एक लंबी कविता

आलोक नंदन


झाड़ियों में उगती है,
कंटीली झाड़ियों में
और उनके संग खुद भी
कंटीली हो जाती है
चुभे तो लहू टपक पड़े,
ऐसी है
लंबी कविता।

धरती के कोख में उस
जगह पलती है
जहां होता है
पानी का अभाव ।

पुस की रात में
सड़क पर
ठिठुरते हुये
बुढ़े के नींद में ऊंघती है
लंबी कविता !

गंगा की मौजों पर
सुबह कि सुर्खीली किरणों
के फैलाव में अटखेलियां करती है
लंबी कविता

दुल्हन के अंग-प्रत्यंग पर
सोलहों श्रृंगार में
लजाती, सकुजाती
और कसमसाती है
लंबी कविता

सेल में बंद
किसी कैदी की बेड़ियों की
खनखनाहट में
आजादी के नगमें सुनाती है
लंबी कविता।

ध्यानमग्न साधक की बंद आंखों के बीच
रश्मियों की तरह नजर आती है
लंबी कविता।

लंबी कविता उगती है
बढ़ती है
और फैलती है
अमरलता मानिंद।

मंत्रों व आयातों में
उतरती है लंबी कविता।

सुकरात, अरस्तु और मार्क्स की
दाढ़ियों में
युगों-युगो तक बढ़ती है
लंबी कविता।

पहली बारिश के बाद
धरती की मटैली सोंधी महक बन कर
सांसों में घुल जाती है
लंबी कविता।

 

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