स्मृतियाँ

Mukesh Kumar Sinha

थोडा बुझा सा मन और
वैसा ही कुछ मौसम
शून्य आसमान पर टिकी नजरें, और
ठंडी हवा के झोंके के साथ

जागी, उम्मीद बरसात की
उम्मीद छमकते बूंदों की
उम्मीद मन के जागने की !!

होने लगी स्मृतियों की बरसात
मन भी हो चुका बेपरवाह
सुदूर कहीं ठंडी सिहरन वाली हवा

सूखी-सूखी धूल धूसरित भूमि
सौंधी खुश्बू बिखेरती पानी की बूंदे
मन भी तो, होने लगा बेपरवाह
टप-टप की म्यूजिक के बैकग्राउंड के साथ
छिछला बरसाती पानी
सूरज की उस पर पड़ती सीधी किरणें
परावर्तित हो, दे रही
सप्तरंगी चकमक फीलिंग !

गोल गोल गड्ढों में जमा
स्टील की थाली सा चमकता पानी
चमकते जल
और उसमे पल-पल
बदलती तस्वीरें

एकदम से आ ही गयी एक
चंचल शोख मुस्कराहट
क्योंकि
एक थाली में था मैं निक्कर टीशर्ट में
तो, दुसरे में जगमगा रही थी तुम
रेनबो कलर वाले फ्रॉक में !!

नकचढ़ी तुम, अकडू मैं
मुस्कुराते मन ने कहा तुम्हे ‘धप्पा’
और खेलने लगे आइस-पाइस
तो कभी उसी पानी में मारा बॉल
खेला ‘पिट्टो’

ठंडा बरसाती पानी ने बरसा ही दिया मन
खिलखिलाया आसमान
सहेजी स्मृतियों के साथ…….!

ओ बारिश की बूँदें
फिर बरसना ………
खोलूं खिड़की या दरवाजा ……

करूँगा इन्तजार
तुम्हारा और उस
नकचढ़ी का भी ..!!

आओगे न!
ये बारिश की बूंदें और स्मृतियाँ !!

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