All posts in " Hayat Singh "
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संतुलन

Hayat Singh यह क्षोभ, विमोह, हताशा और निराशा दिन-महीने या साल विशेष से नहीं, बल्कि कई दशकों से पल रही असन्तुष्टियों का उबाल थी यह बात ज्ञात भी सभी को थी, लेकिन अपनी-अपनी सहूलियत के अनुसार कोई साइकिल में सवार था कोई हाथी में कोई नुक्कड़ के खोखे पर लड़ा रहा था पंजा राष्टीय से […]

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यह सब एक दिन में नहीं हुआ

हयात सिंह यह सब एक दिन में नहीं हुआ अनगिनत सूर्योदय और सूर्यास्त गवाह बने और मिट गए नाटक का पर्दा उठने और गिरने में समय लगता हो भले चंद सेकण्ड का मगर मंचन घंटों चलता है मंचन के लिए कथा और कथानक को तो और भी अधिक कई बार बरसों लग जाते हैं एक […]