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भारतीय शास्त्रीय कलाएं और सामाजिक सरोकार

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Sanjay Jothe

लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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भारतीय कलाकारों, खिलाड़ियों, गायकों नृत्यकारों के वक्तव्य बहुत निराश करते हैं। उनके वक्तव्यों में आम भारतीय मजदूर या किसान या गरीब के सामाजिक सरोकार एकदम से गायब हैं। उन्होंने कला को व्यक्तिगत मोक्ष या अलौकिक आनन्द की जिन शब्दावलियों में गूंथा है उसमें फसकर कला और कलात्मक अभव्यक्तियाँ भी इस लोक की वास्तविकताओं के लिए न सिर्फ असमर्थ हो गए हैं बल्कि उसके दुश्मन भी बन गए हैं। हालांकि अभी कुछ वर्षों से पश्चिमी प्रभाव में एक भिन्न किस्म की कला उभर रही है वह एक नई घटना है, उससे कुछ उम्मीद जाग रही है।

भारत का उदाहरण लें तो साफ नजर आता है कि कला, भाषा, संगीत काव्य आदि सृजन के वाहक होने के साथ ही शोषक परम्पराओं और धर्म के भी वाहक बन जाते हैं। खासकर भारत मे संगीत और साहित्य ने जो दिशा पकड़ी है उसका मूल्यांकन आप समाज की सेहत के संदर्भ में करेंगे तो आपको चौंकानेवाले नतीजे मिलेंगे। 1935 के पहले तक का नख शिख वर्णन और भक्ति सहित नायिका विमर्श वाले साहित्य को दखिये और आज तक के शास्त्रीय संगीत और नर्तन को दखिये – ये सब शोषक धर्म और संस्कृति के कथानकों, मिथकों, गीतों का ही मंचन, गायन और महिमामंडन करते आये हैं।

नृत्य की प्रमुख शास्त्रीय शैलियो को देखिये वे किसी न किसी मिथक या अवतार की लीला से आरंभ होकर उस अवतार या मिथक से जुड़े सामाजिक मनोविज्ञान को सुरक्षित रखने का काम करती आई है। अधिकांश शास्त्रीय गायक अपनी गायकी जिन काव्य प्रतीकों और छंदों में बांधते हैं वे काव्य अंश सामंती दास्यभाव की भक्ति के गुणगान से या परलोकी वैराग्य और काल्पनिक ईश्वर के महिमामंडन से भरी होती है।

यह सब सीधे तरीके से ब्राह्मणी वेदांत और ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म की वर्णाश्रमवादी सामाजिक संरचना को बनाये रखने का एक सूक्ष्म हथियार बन जाता है। एक खास किस्म का कल्पनालोक इन शास्त्रीय कलाओं से जन्म लेता है और स्वयं को हर पीढ़ी में आगे सौंपता जाता है। इसी से प्रेरणा लेकर हमारा फिल्मी और टेलीविजन का संगीत और नृत्य विकसित/पतित होता है। इस ढंग ढोल में जन्मे संगीत नृत्य खेल साहित्य आदि में समाज के वास्तविक सरोकारों को कोइ स्थान नहीं मिलता है। यही भारतीय कला की हकीकत रही है।

हमारे साहित्य, संगीत, खेल और फ़िल्म सहित मीडिया की किसी भी विधा के चैम्पियनों को उठाकर देख लीजिए। उनकी कला न उनके हृदय में सामाजिक सरोकारों को पैदा कर पा रही है न उनसे प्रभावित लोगों में किसी सामाजिक शुभ को प्रेरित कर रही है।

हां, ये ठीक है कि एक व्यक्तिगत अर्थ में, एक व्यक्ति की सृजन प्रेरणाओं को ऊर्जा और आकार देने में ये विधाएं ठीक ढंग से काम करती आई हैं लेकिन इसका सामाजिक या सामूहिक शुभ से कोई अनिवार्य संबन्ध नहीं बनता। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारी कलाएं और उनकी अभिव्यक्तियाँ ठोस और जमीनी सरोकारों से एक खास किस्म की तटस्थता सायास बनाकर चलती हैं।

यहां यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि लोक कलाओं और जनजातीय कलाओं में यह समस्या नहीं है। लेकिन चूंकि उनका विकास अब अवरुद्ध सा हो गया है और उनके अपने वाहक अब “सभ्य” होने लगे हैं, सो उनमे पुरानी लोक कलाओं को सहेजने या विकसित करने की प्रवृत्ति क्षीण हो रही है। एक पॉप्युलर कल्चर और उसका आभामण्डल उनपर हावी हो रहा है। अब वे भी चलताऊ किस्म के न्यूज चैनल्स की शैली में परोसीे गई कला, गीत, संगीत, मंचीय काव्य, शायरी और जगरातों कथा पंडालों से प्रभावित हो रहे हैं।

कुल मिलाकर एक सामान्य स्थिति यह है कि अब लोक कलाओं का नाम लेने वाले समूह और समुदाय ही नहीं बल्कि व्यक्ति और संस्थाएं भी सिकुड़ रही हैं। ऐसे में फिल्म या टेलीविजन पर सवार कला ही सामान्य जनसमुदाय के लिए एक बड़ी खुराक का निर्माण करती है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारा आम भारतीय कलाओं की बहुत निकृष्ट और व्यक्तिगत मोक्ष के अर्थ वाले संस्करणों से कला की प्रेरणा लेता है। यह एकांत में तनाव मुक्ति का या किसी तरह के मनोलोक में खो जाने का उपाय भर होता है। इसका समाज की सामूहिकता पर क्या प्रभाव होता है यह एक अन्य भयानक तथ्य है।

अब कलाकारों और आम जन को लोक कला सहित लोक और लोकतंत्र से ही कोई सरोकार नहीं रह गया है। ऐसे  में कला खेल संगीत नृत्य आदि लोकतंत्र के खिलाफ खड़ी हुई फासीवादी शक्तियों का गुणगान करने लगे हैं। हमारा बोलीवूड, क्रिकेट, टेलीविजन और शास्त्रीय संगीत अब अपनी सांस्कृतिक समझ और राजनीतिक रुझान की घोषणा कर रहा है।

उदारीकरण के बाद राजनीति, धर्म और व्यापार की त्रिमूर्ति ने जिस नये और सर्वयव्यापी ईश्वर को रचा है अब उस ईश्वर के गुणगान में भारतीय  शास्त्रीय संगीत, नृत्य, खेल आदि कलाएं भी दोहरी हुई जा रही है। पहले देवी देवताओं और सामंतों की स्तुति होती थी अब थोड़े बदले ढंग से बाजार और राजनेता की स्तुति हो रही है। ये स्तुति प्रत्यक्ष नजर नहीं आएगी लेकिन प्रचलित राजनीति और राजनीतिक आका जिन मिथकों और महाकाव्यों से अपने विषबुझे तीर हासिल करते हैं उन्ही प्रतीकों को अपने गायन नर्तन में जिंदा रखकर असल मे ये कलाएं और कलाकार एक खास राजनीति की ही सेवा करते आये हैं।

आश्चर्य नहीं कि कलाकार हद दर्जे के अंधविश्वासी, कर्मकांडी, ज्योतिष वास्तु आदि के गुलाम और परलोकवादी होते हैं। इनकी संगीत और काव्य की प्रशंसा सुनें तो साफ नजर आएगा कि ये संगीत या काव्य की प्रशंसा उसके आलौकिक या समयातीत होने की उपमा देते हुए करते हैं। किसी अव्यक्त अज्ञात या अज्ञेय के नजदीक जाने के उपकरण की तरह इन्हें वह संगीत नृत्य या काव्य उपयोगी नजर आता है। ऐसे में संगीत, नृत्य और काव्य स्वयं में एक काल्पनिक ईश्वर के प्रचारतंत्र के दलाल बन जाते हैं।

इस भूमिका के बाद आप भारतीय कलाकारों,संगीतकारों, खिलाड़ियों और कुछ हद तक साहित्यकारों के समाज विरोधी वक्तव्यों को दखिये, आप देख सकेंगे कि भारतीय कला और कलाकार असल मे प्रतिक्रांति के प्राचीन उपकरण रहे हैं जिनमे शहरी मध्यम वर्ग की असुरक्षाओ और नव उदारीकरण के कीटाणुओं ने नई धार और नया जहर भर दिया है।

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