विविध व विस्तृत स्वाध्याय बनाम विभिन्न प्रकार की भक्तई

Vivek Umrao "सामाजिक यायावर"
​कैनबरा, आस्ट्रेलिया

दरअसल भारतीय समाज में स्वाध्याय करने की आदत नहीं है। माता-पिता, परिवार, रिश्तेदार व समाज स्वाध्याय को बच्चों के बचपन से ही भयंकर रूप से हतोत्साहित करता है, हतोत्साहित ही नहीं करता तिरस्कृत भी करता है, उपहास भी उड़ाता है। यहां तक कि यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों के साथ भी यही होता है, वैसे भी ऐसे माहौल में पलने बढ़ने के कारण तथा रोजगार के बेहतरीन अवसरों पर देश के चंद यूनिवर्सिटियों का सामंती चरित्र के साथ कब्जा होने के कारण भी स्वाध्याय हतोत्साहित होता है। स्वाध्याय करते हुए घर वालों की गालियां व जूते खाएं या रोजगार के लिए मशक्कत करें।

उसी जगह देश की जो चंद यूनिवर्सिटियां जबरदस्ती सामाजिक मसलों के चिंतन का ठेकेदार बनीं हुईं हैं। उनमें सिर्फ यह है कि वहां यदि छात्र चाहे तो स्वाध्याय के कुछ अवसर उपलब्ध हैं। लेकिन चूंकि छात्र की बचपन से स्वाध्याय की प्रवृत्ति नहीं होती इसलिए स्वाध्याय के इन अवसरों का प्रयोग पूर्वाग्रह या फैशन या कंडीशनिंग के कारण विकृत जो जाता है, व्यक्तित्व व संभावनाओं का प्रष्फुटीकरण नहीं हो पाता। इस कारण स्थिति यह हो जाती है कि इन चंद यूनिवर्सिटी के छात्र व शिक्षक देश के स्वयंभू कर्णधार व ठेकेदार बन जाते हैं। जो मन में आए, या जो इनके हित का या स्वार्थ का एजेंडा हो या पूर्वाग्रह हों या जो भी उटपटांग चिंतन स्तर हो या जो भी सतही समझ हो,  उसमें ही लिप्त हो जाते हैं। समाज की कंडीशनिंग ही ऐसी है कि यही सबकुछ इनकी महानता भी बन जाती है।

चूंकि अधिकतर लोग स्वाध्याय बिलकुल भी नहीं करते हैं। इसलिए ये लोग चिंदी सा भी स्वाध्याय कर लेते हैं तो आदर्श बन जाते हैं, यहां तक कि महान के रूप में भी प्रायोजित हो जाते हैं, क्रांतिकारी व प्रगातिशील व जागरूक के रूप में प्रायोजित हो पाना तो बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली का खेल हो जाता है। ये लोग इतने धूर्त व सामाजिक बेईमान होते हैं कि पूरी मशक्कत के साथ खुद को समाज व देश का कर्णधार व महान चिंतक व प्रगतिशील के रूप में प्रायोजित करते हैं। इनका पूरा जीवन ढोंग व खोखलेपन में ही गुजरता है। यह लोग स्वतंत्र व ईमानदार चिंतकों से खार खाते हैं, उनके खिलाफ बाकायदा अदृश्य नेक्सस बनाते हैं।

खतरनाक स्थिति यह होती है कि ये लोग खुद को महान मानते हैं, भारतीय समाज के आम लोगों की तो कंडीशनिंग ही ऐसी होती है कि इन चंद यूनिवर्सिटियों के लोगों को महान मानने के दायरे के बाहर कुछ सोच ही नहीं सकते।

कोई भी देश या समाज किन्हीं नरेंद्र मोदी या अमित शाह या किन्हीं अन्य राजनेताओं के कारण चिंतन, विचार, वस्तुनिष्ठता, समझ व दृष्टि के मामले में पीछे नहीं जाता। क्योंकि कोई भी समाज राज-सत्ताओं पर कभी भी पूरी तरह अंध-विश्वास नहीं करता। सत्ताओं पर अंध-विश्वास करना संभव ही नहीं, असंभव है।

लेकिन आम लोग उन लोगों पर विश्वास करते हैं जो लोग बुद्धिजीवी व चिंतको के रूप में प्रायोजित होते हैं। खतरनाक यह है कि भारत की चंद यूनिवर्सिटियों को बुद्धिजीवी व चिंतको को पैदा करने का छापाखाना मान लिया गया है। यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है, इससे भी खतरनाक यह है कि इसको खतरनाक मानने की बजाय, हितकारी माना जाता है, उद्धारक माना जाता है।

जब कोई समाज खोखलाहट को, दोहरेपन को, ढोंग को, सतहीपन को आदर्श मानने लगता है, तब उस समाज को मूर्ख बनाना बहुत सरल हो जाता है। भारतीय समाज में यही हो रहा है। यही कारण है कि राजनैतिक सामाजिक मुद्दों पर आम आदमी के निर्णय प्रभावित होते आ रहे हैं। भारतीय समाज की राजनैतिक सामाजिक जागरूकता आगे बढ़ने की बजाय पीछे की ओर जा रही है, उल्टा चल रहे हैं।

स्वाध्याय के सतहीपन का स्तर यह है कि कोई ओशो की कुछ किताबें पढ़ लेता है तो सबकुछ ओशो की बातों के आधार पर ही देखना शुरू कर देता है। कोई इतिहास की कुछ किताबें पढ़ लेता है तो इतिहासविद बन जाता है, भले ही इतिहास के नाम पर जो किताबें उसने पढ़ीं हों वे कूड़ा रहीं हों। ऐसा ही समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, शिक्षाशास्त्र व अन्य विषयों के लिए भी है। अधकचरापन बेहद खतरनाक होता है, ऊपर से यदि अधकचरेपन में इगो व अहम का तड़का लग जाए तो स्थिति बहुत ही अधिक खतरनाक हो जाती है।

स्वाध्याय के द्वारा एक आम आदमी किसी विषय या अनेक विषयों पर भारत की सबसे बेहतरीन मानी जानी वाली यूनिवर्सिटी से पीएचडी किए छात्र या प्रोफेसर से भी अधिक व बेहतर समझ रख सकता है, यूं कहा जाए कि रखता ही है। स्वाध्याय व्यक्ति को स्वतंत्र बनाता है। स्वाध्याय व्यक्ति को अंदर से मजबूत बनाता है, सामाजिक ईमानदार बनाता है, दृष्टिवान बनाता है। बशर्ते स्वाध्याय का स्तर विविधतापूर्ण व विस्तृत हो।

दुनिया के विकसित देशों की यूनिवर्सिटियों में तो ऐसी व्यवस्था होती है कि यदि कोई व्यक्ति योग्य है तो उसके पास डिग्री हो या न हो, वह शोध यहां तक कि पीएचडी कर सकता है, यूनिवर्सिटी बाकायदा स्कालरशिप देतीं हैं। यही कारण है कि विकसित देशों की यूनिवर्सिटियों के शोधों व पीएचडी का अलग ही स्तर होता है।

भारतीय समाज को अपने बच्चों को बचपन से ही विविधतापूर्ण स्वाध्याय की ओर प्रोत्साहित करना चाहिए, अनगिनत अवसर उपलब्ध कराने चाहिए। स्वाध्याय कभी भी व्यर्थ नहीं जाता। भारतीय समाज यदि अपने बच्चों को विविधतापूर्ण व विस्तृत स्वाध्याय के लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दे, अवसर उपलब्ध कराना शुरू कर दे। केवल दो दशकों में ही आमूलचूल अंतर दीखना शुरू हो जाएगा।

नहीं तो विकसित देशों की भोंडी नकल करने या गरियाने में ही अपना विकास व प्रगतिशीलता व चिंतनशीलता का गौरव अनुभव करता रहेगा। जो समाज सतहीपन व खोखलाहट व ढोंग से भी गौरव महसूस करने की मानसिकता में जीने लगते हैं, उनको सड़ने से बचाया नहीं जा सकता है, असंभव होता है क्योंकि सड़ांध ही उनके चरित्र के मूल में होता है।

Vivek Umrao Glendenning "Samajik Yayavar"

After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

—————

For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.