राखी पर कुछ खुदरा नोट्स

Shayak Alok

विमर्श में बहन संबोधन लज्जास्पद है, अब। अब स्त्री कॉण्ट्रा-गर्ल है। एक सम्बन्ध विहीना। उसके पर्सोना को संबोधन संकटग्रस्त करता है। बहन शब्द, लाइफस्टाइल की कल्चर इंडस्ट्री ने, अपने तमाम उत्पाद के खिलाफ मानकर निषिद्ध कर दिया है। देह केंद्र में आने से, फिल्मों में पिछले 20 वर्षों में बहन पर कोई गाना नहीं आया। राखी पर रेडियो वालों को बड़ी किल्लत हो जाती है। वही गाने बजाने पड़ते है। भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना…

आदि, आदि। अभी, बहन भाई के से कंडोम शेयर नहीं करती। लेकिन, टेलिजेनिक माये, बेटी के पर्स में कंडोम का पैकेट रख कर प्रसन्न होती, बरामद होती है। हो सकता, कोई नया कहानीकार ,बप्रकात हो , और ऐसी कथास्थिति, बुनकर, कथा में नवोन्मेष कर दे।


प्रभु जोशी

शुक्रिया कि आजतक किसी संस्कृतिविद ने यह कांस्पीरेसी थ्योरी नहीं दी कि अरे यह रक्षाबंधन तो बाजार की साजिश के प्रथम उदाहरण में से एक है जहाँ उद्देश्य राखी और मिठाई बेचना है. तमाम अंग्रेजीदां उत्सवों, यथा- वैलेंटाइन, मदर्स, फ्रेंडशिप पर यही फ़ॉर्मूला लागू करते हमारा हिंदी मन संतुष्टि पाता रहा है. वे कहते रहे हैं कि अरे भाई, माँ के लिए और प्रेम के लिए एक दिन ! .. उन्हें तो हम सालों भर स्नेह सम्मान देते रहें. फिर बहन के लिए एक दिवसीय व्यवस्था क्यों ? गणेश, शिव, हनुमान के लिए एक विशेष दिन निर्धारित क्यों ?.. आशय यह कि किसी भी श्रेणी के कुतर्क को दूसरे कुतर्क से पानी पानी (डाईल्युट!) किया जा सकता है.
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कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेज मदद मांगी और हुमायूं ने सेना भेज दी. आसाराम नामक संत (कथित संत नहीं, संत मतलब व्यावहारिक तौर पर वही होता है जो आसाराम है और अन्य लोग हैं) ने कहा कि निर्भया ने फटाक दुपट्टे का कोर फाड़ा होता और अपने बलात्कारियों के हाथ पर बाँध भैया कह दिया होता तो बच जाती. अभी पिछले हफ्ते मैंने एक यूट्यूब विडियो देखा जहाँ संस्कृतिरक्षक एक प्रेमी युगल को पीट रहे थे और लड़की गुहार लगा रही थी कि भैया मत मारिए, मैं बीमार हूँ. और संस्कृतिरक्षक पूछता है कि बीमार हो मने, पीरियड चल रहा?

और फिर फेसबुक है. इस कविता पर आपका आशीर्वाद चाहती हूँ भईया. मुझे बुझाता तो स और क नहीं है लेकिन सहमत दीदी.

मैं बचपन में राखी को लेकर बेहद भावुक हो जाता था. आई मीन हिंदी फिल्मों के वे अद्भुत राखी दृश्य एंड यू ब्लडी डोंट हैव अ बहन मैन ! गुनाहे अजीम हुआ मुझसे. छठी कक्षा में मुझे अपनी एक सहपाठी से प्यार हो गया. प्यार मतलब पता नहीं क्या. उसकी उपस्थिति. और उसका वह स्नेह ! इसे बरक़रार रहना चाहिए था. सातवीं कक्षा में जूनियर स्कूल समाप्त होता और मैं उसे खो देता. मैं उसे नहीं खोना चाहता था. मैं सामाजिक आदर्शों के अनुकूल अपने संबंध की रक्षा चाहता था. मैंने उसे प्रपोज नहीं किया. मैंने कहा मुझे राखी दे दो. मैंने उसे एक चिट दी जिसपर लिख दिया – ‘फूलों का तारों का सबका कहना है/एक हजारों में मेरी बहना है’. वह मुस्कुराई, वह रोई, उसने राखी दी मुझे, लेकिन उसकी उपस्थिति ख़त्म हो गई उसी दिन. उसका वह स्नेह, वह सहजता, वह समाप्त. तीन साल बाद भी भूत ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा था और मैंने कविता लिखी थी इसपर –

*
किताब के अनचाहे पेज में रखी
मेरी याद की एकमात्र पहचान
जला क्यों नहीं देती तुम
जब उसे कर नहीं सकती स्वीकार

मुझे आज भी वह दिन याद है जब मैंने वह अरमान भरा ख़त तुम्हें दिया था
कितनी खुश थी तुम उन अनमोल ईहाओं पर विजय पाकर
कभी चूमती स्निग्ध होठों से कभी अश्रुधारा बहाती उसपर
मानो अश्क का परिचय करा रही हो

दो पंक्तियों में सिमटा मेरा ख़त कितना भाता था तुम्हें
कितनी मेहनत से चुराई थी मैंने दो पंक्तियाँ
देव आनंद की आनंदमय पंक्तियां !

मगर आज क्या हो गया है तुम्हें
कहाँ खो गई तुम्हारी वह स्थायी जय जिसपर इठलाती इतराती थी तुम
मैं समझ नहीं पाता हूँ
लेकिन आज भी उन पंक्तियों को याद करता हूँ तो दोहराने की इच्छा होती है
और तन्हाई में छत पर चढ़ प्रायः गुनगुना लेता हूँ
‘फूलों का तारों का सबका कहना है
एक हजारों में मेरी बहना है’ …

और फिर ऐसे ही एक दिन मैंने कहा कि मैं लौट जाना चाहता हूँ जहाँ से मैंने बात बदली थी. मैंने चिल्लाकर कहा खुद से कि प्यार करता हूँ तुमसे. तुम्हारी उपस्थिति और स्नेह के लिए सामाजिक आदर्शों का दबाव ओढ़ा था मैंने लिहाफ की तरह. मुझे माफ़ करो कि मैं प्यार ही करता हूँ तुमसे. लेकिन आदर्श और मान्यताएं यूँ आसानी से आपको नहीं छोड़ती. एक अपराधबोध में फंस गया और जलता रहा अगले दो वर्ष कि कैसे मनुष्य हो कि बात बदली तो उसपर टिके नहीं रहे और फिर वापस ! यह गुनाहे अजीम था मेरा. लेकिन पारो ने बचा लिया मुझे एक दिन. मैं बैठा था और पारो ने जैसे जोर से पुकारा – ‘’देव दाआआआआ….’’ दा दा दा दा. बंगाल के पास था मेरी मुक्ति का उपाय. वे अपनी लोकोक्ति में कहते थे कि ‘प्रेम का प्रथम डाक दादा को’ .. मुक्त हुआ तो मेरे मन ने विदा शब्द फूंक दिया पूरे प्रकरण व प्रयोजन को.

अभी सोकर उठा कुछ देर पहले तो सुधा दी को याद किया. किसी राखी पर यह लिखा था उसके लिए.

सुधा दी 

मुझे खूब याद है जब मैं छोटा था-एकदम हाफ टिकट -तब राखी वाले दिन राखी बँधवाने के लिए खूब रोता था। स्मृति मुझे नर्सरी से कम से कम पाँचवी कक्षा तक ले जाती है जब तक मेरी माँ ने ही मुझे राखी बांधी और मैं दो रोज़ वह राखी बांधे इतराता घूमता रहता था। फिर सुधा दी आई एक बार…

सुधा दी से अजब पारिवारिक रिश्ता था हमारा-पिता की तरफ के रिश्ते से वह मेरी बुआ लगती थी जबकि माँ की तरफ के रिश्ते से मेरी मौसेरी बहन। तो सुधा दी मुझे और मेरे पिता को साथ साथ राखी बांधती रही-बरसों बरस। पाँच फुट ऊंची वह गौरवर्णा आत्मीयता और मानसिक ऊर्जा की अप्रतिम प्रतिमूर्ति थी। याद नहीं आता कि हमारे पूरे खानदान मे कहीं किसी के घर छठी-शादी-श्राद्ध हो और वहाँ हमारी सुधा दी केंद्रीय भूमिका मे ना हो। सुधा दी को तो हमारे कुल देवता के वे गीत भी याद थे जो उनके पीछे की दो पीढ़ियों की मेरी परदादियो-परनानियों को भी याद ना थे। पिछले साल राखी पर आई तो माँ से अपनी दोनों बहुओं की शिकायत तो लगाई ही,माँ से मेरे ब्याह के बाबत तहक़ीक़ात भी की। जाते जाते कह गईं- “ब्याह कर लो भाय-फिर हम भी गीत-किस्सा गाते अवसान ग्रहण कर लेंगे”।

दो हजार ग्यारह के दिसंबर माह मे मैं अपने तीन माह लंबे दिल्ली प्रवास पर था जब खबर मिली कि सुधा दी की दोनों किडनियाँ फ़ेल हो गयी हैं। महंगे इलाज मे अक्षम सुधा दी का परिवार उनके जाने के दिन गिनता रहा-दम साधे पूरी ज़िंदगी सीधी खड़ी रही सुधा दी बिस्तर पर पड़ी अपनी बची हुई साँसों को सोच समझ कर खर्च करती हुई जी चुकी ज़िंदगी का हिसाब करती रही। बीते बरस जेठ माह मे चली गयी सुधा दी । सावन की पूर्णमासी तक खुद को रोके रखने का साहस नहीं जुटा पायी होगी मेरी सुधा दी।

कुमकुमिया (कुमकुम) और कंचनिया (कंचन) [ दोनों मेरी ममेरी बहने हैं-एक मेरे से तीन साल बड़ी है और दूसरी चार साल छोटी] पिछले साल मुझे राखी बांधने मेरे घर आई थीं । छोटी कंचनिया को उसकी ससुराल मेरी माँ ने बुलावा भेजा- “सुधिया ही बांधती थी- गई बेचारी – आ जाओ तुम ही और तीनों भाई को राखी बांध जाओ”। कुमकुमिया खुद आई । कुमकुमिया बड़ी है ना – जानती होगी कि राखी पर अपनी सुधा दी को ढूँढेंगे हम। मैं जानता हूँ इस साल भी जब कुमकुमिया मुझे राखी बांधेगी तो उसमे मुझे अपनी सुधा दी भी दिखेगी। और कुमकुमिया ज़रूर आँखें बड़ी करेगी और अपने हाथ का बनाया ‘पेडा’ मेरे मुंह मे ठुँसती हुई कहेगी- “ब्याह कर लो भाय”। ‘’

और राखी पर बंदिनी को याद करता रहा हूँ इधर कुछ वर्षों से. अबके बरस भेजो भैया को बाबुल !

और एक राखी पर यह लिखा मैंने. संयोग से बारिश आज भी है और उस रोज़ भी थी —

न .. यूँ नहीं होनी चाहिए थी बारिश .. अभी नीचे गया गली में तो देखा वे जगह जगह सर छुपाती खड़ी हैं .. उनके बढ़िया परिधान खराब होंगे .. उन्हें अपने भाईयों को राखी बाँधने जाना था .. बच्चे गलियों में दौड़ नहीं लगा पा रहे .. उनकी माँओं ने मना कर रखा है कि कपड़े व तबियत खराब होंगे..

मैं मेरा बचपन याद कर रहा हूँ .. नानीघर जाते थे हम .. गौरा गाँव .. नेशनल हायवे पर दो घंटे का सफ़र .. फिर एक लोकपरिया रस्ता जो नीचे उतरता था .. आगे देवी का मंदिर जहाँ पहुँचते माँ नोस्टालजिक होने लगती थी .. मंदिरों से बाहर निकलते स्त्री पुरुष जो माँ को देखते कहते थे – ‘ऐल्हो दाय राखी पे?’ .. फिर कई आंगनों को फर्लांगते अपने आँगन तक पहुंचना .. हर आँगन के चेहरे पर उतरती मुस्कुराहटें .. रस्ते में एक डोभा जो जलकुम्भियों से भरा था जिसमें भूत रहते थे .. हमारे आँगन से सटे आँगन से हम गुजरते तो चौकी वाली चाची (उन्हें नानी नहीं कहा कभी) हर बरस की भाँती बिल्कुल उसी जगह उसी कपड़े में बैठी हुई नजर आतीं .. बिना ब्लाउज के उजली साड़ी पहनी हुई .. एकदम सफ़ेद उनके बाल .. माँ को देखते हूं हूं की आवाज़ निकालतीं और फिर उनकी बहु दरवाजे की ओर झाँकती .. ‘दाय लौट्भो त हियों अयहियो’ .. चौकी वाली चाची और उनकी बहु दुनिया की दो सबसे सुन्दर स्त्रियाँ थीं .. फिर हम अपने आँगन पहुँचते .. जहाँ दुनिया की तीन अन्य सबसे सुन्दर स्त्रियाँ (मेरी तीनों मामी.. बड़ी को माँ पैतलिया वाली भौजी पुकारती हैं तो हम भी ऐसे ही बोलते रहे.. हम बच्चे उन्हें दीदी भी बोलते हैं, मंझली जिसे सब मंझली ही बोलते हैं और छोटी, बारो वाली या रजनी बहु .. रजनीकांत सिंह की पत्नी होने की वजह से रजनी बहु) माँ का स्वागत करतीं .. बच्चों में खूब जोश भर जाता फुआ को देखते .. कुछ बच्चे मेरे शहरी कपड़े छूकर देखते .. फिर पूरे दिन राखी बाँधने और खाने पीने का सिलसिला चलता .. मेरी तीन ममेरी बहनें होतीं वहां .. बड़ी वाली का नाम भूल रहा हूँ अभी .. उसका विवाह दुलारपुर गाँव में हुआ था .. उसकी सास और उसके पिता (मेरे मंझले मामू) बचपन के सहपाठी थे .. दो छोटी .. कुमकुमिया और कंचनिया .. और मेरी एक मौसेरी बहन .. सबकी सुधिया ..मेरी सुधा दी .. (जो नहीं रही अब .. पिछले दो साल राखी पर खूब याद किया था उसे) .. एक चीज जो खूब याद आती है तब की .. उनकी मिठाईयां गाँव के दूकान की बनी होती थी और मैं बमुश्किल निगल पाता था उन्हें .. घरों में बना पेड़ा भी होता था जिनमें चीनी ज्यादा होती थी और वे पिघले हुए दीखते थे .. पड़ोस की एक लड़की जो मेरी हमउम्र थी वह भी मुझे राखी बाँधने आती थी .. मुझे वह बेहद अच्छी लगती थी .. पर उसने दो लगातार साल मुझे राखी बाँधी .. मुझे बुरा लगता था ..

और एक रोज़ यह घटना हुई तो यह लिखा –

लीजिये .. मन गई राखी हमारी .. मेरे नीचे वाले फ्लोर पर कोई कोलेज छात्रा रहती है .. उससे झगड़ा हुआ था पिछले महिने मेरा पानी के लिए .. (सारा पानी केजरीवाल ने बहा दिया अपने 49 दिनों के स्टंट में तो पानी के लिए युद्ध तो होना ही है ) .. तो आई अभी और पूछा कि राखी बाँधी आपने .. मैंने झूठ मूठ कह दिया कि हाँ .. फिर उसने कहा कि मैंने मंदिर में हनुमान जी को बाँधा पर अच्छा नहीं लग रहा .. आपको बाँध दूँ .. मैंने हाँ कह दिया और वह बाँध गई है .. हालांकि मैंने बदले में उसे कुछ नहीं दिया .. मैं नहीं चाहता कि बाद में मैं यह सोचूं कि उसने राखी इसलिए बाँधी कि मैं उसे सौ दो सौ रुपये दूँ ( आखिर दुनिया में कुछ भी हो सकता है !) .. अभी देखूंगा एक दो महिने उसका व्यवहार .. उसने भाई की तरह ट्रीट करना जारी रखा तो उसे एक कुरती खरीद दूंगा .. एक इयरिंग भी खरीद दूंगा .. अच्छा लगा .. थोड़ा अजीब किन्तु आत्मीय ..


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