अखिलेश सिंह यादव को मुख्यमंत्री मोड से बाहर आ जाना चाहिए

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Akhilesh Yadav

मैं अखिलेश सिंह यादव का प्रशंसक रहा हूं जबकि उनसे कभी आमने सामने नहीं मिला। उनसे या उनकी सरकार से या उनकी पार्टी से या उनके कार्यकर्ताओं से मैंने कभी एक रुपए का कोई लाभ नहीं लिया।

किंतु इधर फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में उनके समर्थकों व मीडिया में अखिलेश के बयानों से यूं लग रहा है कि अखिलेश अपने अंदर से अभी यह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि वे अब मुख्यमंत्री नहीं रहे हैं। यह भी लगता है कि मान बैठे हैं कि वे अगली बार 2022 में यूपी में सरकार बनाने जा ही रहे हैं जैसे 2012 में बनाई थी। 2012 की परिस्थितियां भिन्न थीं लोग बसपा से लोग चिढ़े हुए थे, भाजपा कमजोर थी, सपा की सरकार बननी ही थी। अखिलेश यादव के प्रचार ने इसमें सहूलियत दी और सपा सरकार में ढंग से आ गई।

2012 में सपा की लड़ाई बसपा व मायावती जैसे नान-प्रोफेशनल्स से थी, ट्रांसफर-पोस्टिंग में माल कमाने, जन्मदिन में महंगे उपहार लेने जैसे बहुत टटपुंजिया जैसे क्रियापलापों से लोग ऊब चुके थे। ऊपर से इनके पास दूसरी पंक्ति लीडरशिप नहीं, ठोस जमीनी संगठन नहीं, लोगों से संवाद का नेटवर्क नहीं। ऐसी परिस्थितियों में साइकिल चला कर, रथ निकाल कर, प्रेस कान्फेरेंश करके चुनाव जीता सकता है।

वर्तमान मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी से गलतियां होगीं, पिछड़ा व दलित वर्ग सवर्णों की तानशाही व आक्रामकता से ऊबकर अखिलेश के साथ खड़ा होगा क्योंकि अखिलेश ही एकमात्र विकल्प हैं। इस धारणा के कारण मीडिया में बयानबाजी करते रहने के भरोसे ही 2022 की चुनावी बैतरणी पार करने की रणनीति पर काम करने की बजाय अखिलेश यादव को अगले पांच के लिए ठोस जमीनी क्रमागत सामाजिक योजनाओं का क्रियान्वयन करना चाहिए।

2022 में अखिलेश यादव का मुकाबला भाजपा जैसी प्रोफेशनल व भारत की सबसे ताकतवर पार्टी से होगा जो चुनावी जीत के लिए कुछ भी करती है। संघ व भाजपा का व्यापक व मजबूत संगठन है। हर स्तर पर विभिन्न योग्यताओं व विभिन्न क्षमताओं के प्रतिबद्ध लोग हैं पार्टी व संगठनों में हैं। संघ व भाजपा से संबद्ध सैकड़ों संगठन हर स्तर पर हैं।

जैसे अखिलेश यादव स्वयं को देश के प्रधानमंत्री बनने की दौड़ की महात्वाकांक्षा रखते हैं, वैसे ही आदित्यनाथ योगी भी प्रधानमंत्री बनने की दौड़ की महात्वाकांक्षा रखते हैं। भाजपा का विस्तार व नेटवर्क तो पूरे देश में है ही। समाजवादी पार्टी तो यूपी में ही सिकुड़ रही है। अखिलेश यादव को तो बहुत ही अधिक मेहनत, दूरदर्शिता व धैर्य की मूलभूत जरूरत है।

सपा के कार्यकर्ताओं का मनोबल वैसे तो 2014 से ही टूटना शुरू हो चुका था, लेकिन 2017 के चुनावों में हार होने सत्ता न रहने के बाद मनोबल बहुत तेजी से टूट रहा है। धैर्य तो अभी से ही खतम हो रहा है जबकि सत्ता गए हुए दो महीने ही हुए हैं, पूरे पांच साल अभी बाकी हैं।

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पांच साल सत्ता में रहते हुए अखिलेश जी ने

नौकरशाही को जवाबदेह बनाने का प्रयास नहीं किया,
पिछड़ों, दलितों व मुसलमानों के लिए दूरदर्शी प्रयास नहीं किए,
पिछड़ों व दलितों की सामाजिक राजनैतिक व वैचारिक जागरूकता के लिए ठोस कार्य योजनाबद्ध तरीके से नहीं किया,
शिक्षा की गुणवत्ता व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए कार्य नहीं किए,
पिछड़ों, दलितों व मुसलमानों के लिए आर्थिक विकास के लिए दूरदर्शी योजनाएं लेकर नहीं आए,
सामाजिक न्याय के लिए गंभीर व दूरदर्शी प्रयास नहीं किए,  

……. सत्ता रूपी अवसर व संसाधन मिलने के बावजूद बहुत कुछ नहीं किया, जो किया ही जाना चाहिए था।
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मैं अखिलेश सिंह यादव जी को सुझाव देना चाहूंगा कि –

पिछड़े, दलित व मुसलमानों के लिए जमीन पर उतर कर काम व संघर्ष कीजिए। बिना बिस्तर के सोइए। घर में रहने व खाने की बजाय, गरीब लोगों के घरों में जाकर रहिए, खाइए। लोगों का मतलब यादव नहीं है, यादव जाति के बाहर भी लोग हैं। जमीनी संगठन बनाइए जिसमें सभी जातियों व वर्गों से अच्छे व जमीनी लोगों को जोड़िए, उनसे विश्वसनीय संबंध बनाइए, उनको महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीजिए। विश्वास कीजिए यादव जाति के बाहर भी चिंतक होते हैं, विचारक होते हैं, सांगठनिक क्षमता के लोग होते हैं।

अध्ययन कीजिए, वैचारिक स्वाध्याय कीजिए। समाजवाद व सामाजिक समता को गहराई से जानने समझने का प्रयास कीजिए। सामाजिक लीडरशिप क्या होती है, यह जानने समझने का प्रयास कीजिए।

समाजवादी पार्टी मतलब “समाजवाद”, समाजवादी पार्टी का कार्यकर्ता मतलब “समाजवादी”, उसमें भी यादव हुआ और बड़ा वाला “समाजवादी” इत्यादि टाइप के मोडों से बाहर आइए।

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About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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