राजसत्ता

Tribhuvan

[themify_hr color=”red”]

राजसत्ता एक ऐसा केंचुल है, जिसे ओढ़कर विषपायी सांप भी सम्मोहक दिखने लगता है।

भूखे को रोटी मिल जाए और प्यासे को पानी तो यह देखना मुनासिब नहीं होता कि रोटी किसने दी और पानी किसने पिलाया।

योगी आदित्यनाथ अगर उर्दू विश्वविद्यालय के लिए विशालकाय परिसर देते हैं, मुस्लिम युवतियों की सामूहिक शादी करवाते हैं और सरकार से उनका मेहर तय करवाते हैं तो उन्हें किसी को गले लगाने में क्या आपत्ति होगी? होनी भी क्यों चाहिए?

कल अगर कोई मौलवी साहब शिक्षा मंत्री बन जाएं और वे संस्कृत के विस्तार की बातें करें, मंदिरों को जगहें आवंटित करने में जुट जाएं और भारतीय पुरातन वैदिक ग्रंथों के प्रकाशन और संचयन की बातें करने लगें तो मेरा ख़याल है कि वैज्ञानिक टेंपरामेंट वाले शिक्षा मंत्री के बजाय आम लोग ही नहीं, कट्टर हिन्दू भी उसे ही ज़्यादा पसंद करेंगे। आख़िर कट्टरता-कट्टरता का भी तो एक बहनापा होता ही है। ठीक ऐसे ही, हिन्दू मताग्रह और मुसलिम मताग्रह के बीच भी एक गर्भनाल का रिश्ता है।

कांग्रेस तो हाल के वर्षों में कम्युनिस्टीकृत हुई है, वरना यही राग और स्वर तो अाज़ादी से पहले उसके नेताओं के हुआ करते थे। वे ही लोग राम मंदिर का ताला खुलवाते थे और हिंदू परंपराओं को मानते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू को आज लोग कितना भी सेक्युलर कहें, लेकिन उनके समय ही सारनाथ से निकले चार शेरों वाली प्रतिमा को राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न बनाया गया। उपनिषद के वाक्य सत्यमेव जयते को राष्ट्रीय भावना माना गया और किसी भी सरकारी भवन के शिलान्यास पर हिंदू पंडितों से पूजा करवाने की परंपरा डाली गई।

भाजपा और आरएसएस तो नाहक बदनाम हो रहे हैं, दरअसल बहुसंख्यक कट्टरता के बीज तो बाबा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय ही बोए गए। गांधी बाबा ने हर कदम पर भगवद्गीता की बात की और उसे राष्ट्रीय ग्रंथ से ज्यादा महत्व दिया। वे हर जगह रामराज्य की बात ही किया करते थे। नेहरू का राजनीतिक टेंपरामेंट चाहे कुछ भी हो, लेकिन वे राजसत्ता हासिल होने की संभावनाओं के कारण बाबा गांधी से चिपके रहे और सदा उनके प्रिय बने रहे। लेकिन गांधी धार्मिक होकर भी धर्मप्राण और सेक्युलर रहे, लेकिन जिन्ना जैसा नेता गैरधार्मिक और इस्लाम के प्रति परम अज्ञानी होकर भी घोर सांप्रदायिक हो गया।

हम भले आरएसएस या भाजपा को आज हिंदू पुनरुत्थानवाद के लिए जिम्मेदार बताएं, लेकिन सच तो यह है कि हिन्दू मताग्रह की शुरुआत बंकिमचंद्र, तिलक, अरविंद, मदनमोहन मालवीय, वीर सावरकर, महात्मा गांधी सरीखे आधुनिक सुधारकों ने की थी। बंकिमचंद्र ने हिंदू पौराणिक गाथाओं का गान किया। तिलक ने शिवाजी की विरासत और गणेश चतुर्थी पर्व का राजनीतिक उपयोग शुरु किया। अरविंद ने काली की चेतना को उग्र किया। बंकिम जी के उपन्यास में हिन्दू मठ के सदस्य मुसलमानों के खिलाफ जिस वंदेमातरम् का आह्वान करते हैं, उसी वंदेमातरम को कांग्रेस ने ही राष्ट्रगान बनवाया। आज कांग्रेस को भले आरएसएस भाजपा के गौप्रेम पर आपत्ति हो, लेकिन सच यही है कि स्वयं गांधीजी ने यंग इंडिया में लिखा : “इसमें यानी हिन्दू धर्म में गौपूजा मेरी राय में मानवतावाद के क्रमिक विकास के प्रति एक शानदार परिणाम है।” बाेये पेड़ बबूल को, आम कहां तो खाय वाली कहावत शायद इसी संदर्भ में बनी हो तो अचरज़ नहीं।

कांग्रेस के नेताओं ने पहले तो रामराज्य, गीता, वंदेमातरम्, गौपूजा, वर्णाश्रम धर्म आदि के माध्यम से राजनीति में धर्म को घुसेड़ा और मजे से राज किया; लेकिन जब पार्टी इन चीज़ों का रस निकाल चुकी, चुनावों और राजसत्ता की कुल्हाड़ी के गोगड़ों में गन्ने की तरह बार-बार पेरकर और बार-बार दुहरा-तिहरा करके पूरी तरह निचोड़ चुकी और मुसलमानों को भी जमकर इस्तेमाल कर चुकी तो अब चुके हुए हिन्दुत्व के गन्ने के छिलकों से बेचारे आरएसएस वाले और भाजपा वाले अपनी धूनी कुछ साल तापना चाहते हैं तो कांग्रेस हायतौबा मचा रही है। कम्युनिस्टों, लौहियावादियों, जेएनयू वालों, तरह-तरह के गतिशीलों-प्रगतिशीलों ने कांग्रेस को कभी इन मुद्दों पर कुछ कहा हो तो बताओ, लेकिन बीजेपी के बाबा आदित्यनाथ का राजभोग और टीवी पर उनका कुछ कवरेज जैसे लाहौलविलाकुव्वत करवाए दे रहा है! देखिए, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पतन हो गया है। कुछ है ही नहीं दिखाने के लिए। अरे क्या देश में एक बाबा ही रह गया है।

सत्ता का लालच ऐसा ही होता है। वह इनसान की धुरी को पूरी तरह घुमा देता है। अब तक कांग्रेस को घुमाए रखा और अब वह योगियों को घुमा रहा है। आप स्वयं देख लें, कांग्रेस शासन के समय दुनिया के सबसे ताकतवर बाबाओं में एक बाबा रामदेव योग पर फोकस्ड थे और जैसे ही उनके मित्रों की सरकार आई, वे सामान बेचने लगे और वणिक् धर्म अपना लिया। आज तक जिस राजनीतिक दल की जो रेलगाड़ी चला करती थी, उसका नाम कांग्रेस था और सत्ता की मलाई खाने वाले कुर्सीलिप्सु उस ट्रेन पर सवार हो जाते थे। आजकल इस ट्रेन का नाम बदलकर भाजपा हो गया है और अब लोग कांग्रेस या अन्य दल छोड़कर इस पर सवार होने को उतावले हो रहे हैं। जिस तरह विमान में आम कुछ खास चीज़ें अपने साथ नहीं ले जा सकते, उसी तरह सत्ता के स्टेशन के भी कुछ रेस्ट्रिक्शनंस होते हैं। यहां भी आप छुरे, पाछने, तेजाब, उस्तरे, चाकूनुमा चीज़ें साथ नहीं रख सकते। अब जो योगिराज उत्तरप्रदेश की सत्ता संभाल रहा है, उसके कंठ में यह दम नहीं है कि वह गरज कर कह सके कि किसी एक मुसलमान ने किसी एक हिन्दू युवती से बलात्कार किया तो हम सौ मुसलिम युवतियों से बलात्कार करेंगे। अब इस तरह की गैरजिम्मेदाराना बातें करने का अर्थ वे जानते हैं। सत्ता को आप भले बाहर से सांप कहें या ज़हर, आप उसका पान करने के लिए लालायित रहते हैं और हर समझौता करने को करने को तैयार। सत्ता सुंदरी कहें या विष कन्या, उसके अंग-प्रत्यंग का सम्मोहन हर ब्रह्मचारी और संन्यासी के लंगोट ढीले कर देता है! यह बात रीतिकाल में कवियों ने अपने दाेहों में कही, लेकिन आज के योगिराज इसे साबित भी करके दिखा रहे हैं।


फेसबुक वाल से साभार


About the author

.

Leave a comment: