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गोलियां भी हमारी हैं और सीने भी। रक्त भी हमारा है और माटी भी हमारी!

Tribhuvan

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देश में हिंसक और बेकाबू होते आंदोलनों को नियंत्रित करने में पुलिस के अफ़सर क्यों विफल हो रहे हैं? क्यों अपने ही लोगों पर अपने ही लोगों को गोलियां चलानी पड़ती हैं? ऐसा क्या है कि नारेबाजी या प्रदर्शन करते लोगों पर आम लोगों के वही बेटे अपने ही लोगों पर गोलियां दागने लगते हैं, जिनसे उन्हें बहुत उम्मीदें होती हैं? क्या पुलिस को वाकई ऐसा नहीं बनाया जा रहा है? और क्या इसके लिए सिर्फ़ आज की सरकारें ही दोषी हैं?

हम अगर लोगों के उग्र आंदोलनों को टटोलें तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। आज़ादी के अांदोलन में जलियांवाला बाग नरसंहार को याद करें तो हम आम तौर पर किसी जनरल ओ डायर को कोसते हैं। हक़कीत ये है कि ये काम जनरल ओ डायर ने नहीं, कर्नल रेगिनॉल्ड एेडवर्ड हैरी डायर ने किया था। यह ब्रिटिश सेना का अधिकारी था और उसे अस्थायी तौर पर अमृतसर में ब्रिगेडियर जनरल लगाया गया था। वह संकीर्ण राष्ट्रवादी ब्रिटिशर्स के लिए एक नायक था, लेकिन उदारवादी ब्रिटिश इतिहासकारों आैर तटस्थ प्रेक्षकों ने उसे खलनायक बताया और उसकी निंदा की। कुछ ने उसे भारत से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने वाली घटना का प्रणेता भी घोषित किया, लेकिन अत्याचारों के प्रति सदा से सहिष्णु हम भारतीयों ने इस नृशंस कांड को भी बर्दाश्त किया और ब्रिटिश शासन को 28 साल तक बर्दाश्त किया। नहीं किया तो उस किशोर ने जिसे शहीदे आज़म भगतसिंह कहा जाता है।

लेकिन प्रश्न ये है कि क्या गोली कर्नल रेगिनॉल्ड एेडवर्ड हैरी डायर ने चलाई थी? नहीं गोलियां हमारे ही लोगों ने हमारे ही लोगों पर चलाईं और 1500 नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया। ये हमारी ही भारतीय सेना के लोग थे। ये 9वीं गुरखा बटालियन के फौजी थे और बंदूकों के साथ-साथ खुखरियों तक से लैस थे। उनके अलावा सिख, बलौच और दूसरी बटालियनों के फौजी थे। वह अंग़रेजी शासन शैली थी और यह समझ आता है कि उनके लिए ऐसा करना जरूरी था। लेकिन आजादी के बाद हमारे शासकों ने आज तक इस नीति को नहीं बदला है। वही प्रशासनकीय शैली है और वही पुलिसीय। ऐसी कितनी ही घटनाएं बताती हैं कि स्वतंत्र भारत में हमारे शासकों ने पुलिस को वही पुलिस रहने दिया है और लोगों के प्रति नीति को भी वैसा ही।

न जाने यह कब समझ आएगा कि हमारे अपने ही लोगों पर अपने ही पुलिस अधिकारियों को गोलियां क्यों चलानी चाहिए? हमारे शासकों को चाहिए कि वे आंदोलनों के प्रबंधन में भी अपने अफ़सरों और पुलिस के जवानों को दक्ष बनाएं और इसके लिए विश्व भर से और अपने अनुभवों से सीखने की जरूरत है। आज हमारे जवानों की न केवल ऊर्जा व्यर्थ जाती है, बल्कि उन्हें वीवीआईपी सुरक्षा के नाम पर घंटों तपना पड़ता है। हम देखते हैं कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रेदेऊ एक रेस्तरां में बैठकर गपशप कर सकते हैं, लेकिन हमारे यहां के नेताओं ने पिछले 70 साल में ऐसी संस्कृति बना दी है कि वे दुनिया के सबसे दुर्लभ नगीने हैं।

यह समय की मांग है कि हम अपने किसानों को या आम नागरिकों को भी यह सिखाएं कि आंदोलन किए कैसे जाते हैं? आम नागरिकों में इस शिक्षा का प्रचार होना चाहिए और खासकर किसान संगठन चलाने वाले या अन्य संगठनकर्ताओं को यह प्रशिक्षण दिया जाना देशहित में है कि आंदोलन हिंसक न हों और वे एक लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से सरकारी तंत्र पर दबाव बनाने में सफल रहें। भारतीय राजनेताओं बहुत चालाक हैं और वे यह नहीं चाहते कि ऐसी कोई विधि विकसित हो, क्योंकि इससे उन्हें ही नुकसान होता है, लेकिन लोकहित में आम लोगों को ऐसी लोकनीति के लिए सरकारी तंत्र पर दबाव बनाना चाहिए और कहना चाहिए कि आप वैज्ञानिक और तकनीकी प्रतिभाओं के सहयोग से ऐसे गोले या कारट्रिज विकसित करें, जिससे किसी का नुकसान नहीं हो, लेकिन वे नियंत्रित भी रहें। लाेगों को अपनी आवाज़ मुखरता से उठाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए और ऐसी संस्कृति विकसित हो कि आंदोलन से पहले ही वार्ताओं के रास्ते खुलें और आंदोलकारियों के नेताओं से बातचीत की जाए।

सनद रहे कि गोलियां भी हमारी हैं और सीने भी। रक्त भी हमारा है और माटी भी हमारी!

Credits: Tribhuvan’s Facebook wall.

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