गोरखपुर में बच्चों की मौत का वास्तविक जिम्मेदार कौन

Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”
संस्थापक सह मुख्यसंपादक, ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
संस्थापक सह वाइसचांसलर, गोकुल सामाजिक विश्वविद्यालय

कटु सच्चाई है कि हम समाज के रूप में बहुत कमजोर, भयंकर असंवेदनशील व बेहद गैरजिम्मेदार हैं। पूरे देश में प्रतिदिन अनेक भयावह व लज्जित करने वाली घटनाएं होतीं हैं, अधिकतर घटनाएं सामने आ ही नहीं पातीं हैं। हम, हमारा समाज, हमारा मीडिया व हमारे आग्रह सभी का चरित्र व्यक्तिनिष्ठ चयनात्मक हैं।

हम घटनाओं के होने के बाद राजनैतिक दलों के प्रति अपनी निष्ठा, पसंद नापसंद व स्वार्थों के पूर्वाग्रहों के आधार पर अपना पक्ष चुनते हैं। गोरखपुर मेडिकल कालेज में बच्चों के मरने की घटना को ही ले लीजिए। हम दिखावा तो ऐसा कर रहे हैं कि बच्चों की मृत्यु से अंदर तक झिंझूड़ गए, लेकिन सच्चाई यह नहीं है। सच यह है कि हम संवेदनशीलता का चोला ओढ़ कर अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों को जी रहे हैं।

एक समय था जब केवल नेता लोग ही राजनैतिक पूर्वाग्रहों व सामाजिक असंवेदनशीलता को जीते थे। क्योंकि अखबारों व टीवी चैनल्स में बात रखने की उपलब्धता कम होने से हम लोगों को अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों व सामाजिक असंवेदनशीलता को जी पाने का अवसर नहीं मिलता था। किंतु अब सोशल मीडिया के आने से समय बदल गया है, हमें भी अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों व सामाजिक असंवेदनशीलता को जी पाने का माध्यम व अवसर मिल गया है।

इस माध्यम से अब हम विकृति, कुंठाओं व मानसिक हिंसा की सीमा तक जाकर अपने पूर्वाग्रहों को जीते हैं। जो अपवाद लोग पूर्वाग्रहों को नहीं जीते हैं, हम उन लोगों को मूर्ख मानते हैं, अव्यवहारिक मानते हैं, अपरिवर्तनशील व अजागरूक मानते हैं। हमने अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार अपनी परिभाषाएं गढ़ ली हैं।

इसी घटना को लीजिए, जो भाजपा या योगी विरोधी हैं, वे जुट पड़े हैं संवेदनशीलता का ढोंग करते हुए अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों को जी सकने पर। जो भाजपा या योगी समर्थक हैं, वे इस जुगत में जुटे पड़े हैं कि कैसे मामले का ठीकरा अपने सर फूटने से बचा जाए। दोनों ही सूरतों में वास्तविक संवेदनशीलता व सामाजिक ईमानदारी कहां है !!

यदि अखिलेश यादव जी भी मार्च में चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनते तब भी बच्चे यूं ही मरते। तब क्या अखिलेश यादव दोषी होते। दरअसल योगी आदित्यनाथ जी या अखिलेश यादव जी दोषी तब होते जब सरकारी ढांचे व सामाजिक तानेबाने का चरित्र संवेदनशील व जिम्मेदार होता। तब ऐसी घटनाएं होने पर सरकार का मुखिया का दोषी होता। लेकिन चूंकि अब सबकुछ राजनैतिक पूर्वाग्रहों से ही तय होता है, राजनैतिक पूर्वाग्रह ही सामाजिक संवेदनशीलता, परिवर्तन, जागरूकता का रूप ले चुके हैं। हममें से अपवाद छोड़कर सभी लोग इसी धींगामुस्ती में लिप्त हैं।

चलते-चलते

दरअसल हम व हमारा समाज बेहद असंवेदनशील, गैरजिम्मेदार व पूर्वाग्रहों से भीषण रूप से ग्रस्त है। बात केवल सरकारी डाक्टरों की नहीं है। जो जहां पर है वहां पर जितना तरव जिस स से असंवेदनशील हो सकता है उतना है, पूरी ताकत व जोरशोर के साथ है, बिना रुके लगातार है।

हमारा समाज ऐसे ही लोगों को बना रहा है। हम संवेदनशील तब होगें जब हम ऐसी घटनाओं के मूल कारणों व समाज के लोगों के मनोविज्ञान को समझें। स्वयं की मानसिकता, समाज की मानसिकता को बदलने का ईमानदार प्रयास करें। राजनैतिक पूर्वाग्रहों से देखना व प्रतिक्रिया देना बंद करें। समाज को वास्तव में संवेदनशील बनाने का प्रयास करें।

कुछ न कर पाएं तो कम से कम संवेदनशीलता के ढोंग को जीना बंद कर दें। दोषी राजनेता नहीं। हम आप व समाज है। बाकी मुद्दों को छोड़िए। व्यक्तिगत स्तर पर, परिवार स्तर पर, समाज स्तर पर; हम वास्तव में बच्चों के लिए ईमानदारी से कितना संवेदनशील हैं, इसका ही मूल्यांकन ईमानदारी से अपने भीतर करके देखा जाना चाहिए।

About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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