पिता व भाई आदि की आज्ञाकारी रहे और उनके अनुसार ढले और विवाह पश्चात् अपने सास ससुर व पति की आज्ञाकारी रहे और उनके अनुसार ढले।

    संस्कारित पुरुष का तात्पर्य कि पुरुष परिवार के लिए  संपत्तियां अर्जित करे और सुविधाएं एकत्र करे और संपत्तियों व सुविधाओं से अपने माता पिता, पत्नी व संतानों की देखभाल करे। बचपन से लेकर युवा होने तक माता पिता ने देखभाल किया है इसलिए   पुत्र अपने माता पिता की मृत्यु तक उनकी देखभाल करे और आज्ञाकारी बन कर रहे। केवल संपत्ति व सुविधा अर्जित करने के तौर तरीको में विशेषज्ञता प्राप्त करे और माता पिता जिस स्त्री से विवाह कर दें, उसी स्त्री के साथ शारीरिक संभोग करे और उस स्त्री का प्रयोग अपने लिए  संताने उत्पन्न करने के लिए  करे।   

    माता पिता द्वारा तय किया गया विवाह :

    माता-पिता द्वारा तय किए गए विवाह में लड़की व लड़के को सभ्यता व संस्कारों के मूल्यों की कसौटी में मूल्यांकन करने का जबरदस्त प्रचलन है, इस प्रचलन को लड़का या लड़की को परिवार व समाज की संस्कृति की रक्षा व समृद्धि के लिए  ठोंक बजाकर चुनना कहा जाता है; इस प्रक्रिया में बहुत सारी लड़कियां व लड़के अस्वीकृत किए जाते हैं, ताकि अपने पुत्र के लिए  सेवाभावी संस्कारी पत्नी और पुत्री के लिए  देखभाल करने वाला प्रतिष्ठित पति खोजा जा सके।

    पुत्रवधू के संस्कारी होने के मूल्य :

    लड़की अपने ही धर्म व जाति की हो, लड़की स्वर्ग की अप्सरा जैसी सुंदर हो, बहुत अमीर घर की हो या अच्छे वेतन व सुविधा वाली सरकारी या गैर सरकारी नौकरी करती हो या दोनो, मुंहमागा दहेज लेकर आए, भाई न हों तो और बेहतर ताकि माता पिता की चल-अचल संपत्ति में हिस्सा भी मिले, प्रतिष्ठित परिवार की हो ताकि लड़के वालों का सामाजिक कद भी बढ़ जाए आदि आदि प्रकार की सभ्यता व संस्कारों से संपन्न गुणी लड़की को पुत्र की पत्नी होने के लिए  प्राथमिकता दी जाती है।

    ऊपर बताए गए मानकों की सभ्य व संस्कारी लड़की मिलने पर उसको चलाकर देखा जाता है ताकि उसके लंगड़ेपन की जांच हो सके, गाना गवाकर देखा जाता है ताकि उसके गूंगेपन की जांच हो सके, किसी प्रकार जुगत लगाकर लड़की के शरीर के आंतरिक अंगों को भी किसी विश्वसनीय महिला द्वारा देखे जाने का प्रयास किया जाता है ताकि शरीर में दाग-धब्बे आदि की जानकारी हो पाए, कुछ संस्कृतिवान लोग तो लड़की के अंतः वस्त्र तक उतरवा कर जांच करना चाहते हैं ताकि शरीर में छुपे हुए दाग व धब्बों की पूरी जानकारी मिल सके और वे लड़की के परिवार वालों से ठगा हुआ न महसूस करें।

    जामाता के संस्कारी होने के मूल्य :

    लड़का अपने ही धर्म व जाति का हो।  लड़के के माता पिता के पास चल अचल संपत्ति हो या लड़का ऊंचे वेतनमान व सुविधाओं की सरकारी या गैरसरकारी नौकरी करता हो या दोनो। लड़का सुंदर हो किंतु यदि लड़का बहुत अमीर है और बदसूरत है तो उसकी अमीरी के कारण उसको सुंदर और सुपात्र मान लिया जाता है। लड़का इकलौता हो तो और अच्छा, लड़के की बहन न हो तो और अच्छा। लड़का ऊपरी कमाई वाली सरकारी नौकरी में हो तो सबसे अधिक संस्कारी और सुपात्र माना जाता है।

    माता पिता द्वारा तय किए गए विवाहों को परंपरा में केवल इसलिए   सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित किया गया है क्योंकि इसमें लड़का या लड़की अपना जीवन साथी अपनी विचारशीलता व समझ के आधार पर नहीं बल्कि अपने माता पिता की इच्छा के आधार पर चुनते हैं।

    प्रेम विवाह :

    चूंकि परंपरा में प्रेम को स्त्री पुरुष के मध्य यौन संभोग तक ही संकुचित कर दिया गया है; इसलिए   माता पिता के द्वारा तय किए गए विवाह और प्रेम विवाह में केवल एक ही अंतर रह पाता है, वह यह कि एक में माता पिता द्वारा निर्धारित किए गए मनुष्य के साथ यौन संभोग किया जाता है जबकि दूसरे में अपने द्वारा पसंद किए गए मनुष्य के साथ यौन संभोग किया जाता है। बाकी सब कुछ समान ही रहता है।

    परिवार में सहज प्रेम व पारस्परिक विश्वास की जीवंतता न होने से युवक या युवती को सहज प्रेम की अनुभूति नहीं होती। परिवार में यौन से संबंधित चर्चा बच्चों व किशोरों के लिए  प्रतिबंधित होती है, अश्लीलता माना जाता है।

    माता पिता आपस में यौन संभोग करते हैं किंतु यह मानने को तैयार नहीं होते कि स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर व शारीरिक क्रियायें प्राकृतिक हैं, कुछ भी बुरा नही, कुछ भी छुपाने लायक नहीं। स्त्री के अंगों को अश्लील मानते हैं, छुपाने लायक मानते हैं।

    उचित जानकारी के अभाव में किशोर यौन कुंठित हो जाता है, इसलिए   अपवाद को छोड़कर प्रेम विवाह में भी सहज प्रेम प्रस्फुटित नहीं हो पाता है; प्रेमी प्रेमिका सहज प्रेम व यौन आकर्षण में अंतर ही नहीं कर पाते परिणामस्वरूप उनका प्रेम विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण व वासना तक ही संकुचित हो जाता है।

    यही कारण है कि बहुत मामलों में लड़की अपने प्रेमी को एक झटके में केवल इसलिए छोड़ देती है कि उसके माता पिता द्वारा खोजा गया लड़का उसके प्रेमी की तुलना में अधिक अमीर और कमाऊ है; और ऐसा करते ही उस लड़की को उसके माता पिता व परिवार द्वारा समझदार, तीव्रबुद्धि व संस्कारी मान लिया जाता है। प्रेमी के साथ यौन संबंधो के बावजूद उस लड़की को चरित्रवान व संस्कारी लड़की माना जाता है।

    ऐसा ही लड़के के लिए  भी है; जब वह माता पिता द्वारा खोजी गई अमीर लड़की, दहेज व सुविधाओं आदि के लिए  अपनी प्रेमिका को एक झटके में छोड़ देता है।

    प्रेम विवाह व माता पिता द्वारा तय किए विवाह का चरित्र बिलकुल एक सा ही होने के बावजूद प्रेम विवाह सामाजिक रूप से केवल इसलिए   तिरस्कृत होता है क्योंकि प्रेम विवाह में जाति या धर्म के बाहर का मनुष्य प्रेमी या प्रेमिका हो सकता है और माता पिता के द्वारा निर्धारित किए गए मनुष्य के बजाय अपनी पसंद के मनुष्य के साथ यौन संबंध बनाए जाते हैं और संतानोत्पत्ति की जाती है।

    परिवार में पति पत्नी  :

    अपवादों को छोड़कर विवाह होने के पश्चात् कुछ दिनों तक दोनों पक्षों की ओर से सामंजस्य, संतुलन आदि का ढोंग चलता है। लेकिन समय के साथ-साथ जब पति पत्नी अपने वास्तविक चरित्र के साथ जीना शुरू करते हैं, तो आपसी टकराहटें शुरू होतीं हैं। ऐसी स्थिति आने पर जो पति पत्नी अपने स्वार्थ व अहंकार से बाहर आकर संतुलन नहीं कायम कर पाते हैं, वे अपने वैवाहिक जीवन को नर्क बनाते हैं।

    दरअसल लड़का, लड़की, माता, पिता आदि यह भूल जाते हैं कि उनमे अच्छाई व बुराई दोनों ही हैं और वे समाज व परिवार की अनुकूलता के ही उत्पाद हैं; जैसे वे खुद हैं वैसे ही उनकी पत्नी, पति, बहू, दामाद, पुत्र, पुत्री आदि भी हैं।

    ये लोग स्वार्थ, लिप्सा व बाजारू भोग के नशे के अंधेपन में यह भूल जाते हैं कि विचार, संस्कार, विनम्रता, शुद्धता, प्रेम, समर्पण, त्याग आदि मूल्य जीवन में जीवंतता से जिए जाते हैं।  ऐसे लोगों की ईमानदारी, विश्वास व प्रेम का कोई ‘वास्तविक जीवन मूल्य’ नहीं होता।  ऐसे लोग पूरा जीवन रोते झींकते गुजारते हैं और समय के साथ-साथ परिवार व समाज में जाने अनजाने ऋणात्मकता ही बढ़ाते हैं।

    परंपरा में विवाह संस्था में सहज व स्वतंत्र जीवन सहचरत्व का मूल्य विकसित करने के बजाय स्त्री व पुरुष के यौन संबंध से संतान पैदा करने व पैदा की गई संतान को अपने जैसा ही संकुचित, अनुकूलित, कुंठित व परतंत्र बनाने वाली संस्था बना दिया गया है; जिसमें मनुष्य के भावों, प्रेम व स्वतंत्रता आदि का कोई स्थान व महत्व नहीं है। सब कुछ बने बनाए ढांचे से ही तय होता है।

    परिवार में बच्चे :

    चूंकि विवाह संस्था के ढांचे में ही सहज प्रेम उपेक्षित व तिरस्कृत किया जाता है, इसलिए   बच्चों का पालन पोषण भी ढांचे की अनुकूलता के संकुचित प्रभाव क्षेत्र के दायरे में ही होता है। अनुकूलता के प्रभाव क्षेत्र से बाहर आने का प्रयास करना ही संस्कृति व संस्कार का ध्वस्त होना मान लिया जाता है।

    माता पिता व परिवार द्वारा बच्चों में स्वतंत्र व वैज्ञानिक दृष्टिकोण की संभावना तक की भ्रूण हत्या की जाती है। बच्चे  स्वतंत्र अस्तित्व वाले चेतनशील जीवंत मनुष्य के बजाय माता पिता की व्यक्तिगत संपत्ति माने जाते हैं; यही कारण है कि माता पिता व बच्चों के संबंध सहज व मौलिक प्रेम के बजाय अनकही किंतु तीव्र अपेक्षाओं के व्यापाराना लेनदेन पर आधारित होते हैं।

    ऐसी अनुकूलता व कुंठित वातावरण मनुष्य व समाज का विकास व चेतनशीलता अवरुद्ध कर देते हैं और बचपन से ही मानसिकता दूषित व कुंठित कर देते हैं।  बच्चा मौलिकता व स्वतंत्रता के बजाय व्युत्पन्न अनुकूलता की परतंत्रता की ओर बढ़ता जाता है और इन्ही के सख्त व संकुचित दायरों में आजीवन कुंठित होकर रह जाता है। ऐसे ही चक्रों के कारण कुंठा व मानसिक परतंत्रता पीढ़ी दर पीढ़ी और गहरे व्याप्त होती चली जाती है।   

    चलते-चलते :

    परिवार व विवाह संस्था के भावों व मूल्यों को अपनी जरूरत के अनुसार परिभाषित करके प्रायोजित करते हुए कुंठित व परतंत्र मानसिकता के व्यापाराना ढांचे को संस्कृति का नाम दे दिया गया है। यही कारण है कि वास्तविक जीवन-मूल्य, संस्कार, संस्कृति, स्वतंत्रता व चेतनशीलता आदि अपवाद परिवार में ही परिलक्षित होता है।

    साभार – “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” किताब के एक खंड से लिया गया.

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