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भारतीय समाज को सामाजिक सेलिब्रिटियों से खुद को बचाने की जरूरत है

सामाजिक यायावर Social Wayfarer

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लेख की शुरुआत में ही यह कहना चाहता हूं कि मुझे मोदी जी बड़े मासूम लगते हैं और RSS (संघ) से अधिक भारतीय लोगों की चारित्रिक-नस को समझने वाला कोई और संगठन नहीं।

फेंकना हो, झूठ बोलना हो, दावे ठोंकना हो, सेल्फी लेना हो, मीडिया का प्रबंधन करना हो, लोगों के सामने लछ्छेदार बातें बनानी हों, यात्राएं करनी हों, मैं फकीर हूं कभी भी झोला उठाकर चल दूंगा, मैं तो आप लोगों के लिए जीवन का त्याग किया हूं, जिम्मेदारी का निर्वाहन करने की बजाय विरोधियों की बुराई करना, वगैरह-वगैरह …. मतलब मोदी जी के जीवन-व्यवहार के किसी मुद्दे की बात कर ली जाए।

यदि आपको यह लगता है कि मोदी जी ही ऐसे हैं, विरले हैं, तो आप या तो मूर्ख हैं या निहायत ही धूर्त हैं या आपको मोदी जी के व्यक्तित्व की बुराई करने में सैडिस्टिक आनंद आता है। वास्तविकता तो यह है कि मोदी जी की इन सभी बातों व क्रियाकलापों में एक भी बात उनकी अपनी मौलिक नहीं है। ध्यान से देखेंगे तो भारतीय समाज में इनके जैसे लोग जगह-जगह छितरे हुए मिल जाएंगें।

मैंने 2014 में मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक छोटी सी चंद लाइनों की पोस्ट की थी, कि मोदी जी भारत के लोगों के चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। मेरी मित्र सूची के केवल एक ऐसे मित्र हैं जिन्होंने कहा था कि यदि ऐसा है तो यह चिंताजनक बात है, उन मित्र का नाम है सचिन भंडारी, भंडारी जी मोदी के बड़े प्रशंसक हैं लेकिन मेरी बात से इनको चिंता इसलिए हुई क्योंकि इनको भारत के लोगों का चरित्र का अनुमान है और यदि मोदी जी उसी चरित्र के हैं तो इनको यह चिंताजनक बात लगी।

मोदी जी ने कैसे गुजरात को विकास के अद्वितीय माडल के रूप में प्रायोजित करके पूरे देश में अपने लिए माहौल बनाया और विकास के जनक व पुरोधा बनते हुए प्रधानमंत्री की गद्दी को सुशोभित करने तक की सीढ़ी तय की। प्रधानमंत्री बनते ही विदेश के दौरे शुरू, महंगे-महंगे कपड़े पहनना, विदेशी राजनेताओं के साथ सेल्फी लेना, खुद को महान मानते हुए नए-नए नारे देना, मन की बात करना। अधिक क्या बताना, फेसबुक की वालों को घूमिए मोदी जी के चरित्र के बारे में हजारों लोग बतियाते हुए मिल जाएंगें।

मुझे इस बात से बिलकुल विरोध नहीं कि देश के नागरिकों को अपने चुने हुए प्रतिनिधि को लाते बाते सुनाने, व्यंग्य कसने आदि का अधिकार नहीं। बिलकुल है, नागरिक सत्ता सौंपते हैं तो उन्हें अपने प्रतिनिधि के बारे में मूल्यांकन करने, लाते-बातें सुनाने का पूरा अधिकार है। फिर मोदी जी तो भारत के पहले ऐसे लोकतांत्रिक मूल्यों वाले राजनेता है जो स्वयं ही लोगों से कहते हैं कि यदि इतने दिनों में ऐसा या वैसा न हो तो मुझे चौराहे में जूते मार लेना।

भाजपा के नेताओं को ही लीजिए, जब सरकार में नहीं होते तो धरना करते हैं, प्रदर्शन करते हैं, जिसकी सरकार होती है उसकी हर बात का विरोध करते हैं। वह बात अलग है कि जब खुद सरकार में आते हैं तो सरकार में नहीं होने पर जिस बात का विरोध करते थे, उसी बात को और अधिक शिद्दत के साथ करते हैं। इन सभी बातों को कोई कहे या न कहे, लेकिन सभी जानते समझते हैं। भाजपा के नेता, समर्थक व भक्त लोग भी जानते समझते हैं।

भाजपा, संघ व मोदी जी भारतीय समाज के लोगों की सोच, मानसिकता व चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और विशेषज्ञ हैं।। लोगों के चरित्र को घुमाना-फिराना, उठाना-बिठाना, सुलाना-जगाना सभी कुछ बहुत ही बढ़िया से जानते हैं। उदाहरणस्वरूप देख लीजिए नोटबंदी को भूल गए लोगबाग।

इस पोस्ट को लिखने का मकसद इन सब बातों की चर्चा करना नहीं है। लेकिन चूंकि इन बातों की चर्चा किए बिना आगे की बात कही ही नहीं जा सकती है, इसलिए करना पड़ रहा है। खैर आते हैं पोस्ट की असल बात पर…।

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आपमें से बहुत ही कम लोग ऐसे होंगे जिनको भारत के सामाजिक क्षेत्र के सेलिब्रिटियों को असल जीवन में जानने समझने का अवसर मिला होगा। अवसर भी तो तब मिलता जब आपने अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर कभी कुछ करने का सोचा होता।

मैं सामाजिक सेलिब्रिटी उनको कहता हूं, जिनको सामाजिक क्षेत्र में काम करने के लिए नोबेल, मैगसेसे आदि जैसे पुरस्कार मिले, जो पादें या हगें या खांसे तो खबर बने या जिनकी संस्थाओं का टर्नओवर करोड़ों/अरबों का है या जो हर सप्ताह/महीना विदेश भाषण देने पहुंचते रहते हैं।

यहां मैं उन अवसरों की बात नहीं कर रहा जो रोजगार की तलाश में या कुछ साल सेलिब्रिटियों को तेल-मालिश करके अपने लिए पहचान व लंबी ग्रांट आदि का जुगाड़ तलाशने या बनाने की देन होते हैं या इन जैसे एजेंडों से जुड़े होते हैं।

मैं उन अवसरों की बात कर रहा हूं जिन्होंने निर्णय पूर्वक सामाजिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यों, आंदोलनों आदि को समझने के लिए इन सेलिब्रिटी लोगों के ढांचों में बिलकुल निचले स्तर पर रहकर काम करने का प्रयास किया।

आपमें से शायद ही कोई ऐसे अवसर पाने के लिए प्रयास करता हो, गंभीर हो। ऐसा हो पाने के लिए अंदर की मजबूत सोच वाली ताकत चाहिए होती है, अहंकार की कमी चाहिए होती है। सबसे बड़ी बात समाज को नजदीक से समझने का भयंकर जज्बा व प्रतिबद्धता चाहिए होती है।

भले ही आप जीवन व समाज को व्यवहारिक रूप से समझने के प्रति ईमानदार, गंभीर, जज्बेधारी व प्रतिबद्ध नहीं हों। लेकिन चूंकि आपमें से अधिकतर लोग तर्क वितर्क कुतर्क के विशेषज्ञ हैं और इन तत्वों को आलोचना, समालोचना जैसे खूबसूरत नामों से अलंकृत भी करते हैं। कुछ तो अपने बौद्धिक अहंकार को तुष्ट करने के लिए लंबी-लंबी पोस्ट लिख कर यह भी साबित करते हैं कि कैसे फेसबुक में बिना जमीन में कुछ किए हुए भी लिखना, बहुत बड़ा सामाजिक काम है, महानता है, सामाजिक परिवर्तन वाली प्रतिबद्धता है।  इसलिए आगे मैं जो लिखने जा रहा हूं वह आप मोटे तौर समझ ही जाएंगें ऐसी आशा मैं रखता हूं।

आपको शायद नहीं भी पता हो सकता है कि भारत में सामाजिक प्रतिबद्ध लोग व सामाजिक क्रांतिकारी लोग कुकुरमुत्तों की तरह यहां-वहां जहां-तहां उगे हुए मिल जाते हैं।

कोई NGO वाला होगा जिसने बीसियों साल भ्रष्टाचार व दलाली करके पैसे बनाए होगें, आदिवासी लड़कियों का यौन शोषण किया होगा, ग्रांट पाने के लिए आदिवासी लड़कियों को परोसा होगा, सरकारी विभागों को ग्रांट पाने के लिए कमीशन दिया होगा, फर्जी बिल वाऊचर लगाए होगें। वह एक दिन देश भर में घूम-घूम कर मानवाधिकारों की बात करना शुरू कर देता है, लोग हाथों हाथ लेते हैं यहां तक कि उसके नाम का रिफरेंस देते हुए खुद को जमीनी समझने के गौरव में जिएंगे और तो और अपने शोधों में भी उसकी बातों का रिफरेंस देते हैं।

छोड़िए इन जैसे टटपुंजिए NGO वाले दुमछुल्ले लोगों को, खाने कमाने दीजिए, खुद को बड़ा आदमी मानने की कुंठा में जीने दीजिए व बैठने लायक जगह बनाने दीजिए। बात करते हैं बड़े पुरस्कारों व बड़े नामों वाले सेलिब्रिटी लोगों की।

तो गैर-पंचसितारा व गैर सात-सितारा फार्महाउस टाइप वाले सामाजिक सेलिब्रिटी लोग शुरुआत तो जमीनी कामों से करते हैं, लेकिन मन के भीतर एजेंडा कुछ और रहता है। इसलिए किए गए कामों के लिए किसी भी जुगाड़ से मीडिया पब्लिसिटी करते हैं। मीडिया में सेटिंग करते हैं। बड़े नाम वालों के साथ जुड़ते हैं, वह अलग बात है कि पुरस्कार पाने या सेलिब्रिटी बनने के बाद उनको लतिया देते हैं। जैसे मोदी जी ने आडवाणी जी व मुरली जी को कोने में टरका दिया। शुरुआत के लिए गुजरात विकास को प्रायोजित किया।

पुरस्कार मिलने व सेलिब्रिटी बनने के बाद काम करना बिलकुल बंद। कहीं भी कोई भी मुद्दा हो, विशेषज्ञ बनते हुए प्रेस कान्फेरेंस करते हैं, टीवी चैनल्स में ज्ञान बाटते हैं। मुद्दों को गहराई से बिना समझे जो भी समझ में आया या विरोध या समर्थन जो भी करना हुआ उसके आधार पर घुमा फिराकर लछ्छेदार तरीके से बातें बोलते हैं। मतलब यह कि काम न करने के बावजूद काम कर रहे हैं ऐसा जोरशोर से प्रायोजित करने में लगे रहते हैं। इन्हीं की तरह मोदी जी ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद काम बंद कर दिया, केवल काम करते हैं ऐसा प्रायोजित करने में लगे रहते हैं, इसके लिए नारे देते हैं, मीडिया का प्रयोग करते हैं, भाषणबाजी करते हैं।

अपने मित्रों व चेले चपाटों के माध्यम से लाखों-करोड़ों के वारे-न्यारे करते रहने के बावजूद खुद को फकीर व समाज के लिए त्यागी महात्मा के रूप में जबरदस्त तरीके से प्रायोजित किए रहते हैं। फोटो व मीडिया का तो इतना नशा होता है कि मोदी जी की सेल्फी-दीवानगी इनके नशे के आगे बौनी है। जैसे मोदी जी अपने फेवर में रिपोर्ट्स प्लांट करवाते हैं, वैसे ही सामाजिक सेलिब्रिटी लोग अपने फेवर में रिपोर्ट्स प्लांट करवाते हैं।

जैसे मोदी जी अपने आगे किसी को पनपने नहीं देना चाहते हैं, बिलकुल वैसे ही सेलिब्रिटी लोग अपनी संस्था में अपने आगे किसी को पनपने नहीं देते हैं। भाजपा व मोदी जी तो इस मामले इन सेलिब्रिटियों की तुलना में बहुत अधिक लिबरल व लोकतांत्रिक हैं।

जैसे मोदी जी विदेश के दौरों में सरकारी धन खर्च करके जाते हैं। वैसे ही सामाजिक सेलिब्रिटी लोग ग्रांट या लोगों से मिले पैसे से विदेश के दौरों पर जाते हैं, लेकिन अपने चेले चपाटों को यह बताते हैं कि उनको विदेश से खर्चा पानी मिला था, जबकि या तो ग्रांट का पैसे का अकाउंट एडजस्टमेंट होता है या किसी भक्त के खर्चे पर या विदेश में रहने वाले चेले-चपाटों के खर्चे पर जाते हैं। बहुत ही कम बिलकुल न के बराबर ही ऐसी घटनाएं होती हैं जब सेमिनार के आयोजकों ने सच में खर्चा पानी दिया हो।

जैसे मोदी जी अपने चेलों के बुलावे पर राक-डांस करने जाते हैं, वैसे ही सामाजिक सेलिब्रिटी लोग अपने चेलों के बुलावे पर किसी यूनिवर्सिटी में दो चार लोगों को लेक्चर देने रूपी कान्फेरेंस करने पहुंच जाते हैं। बेसिकली यह होता है हालीडे/पर्यटन ही।

खैर कितना लिखा जाए, मोटा-मोटी यह समझिए कि मोदी जी अभी बच्चे हैं इन सामाजिक सेलिब्रिटियों के सामने। मोदी जी इन सामाजिक सेलिब्रिटियों की तुलना में कम धूर्त हैं क्योंकि मोदी जी का खाया पिया दिखता है, मोदी जी का नाम लेकर मैं यह पोस्ट लिख सकता हूं लेकिन मेरी यह औकात नहीं कि मैं जिन-जिन सेलिब्रिटियों का खाया पिया अघाया जानता हूं उनका नाम लेकर यह पोस्ट लिख पाऊं।

रातदिन कारपोरेट को गरियाने वाले ये सामाजिक सेलिब्रिटी लोगों के घर का चम्मच भी कारपोरेट के धन से खरीदा गया होता है। उनके बच्चों की नैपी, चाकलेट व पेंसिल भी कारपोरेट के पैसे से आती है। लोकतंत्र का रट्टा लगाने वाले ये सामाजिक सेलिब्रिटी लोग निहायत ही साम्राज्यवादी सोच के होते हैं।

यदि तुलनात्मक बात की जाए तो ऊपर बताए गए किस्म के NGO वाले लोगों, प्रायोजित आंदोलनों वाले लोगों तथा सेलिब्रिटी लोगों की जिसकी जो औकात व स्तर है, उस औकात व स्तर पर ये लोग मोदी जी की तुलना में बहुत अधिक भयावह हैं, खतरनाक हैं। आप मानें या ना मानें लेकिन इन्हीं लोगों के कारण आम समाज के लोगों की मानसिकता बदलती है और देश के लोग मोदी जी को प्रधानमंत्री चुनने व देश का कर्णधार अवतार मानने में गर्व का अनुभव करते हैं।

हमारे समाज व देश के लोकतंत्र के लिए मोदी जी कोई खतरा नहीं, अपने समाज से इन जैसे NGO वालों, सेलिब्रिटी लोगों को नियंत्रित कर लीजिए, इनको ईमानदार, विशेषज्ञ व आदर्श मानना बंद कर दीजिए। मोदी जी जैसे लोगों का चरित्र अपने आप बदला हुआ ही मिलेगा। लेकिन हम आप इन्हीं सामाजिक सेलिब्रिटी लोगों के आधार पर, इन्हीं पर अंधा विश्वास करते हुए अपना माइंडसेट तय करते हैं।

जब इतनी बात कर ही रहा हूं तो लगे हाथ यूनिवर्सिटी के छात्रों व छात्र नेताओं की बात भी कर ली जाए। अपवादों में भी अपवाद की बात यदि छोड़ दी जाए तो जिन छात्रों ने अपने छात्र जीवन में छात्रों व सामाजिक मुद्दों के नाम धरना प्रदर्शन किए होते हैं, पुलिस की लाठी खाई होती है वे सभी अपने जीवन में निहायत धूर्त, भ्रष्ट व चालबाज लोग ही निकलते हैं। दरअसल धरना करना, प्रदर्शन करना, नारे लगाना, पुलिस की लाठी खाना यह सब निवेश की तरह होता है जो या तो कैरियर के लिए होता है या फिर नाम-पहचान की वाहवाही के लिए होता है।

अब आप कहेंगे कि नौकरशाहों के बारे में कुछ न लिखा। इस मसले पर मेरा सिर्फ यही कहना है कि भारत में सामाजिक सेलिब्रिटी, राजनेता, छात्रनेता, व्यापारी आदि मने जो कोई भी जो कुछ भी करता है वह सब नौकरशाही की रची हुई दुनिया में करता है। नौकरशाह ईश्वर है, सृष्टि का रचयिता है। इनकी माया जितनी समझें उतनी ही घुसी हुई मिलेगी।

फिर भी हर क्षेत्रों की तरह इन लोगों में भी अपवाद होते हैं। अपवादों में भी अपवाद ऐसे होते हैं जो यह सब जीवन, समाज व ढांचों आदि की समझ विकसित व जीवंत अनुभव लेकर मानसिक रूप से समृद्ध होने के लिए करते हैं। ऐसे अपवाद लोगों की तासीर आपको अलग ही दिखेगी यदि आपको व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने की जरा सी भी समझ होगी और आप सभी के प्रति ईर्ष्या का भाव नहीं रखते हैं, तो।

अंत में मैं सिर्फ यह लिखते हुए कि “ये सभी लोग निकलते किस समाज से हैं”, पोस्ट को अपूर्ण छोड़ रहा हूं, आप अपनी-अपनी समझ के अनुसार स्वयं पूर्ण कर लीजिए।

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About the author

सामाजिक यायावर

The Founder and the Chief Editor, the Ground Report India group. The Vice-Chancellor and founder, the Gokul Social University, a non-formal but the community-university. The Author of मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर, this book is based on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist. He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other. For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability. Vivek U Glendenning "सामाजिक यायावर"​ MCIJ

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