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क्या इस देश में ऐसा कोई है, जिस पर आरोप लगें और वह उन्हें खुले मन से स्वीकार कर ले?

त्रिभुवन


क्या इस देश में ऐसा कोई है, जिस पर आरोप लगें और वह उन्हें खुले मन से स्वीकार कर ले? बीएसएफ के जवान तेज बहादुर ने बाकायदा विडियो डालकर बुरे खाने पर जो प्रश्न उठाए हैं, उन्होंने बीएसएफ के अफ़सरों और केंद्रीय गृह मंत्रालय की उस व्यवस्था के रुपहले झूठ की कलई खोल दी है।

अब बीएसएफ के आईजी और डीआईजी से लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय तक ने खाने-पीने की चीज़ों को दुरुस्त करने के बजाय खुले तौर पर असलियत सामने लाने वाले तेज बहादुर को ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया है। यह भारतीय बलों की अंदरूनी हक़ीक़त है।

बीएसएफ के एक जवान की हूक और तड़प ने पूरी व्यवस्था के भीतरी कोढ़ को सामने ला दिया है। यह सच मैंने सीमा की रिपोर्टिंग करते हुए बहुत नज़दीक से देखा है कि सेना और अर्धसैनिक बलों के आला अफ़सर किन रंगीनियों और रानाइयों में रहते और मौज-मज़ा करते हैं और आम सैनिक किस तरह हाथों को खंजर बनाकर सेना या बीएसएफ के ताज़ को दमकाते हैं।

मैंने स्वयं देखा है कि साधुवाली, सूरतगढ़ और लालगढ़ छावनी से सेना के अधिकारी किस तरह ट्रकों को सुनसान इलाकों में ले जाकर डीजल बेचा करते थे। मैं जिन दिनों एक साप्ताहिक अख़बार निकाला करता था, उन दिन जहां से कागज़ खरीदता था, वहां से सेना के अधिकारी एक पचास पैसे वाले स्कैच पैन को दस रुपए में खरीदने का बिल लिया करते थे। बीएसएफ के बटालियनों में जब कभी किसी कार्यक्रम के लिए गए, अफ़सर माैज-मजा करते थे और सिपाही तेज बहादुर की तरह ही कलपते थे, लेकिन उनकी सुनता कौन है?

आपने बीएसएफ के डीअाईजी मान का तर्क तो सुना ही होगा कि तेज बहादुर निजी कारणों से नाराज है। तेज बहादुर का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। इस देश में जो भी व्यक्ति सच कहता है या किसी ताकतवर संस्था के खिलाफ आवाज़ उठाता है तो उसे पागल ही करार दिया जाता है। इस देश का यही ऐतिहासिक सच है। आप सेना के, सुप्रीम कोर्ट के और प्रधानमंत्री सहित किसी अन्य ताकतवर संस्था के खिलाफ़ कुछ बोलेंगे तो कह दिया जाएगा कि आप अमेरिका के या किसी पाकिस्तान एजेंसी के एजेंट हैं!

तेज बहादुर पागल ही तो है, जिसने यह जानते हुए कि उसका और उस जैसे लाखों जवानों का हर रोज़ जिन चंगेज़ों और नादिरशाहों से वास्ता पड़ता है, वे हेलिकॉप्टरों और युद्धक विमानों की खरीद का सौदा करते हुए तीन-चार सौ करोड़ रुपए से यों ही गिफ्ट में कमा लेते हैं। ऐसे लोगों के पास किसी तेज बहादुर की दाल का पानी मापने और उसमें कितने दाने हैं, यह गिनने की भला फ़ुर्सत होगी? तेज बहादुर पागल नहीं तो क्या है, जो यह जानते बूझतेऔर देखते हुए एक विडियो वायरल करता है कि उसका सामना कितने ही सुल्ताने-ज़ाबिर से हर रोज़ होगा।

तेज बहादुर तो बीएसएफ का जवान है और वह जब बीएसएफ के अफ़सरों पर प्रश्न भर उठाता है। बीएसएफ के आला अफ़सर उसे मनोरोगी भी साबित कर सकते हैं, लेकिन उस मीडिया को क्या कहेंगे, जिसमें सुधीर चौधरी जैसे वज्रमूर्ख और सरेआम भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे लोग ऐसे राजनीतिक दलों को पाकिस्तानी एजेंट घोषित करने लगते हैं, जो केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री के खि़लाफ़ एक होने का संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार रखते हैं।

ऐसा ही दौर 1975 से 1977 के दौरान आया था जब इंदिरा इज़ इंडिया और इंडिया इज़ इंदिरा का नारा सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़े सुधीर चौधरी लगाया करते थे। भारत में सुलतानों से मुहब्बत का दौर आज का नहीं है। यह बहुत पुराना रोग है। सुलतानों के इश्क में पागल हुए लोग ऐसे होते हैं, जो स्वतंत्रता के नूर और अभिव्यक्तियों के चंद्रमा को फेंककर सुलतान के जूते झाड़ने में फ़ख़्र महसूस करते हैं।

अब तो क्या मीडिया और क्या सेना, सभी एक ही धारा में बह रहे हैं। क्या संत और क्या मतिमंत। भारत में कभी एक दौर था जब कुंभनदास जैसे संत हुए थे। जिस समय बड़े बड़े राजे-महाराजे अक़बर बादशाह के दरबार में हाजिर हो चुके थे तो कुंभनदास को अक़बर बादशाह ने अपनी राजधानी सीकरी में बुलाया और एक पद सुनाने को कहा तो बाबा कुंभनदास ने टिकट या सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मांगी। वे बोले : ‘संतन को कहा सिकरी सो काम। आवत जात पनहियाँ टूटी। बिसरि गयो हरि नाम। जिनको मुख देखे दु:ख उपजत। तिनको करिबे परी सलाम!’ अरे ओ अक़बर बादहशाह, मुझ संत को तेरी सीकरी से क्या लेना देना।यहां आया और यहां से पैदल जाऊंगा, क्योंकि मैं हाथी घोड़े तो चढ़ता नहीं, मेरी पन्हैयां यानी जूतियां टूट गई हैं। जो आने-जाने में देर हुई, उतने समय में मैं ईश्वर चिंतन करता। और बादशाह की तो शक्ल देखकर तो दिन खराब हो जाता है और देख मेरा दुर्भाग्य कि तुझे सलाम करना पड़ रहा है। और एक आज के संत हैं। निकृष्टता और पतन के चरम पर।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण से लेकर आम आदमी तक जब इंदिरा सरकार के लौहावरण के खिलाफ जनयुद्ध में उतरा तो सत्ता प्रतिष्ठानों ने उन सबको विदेशी शक्तियों के इशारे पर काम करने वाला घोषित करके जेलों में डाल दिया। ये आरोप कम्युनिस्टों के एक खेमे पर भी लगे और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं पर भी। ये आरोप भारतीय जनता पार्टी के पुराने संस्करण भारतीय जन संघ पर भी मंढे़ गए और लोहियावादियों-समाजवादियों पर भी। इंदिरा गांधी और उनके मूर्ख और आत्मघाती प्रशंसकों ने विरोधियों को क्या-क्या नहीं कहा। लेकिन अफ़सोस आज नरेंद्र मोदी के भक्त और राष्ट्रीय स्वयं सेवक के अनुयायी उस इंदिरा मार्ग का अनुसरण बड़े गर्व से कर रहे हैं।आज उन्हें उन अंधेरों में नूर ही नूर नज़र आ रहा है, जिनके लिए वे कभी जेल गए थे।

लिहाजा, बीएसएफ के जिस साहसी जवान ने विडियो डालकर जिस सच को देश के सामने ला दिया है, वह बीएसएफ ही नहीं, केंद्रीय गृह मंत्रालय तक को पच नहीं रहा है। बेहतर ये है कि बीएसएफ और गृह मंत्रालय सेना और बीएसएफ के जवानों की जमीनी खबर ले और सच को सच माने। ऐसे साहसी सैनिक को दंडित करने के बजाय भ्रष्टाचार से सड़ती व्यवस्था को दुरुस्त करे। यह ऐसा ही समय है जब सेना के अफ़सरों के खिलाफ जवानों को अपनी बात रखने का हक़ और अधिकार हो और सुप्रीम कोर्ट अपनी पवित्रता से बाहर आकर आंख में आंख डालने का साहस करे। क्या इस बहादुर देश को सवालों से डरा हुआ सुप्रीम कोर्ट चाहिए? क्या इस देश को ऐसी सेना चाहिए, जो प्रश्नों से डरे? अब समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट साहस दिखाए और कंटेप्ट ऑव कोर्ट जैसे दकियानूसी, अलोकतांत्रिक और बेसिरपैर के कानून को अब तिरोहित कर दे। अब तूफ़ाने तरब का वक्त गया सत्ता की शक्तियो!

पवित्रता यही है कि पवित्रता के अलावा कुछ भी पवित्र नहीं है। न सेना, न अर्धसेना, न प्रधानमंत्री, न राष्ट्रपति, न सुप्रीम कोर्ट और न प्रभु स्वयं। अब वह दौर बीत चुका है जब सेना, अदालतें और बादशाहतें खलीफा थीं। अब खलीफा है तो वह जनता है। लोक है। इस लोक से ऊपर कुछ नहीं है। आप जिस लोक के लिए हैं, आप जिस जनता के लिए हैं, आप जिस नागरिक के लिए हैं, उसे यह अधिकार है कि वह आप पर सवाल उठाए। सवालों से बचने की कोशिश करेंगे तो किसी से नहीं बच पाएंगे। जो सवाल से बचने की कोशिश करेगा, वह भ्रष्ट ही होगा। वह निकृष्ट ही होगा। तेज बहादुर ने अर्ध सैनिक बल की रसाेई की बदहाली का सवाल उठाया है, लेकिन यह सवाल बता रहा है कि देश और व्यवस्था के चूल्हे पर ज़ुल्म, झूठ और निकृष्ट पतन किस तरह पक रहे हैं। मैं बहादुर जवान तेज बहादुर के साहस को प्रणाम करता हूं। वह ज़ुल्मत-कदे में शम्म-ए-फ़रोज़ां लेकर दाखिल हुआ एक साहसी व्यक्ति है। हमें उसके साहस के साथ खड़ा होना चाहिए।


credits : Tribhuvan's facebook wall

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