‘कविता का जोखिम’

Shayak Alok

‘कविता का जोखिम’ विषय पर हिंदी अकादमी, दिल्ली के मंच से दिया गया मेरा वक्तव्य – शायक

[themify_hr color=”red”]

मैं भी लिखकर लाया हूँ. अभी रवीश कुमार पुरस्कार लेने गए थे तो कहा कि ‘उम्र हो गई है तो सोचा कुछ लिखकर लाते हैं.’ उसके बाद उन्होंने कविता की भाषा में कुछ भारी बातें कहीं. घड़ी की टिक टिक. आहट. ब्लाह ब्लाह. भाषण लिखकर ले जाना अच्छा ही होता है. इससे भटकने और दुनिया को भटकाने पर कुछ रोक लग सकती है.

अभी आप में से कुछ लोग सोच रहे होंगे कि मैं रवीश कुमार पर व्यंग्य कर रहा रहा हूँ और कुछ लोग सोच रहे होंगे कि लगता है ये महाशय भी एनडीटीवी प्रकार के बुद्धिजीवी हैं. इस समय का सबसे बड़ा जोखिम यही है कि एक कवि भी अपना मुंह खोले तो उसे सामने लगी दो कतारों में से एक में खड़ा कर दिया जाता है. कविता का सबसे बड़ा जोखिम यह है कि ऐसी तय कतारों के बीच कविता अपनी सुसंगत जगह कैसे बनाए.

कविता के जोखिम पर अकादमिक भाषा व परिभाषा में एक युवा कवि के पास निर्णयपूर्वक कुछ कह सकने की सुविधा बेहद कम है. मेरे पास संशय अधिक है कि साध्य क्या है और हमें कौन से टूल्स आजमाने हैं. इसलिए मैं आपका बेहद कम समय लूँगा और कुछ उलझी हुई बातें ही कहूँगा. सबसे पहले तो कविता की परिभाषा का ही संकट है जहाँ एक सुविज्ञ अध्येता एक परिभाषा गढ़ता है तो दूसरा उसपर दूसरे प्रकार की आपत्तियां लादता हुआ उपहास करने लगता है. आप नामवर सिंह, डा. नगेन्द्र और जगदीश गुप्त के नाम यहाँ रख लें. मैंने पढ़ा कि ‘जकड़ी जा रही सभ्यता में कला की स्वायत्तता का प्रश्न ही कला का जोखिम है.’ अगर स्वायत्तता की आधारभूमि को हम केंद्र में रख भी लें, कि यह कला या कविता का सबसे बड़ा जोखिम है, तो इस स्वायत्तता की परिधि का ठीक ठीक निर्धारण कठिन है. पहला संकट, कि बहस स्वायत्तता तक ही नहीं ठहरी हुई है.

एक दूसरा विचार सापेक्षिक स्वायत्तता या स्वतंत्रता का है. इसमें भी सुधार व आदर्श की गुंजाइश की मांग रखते हुए स्वयत्तता अर्थात ऑटोनोमी, को अस्मिता अर्थात आइडेंटिटी से स्थानापन्न कर देने का प्रस्ताव है. अब अस्मिता को लेकर संकट यह है कि इसका सृजन मनुष्य अपनी आत्मचेतना के अंदर करता है, इसलिए वह सपनों व आकांक्षाओं में भटकती रहेगी. हेगेल ने अस्मिता के बारे में यह कह रखा है कि अस्मिता हमेशा दूसरों के विरुद्ध होती है. इससे एक दुष्चक्र का निर्माण होता है जहाँ दूसरे को नष्ट कर हम सम्पूर्ण बनना चाहते हैं लेकिन दूसरा नष्ट होता है तो उसके बिना हमारा ही अस्तित्व नष्ट हो जाता है. यह बात निर्मल वर्मा ने कही है. सापेक्ष स्वायत्तता का हिंदी विचार नामवर सिंह ने लोकप्रिय कराया है. बीच में अशोक वाजपेयी यह प्रस्ताव लेकर आए हैं कि कविता की स्वायत्तता का आग्रह उसे राजनीति या जनजीवन से विमुख करना नहीं है और इसलिए वे कविता के लिए राजनीति सी किसी सत्ता या समकक्षता की मांग रखते हैं. किन्तु यहीं फिर वे राजनीति को उपलब्ध प्रणाली, ढांचे या व्यवस्था पर कोई विचार नहीं करते और कविता के जोखिम के किसी प्रश्न से उलझते हुए सीधे ‘इधर के कवियों में बौद्धिक ठसपन और एंद्रियता के अभाव’ की शिकायत करने लगते हैं.

आर्ट या आर्टफॉर्म के जोखिम को फिर आइडियोलॉजी के रु ब रु देखा गया है. चेतना के परिप्रेक्ष्य में आइडियोलॉजी को एकमात्र चुनौती कला से ही मिलती है क्योंकि वह स्वतंत्र स्थिति की आकांक्षा रखती है, लेकिन ऐसा करने पर फिर कला ही संदिग्ध हो उठती है क्योंकि उससे आइडियोलॉजी की कथित पवित्रता भंग होती है.

इसी प्रकार कविता के जोखिम को हम फिर प्रासंगिकता और उपादेयता से समझने का प्रयास करते हैं. कला की प्रासंगिकता बढ़ी है क्योंकि आधुनिक युग में मनुष्य की स्वतंत्रता गहन संकट में है, लेकिन विरोधाभास यह है कि कला ने अपनी स्वतंत्रता का स्वैच्छिक परित्याग कर खुद को किसी फ्रेम में जकड़ लेना स्वीकार कर लिया है. आइडियोलॉजी एक फैशन की तरह भी कविता पर हावी हुआ है कि चलन में यही है तो यही लिखते हैं. निर्मल वर्मा आह भरते हुए कहते हैं कि जिनके पास शब्द हैं उनके पास सत्य नहीं और जिनके पास अपने असहनीय अनुभवों का सत्य है, शब्दों पर उनका अधिकार नहीं.

कविता के जोखिम से जुड़े विषयों पर गोएटे, फाकनर, हेगेल, मार्क्स, कैसिरर, फ्रायड, विटगेन्सटाईन आदि के हवाले से बहुत सी बातें कही जा सकती हैं लेकिन मुझे संशय है कि फिर भी कविता के जोखिम के इस प्रश्न को अंतिम-अनंतिम तरीके से सुलझाया जा सकता हो.

बातें हैं बातों का क्या !

यह ऐसा है कि एक मछली की कहानी में कई मछलियाँ उसे तैरने का पाठ देती रहीं. अथाह जल में नहीं जाना, उथाह तल पर नहीं आना. हरे रंग से डरना. लाल पर भरोसा मत करना. मैंने एक दिन श्री प्रभु जोशी से पूछा कि आखिर में उस मछली का क्या बन पड़ा ? उन्होंने कहा कि एक नए विमर्श में उसपर खोज जारी है, अभी वह मछली ही नहीं मिल रही.

कुछ दिन पूर्व विश्व कविता दिवस पर मैंने चिली के प्रसिद्ध कवि निकानोर पर्रा की एक कविता का अनुवाद किया जो नवोदित कवियों को संबोधित है.

जैसे तुम्हारा मन हो वैसे लिखो
किसी भी शैली में जो तुम्हें पसंद हो

बहुत खून बह चुका इस पुल के नीचे
महज इस भ्रम के नाम पर
कि केवल एक ही रास्ता है जो सही है

कविता में सबकुछ स्वीकृत है

बेशक लेकिन लिखो तो केवल एक शर्त पर
कि खाली पन्ने को भरोगे तो बेहतर से भरोगे.

मेरे लिए कविता अपने बोध और अनुभूति से की गई संवाद की एक क्रिया है क्योंकि मैं खुद को सबसे पहले एक इकाई मनुष्य और एक नागरिक के रूप में देखता हूँ. मेरे सामने कविता का सबसे बड़ा जोखिम मेरे खुद के बचे रहने का जोखिम है क्योंकि समय का इतिहास लगातार एक संक्रमण से गुजरता हुआ जब मेरे समय तक पहुंचा है तब राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक रूप से पूरा विश्व एक बिसुबियस क्रेटर पर बैठा नजर आता है. इस प्रकार प्रत्येक इकाई मनुष्य, और नागरिक के ऐतिहासिक संवाद की जिम्मेवारी बढ़ गई है.
हम एक दृश्य जगत में जीते हैं तो हमारी प्रकट चुनौतियाँ सर्वप्रथम इस दृश्य जगत की चुनौतियाँ ही हैं और हमें हमारे हथियारों या उपस्करों के साथ इसका तात्कालिक मुकाबला करना है.

मैं कविता के जोखिम के प्रश्न को कविता के अंदर का प्रश्न नहीं रखना चाहता. मैं इसे चेतना-अवचेतना के गुह्य कक्षों से नहीं गुजारना चाहता. न ही मैं इसे महान पवित्रता के किसी अखंड दरवाजे की तरह समय के तोप के आगे निरीह छोड़ देने के पक्ष में हूँ. मैं कविता और साहित्य को संवाद और संदेश के माध्यम के रूप में देखना चाहता हूँ जो दृश्य जगत की समस्याओं से सीधे वार्तालाप में सक्षम हो. मैं सिनेमा की तरह इस माध्यम के विस्तार के पक्ष में हूँ.

अगर कविता का सबसे बड़ा जोखिम अपने लिए स्वायत्तता की तलाश ही है तो हमें इसके लिए एक स्थूल व्यवस्था का निर्माण करना होगा. हमें उस व्यवस्था के संचालन के लिए ईमानदार स्थितियों की रचना करनी होगी. हमें लेखक संगठनों की भूमिकाओं का विस्तार करना होगा. अकादमी-विश्वविद्यालयों-संस्थानों और संगठनों के बीच एक संवादपरक व सहयोगपरक समन्वय की राह जाना होगा.

पिछले वर्ष मैंने श्री उदय प्रकाश को एक चिट्ठी लिखी और उनसे आग्रह किया कि पुरस्कार कोई कृपा नहीं हो बल्कि एक युवा प्रतिनिधि संवाद स्वर चुनने की इच्छा हो जो हमारे साथ या हमारे समानांतर हांक लगा सके.

युवाओं के लिए उपलब्ध, चिन्हित होने के जो भी मौके हैं, वहां मैंने लोकतांत्रिक और सुगढ़ प्रक्रिया की अपेक्षा रखी. मैंने कहा कि साहित्य में नोबेल का उदाहरण हमारे सामने है तो हम इस प्रकार से चयन क्यों नहीं कर सकते कि इस दस को हमने अंतिम रूप से चुना और यह एक पुरस्कृत हुआ. मैंने अपेक्षा रखी कि भारत भूषण का पुरस्कारदाता अपनी प्रस्तावना लिखे तो उसमें जिक्र करे कि पिछले वर्ष उसने किन किन युवा कवियों की कौन कौन सी कविताएं पढ़ अपने अंतिम निर्णय को चुना. मैंने यह प्रस्ताव दिया कि उसके लिए खुद चुन सकना कठिन हो तो वह कविताएं आमंत्रित ही कर ले. बेढब व्यवस्था की सवारी करती कविता दूसरी सत्ताओं से आदर्श की मांग कैसे कर सकती है?

प्रतिनिधित्व का महत्व है. आवक पीढ़ी को चिन्हित करने का भी. कविता का जोखिम नई प्रतिनिधि पीढ़ी को तैयार करना है. हम इसे कविभरोसे नहीं छोड़ सकते कि वह जो पाए अपनी खुद की गोटियाँ फिट कर पाए. आपकी इच्छा है कि कविता राजनीति सरीखी कोई स्वायत्त सत्ता हो और आपका योगदान यह कि आप शोरशराबे के साथ एक बेकार का मजमा जुटाते है, कोई ढांचा बनाने की कोशिश नहीं करते.

दो वर्ष पहले अशरफ फ़याद का मामला सामने आया. अशरफ फ़याद फिलिस्तीनी मूल के युवा कवि हैं और सऊदी अरब में रहते हैं. सऊदी सरकार ने ईशनिंदा के आरोप में उन्हें बंदी बना लिया और फांसी की सज़ा सुना दी. पूरी दुनिया में इस सजा पर लेखकों के प्रोटेस्ट सामने आ रहे थे. लेकिन दिल्ली हमारी चुप थी. हिंदी में सबसे पहले इस विषय को केरल से कवयित्री रति सक्सेना ने उठाया. मैंने फ़याद की अंग्रेजी अनुवादक मोना करीम से संपर्क किया और पहली बार अशरफ की दस क्रांतिकारी कविताओं को हिंदी में लेकर आया. और हिंदी की प्रतिक्रिया ऐसी कि फेसबुक पर घूम घूमकर कवयित्री से दिवाली विशेषांक के लिए कविताएं मांगने वाला हमारा बड़ा कवि-संपादक इस संवाद के प्रकाशन में कोई रूचि नहीं रखता !

निराशा होती है. बहुत बहुत निराशा होती है. बहुत निराशा होती है कि 2014 के विकल्पहीन वैचारिक विप्लव काल के बाद जहाँ कविता की आक्रामकता हमारा प्रतिनिधित्व करती, वहां आप हमपर अर्थविहीन बिंबों और कविता की खिलंदड़ी को थोप देते हैं. हम हिंदी के लोग बचपन से नीरो को कोसते बड़े होते हैं कि रोम जल रहा था तब वह बाँसुरी बजा रहा था, लेकिन जब हमारे घर आग लगी तब हम खुद बाँसुरी सुनने में लग पड़े. तो मैं बेहद जोर देकर कहता हूँ कि कविता का जोखिम कवियों और कविताओं की इस आंतरिक दुनिया के धैल बेईमान बोध और समीकरण को ध्वस्त करना है.

कविता को एक बड़ा खतरा उसकी नष्ट होती जाती स्वीकार्यता से भी है. हमने अखबारों में कितनी ही भाग जाती लड़कियों की खबरें पढ़ी. लेकिन हम उन लड़कियों की संवेदना से तब गहरे जुड़े जब आलोक धन्वा ने भागी हुई लड़कियां लिखी. हमने हताशा में बैठे हुए किसी किरदार को उतनी गहराई से यूँ नहीं महसूसा जैसा विनोद कुमार शुक्ल के हाथ बढ़ाने के बाद महसूसा. कविताएं, ख़बरों और दृश्यों की संवेदनात्मक पुष्टि थी. वह असर खोता जा रहा. सोशल मीडिया के आगमन के बाद कविताएं भी रोजमर्रा के पोस्ट की तरह लिखी जा रहीं और हम कविताओं को रोजमर्रा की ख़बरों की तरह देखते हुए गुजर जा रहे. कविताएं जैसे सिंथेटिक उत्पाद भी बन गई हैं जहाँ प्रथम पुरुष के साथ दुनिया के तमाम इतर पीड़ा का रोज़ाना उत्पादन किया जा सकता है. ऐसी पीड़ा किसे झकझोरेगी जिसका कर्ता उस पीड़ा से दूरस्थ संबंध रखता है.

मैं अपने युवा साथियों से भी संबोधित होना चाहूंगा कि वे एक दूसरे की कविता को किसी साझा उपलब्धि की तरह देखें और जो कविता, समय से खुले मुठभेड़ में रत हो, तुरंत आकर उसका कंधा थाम लें, ताकि वह लड़खड़ा जंग न हार जाए.

कवि हूँ मैं, तो अंत में एक कविता से ही अपनी बात समाप्त करूँगा. यह कविता संवाद के जोखिम पर है जो मेरे चिरंतन संशय के साथ ही समाप्त हो जाती है. चिरंतन संशय ने नीत्शे को पागल कर दिया और टालस्टाय ने अपने अंतिम दिनों में पूछा कि – क्या कला का कोई अर्थ है?

अंत में यही होगा बहुत से बहुत कि
तुम उठा डाल दोगे मुझे पागलखाने में
एक बयान जारी कर कहोगे कि नहीं था यह किसी के पक्ष में
न लाल हरा न नीला केसरिया !
कि इसने मुझे भी
मेरे विरोधियों को भी गालियाँ बकी
कि प्रेस वार्ता के बाद के शराब भोज में
मुझे जानने वाला संपादक तुम्हारे कान में कहेगा-
‘ ठीक किया .. अजब पागल था ‘

वे जो मुझे कनखियों से देखते हैं
जो इस दौरान चुप थे, रहे थे ताक में
मुस्कुराएंगे
वे जो कविताएं लिखते हैं, मेरी कविताएं चबाएंगे.

यह भी होगा कि
पागलखाने की सलाखों से मैं हंसूंगा तुमपर
कुछ और ही जोर से, और चिल्लाऊंगा
और तुम्हें लिखेंग चिट्ठियाँ वे कुछ
जो मेरी तरह शोक में थे ऐसे संक्रमित समय पक्ष के

अंत में यह होगा कि तुम्हारे तमाम पक्षों के खिलाफ
मेरे पक्ष की संख्या में इजाफा होगा
या यह होगा कि इस मुल्क में
पागलखानों की तादाद बढ़ानी होगी तुम्हें.


About the author

.

Leave a comment: