एक चुटकी मुस्कान

Mukesh Kumar Sinha

होंठ के कोने से चिहुंकी थी हलकी सी मुस्कराहट
आखिर दूर सामने जो वो चहकी,
नजरें मिली, भर गयी उम्मीदें
हाँ, उम्मीदें अंतस से लाती है हंसी !!

माँ के आँचल में दबा, था अस्तव्यस्त
छुटकू सा बालक, स्तनपान करता
तभी आँचल के कोने से दिख गए पापा
मुस्काया, होंठ छूटे और फिर खिलखिलाया
आखिर जन्मदाता ही देते हैं पहली हंसी
भरते हैं जीवन में किलकारियाँ !!

हंसी, खिलखिलाहट, हो हो हो …….हां हा हा
जीने के लिए है लाइफ लाइन
इसलिए तो मुस्कुराते फोटो के लिए
कहते हैं चीज या पनीर, और
क्लिक पर मुस्कुरा जाता है चेहरा …… !!
ताकि गंभीर भी कहलायें
हंसमुख व फोटोजनिक !!

कभी दर्द से कराहो या हो
शोक संतृप्त दृश्य, हो सब गमगीन
और, लगे कोई बच्चा खिलखिलाने
फिर देखना, कैसे छूटेगा फव्वारा
खिलखिलाहटों का, दर्द की झील से निकल कर !!

अन्दर से आ रही हो हंसी, और खिलखिलाओ
समझ में आती है बात
पर कभी रोते रोते
कुछ ऐसे जगाओ खयालात
ताकि हंस पड़े जज्बात !!
तब खुद से कहोगे क्या बात क्या बात!!

वैसे हंसी होती है प्यार, न्यारी
दिल दिमाग और स्वास्थ्य
के लिए भरती है पिचकारी
हंसी को हो वजह कुछ भी
पर जब खिलखिलाएं खुद की
बेवकूफियों और गलतियों पर
वो हंसी, हो जाएँ खुद पर कुर्बान
कहता है तब मन !!

हंसो हंसो, बन जाओ लाफिंग बुद्धा
ताकि कहलाओ स्वयंसिद्धा !!

जिंदगी का जायका ही बदल देती है
एक चुटकी मुस्कान !!

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