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कला और सृजन के आयामों में एक जैसा भाईचारा चाहिए जो कि भारत में नहीं है

 

संजय जोठे

ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।

सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।

 

     

कला और सृजन के आयामों में एक जैसा भाईचारा चाहिए जो कि भारत में नहीं है। ऐसा क्यों है? ऐसा होना नहीं चाहिए, लेकिन है। सृजनात्मक लोगों के बीच इस तरह मेलजोल और एकता क्यों नहीं है? एकता एक नैतिक प्रश्न है अगर आपकी नैतिकता विखण्डन और विभाजन के चारे से बनी है तो सृजनात्मक आयामों में भी एकता नहीं बन पाएगी।

 

इतिहास में देखें समाज के सबसे शक्तिशाली आयाम – राजनीति के प्रति भी हमारी जनता में एक उपेक्षा फैलाई गई थी जो अभी भी बनी हुई है- “कोउ नृप होय हमे का हानि”, ये वक्तव्य सभ्यता और एकता वाले समाज में असंभव है हाँ विभाजन वाले और असभ्य समाज में ये न केवल संभव है बल्कि यही उसके सार्वजनिक और सामाजिक जीवन का एकमात्र नियम भी है। कोई भी राजा हो हमें क्या मतलब – इसका अर्थ है कि आपके राजा और राजगुरु, राजसत्ता आपके हितैषी नहीं हैं और आपको उनसे कोई लगाव नहीं है। मतलब कि देश, इतिहास, भूगोल सहित धर्म और समाज की धारणा ही यातो अभी यहां जन्म नही ले पायी है या मिटा दी गयी है।

 

ये धारणा क्यों जन्म नहीं ले पायी? या क्यों मिटा दी गयी? इस प्रश्न के उत्तर में भारत के पूरे इतिहास और मनोविज्ञान का सार छुपा हुआ है। अभी किसी गाँव में जाइये किसी हेण्डपम्प या तालाब या कुवें के पास खड़े हो जाइये अगर वो सूख रहा है तो पूरे गाँव को एक जैसा दुःख नहीं होता। समाज के एक बड़े वर्ग के लिए पानी का ये स्त्रोत उपलब्ध ही नहीं, उसे इस स्त्रोत के पास फटकने ही नहीं दिया जाता। ये ताल या हेण्डपम्प सूख मरे तो वे लोग कहेंगे हमे क्या मतलब सूखे तो सूख जाए। इसी तरह जिन व्यापारों, व्यवसायों में आपका या आपके परिवार, रिश्तेदारों का दखल या हित नहीं है उनके बन्द हो जाने पर या उन पर हमला हो जाने पर आप कह सकते हैं कि हमें क्या मतलब आपका बिजनेस डूबता है तो डूबे। इसी तरह जिन जातियों में आपके लोगों का भोजन या विवाह नहीं होता वे गुलाम हों या दंगे में मरें, आपको कोई फर्क नही पड़ता। अगर आपके रिश्तेदार और हितैषी हर जाति हर वर्ग में हों तो आपको उन जातियों वर्गों की ख़ुशी या सुख से सहानुभूति होगी।

लेकिन भारत में एक किस्म का “सामाजिक वैराग्य” बनाकर रखा जाता है ये वैराग्य नहीं बल्कि पलायन और छुआछूत है, जिम्मदारी से भागने का दूसरा नाम है। इससे समाज विभाजित कमजोर और जातिवादी बना रहता है। इसीलिये गौर से देखिये तो साफ़ समझ में आएगा कि ओशो, रविशंकर, जग्गी वासुदेव जैसे भारतीय धर्मगुरु, योगी, बाबा आदि ऐसे वैराग्य और मोक्ष की धारणा से भरा जहरीला अध्यात्म हर एक पीढ़ी को पिलाते रहते हैं। ये बाबा हर पीढ़ी को पलायनवादी वेदांत सिखाते चलते हैं। इनका एकमात्र फायदा इस बात में है कि भारत की गरीब दलित दमित जनता इस सामंती और पुरुषसत्तावादी धर्म से आजाद न हो जाए। कर्मकांड न सही तो अध्यात्म की रस्सी से ही ये धर्म के खूंटे से बंधी रहे। ताकि उनका कुआँ न सूखे।

इसी तरह आज के फ़िल्मकार साहित्यकार चित्रकार और सृजनधर्मी लोग हैं। सबके अपने कुवें और हेण्डपम्प है किसी को किसी से कोई मतलब नहीं। यहां अपनी झोली भर जाए तो मोक्ष मिल जाता है बाकी समाज और दुनिया जाये भाड़ में अपना कुटुंब ही वसुधैव कुटुंब है।

हसन निसार ने एक चर्चा में थॉमस रो का उदाहरण देते हुए कहा है कि अंग्रेजी अधिकारियों ने जब भारत में पैर फ़ैलाने शुरू किये तो मुगल दरबार में किसी बादशाह के बीमार बेटे का उन्होंने एलोपैथी से इलाज किया बेटा स्वस्थ हुआ तो बादशाह ने खुश होकर कहा कि इस अंग्रेज के वजन के बराबर सोना तौलकर इसे दिया जाए। अंग्रेज अधिकारी ने कहा कि बादशाह मुझे ये सोना नहीं चाहिए बस मुझे और मेरी कौम को हिंदुस्तान से व्यापार की इजाजत दे दीजिए।

इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है। हालाँकि इसका ये अर्थ नहीं कि उन अंग्रेजो की लूटमार भरी नैतिकता सर्वथा प्रशंसनीय है। लेकिन फिर भी कुछ श्रेष्ठता का तत्व तो उनमें है ही। उसी श्रेष्ठता ने भारत को आधुनिकता और सभ्यता दी है।

अब देखिये, भारत में जब साहित्यकारों पर हमले होते हैं तो फिल्मकार बिरादरी को फर्क नहीं पड़ता। फिल्मकारों पर हमले होते हैं तो खिलाडियों को फर्क नहीं पड़ता। वो तो आजकल फिल्मकारों और खिलाड़ियों में प्रेम विवाह और अंतर्जातीय अंतरधार्मिक विवाह होने लगे हैं इसलिए उनके बीच एकता जन्म ले रही है। डॉ. अंबेडकर ने इसीलिये अंतर्जातीय विवाह की सलाह दी थी, बॉलीवुड और क्रिकेट के बीच वह सलाह बढ़िया काम कर रही है। लेकिन साहित्य, संगीत कला आदि में अभी भी मनुस्मृति ही चल रही है।

अब बड़ा प्रश्न ये है कि साहित्य और खेल या साहित्य और फिल्म के बीच ये प्रेम क्यों नहीं पनप रहा है?

इसका बहुत गहरा कारण है। साहित्य और फिल्म इतने गहराई से और सीधे सीधे समाज को संबोधित करते हैं कि उनके सन्देश से बड़ा बदलाव आ सकता है। इसीलिये इस देश के धर्म संस्कृति के ठेकेदारों को पता है कि साहित्यकार और फिल्मकार तबकों को कंट्रोल करके रखना है वरना यहां की जनता कला के सृजनात्मक आयामों की शक्ति से परिचित हो गयी तो इस देश पर शोषक धर्म की सत्ता खत्म हो जायेगी।

 

इसीलिये बहुत सोच समझकर साहित्य में भी जन विमर्श को अदृश्य बनाकर देवी देवता, भक्ति, राजे रजवाड़े, मिथक, महाकाव्य आदि की चर्चा चलती रही है। हजारों साल से इस मुल्क के साहित्य में आम आदमी की कोई बात नहीं हो रही थी, 1935 तक मुख्यधारा के साहित्य में जिस तरह का नायिका विमर्श और श्रृंगार वर्णन चला उसे देख लीजिये। वो तो भला हो कार्ल मार्क्स और अन्य दार्शनिकों का जिन्होंने भारतीय विद्वानों को पहली बार जन हितैषी साहित्य रचना सिखाया। वरना आज तक नख शिख वर्णन और भजन कीर्तन स्तुतियाँ इत्यादि ही चलती रहती।

हालाँकि मार्क्स के आने के बाद भी भारतीय भक्ति का आभामण्डल कम नहीं हुआ है। आज भी कला, संगीत, साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र उसी परलोकी, आत्मघाती अध्यात्म में जड़ जमाये हुए है। आज भी कला के आनन्द की उपमा ‘विदेही भाव, समाधी भाव और समय की स्तब्धता’ से दी जाती है। मतलब इस लोक से हटकर परलोक में ले जाने वाली कला ही महान कला है। बाकी सब बेकार है। ये सब उसी जहरीले कुवें से निकलने वाली शब्दावली है जिसने स्त्री अधिकार और स्त्री विमर्श की बजाय नायिका विमर्श पैदा किया था। या जिसने दलित साहित्य की बजाय “दास्य भक्ति साहित्य” पैदा किया था।

साहित्य के बाद जब फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो भारत का यही देवता विमर्श या नायिका विमर्श भक्ति में और इश्क मुहब्बत की छिछोरी रंगीनियों में ट्रांसलेट हो गया। हालाँकि यूरोप में भी फ़िल्मी सफर ऐसे ही शुरू हुआ था। पहले धर्म फिर इश्क मुहब्बत। लेकिन बहुत जल्द उन्होंने अन्य विषय भी सीख लिए। बायोग्राफ़िकल, हिस्टोरिकल, डॉक्यूमेंट्री स्टाइल फिल्में वहां खूब सराही जाती हैं। इधर भारत में इसकी कल्पना ही असंभव है। यहां अभी भी रामलीला चल रही है। स्त्री विमर्श सास बहू विमर्श बना हुआ है। एक सभ्य और इंसानी समाज होने के नाते यूरोप में उन्होंने इंसानी अधिकारों की परिभाषा जल्द सीख ली और अपने साहित्य औऱ फिल्मों में उसे अभिव्यक्त करना शुरू कर दिया। लेकिन हमारा देश धर्मप्राण होने के नाते आज भी देवी देवताओं और मिथकों महाकाव्यों में ही घुसा जा रहा है, बहुत हुआ तो इश्क मुहब्बत और शादी के वीडियो चला देते हैं या चलताऊ देशभक्ति के हैंडपंप उखाड़ने वाले “गदरीले नायक” रच देते हैं।

भारत का साहित्य और फिल्म आज भी पूरी तरह जन विमर्श में नहीं उतर सका है। अभी भी पुराने सौन्दर्यशास्त्र का मोह ऐसा बना हुआ है कि समानता, प्रेम, स्त्री अधिकार, दलित अधिकार की प्रस्तावनाओं से डर लगता है। और तो और बच्चों को भी वैज्ञानिक तार्किक शिक्षा देने से डर लगता है कि कहीं वे अधर्मी न हो जाएं। इसीलिए सारे बाबा योगी और पंडित मिलकर बच्चो को ध्यान योग और प्राणायाम के नाम पर विभाजन और इंसानियत के विरोध के “संस्कार” सिखाते हैं।

ये विभाजक संस्कार असल में भारत को पुराना भारत बनाये रखने की सनातन साजिश है। इसलिए सिनेमा, साहित्य, पत्रकारिता और सभी कलाओं में ठीक राजनीति, प्रशासन और न्यायपालिका की ही तरह सवर्ण द्विजों का ही आधिपत्य बना हुआ है। वे तय करते हैं कि किस गुण को किस भाषा में सद्गुण सिद्ध करना है। किस गुण को मानव हितैषी और “वसुधैव कुटुंब” के “अनुकूल” सिद्ध करना है या “प्रतिकूल” सिद्ध करना है। इन परिभाषाओं से अंततः वे कहाँ और कैसे पहुंचना चाहते है ये वे बहुत सावधानी से तय करते हैं। वे एक ऐसे सर्वोदय या रामराज्य की रचना करते हैं जिसमे वर्ण व्यवस्था भी जारी रहे और वर्णानुकूल कार्य करते हुए “स्वधर्म” पालन करने वाले “संस्कारी पुरुष” और “सुशीला स्त्री” सहित सभी बच्चे तर्क और मानव अधिकार भूलकर संस्कारी भी बनी रहें और यूरोपीय कला, साहित्य, सिनेमा, विज्ञान तकनीक आदि को ऊपर ऊपर सीखकर प्रगतिशील भी बने रहे। भीतर हनुमान चालीस चलती रहे और ऊपर ऊपर “वी शल ओवरकम” या “तुंकल तुंकल लिटिल इश्टार” भी चलता रहे। ऊपर टाई और भीतर जनेऊ चलती रहे। काउबॉय हैट के नीचे संस्कारी चोटी सरकती भी रहे।

जब कला और कलाओं के प्राप्य या करणीय के प्रति आपके विद्वानों और “विद्वान षड्यंत्रकारियों” का ये रुख है तो आपकी कला और साहित्य भी विभाजन ही पैदा करेंगी और खुद भी विभाजित होंगी। उनमे आपसी मेलजोल से अंतर्जातीय विवाह नहीं होंगे बल्कि छुआछूत पैदा होगी इंटेरडीसीप्लिनरिटी या इनोवेशन का पुरस्कार या प्रेरणा नहीं होगा बल्कि व्यभिचार की टीस और “नीच वर्णसंकर” पैदा होने का भय होगा।

ऐसी भयभीत और अनैतिक कौम से आप कैसे उम्मीद करेंगे कि वे कला या सृजन के नाम पर एकदूसरे के साथ खड़े हों? क्यों उम्मीद करेंगे? साहित्य, कला, सिनेमा और पत्रकारिता में भी जिन लोगों का दबदबा बना हुआ है क्या वे इन सृजनात्मक आयामों में कोई सार्थक एकता सिद्ध होने देंगे? क्यों होने देंगे? जबकि वे बखूबी जानते हैं कि इन आयामों में एकता का अर्थ होगा भारतीय शोषक संस्कृति का निर्णायक अंत। क्या वे इतने मूर्ख हैं कि अपनी परम्परागत सत्ता, आजीविका और भविष्य को नष्ट कर दें?

इसीलिये भारतीय फिल्मकार पत्रकार और खिलाड़ी भारतीय समाज की समस्याओं पर कुछ नहीं बोलते। वे किस जाति या वर्ण से आते हैं ये देख लीजिए आपको उनकी चुप्पी और तटस्थता का कारण समझ में आ जायेगा। मुहम्मद अली ने अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ बोलते हुए सरकार से और धर्म से कड़ी टक्कर ली थी, कई हॉलीवुड सितारों ने भी इसी तरह हिम्मत दिखाई। तत्कालीन यूरोप में चार्ली चैपलिन ने और सैकड़ों साहित्यकारों रंगकर्मियों ने ये साहस दिखाया था। लेकिन हमारे क्रिकेट के भगवानों और महानायको ने क्या किया? इन्होंने कभी गरीब मजलूम और स्त्री अधिकार की बात नही की। बल्कि हर दौर में बदलते राजनितिक आकाओं के सामने इन्होंने सकर्वजनिक रूप से साष्टांग प्रणाम किये हैं। इसका क्या मतलब है?

धर्म सत्ता अर्थसत्ता और राजसत्ता के समीकरण की एक ही चाबी है उस चाबी को सब मिल जुलकर संभालते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे सौंपते जाते हैं। इस प्रवाह में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। इस बीच “शुद्रा दी राइजिंग” या “शरणम गच्छामि” जैसी फिल्में बनें या ऐसा साहित्य लिखा जाने लगे तो उसे बैन कर दिया जाता है। समाज के लिये घातक सिद्ध करके सेंसर कर दिया जाता है। लेकिन घर घर में मूर्खता और अनैतिकता फ़ैलाने वाले मिथक और महाकाव्यों आधारित सीरयल लगातार बढ़ते ही जाते हैं। ये सब अपने आप ही नहीं होता, इसके पीछे बहुत निर्णयपूर्वक सचेतन ढंग से कोई यांत्रिकी काम करती है।

तो अंततः यह लिख कर रख लीजिए कि जब तक भारत में कला, संगीत, पत्रकारिता और सृजन के आयामों में स्वर्ण द्विजों और ब्राह्मणवादियों का कब्जा है तब तक साहित्य, गीत, संगीत, सिनेमा पत्रकारिता और खेल भी आम भारतीय के विरोध में ही काम करेंगे। जैसे भक्तिकाल और नायिका विमर्श को मार्क्स ने टक्कर दी थी उसी तरह संस्कृति और धर्म के विमर्श को अब अंबेडकर टक्कर दे रहे हैं। मार्क्स से बहुत कुछ सीखा है इस मुल्क ने, अब अंबेडकर से सीखने की जरूरत है। तभी भारत सच में सृजनशील और सभ्य बन सकेगा।

 

 

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