जरूरी हो गया है

Dhiraj Kumar

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वो एक है
अरे नही ! वो दो है
नही नही वो अनेक है
नही रे वो कण कण मे है

वो एकमात्र है
नही वो तो अंतिम है
वो अनंत है,अपरंपार है
वो सच्चा सत्य है
नही वो सच्चा शिव है
नही वो तो सच्चा सुन्दर है

वो ऐसा है ,वो वैसा है
वो फलाना है ,वो ढिमकाना है
उसने यह किया,उसने वो किया
वो यह करता है,वो वह करता है
वो यह यह करेगा ,वो वह करेगा

पर’ वो’ को बनाने वाले
या उसका उत्पादन करने वाले को
यह बखूबी पता होता है कि
जिस झूठ की फैक्टरी से
‘ वो’ नामक झूठ का उत्पादन कर
‘ वो ‘बेचने का धंधा वो करता है
जल्द ही लोग उब जाते है..
तभी तो वो ‘वो’ को नये फलेवर या पैकेज मे
बेचने का नया जुगाड़ तलाश कर ही लेता है
यानि बोतल नया,शराब वही’ वो ‘

‘वो’ को बनाने वाले या….
बनाकर धंधा करने वाले
अब तक तो “येन केन प्रकरेण ‘
सफल माने जा सकते है..
जीतते रहे है…
पर अब मामला संजीदा हो चला है….

किसी ‘वैज्ञानिक’ ने एक प्रश्न पूछ लिया है कि
‘ वो’ बनाने वालों जरा बताओ कि..
‘ बिग बैंग’ के पहले तुम्हारा ‘ वो ‘ कहां था
या वो कर क्या रहा था ?

मामला दिलचस्प है और रहेगा…
‘ वो ‘ के उत्पादन कर्ता सच और झूठ के बीच के
खेल के माहिर परन्तु शातिर खिलाड़ी रहे है..

हम …
दर्शक दीर्घा मे बैठे ठाले
फेयर प्ले की उम्मीद नही कर सकते
क्योंकि इतिहास जानते हुए
हम अनजान नही रह सकते…

पता होना चाहिए कि…
‘वो ‘ बनाने वालों के द्वारा फेंकी गयी
रोटी के टुकड़ों पर पलने वाले
कथित निर्णायकों ने
‘ गाड पार्टिकल’ नामक सीटी
खेल शूरू होने से पहले ही
बजानी शूरू कर दी है….

हमेशा की तरह
खेल खतरनाक है….
जिंदगी की हार को
खेल भावना से स्वीकार करने की
परंपरा को छोड़ना जरूरी हो गया है…

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