टुकड़ा टुकड़ा प्रेयसी

Shayak Alok

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अपनी पहली भूमिका में वह गुनगुनाती है बेतरह

अपने होठों को पांच प्रकार से घुमाकर
पांच तरह की अभिव्यक्ति देती है
पांच सौ प्रकार के संकेत
पहले घुमाव से आखिरी तक में मीलों गुजर लेती है
अतीत के मेरे प्रेम-हादसों की भरी-पूरी ट्रेन
और मैं बिजली के तारों पर के नीलकंठ गिनता रहता हूँ

होठों की तीसरी अभिव्यक्ति में ‘ओ’ बनाकर चूमती है मुझे
मैं महसूसता हूँ मेरे होठों को कांपते हुए
मेरी पाँचों इन्द्रियाँ जम जाती हैं
उसके होठों की पांचवीं अभिव्यक्ति में उसके गाल पर गड्ढा बनता है

दूसरी भूमिका में करवट बदलती है प्रेयसी
मैं उसके खाली कंधों पर तिल ढूंढने लगता हूँ

तिल की तलाश का कारवां सुस्त क़दम गुजरता है
उसके एक एक रोमकूप से प्यास पुकारती है मुझे
मैं लिखने लगता हूँ चुम्बनों में देह की भूख की पीड़ा
मेरी भूख बढती जाती है
उसके पेट का वलय सिहरन में प्रतिध्वनित होता है

कलपती है प्रेयसी ..
‘बस शरीर नहीं हूँ मैं’ का हुंकार भरती
अपनी तीसरी भूमिका में प्रवेश करती है प्रेयसी ..

उठाती है वह सदियों के सवाल
जमा हिसाब मांगती पूछती है प्रेम का प्रयोजन
बार बार लौट जाती अतीत में मुझे धकिया कर
मन के दरवाजे की सांकल अन्दर से बंद कर लेती है

मैं मेरे कान सांकल में दर्ज रुक गयी स्त्री पर लगाकर रखता हूँ
मैं सूंघता रहता हूँ रुक के बहकते पदचापों को

उसकी चौथी भूमिका में
आसमान पर घिर आते हैं हरसिंगार
चींटियाँ सीढ़ी लगा हरसिंगार के नीचे उतरने की बाट जोहती हैं
प्यास के कूप फिर पानी से भर आते हैं
एक एक चींटी सौ सौ बार पानी से मुंह जूठा करती निर्वाण पा लेती है

इसी दृश्य में मैं हरसिंगार सा महकता रहता हूँ
वह बदहवास खाली पैर
मेरी नाभि के गोल गोल घुमती मुझे ढूंढती रहती है

उसे देखा मैंने फिर लौट जाते उसकी पांचवीं भूमिका में
बुदबुदाती है स्त्री बने रहने के जादू मंतर
बालों को कसकर बाँध लेती है
एक बाल्टी पानी छपाक फेंक रात का फर्श धो देती है
मेरा भीगना भीग जाता है

उसकी अंतिम भूमिका में एक नीलकंठ फड़फड़ाता है बेतरह.


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