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स्त्री का शरीर व शरीर के अंग भड़काऊ नहीं होते, स्तन व योनि जैसे यौनांग भी नहीं

सामाजिक यायावर

शुचिता के नाम पर, संस्कार के नाम पर, संस्कृति के नाम पर, शालीनता के नाम पर, सौंदर्य के नाम पर स्त्रियों के पहनावे आदि पर सवाल खड़े करना बहुत अधिक आम बात है। यहां तक कि बलात्कार, छेड़खानी व बदतमीजी आदि का ठीकरा भी स्त्री के पहनावे पर ही फोड़ दिया जाता है।

बकवास, कुतर्क, मानसिक विकृति, वैचारिक विकृति व बेहूदगी के आवेश/आवेग में कहा कुछ भी जाए लेकिन यह एक तथ्य है कि यदि कोई पुरुष स्त्री को भोग्या के तौर पर नहीं देखता है तो उसके सामने यदि स्त्री निर्वस्त्र भी खड़ी है तो उस पुरुष में कामवासना का भाव नहीं आएगा। वह स्त्री के शरीर को एक साधारण वस्तु के रूप में सहजता से ही स्वीकारेगा।

जब बचपन से ही लड़कों के अंदर लड़की को यौन रूप से पुरुष के द्वारा भोग्या और लड़कियों के अंदर खुद को यौन भोग्या माने जाने के रूप में जबरन ठूंस दिया जाता है। तो लड़के की मानसिक कंडीशनिंग लड़की को भोग्या के रूप में देखने की और लड़की की मानसिक कंडीशनिंग खुद को भोग्या के रूप में देखने की हो जाती है। बहुत गहरे अंदर अवचेतन में यह कंडीशनिंग पैठ बना लेती है और मन के भावों व विचारों को नियंत्रित करने लगती है।

स्त्री के पहनावे आदि की बात की जाती है। किंतु जिनको स्त्री को भोग्या के रूप में देखना होता है वे पूरे कपड़े पहने स्त्री को भी ऐसे देखते हैं जैसे कि कपड़ों को भेदकर स्त्री का हर अंग देख लेगें और पकड़ कर भंभोड़ डालेंगें। इसको समझने के लिए के लिए बहुत बड़ी बहस की जरूरत नहीं है, सहजता से समझा जा सकता है। 

स्त्री के स्तन जो ब्रा व ब्लाउज से ढके रहते हैं, ऊपर से पल्लू रहता है तब भी देखने वाला पुरुष ऐसे देखता है जैसे सबकुछ दिख रहा है। स्तनों को मसलने तक की कल्पनाएं कर लेता है। ब्रा, ब्लाउज व पल्लू आदि की बात छोड़िए। स्त्री यदि रजाई से ढकी भी लेटी हो और उसका कोई अंग न दिख रहा हो, केवल पुरुष को यह मालूम पड़ जाए कि रजाई के अंदर स्त्री है तब भी उसके सारे अंगों की कल्पना वैसे ही करेगा जैसे कि सामने देख रहा हो। सारे यौनांगों की कल्पनाएं कर डालेगा। स्त्री पैंटी पहने होगी, पैंटी के ऊपर सलवार या पैंट या साड़ी या लहंगा या कुछ और। लेकिन देखने वाला पुरुष स्त्री द्वारा पहने गए दो तीन परतों के कपड़ों को भेदकर भी योनि व चूतड़ों को देखने और भभोड़ने की कल्पना कर लेता है।

यदि स्त्री के यौनांग पुरुष में कामुकता पैदा करते हैं तो एक नवजात बच्ची की योनि के द्वारा या एक बहुत वृद्ध महिला के अंग भी कामुकता पैदा करने चाहिए। किशोर व युवा उम्र की स्त्रियों के अंगों से कामुकता पैदा होती है ऐसा क्यों?

यदि स्तन व योनियां पुरुष में कामुकता पैदा करती हैं तो गाय, भैंस, बिल्ली, बकरी, भेंड़, कुतिया, गदही, घोड़ी, हथिनी, ऊंटनी आदि पशुओं की मादाओं के पास भी स्तन व योनियां होती हैं और ये मादाएं बिना कपड़े पहने खुलेआम घूमती रहती हैं, तब पुरुषों में कामुकता क्यों नहीं पैदा होती है जबकि इन पशु-मादाओं की योनि की बाहरी बनावट लगभग मनुष्य स्त्री की योनि के जैसी होती है। 

पुरुष अपनी बकरियों, भैंसों, गायों, भेड़ों, घोड़ी, गदही, ऊँटनी आदि को पशु पुरुष के पास गर्भाधान के लिए लेकर खुद जाता है, पशु उसके सामने ही यौन क्रिया करते हैं इसके बावजूद पुरुष के अंदर बकरी, भैंस, गाय, भेंड़, गदही, घोड़ी आदि से सेक्स करने की इच्छा क्यों नहीं पैदा होती है जबकि उसकी आंख के सामने ही पशु मादा की योनि में पशु पुरुष अपने शिश्न को प्रवेश कराता है, यौन क्रिया करते हुए योनि के अंदर वीर्यपात करता है।   

मैं ऐसे कई आदिवासी समाजों से मिल चुका हूं जहां आज भी स्त्रियां अपने स्तनों को नहीं ढकती हैं। उन समाजों के पुरुषों के अंदर तो स्त्री के स्तन देखकर कामुकता या वासना नहीं पैदा होती है। आदिवासी समाज में बलात्कार नहीं होते हैं। आदिवासी समाज में छेड़खानी नहीं होती है। जबकि स्त्री तो अर्धनग्न रहती है। स्त्री पुरुष दोनो दारू पीते हैं। स्त्री अर्धनग्न, स्त्री पुरुष दोनो दारू के नशे में लेकिन फिर भी नहीं बहकते हैं, बलात्कार नहीं होते हैं, यौन छेड़खानी की बेहूदीगियां नहीं होती हैं। जो पुरुष स्त्री को भोग्या के रूप में न देखकर अपने ही जैसे मनुष्य के रूप में देखता है उसको क्या फर्क पड़ता है कि स्त्री ने कपड़े पहने हैं या नहीं पहने हैं।

वास्तविक तथ्य तो यही है कि वासना मानसिक होती है। वासना किसी शारीरिक अंग के आकार प्रकार पर निर्भर नहीं होती है। दरअसल पुरुष के द्वारा स्वयं की वासना कामुकता के लिए स्त्री को गुलाम बनाने या प्रतिबंधित करने की जरूरत नहीं है। यदि जरूरत है तो खुद के अंदर स्त्री को अपने जैसा ही मनुष्य स्वीकारने की, स्त्री के स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकारने की।  

स्त्री को यौन भोग्या के रूप में देखना, स्त्री शरीर के प्रति कामुक बने रहना मानसिक यौन विकृति है। वैसे ही जैसे मानसिक यौन विकृत पिता अपनी पुत्री व भाई अपनी बहन से संभोग करता है। हमारे समाज में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं भले ही इन घटनाओं के सच को दबा दिया जाता हो।

मैं तो कहता हूं कि जिन लोगों को यह लगता है कि स्त्री के अंग स्तन व योनि कामुकता बढ़ाते हैं उन लोगों को बकरी, कुतिया, घोड़ी, गदही, भेंड़, भैंस व गाय आदि के साथ भी यौन क्रिया करना चाहिए। योनि ही तो है क्या फर्क पड़ता है किस प्रजाति के जीव की है। सभी योनियां चमड़ी, नसों व धमनियों आदि से ही तो निर्मित होती है। 

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