समझदारों की समझ

Bhanwar Meghwanshi
संपादक – शून्यकाल

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एक सेकुलर ने
दूसरे सेकुलर को
सेकुलरिज्म समझाया
दूसरे को समझ में आ गया
हालाँकि दोनों ही
पहले से समझे हुए थे ।

एक लोकतंत्र समर्थक ने
दूसरे जम्हूरियत पसन्द इंसान को
डेमोक्रेसी पर सहमत किया
सहमति बन गयी
क्योकि उनमे पहले से ही
सहमति थी ।

एक साम्राज्यवाद विरोधी ने
दूसरे फासीवाद विरोधी को
इंक़लाब भेजा।
लौट आया तुरंत ही
इंक़लाब,
इस तरह देर तक
गूंजते रहे
इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे ।

एक साम्यवादी ने
दूसरे समाजवादी से की बात
बात समझ गए दोनों
बात बन गई
इस तरह चलती रही
जीवन भर बातें ही बातें ।

एक एक्टिविस्ट ने
दूसरे ग्रासरूट वर्कर से
साझा किया
एक्शन प्लान,
करने लगे वे
मिल कर काम
करने के सिवा उन्हें
कुछ भी नहीं था पता
इसलिए करते रहे
जीवन भर काम ।

एक से दस तक
दस से पचास तक
एक ,दो ,तीन दशक
लगभग आधी सदी तक
वे सब मिलते रहे
आपस में,
करते रहे बातें
पिलाते रहे भाषण
एक दूसरे को।

बेहद समझदार लोग थे
हद दर्जे के समझदार
नासमझी की हद तक पहुंचे
वे समझदार लोग।

ताज़िन्दगी उन्होंने
सहमत लोगों को
और सहमत किया।
समझे हुओं को
और समझाया।

फासीवाद,ब्रह्मनवाद,
साम्राज्यवाद,अन्धराष्ट्रवाद
अधिनायकवाद, धर्मनिरपेक्षवाद
जैसे भारीभरकम शब्द
अलापते रहे।

जन के बीच गये ही नहीं
पर जनता के नाम पर
किये सारे काम ।

अंततः
ड्राईंग रूमो ,सभा ,सम्मेलनों,
सेमिनारों ,अकादमिक बहसों ,रिसर्चों
तक सिमट गए।

फिर वे सिरे से सहमत,
निरे समझदार लोग
एक दिन इतिहास बन गए,
उनके धुर विरोधी
सत्ता पर काबिज़ हो गए।
और उन्होंने इतिहास ही
बदल डाला।
इस तरह वे स्मृति शेष
हो गए।

समझदारों का यह खेल
आज भी जारी है ।
उन्हीं पचास लोगों को
पचास लोगों द्वारा
पचास वर्षों से
पचास बातों के ज़रिये
कन्विन्स किया जा रहा है।
ऑलरेडी कन्विन्स लोग
फिर से कन्विंस हो रहे है।

अन्ततः जब सब समझे हुयों ने
पहले से ही समझदारों को
और भयंकर समझा दिया।
तो जाहिर है कि
सबको समझ में भी
आ ही गया।

हालाँकि जिनको समझना था
वे आज तक नहीं समझे।
जिन पर समझाने की
ज़िम्मेदारी थी
वे खुद नहीं समझ पाये
कि समझाना क्या है ?
तो क्या खाक समझाते वो?

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