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भारत के स्कूलों-कॉलेजों में शिक्षा मात्र सहित समाज विज्ञान और भौतिक विज्ञान को समझ सकने वाली क्रिटिकल थिंकिंग का नष्ट किया जाना.

Sanjay Jothe

भारत की इंजीनियरिंग मेडिसिन और मेनेजमेंट की पढाई के बाद अब समाज विज्ञान दर्शन इतिहास और मानविकी की शिक्षा की भी बात कर लेते हैं.

तुर्की और अफ्रीका का उदाहरण यहाँ महत्वपूर्ण है. जब प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार हुआ और तुर्की में प्रेस लगने के बाद किताबें छपकर समाज में फैलने लगीं तब तुर्की की राजसत्ता और धर्मसत्ता को खतरा पैदा हुआ कि इस तरह ज्ञान फैला तो उनकी गुलामी कौन करेगा? ये जनता अगर तर्क, ज्ञान और चेतना से भर गयी तो उनकी अपनी सदियों पुरानी परम्पराओं पर सवाल उठाने लगेगी. ऐसे कई गुणा भाग करते हुए तुर्की में प्रेस और किताबों के साथ ज्ञान का फैलाव भी बंद हो गया. नतीजा सामने है. पूरा मिडिल ईस्ट, अरब और शेष दुनिया का इस्लामिक जगत आज ज्ञान विज्ञान के मामले में सबसे फिसड्डी बना हुआ है.

एक अन्य उदाहरण है जो कोलोनियल एरा में रिकार्ड किया गया. अफ्रीका में मिशनरियों ने एक अफ्रीकी कबीले में बच्चों की बीमारियों से मौत पर ध्यान दिया. वहां उन्होंने पाया कि अशिक्षा की वजह से बच्चे और माताएं साफ़ सफाई और अन्य स्वास्थ्यवर्धक आदतें नहीं सीख पाते और एक से दूसरी पीढी में नहीं पहुंचा पाते. इसके लिए उन्होंने उस कबीले की स्त्रीयों और बच्चों के लिए विशेष स्कूल खोने और उन्हें पढाना शुरू किया. थोड़े समय में कबीले के सरदार ने खतरा महसूस किया. हुआ ये कि पढने वाले बच्चे इन मुखिया जी से तर्क करने लगे और कुछ पारम्परिक कर्मकांडों अंधविश्वासों आदि पर स्पष्टीकरण मांगने लगे. मुखिया जी और उनके लठैत समझ गये कि ये शिक्षा अगर फ़ैल गयी तो उनकी राजनीति खत्म हो जायेगी. मुखिया जी अपने लठैतों के साथ गये और स्कूल बर्बाद कर डाले.

ये तुर्की और अफ्रीका में जो हुआ वो ठीक हमारे सामने भारत में हो रहा है. कुछ अलग ढंग से हो रहा है इसलिए हम समझ नहीं पा रहे हैं. लेकिन इसके कारण और परिणाम वही होंगे जो इस्लामिक और अफ्रीकी जगत में हो चुके हैं. ठीक से देखें तो हम उन परिणामों को ही जी रहे हैं.

अब भारत के स्कूलों में आइये. समाज विज्ञान, साहित्य और दर्शन सहित राजनीति और इतिहास को भारत में जिस तरीके से पढ़ाया जाता है वो एक हैरान करने वाला तथ्य है. कुछ चुनिन्दा विश्वविद्यालय या संस्थान छोड़ दिए जाएँ तो शेष जगहों पर इन विषयों को एकदम तथ्यों को घोटने की शैली में पढाया जाता है. स्कूल के बच्चों से कुछ पूछिये वे एकदम खड़े होकर एक सांस में कुछ उत्तर दोहराने के लिए प्रशिक्षित किये जाते हैं, जो बच्चा लगातार बोलते हुए किसी रते हुए उत्तर को नहीं दोहरा पाता उसे दुसरे लोग मूर्ख समझते हैं और वो बच्चा भी खुद को कमजोर समझता है. किन्ही स्कूलों में मैंने पढ़ाई करने या अभ्यास करने के स्था पर एक ख़ास शब्द का प्रचलन देखा है, शिक्षक बच्चों को कहते हैं “याद कर” पढाई कर या पढ़ नहीं बल्कि “याद कर” ये मैंने मध्यप्रदेश के मालवा के कुछ शहरों में अधिक देखा है. अन्य शहरों के मित्र अपनी बातें जोड़ सकते हैं.

तथ्यों को घोटकर उन्हें दोहरा देने की कला को शिक्षा या पढ़ाई कहना एक अन्य अंधविश्वास है जो उन लोगों ने फैलाया है जो असल में शिक्षा को नष्ट करके इस समाज को अन्धविश्वासी बनाये रखते हुए इसका शोषण करना चाहते थे.

कल्पना कीजिये छोटे छोटे बच्चे अगर न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को रट्टा मारकर घोटने दोहराने के बजाय उसे प्रयोगों द्वारा ठीक ढंग से समझ ले तो क्या ये बच्चा किसी उड़ने वाले देवता का भक्त बन सकता है? क्या वो परीक्षा के भय से ऐसे देवता को नारियल चढाने जाएगा? फिर ऐसे देवता के आधार पर रचे गये शास्त्रों और परम्पराओं की गुलामी करेगा? बिलकुल नहीं करेगा.

अब एक अन्य कल्पना कीजिये, अगर कोई बच्चा कबीर या बुद्ध या चार्वाकों या मार्क्सवादियों की भौतिकवादी तर्क पद्धति के अनुरूप विचार करते हुए तर्क से अपने जीवन और समाज की समस्याओं को सुलझाना सीख ले तो क्या वो गुरुपूर्णिमा या गुरुभक्ति या धर्म के नाम पर अंधे दंगों में शामिल होगा? बिल्कुल नहीं होगा.

ऐसे में जो सत्ता, जो जातियां, जो वर्ण इस देश में अपना आधिपत्य बनाये रखना चाहती हैं उन्हें उस अफ्रीकी कबीले के सरदार की तरह नजर आने लगता है कि इस शिक्षा को बर्बाद करने के लिए उन्हें क्या करना है. और मजे की बात ये है कि शिक्षा जगत पर पठन पाठन लेखन पर एक ही वर्ण का कब्जा है तो वे अपना निर्णय बड़ी आसानी से पूरे समाज और देश पर थोप सकते हैं. सो वो हजारों साल से ये कर पा रहे हैं. नतीजा आपके सामने है.

साहित्य को देखिये 1935 तक मुंशी प्रेमचंद के उभार के ठीक पहले तक भक्ति कवितायें, राग रंग, और नायिका विमर्श चल रहा था. सभी ब्राह्मण साहित्यकार जो संपन्न घरों से आते थे और जिनके परिवारों या समुदाय में शोषण या दमन की पीड़ा अनुभव नहीं की गयी थी वे अगम्य अगोचर, भक्ति और भगवान् सहित राजाओं सामंतों की स्तुतियाँ और उनका मनगढ़ंत इतिहास लिखा करते थे. उस जमाने में किसानों, मजदूरों स्त्रीयों, दलितों शूद्रों के जीवन पर एक ढंग का दस्तावेज भी खोजना मुश्किल है. जब भारत में मार्क्सवादी साहित्य दृष्टि प्रविष्ट हुई तब भारत के गैर ब्राह्मण लेखकों ने आम जनता और गरीब मजदूर स्त्री को केंद्र में रखकर साहित्य की रचना की. उसके बाद भारत के साहित्य में एक नई चेतना निर्मित हुई जिसने आगे जाकर लोकतंत्र की चेतना समाजवाद की चेतना को सहारा दिया. लेकिन इसके ठीक पहले ब्राह्मण साहित्य में नख शिख वर्णन चल रहा था, स्त्री के नायिका के सौन्दर्य के चर्चे होते थे.

क्या ये बात कुछ बताती है हमें? साहित्य से आम आदमी गरीब मजदूर और स्त्रीयों का गायब हो जाना क्या बताता है? सदियों तक साहित्य काव्य नाटक कथाएँ सब इसी तरह से निर्मित होती रही हैं जिनमे समाज के असली आदमी और उसके जमीनी जीवन का कोई उल्लेख तक न रहा. इसीलिये भारत में विदेशी यात्रियों और अग्रेज अधिकारियों के लिखे वृत्तांत इतने महत्वपूर्ण हो गये हैं. उनमे पहली बार भारत के “जन इतिहास” की आवाज सुनाई देती है. अगर वे न होते और उनका लेखन न होता तो अभी भी भारतीय पोंगा पंडित किसी न किसी तरह का “पुराण” ही लिख रहे होते. वे हमेशा की तरह जमीनी सवालों को अध्यात्म, रहस्यवाद और मिथकों की जलेबी बनाकर खत्म कर देते.

यही उनकी पीढी दर पीढी विशेषज्ञता रही है. इसीलिये उन्होंने हजारों साल से शिक्षा और पठन पाठन को अपना विशेषाधिकार बनाया था ताकि उनके षड्यंत्रों को कोई समझ न सके.

इसी मानसिकता को ध्यान में रखते हुए अब विज्ञान या साहित्य या समाज विज्ञान के विषयों की भारत में पढ़ाई को देखिये. यही वर्ग सब विश्वविद्यालयों कालेजों स्कूलों में अधिकार जमाये बैठा है. इस वर्ग को भारत के वैज्ञानिक या लोकतांत्रिक या धर्म की गुलामी से मुक्त हो जाने का सबसे बड़ा भय सता है. ये वर्ग (या वर्ण) नहीं चाहता कि भारत के बच्चे उस अफ्रीकी कबीले की तरह तर्क और विज्ञान से भरे सवाल उठाने लगें इसलिए वे शिक्षा के साथ साथ गुरुभक्ति और देवी देवताओं का चरणामृत आवश्यक रूप से बांटते हैं. गुरु पूर्णिमा गुरुशिष्य परम्परा इत्यादि का जोर शोर से प्रचार करना उनके लिए बहुत जरुरी है.

अब इस विरोधाभास को देखिये. जो शिक्षक अपने घर में श्राद्ध कर रहा हो अदृश्य पितरों या देवी देवताओं के भय से आक्रान्त हो वो स्कूल में बच्चों को या विश्वविद्यालय में छात्रों को विज्ञान या समाज विज्ञान में तर्क और क्रिटिकल थिंकिंग सिखा पायेगा? किस मुंह से सिखाएगा? वो स्वयं अपने जातिगत वर्णगत संस्कार के कारण वैज्ञानिक बुद्धि को अभी तक पैदा नहीं कर पाया है वो बच्चों को क्या और क्यों सिखाएगा? इस बात पर गौर कीजिये. ये एकदम जमीनी सच्चाई है कोई आसमानी बात नहीं.

अपने आसपास के लोगों से पूछिए पिछली पीढी में या उससे पहले की पीढी में शिक्षकों के नाम और सरनेम बताएं, वे किन जातियों और वर्णों से आ रहे हैं? उनके अपने व्यक्तिगत धार्मिक रुझान क्या हैं? आपको तुरंत समझ में आयेगा कि भारत के स्कूलों कालेजों में शिक्षा मात्र सहित समाज विज्ञान और भौतिक विज्ञान को समझ सकने वाली क्रिटिकल थिंकिंग को किन लोगों ने किस बुद्धि के साथ और क्यों नष्ट किया है.

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