विजय दीवान व गांधी विचार

Pushya Mitra

[themify_hr color=”red”]

ये विजय दीवान हैं. महाराष्ट्र में रहते हैं, पिछले दिनों चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह में भाग लेने पटना आये हुए थे. यहां उनको सुनने का मौका मिला. इनका जन्म ब्राह्मण जाति में हुआ था, मगर जब इनकी समझ बूझ बढ़ी तो इन्होंने तय किया कि वे मरी हुई गाय की चमड़ी को उतारने का काम करेंगे. बीस साल से वे यह काम कर भी रहे हैं. वे ऐसे पहले व्यक्ति नहीं हैं, जो यह काम कर रहे हैं. उनसे पहले गोपाल राव आहुजकर नामक एक व्यक्ति ने सवर्ण होने के बावजूद यह काम करना शुरू किया था. दरअसल महाराष्ट्र में एक परंपरा रही है, गांधीवादियों की जो जन्मना सवर्ण होने के बावजूद कथित रूप से दलितों के लिये तय पेशे को अपनाते हैं और उसी के हिसाब से जीना पसंद करते हैं.

Vijay Divan

विजय दीवान ने कहा कि गांधी कहते थे, कोई भी काम बुरा नहीं. हां, कोई भी काम स्वेच्छा से करना चाहिये, किसी पर लादना नहीं चाहिये. उन्होंने खास तौर पर यह संदेश दिया था कि सवर्णों को उन पेशों को अपनाना चाहिये, जो उन्होंने दलितों पर लादे हैं. उनसे प्रेरित होकर बिनोवा भावे और कई अन्य लोगों ने दलित बस्तियों में रह कर उन पेशों को अपनाने की कोशिश की. कुछ लोग आज तक यह काम कर रहे हैं. यह उद्धरण मैं उन लोगों के लिए पेश कर रहा हूं, जो यह दावा करते हैं कि गांधी का दलित प्रेम दिखावा था. वे केवल औपचारिकता करते थे.

एक मित्र ने आज कहा कि अगर गांधीवादी तरीके से ही चला जाता तो दलितों को अधिकार मिलने में हजारों साल लग जाते. यह बात हिंसावादी भी कहते हैं कि अहिंसा से थोड़े ही आजादी मिली है, अहिंसा पर आधारित रहते तो हजारों साल में भी आजादी नहीं मिलती. वह तो सुभाष चंद्र बोस थे, जिनसे डर कर अंगरेजों ने भारत को आजादी दे दी. मगर ऐसा कहने वाले गांधी के प्रयासों से अवगत नहीं हैं. और ज्यादातर लोग पूना पैक्ट को ही आधार बनाकर गांधी की आलोचना करते हैं.

पूना पैक्ट पर आंबेडकर ने जो करुणा दिखायी वह अविस्मरणीय है और निश्चित तौर पर यह फैसला उन्हें काफी बड़ा साबित कर देता है. मगर हमें यह भी याद रखना चाहिये कि पूना पैक्ट के बाद आंबेडकर से किये वायदे को पूरा करने के लिए गांधी ने क्या-क्या किया और इसमें उन्हें किन-किन का सहयोग मिला. वे देश भर के मंदिरों में घूमे और दलितों को प्रवेश दिलाने की कोशिश करते रहे. मगर दुर्भाग्यवश उन्हें अपनी ही पार्टी के लोगों का समर्थन नहीं मिल पाया. वे इस काम को करने के प्रयास में बिल्कुल अकेले पड़ गये थे. आखिरकार उन्हें कांग्रेस से त्यागपत्र दे देना पड़ा.

आज हम गांधी और आंबेडकर की तुलना करने लगते हैं, मगर हमें यह याद रखना चाहिये कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों में सिर्फ गांधी ही थे जो आंबेडकर के विचारों से प्रभावित थे. उन्होंने ही बस इसे व्यवहार में अपनाया. बांकी लोगों के लिए गांधी का छुआछूत विरोधी अभियान एक मजाक था. गांधी ने दिल से चाहा था कि यह समाज बदले, लोग जाति प्रथा के कोढ़ से बाहर निकलें. मगर इसके लिए नेहरू, सुभाष, पटेल या राजेंद्र बाबू ने क्या किया यह कोई बता सकता है क्या… ?

यह गांधी ही थे जिन्होंने आंबेडकर को संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी का अध्यक्ष बनवाया. वरना नेहरू और पटेल इसके पक्ष में नहीं थे. इन लोगों के लिए दलितवाद एक राजनीतिक मसला भर था. गांधी की हत्या के बाद इन लोगों ने जगजीवन राम को खड़ा किया ताकि वे आंबेडकर की काट बन सकें और आंबेडकर राष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग पड़ते गये.

मैंने जब लिखा कि मैं गांधी को नायक मानता हूं तो कई लोगों ने इसे इस रूप में लिया कि मैं आंबेडकर को या उनके विचारों को खारिज कर रहा हूं. ऐसा कतई नहीं है, आंबेडकर के विचारों में वह उत्तेजना है जो आपके सोच को एक झटके में बदल देती है. निश्चित तौर पर जिन लोगों ने जातिगत भेदभाव का जहर पिया है, उन्हें आंबेडकर के विचारों से शांति और प्रेरणा मिलती होगी. हमलोग इस बात को उस तरह महसूस नहीं कर सकते. हम दलित नहीं हो सकते और न ही हमें यह ढोंग करना चाहिये कि हम दलितों का दर्द समझते हैं. हमारा काम इतना ही है कि हम खुद को बदलें और विरासत में हमें जो भेद-भाव की प्रवृत्ति मिली है उससे उबरें.

जहां तक मेरे गांधी को नायक मानने की बात है, उसकी वजह सिर्फ इतनी है कि गांधी एक छतरी की तरह थे, जहां हर बेहतर विचार जगह पाता था और फूलने-फलने का अवसर भी. वे समाज को बदलना चाहते थे, मगर एक को दूसरे का दुश्मन बना कर नहीं. वे हर किसी को प्रेम से बदलना चाहते थे, चाहे वे अंगरेज ही क्यों न हों. इसी वजह से उनके आंदोलनों में कटुता कम पैदा हुई. मैं इसलिए उन्हें पसंद करता हूं और जातिगत भेदभाव को मिटाने को लेकर उनके जो प्रयास थे, तरीके थे, उनमें आस्था व्यक्त करता हूं. इसका मतलब यह नहीं कि मैं आंबेडकर से असहमत हूं. इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि मैं दोनों से सहमत होते हुए दोनों में से गांधी को बेहतर विकल्प मानता हूं.


फेसबुक वाल से साभार

About the author

.

Leave a comment: