प्रारम्भ-अंत-प्रारम्भ-अंत…

मरते हुए फल
फटते हैं
उगल देते हैं बीज
धरती धारण कर
सेती है
पुनर्जन्म तक

दोमुंहे केशाग्र
धर कर
चला देती हूँ कैंची
स्वस्थ हो उठते हैं

नक्षत्र
वहाँ मर चुके कबके
जीवित है आज भी
मगर रश्मि उनकी

आखरी पन्ना पढ़ने के बाद
बंद कर देती हूँ किताब
बंद कर लेती हूँ आँखें
खोल लेती हूँ फिर से किताब

कुनमुनाती हैं कवितायें भीतर
रह जाता है उनका लिखना
खो जाती हैं.. कहाँ हैं मिलतीं
फिर उसी रूप में

काल एक सर्प है
दुम लिए मुंह में अपनी
स्वयं को खा रहा है

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