All posts in "आपके आलेख"
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क्या इस माहौल के लिए सिर्फ़ संघवादी मानसिकता से जुड़े लोग ही दोषी हैं?

Tribhuvan इन दिनों जो माहौल चल रहा है, उसे लेकर देश का एक बड़ा वर्ग आरएसएस और उससे जुड़े लोगों को दोषी मानता है। यह स्वर छुपा हुआ नहीं है। यह बहुत मुखर स्वर है और ख़ासकर वामपंथी झुकाव वाले प्रगतिशील खेमे के बुद्धजीवियों में। लेकिन क्या सिर्फ़ संघवादी मानसिकता के लोग ही इस वातावरण […]

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सीखने की कला के बिना स्कूली शिक्षा के दुष्परिणाम

Sachin Raj Singh Chauhan विश्व विकास रिपोर्ट 2018 के अनुसार स्कूलिंग विदाउट लर्निंग ने न केवल विकास के अवसरों को बर्बाद कर दिया है बल्कि वैश्विक स्तर पर बच्चों के प्रति घोर अन्याय किया है। इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलने लगे है। अकेले ग्रामीण भारत में विद्यालयों के तीसरी कक्षा के 75 प्रतिशत छात्रों […]

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धरती और इंसान

Nishant Rana जला देना हर एक उस पेड़ को जो तुम्हारे कहने से मनचाहा फल न दे। भाप बना कर उड़ा देना हर वो नदी जो तुम्हारे कहने पर दिशा न बदले। भून देना हर एक उस पंछी को , पशु को  जो तुम्हारे तलुए न चाटे, जो दुम हिला के हाजिर न हो तुम्हारी […]

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राहुल गाँधी बनाम उन पर लगाए जाने वाला वंशवाद का इल्ज़ाम !

Razia S. Ruhi डॉक्टर का बेटा एक अच्छा डॉक्टर बन सकता है, इंजीनियर का बेटा एक काबिल इंजीनियर बन सकता है, चिरौंजी लाल का बेटा उसकी किराने की दुकान संभाल सकता है, ऋषि कपूर का बेटा रॉक स्टार बन सकता है, और इस सब में कहीं किसी का वंशवाद आड़े नहीं आता बल्कि इन क्षेत्रों […]

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किसानों की जमीन पूंजीपतियों द्वारा जबर्दस्ती छीनी जाती है या हम किसान को मजबूर कर देते है ऐसा करने पर

Nishant Rana आए दिन हम सुनते रहते है की कोर्पोरेट किसानों की जमीन हथियाती जा रही है इसके आगे भी यह सुनते है कि  सरकार जोर जबर्दस्ती पूंजीपतियों को किसान की जमीनों पर कब्जा दिलवा रही है। इसके लिए हम दूर दराज के क्षेत्र, जंगलों आदि के बारे में की-बोर्ड पर बैठे तुक्के मारते रहते […]

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जागरूक युवा बनाम उदासीन युवा

Sachin Raj Singh Chauhan जब बच्चा जन्म लेता है तो कई उम्मीदें भी जन्म लेती है, कई सपने भी देखे जाते है और आगे चलकर जब बच्चा युवा होता है तो वह सारी जिम्मेदारियों को अपने विशाल कंधो पर धारण कर लेता है ठीक उसी तरह माँ भारती को भी अपने बच्चों से पूरी उम्मीदें […]

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यूँ बनता है एक आदमी

Veeru Sonker यूँ बनता है एक आदमी थोड़ा सा डर बटोरे हुए जो कहता है मैं नही डरता. चलने से पहले बहुत बार ठिठकता है और जेब मे पड़ी भाषा की गिन्नियां टटोलता है उसके बाद आदमी नही उसका जोड़-घटाव चलता है. जैसे नफरत चलती है जैसे सत्ता के पैर नाचते हैं जैसे लड़खड़ा जाती […]

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महात्मा ज्योतिबा फुले स्मृति दिवस पर ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता और एक स्वाभाविक प्रवाह को देखने की आवश्यकता

संजय जोठे महात्मा ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर का जीवन और कर्तृत्व बहुत ही बारीकी से समझे जाने योग्य है. आज जिस तरह की परिस्थितियाँ हैं उनमे ये आवश्यकता और अधिक मुखर और बहुरंगी बन पडी है. दलित आन्दोलन या दलित अस्मिता को स्थापित करने के विचार में भी एक “क्रोनोलाजिकल” प्रवृत्ति है, समय के क्रम में […]

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