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यूँ बनता है एक आदमी

Veeru Sonker यूँ बनता है एक आदमी थोड़ा सा डर बटोरे हुए जो कहता है मैं नही डरता. चलने से पहले बहुत बार ठिठकता है और जेब मे पड़ी भाषा की गिन्नियां टटोलता है उसके बाद आदमी नही उसका जोड़-घटाव चलता है. जैसे नफरत चलती है जैसे सत्ता के पैर नाचते हैं जैसे लड़खड़ा जाती […]

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शब्द नही, एक पूरा देश है

शब्द, शब्द की तरह नही आये वह आये थोड़ा सकुचाते हुए और, मैंने पूछा कैसे हैं आप! शब्द जो प्रत्यक्ष थे, स्वतः प्रमाणित थे आश्चर्य से भरे हुए, वह दुबारा आये तो अपने कपड़े उतारे हुए और, मैंने फिर पूछा मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ लौट गए शब्द इस बार आये, तो करुणा […]

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हमारे दौर के बच्चे

हमारे दौर के बच्चों की पतंग कट गई है उनकी दौड़ कहीं गुम है आसमानों में वे ताक रहे हैं दुख के उस आसमान को, जिसने खा लिया है उनकी पतंग को और उगल दिया है मौसमी बमवर्षक विमानों की चहल-पहल को हर पेड़ ने उनके ‘लंगड़ो’ के जवाब में अपनी खाली जेबें दिखा दी […]