जय जवान – जय किसान :: सत्ता की दुकान

Tribhuvan

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आप किसानों को पुलिस की गोलियों से मरवा दो। आप जवानों को आतंकवादियों की गोलियों से मरने को मजबूर कर दो। आप जय जवान और जय किसान के नारे लगाते रहो।

आप साठ हजार और सत्तर हजार करोड़ रुपए के युद्धक विमान खरीदते रहो और जवानों को यों ही मरने उनके हालात पर छोड़ दो! आप अमेरिका और फ्रांस की हथियार कंपनियों को लाखों करोड़ रुपए लुटवाते रहो, लेकिन न इस देश के जवानों की चिंता करो और न किसानों की। आप किसानों को मूर्ख बनाते रहो, वोट लेते रहो और अपनी सरकारें स्थापित करते रहो।

आप 15 अगस्त 1947 से ऐसा का ऐसा कर रहे हो। आपकी सत्ता की दुकान वही की वही रहती है और हर पांच, दस या पंद्रह साल में एक बार उस दुकान का बोर्ड बदलते हो। सत्ता की आपकी यह दुकान किसी राज्य में किसी के नाम से चलती है और किसी राज्य में किसी से। आप कभी किसी निरीह गाय पर दांव खेल जाते हो और कभी किसी बकरी को बादाम खिलाकर अपने सत्ता प्रतिष्ठान की दुंदुभियां बजाते रहते हो।

किसान अपना हक मांगे तो अापकी पुलिस उसे कानून और व्यवस्था के नाम पर गोलियों से ऐसे भून देती है जैसे जनरल डायर ने हमारे ही लोगों को भून दिया था। जवान अगर अपने खाने में खराबी को लेकर ठेकेदार की शिकायत भर कर दे तो अाप बदनामी से डरकर उसकी नौकरी छीन लेते हो। आप तो आप हैं। आप और आपके चमचों के अलावा इस देश में सबके सब देशद्रोही हो जाते हो। अाप सत्ता में इतने अंधे हो जाते हो कि आप अपने ही लोगों को पार्टी द्रोही बताकर उन्हें राम की तरह बनवास जैसी हालत में फेंक देते हो, क्योंकि आपकी सत्तावादी राजनीति की आत्माओं में मंथराएं विराजती हैं।

आप कभी कांग्रेस, कभी जनता दल, कभी कम्युनिस्ट पार्टी, कभी माले और कभी बसपा, कभी सपा, कभी अकाली, कभी आम आदमी और कभी अनाद्रमुक, द्रमुक और कभी आप शिवसेना हो जाते हो। आप कभी यह तो कभी वह का रूप धारण कर लेते हो। आप गिरगिट की तरह रंग बदलते हो और गिरगिट आपके सामने लज्जित हो जाता है। आप जब सत्ता से बाहर होते हो तो आप अपने पास अमृत कुंड रखने का दम भरत हो और जैसे ही आप सत्तासीन होते हो तो आप अपने सोने के घड़ों को विष से भर लेते हो। प्रभु, आप का यह कौनसा रूप है? आप सफेद, हरे, लाल, नीले, आसमानी और न जाने कैसे-कैसे हो जाते हो। आप तिरंगे होते हैं तो आपकी आत्मा का कालापन साफ दिखता है, लेकिन आप जब केसरिया होने की कोशिश करते हैं तो आपका हृदय केसर की क्यारियां खिलाने वाले लोगों को देखकर डरप उठता है।

आप राजस्थान के घड़साना में किसानों को गोलियों से भून देते हो। आप आंदोलन कर रहे 70 गुर्जरों को एक साथ गोलियों से धराशायी कर देते हो। आप कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु, केरल और उड़ीसा में आंदोलनकारियों के रक्त से स्नान करते हो। आप लोकतांत्रिक युग में हो और आदिम युग का सा विकल्प लेकर प्रस्तुत होते हो। आप चुनावों में ऐसे प्रस्तुत होते हैं, मानो आप ही भगवान राम और श्रीकृष्ण के अवतार हैं, लेकिन जैसे ही सत्ता में आप आते हो और लोग आंदोलन करते हैं तो आपका भी स्वरूप वही पुरानी सरकार सा विकराल नजर आता है और आपकी सरकार नरमुंड धारण करने को उत्कंठित किसी काली का स्वरूप नजर आती है, लेकिन लोकतांत्रिक युग के प्रभुओ, सुनो कि काली दुष्टों का दमन करके उनके नरमुुंड पहनती थी कि न कि अपनी ही प्रजा के। वह प्रजा को सताने वालों को दंडित करती थी, लेकिन आपकी माया अनूठी है मेरे प्रभु। आप तो सताए हुओं के नरमुंडों की माला पहनते हो।

अाप कैसे राजनेता हैं? आख़िर इस देश के राजनेता किस दिन ऐसी नीतियां बनाएंगे कि न इस देश के जवानों का रक्त बहे और न किसान का। कब हमारे राजनेता ऐसे देश का निर्माण करेंगे कि सीमा पर हमारे जवान के युद्ध आभूषण देखकर शत्रु निगाहें नीची कर ले और किसान सीना तानकर चले। कब कश्मीर में शांति लौटेगी और कब सरहद पर हम रक्तस्नान बंद करेंगे? भगवान् महावीर और बाबा नानक के इस देश में कब कोई देश के नागरिकों से प्रेम करने वाला अपना सा शासक आएगा? कब कोई भगवान बुद्ध की शिक्षा लेकर इस देश के आम नागरिक के साथ उसके आंसू पौंछने और उसके क्लेश मिटाने आएगा? कब कोई भगवान राम की इस मर्यादा को इस देश में स्थापित करेगा कि किसी के मन को पीड़ा पहुंचाकर सत्ता प्राप्त करना मैं अपनी ठोकर के बराबर मानता हूं और कब इस देश में ऐसे राजसी लोग होंगे, जो सत्तासीन होने वाले भरत के साथ नहीं, वनगमन को जाते राम का साथ गहेंगे।

आखिर क्यों हमारे देश का किसान दो रुपए किलो टमाटर और ढाई रुपए किलो प्याज बेचने को मजबूर है? नोटबंदी के दिनों में किसानों ने मुफ़्त में अपनी मटर, गोभी, आलू और अन्य फसलें मुफ्त तक कटवा डालीं। क्या किसी व्यापारी ने कभी ऐसा किया है? क्या देश में कभी ऐसे हालात बन हैं कि कारोबारियों ने घाटा खाकर चीजें बेची हों। आखिर किसान को ही आत्महत्या करने के लिए क्यों मजबूर किया जाता है? क्यों ऐसा है कि चुनाव जीतने के लिए यूपी के किसानों के कर्ज माफ कर दिए जाते हैं और शेष देश के किसान तड़पकर रह जाते हैं? आप क्यों ऐसी चालें चलते हैं कि एक जगह जो चीज ठीक है, वही दूसरी जगह एकदम गलत हो जाती है। आपके लिए राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों का किसान उसी कर्जमुक्ति का पात्र क्यों नहीं बनता जो आप उत्तरप्रदेश में सहज ही बना देते हैं।

आखिर कब वह समय आएगा जब इस देश को भगवान राम जैसा कोई शासक मिलेगा, जो अगर झूठे ही किसी की शिकायत सुन ले तो अपनी प्राण प्रिया को निकाल बाहर करे या सत्ता को ठोकर मार कर चल दे। बन-बन भटकता फिरे और सबसे कमजोर लोगों में ऐसी ताकत भर दे कि वे उफनते समुद्र पर पुल बना दें और राक्षसी सत्ता का सर्वनाश कर दें। न कि वे अपने ही भाई बंधुओं सहनागरिकों और सह शासकों को झूठे बदनाम करके अपनी मैली आत्माओं को सबसे सुवासित घोषित करने के शासकीय आदेश जारी कर दें। यह कब तक होता रहेगा?

राजनीतिक दलों का यह रवैया कब बदलेगा कि वे खुद तो सुरक्षित होते रहें और इस देश के जवान और किसान को बेहाल मरने के लिए छोड़ दें। कभी वह अपने ही नागरिकों को यह बना दे या वह बना दे और खुद एक कड़े सुरक्षा घेरे में सदा मौज करे? सिर्फ बातों ही बातों का कारोबार करके आप कब तक यह खतरनाक खेल खेलते रहेंगे? कब तक ऐसा होगा कि किसान सिसकेगा और नेता हंसेगा? कब तक ऐसा होगा कि जब प्रदूषण फैलाने वाले कंप्यूटर अौर गैजेट्स अाएंगे तो आप उनका स्वागत करते हुए धन्य होंगे और किसान के लिए कोई बेहतरीन बीज आएगा तो आप जीएम का नाम लेकर किसानों को डरा देंगे और पेस्टीसाइड लॉबी ठटाकर आपकी मूर्खता पर हंसती रहेगी! आखिर कब तक? आखिर कब तक आप लोगों के साथ ऐसा करेंगे? आप कब तक भारतीय नागरिक को उसके धर्म और उसकी जाति में बांटकर भारत माता के हृदय की वाहिनियों में विष भरते रहेंगे? आप तक भारत माता के पुत्रों में किसान और पुलिस का फर्क करके उनके दमन की राहें प्रशस्त करेंगे? क्या सत्ता में प्रजा का कोई स्थान नहीं है? प्रिय शासको, यह हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में हैं और आपका यह फर्ज है कि आप आज किसानों के साथ वही न्याय करो, जिसकी आप विपक्ष में रहकर मांग करते रहे हैं और विपक्ष तो आज कहीं प्रश्न करने को भी प्रस्तुत नहीं है, इसलिए उसके लिए कहा भी क्या जाए!

हे मेरे शासकीय राजनेता, तू 15 अगस्त 1947 से जो अपने ही नागरिकों के रक्त से स्नान कर रहा है, वह कब तक करेगा और कब तक इसे राष्ट्रप्रेम घोषित करता रहेगा?

त्रिभुवन की फेसबुक वाल से



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