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All posts in " Kumar Vikram "
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निजता की बहस पर एक सार्वजनिक सवाल

हर साल बाढ़ से बेघर हुए लाखों लोग राहत शिविरों में पैदा होते बच्चे  हेलिकॉप्टर से फेंके गए खाने के पैकेट को धक्का मुक्की कर लूटने को अभिशप्त बच्चे जवान और बूढ़े ज़िला अस्पताल के गलियारों में अधमरे सोए कातर निगाहों से टहलते कुत्तों को देखते मरीज़ और उनके अस्वस्थ परिचारक भावी इतिहास हमारा है […]

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अंत की शुरूआत

[themify_hr color=”red”] अंत में उसने कहा था कि अंत में सब ठीक हो जाएगा अंतत: सबक़ा भला होगा मैंने सोचा था अंत अंत में ही आएगा मुझे यह इल्म नहीं था कि अंत दरअसल एक रोज़ाना ख़बर थी और अंत अंत में नहीं बल्कि हर पल आने वाले अंत की एक बानगी दिखाता जाएगा शायद […]

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एक कविता के दो ड्राफ्ट्स, और दो ड्राफ्ट्स से बनी एक कविता

कुमार विक्रम ड्राफ्ट १ मैं प्रार्थना करता हूँ मेरे शहर का सबसे अमीर आदमी और भी अमीर हो जाये मैं चाहता हूँ मेरे शहर का सबसे बड़ा गैंगस्टर और भी बड़ा गैंगस्टर हो जाए मेरी दिली ख्वाईश है शहर की सबसे नामी तवायफ और भी नामी हो जाए मेरी तमन्ना है मेरे शहर का सबसे […]