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All posts in " Dhiraj Kumar "
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सोच

[themify_hr color=”red”] अनिश्चितता इस कदर व्याप्त हो कि ठीक ठीक कुछ भी कहना ठीक नही हो तो संभावना या प्रायिकता इस बात कि सबसे ज्यादा होती है कि किसी ज्ञात बिन्दु पर या किसी ज्ञात समय पर यदि वो ‘हाँ’ है तो तक्षण दुसरे बिन्दु या समय पर वो ‘ ना’ हो जाता है ऐसा […]

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जरूरी हो गया है

[themify_hr color=”red”] वो एक है अरे नही ! वो दो है नही नही वो अनेक है नही रे वो कण कण मे है वो एकमात्र है नही वो तो अंतिम है वो अनंत है,अपरंपार है वो सच्चा सत्य है नही वो सच्चा शिव है नही वो तो सच्चा सुन्दर है वो ऐसा है ,वो वैसा […]

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गिरना

धीरज गिरने की सीमा या तो सुनियोजित होती है या पूरी तरह अनियोजित तीसरा विकल्प तो उपरोक्त का निर्विकल्प ही होता है…. जब गिरने की सीमा अनियोजित होता है बहुधा ताड़ से ही गिरते है और किसी मनचाहे खजूर पर आकर अटक ही जाते है जब सुनियोजित ढंग से गिरना शुरू करते है भारशून्यता के […]

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हाथी के दांत…

धीरज हाथी के दांत… खाने के अलग और दिखाने के लिए अलग होते है पर यह ….. सही नही है जनाब ! ये जो बाहर वाले चमकीले और नुकीले दांत होते है,वो डराने के लिए और जो…. भीतर वाले चौडे एवं काले दांत होते है न….. भोजन के देखकर गुपचुप गुपचुप मुस्कराने के लिए होते […]