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खिड़की से झांकते ये वृक्ष, क्या कहीं बिछुड़ गए मीत हैं?

संजय जोठे


खिड़की से झांकते ये वृक्ष
क्या कहीं बिछुड़ गए मीत हैं?

उनकी ऊँचाइयों पे इठलाती
अनगिनत कोपलों पर रचा आश्वासन
एक दमकती हुई हरियाली लिए
इन बेनूर सी आँखों में
अकारण ही चमकने लगता है

उनकी टहनियों पर झूमती
पगली सी गिलहरियों का नृत्य
उनकी अठखेलियों का ज्वार लिए
इन जड़ हो चुके पैरों में
अकारण ही मचलने लगता है

उन पर पात-पात फुदकती
बैचेन सी गौरैया का गीत
अपने अंतर की वीणा लिए
इन बद्ध हो चुके कानों में
अकारण ही गूंजने लगता है

क्या हर टहनी, हर पात और गौरैया में
मेरे ही प्राणों के स्पंदन नहीं छिपे हैं?
क्या मुझमे उनकी जिजीविषा
और उनमे मेरे स्वप्न नहीं छिपे हैं?

मेरी इन धमनियों में तड़पता उनका जीवन
और उनकी ऊंचाइयों में आकाश छूते मेरे स्वप्न
क्या सहोदर सहयात्री नहीं हैं?

एक से उद्गम से चले
एक से गन्तव्य की तरफ
एक ही पाथेय लिए

फिर हर बार हर मोड़ पर मैं
उनमे खुद को और खुद में उनको खोजता हूँ
उन्ही के गीतों और नृत्यों से ताल मिलाते हुए
हर गीत में अपनी ही आवाज खोजते हुए
हर नृत्य में अपनी ही छवि गढ़ते हुए

और अंत मेंअपने ही नवांकुरों का स्वप्न लिए
उनकी जड़ों में लिपटी मिट्टी तक लौटता हूँ

उनमे विश्राम पाकर
सारे गीत, नृत्य और स्वप्न
उन्हें सौंप जाता हूँ …

 

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