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भारतीय समाज में इंसानों की ही नहीं बल्कि ज्ञान के विषयों की भी जाति व्यवस्था है और इनके बीच में अंतर्जातीय विवाह (इंटेरडीसीप्लिनरिटी) असंभव बना दी गयी है

संजय जोठे


यूरोपीय और अमरीकी विश्वविद्यालयों (सभी नहीं) में और विशेष रूप से वहां के समाज में एक ख़ास प्रवृत्ति है। वहां छात्र छात्राएं गणित के साथ मनोविज्ञान या साहित्य भी पढ़ सकते हैं। आर्ट्स, साइंस, मेडिसिन, ह्यूमेनिटीज, मैनेजमेंट आदि के बीच कोई जाति व्यवस्था नहीं है। उनमें मेलजोल और "अंतर्जातीय विवाह" जैसे "अवैध" संबन्ध तेजी से बनते हैं। भारत के लिए ये 'अवैध' संबन्ध हैं जिनसे " नीच वर्ण संकर" जन्मते हैं। विभिन्न विषयों के मेलजोल को यूरोप में "इंटेरडीसीप्लिनरिटी" कहते हैं और इन से जन्मे वर्णसंकर को "इनोवेशन" कहते हैं। लेकिन भारत में ये सब पाप है। इसीलिये भारत सड़ रहा है।

यूरोपीय समाज में जीवन यापन के लिए जितना जरूरी है उतना सीखने के बाद भी उनकी सीखने की क्षमता पर विराम नहीं आता। वे बचपन से बुढ़ापे तक सीखते ही जाते है। 'स्वामी' विवेकानन्द जब यूरोप प्रवास पर थे तब उन्होंने एक बूढ़े जर्मन को चाइनीज भाषा सीखने की कोशिश करते पाया था, विवेकानन्द ने एक आम भारतीय की तरह पूछा कि इस कठिन भाषा को आप कितने वर्षों में सीखकर क्या लाभ ले सकेंगे? उस बूढ़े व्यक्ति ने विवेकानन्द को देखकर कहा था कि अगर तुम एक युवा होकर भी ऐसे सवाल पूछते हो तो मैं दावे से कह सकता हूँ कि तुम्हारा मुल्क और समाज अन्धकार में सड़ रहा होगा।

उस व्यक्ति की बात कितनी सही है न? विवेकानन्द जैसे 'शरीर से युवा' भारतीय व्यक्ति भी मन से कितने बूढ़े हो सकते हैं, वे सच में भारत के सच्चे प्रतिनिधि थे। भारत की सारी समस्याएं उनके व्यक्तिगत रुझानों और मनोविज्ञान सहित उनके प्रश्न-उत्तरों में साफ़ झलकती हैं।

खैर, तो यूरोपीय समाज में आजीविका से परे भी ज्ञान की खोज चलती है। लेकिन "धर्म अर्थ काम मोक्ष" की दिव्य युति का दावा करने वाला भारतीय समाज शिक्षा, पठन-पाठन और स्वस्थ बहसों पर हजारों साल से ताला लगाकर बैठा है। 'अर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन' सिर्फ समाज के एयरटाइट कम्पार्टमेंट्स में अलग अलग लेयर्स ने ही होते हैं और इन कम्पार्टमेंट्स और लेयर्स में आपस में कोई संवाद नहीं होता। इसीलिये एक गांव या राज्य के गुलाम बना लिए जाने पर भी "कलेक्टिव आर्ग्युमेंट" से किसी "एक" राजनितिक धार्मिक या सामरिक एकता का जन्म न हो सका और भारत दो हजार साल तक गुलाम रहा।

भारतीय समाज के स्तरों में संवादहीनता आज भी इतनी भयानक है कि एक ही गाँव में एक हैंडपंप या तालाब के सूखने पर सभी ग्रामीणों को एक सा दुःख नहीं होता, कई लोग खुश भी हो सकते हैं। एक ही तालाब पर सबका एक सा अधिकार नहीं है तो एक सी चिंताएं भी क्योंकर होंगी भला? क्या ये सभ्य समाज के लक्षण हैं? क्या भारत सभ्य है?

एक औसत भारतीय ज्ञान से और स्वाध्याय से या अपने सुरक्षित गढ़ से परे जाकर संवाद बनाने से इतना चिढ़ता क्यों है? आजीविका सुरक्षित कर लेने के बाद पड़ता लिखता क्यों नहीं? साइंस का छात्र दर्शन, साहित्य या इतिहास पढता क्यों नहीं?

इसका गहरे से गहरा कारण है कि लंबे समय तक भारतीय मन परम्परागत आजीविका या पेशे से इतना अधिक बंधा हुआ है कि उस सुरक्षा से परे उसे कभी कुछ देखना ही जरूरी नहीं रहा है। वह परे का कुछ देख न सके इसके लिए धर्म और परम्परा ने भारी इंतेजाम किये हैं। आज पश्चिम के प्रभाव से स्थिति थोड़ी बदली है लेकिन भारत के धर्म और उससे जन्मे मनोविज्ञान का सातत्य बहुत अर्थो में अभी भी बना हुआ है। अतीत में एक कुम्हार, लोहार या किसान से यही अपेक्षा की गयी है कि वह अपने हुनर में पारंगत हो और भेषज, साहित्य, दर्शन, राजनीती, धर्म के आयामों में प्रवेश न करे। यही उम्मीद उनसे की गयी है जो धर्म दर्शन राजनीति आदि का "रोजगार" करते आये हैं।

इस तरह इंसानों की ही नहीं बल्कि ज्ञान के विषयों की भी जाति व्यवस्था है और इनके बीच में अंतर्जातीय विवाह (इंटेरडीसीप्लिनरिटी) असंभव बना दी गयी है। इसी वजह से भारतीय धर्मशास्त्री भौतिक या प्राकृतिक विज्ञान से इतने बेखबर होते हैं कि वे पूजा पाठ से ग्रह नक्षत्रों की दिशा बदलने के दावों की बेवकूफी को देख ही नहीं पाते। यही बिमारी फिर पूरे समाज में फ़ैल जाती है। अब ये समाज सड़कर गुलाम हो जाये तो आश्चर्य कैसा?

यूरोप या अमेरिका में ज्ञान के बढ़ने का राज़ क्या है?और भारत में ज्ञान, सभ्यता और संस्कृति के रसातल में पहुंचते जाने का राज़ क्या है? एक ही सूत्र है इसे समझने का, यूरोप में व्यक्तियों और ज्ञान के विषयों में संश्लेषण होता रहता है वहां विषयों और व्यक्तियों में अंतर्जातीय विवाह होते रहे हैं जो भारत में असंभव है। यूरोप में भूगोल पढ़ने वाला व्यक्ति दर्शन भी पढ़ सकता है। गणित या साहित्य के साथ मनोविज्ञान या संगीत भी पढ़ सकता है। लेकिन भारत में ये "शादी नहीं हो सकती" यहां साइंस ब्राह्मण है और आर्ट्स शुद्र है।

अभी अमेरिका के MIT ने विज्ञान के छात्रों के प्रवेश के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि उनके पास मानविकी विषय के किसी प्रोफेसर का अनुशंसा पत्र होना आवश्यक है। मतलब कि क्वांटम मेकेनिक्स या इंजीनियरिंग के शोधार्थी को इतिहास, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, साहित्य आदि में से किसी एक विषय के विद्वान की तरफ से रिकमेंड किया जाना जरूरी है।

कल्पना कीजिये कि भौतिकशास्त्र का जानकार यदि मनोविज्ञान भी समझता है तो उसकी खोज इंसानी समाज के लिए कितनी व्यवहारिक न होगी? वो जो मशीन या तकनीक बनायेगा उसमे इंसानी जरूरतों के उत्तर भी मिल सकेंगे। लेकिन भारतीय ज्ञान परम्परा की सुनें तो इस भौतिशास्त्री को इतिहास, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान को छूना भी पाप है। वो इधर झांकेगा भी नहीं। इसीलिये भारत इनोवेशन नहीं करता सिर्फ यूरोपीय विज्ञानं का सबसे सस्ता भारतीय वर्जन बनाता है। ये खुद रॉकेट नहीं बना सकते लेकिन एक बार यूरोप में रॉकेट बन जाये तो ये सबसे सस्ता मंगल यान बनाकर खड़े हो जाएंगे और वेदों में से पुष्पक विमान लाकर बहस करने लगेंगे। लेकिन इससे इनकी मौलिक बिमारी का कोई इलाज नहीं होता, बल्कि वो बीमारी बढ़ती ही जाती है।

इसीलिये अब "विश्वगुरु" को ईमानदारी से विश्व का शिष्य बनकर कुछ सीखना चाहिए। अब भारतीय बच्चों को समाज की ही नहीं बल्कि सिलेबस की और विषयों की जाति व्यवस्था को भी तोड़ना होगा।

समाज में ही नहीं बल्कि ज्ञान विज्ञानं के विषयो में भी वर्णसंकर पैदा करने होंगे। विज्ञानं ने सिध्द कर दिया है कि वर्णसंकर अधिक प्रतिभाशाली और प्रबल होते हैं। लेकिन सनातनी भारतीय धर्म बुद्धि प्रतिभा की हत्यारी रही है। इस हत्यारी व्यवस्था को विराम लगाना होगा ताकि भारतीय विद्यार्थी भी सभ्य सुसंस्कृत होकर ज्ञान विज्ञान और खेल कूद की दुनिया में अपने को साबित कर सकें, ताकि सवा अरब का ये मुल्क दो चार नोबेल, ऑस्कर और ओलंपिक जीत सके और बार बार काल्पनिक सतयुग के बिल में घुसने की बजाय कलियुग में सम्मान से जीना सीख सके।

 

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