मेरे प्रिय मुख्यमंत्री : नृपेन दा

P. K. Siddharth

राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल
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1981 में मेरी नियुक्ति भारतीय पुलिस सेवा में हुई. प्रशिक्षण के बाद मुझे त्रिपुरा काडर मिला जहां एक वामपंथी सरकार थी और उसके शीर्ष पर थे एक 78 वर्षीय मुख्यमंत्री श्री नृपेन चक्रवर्ती

Late Nirpen Chakraborty

मैंने सब डिविजनल पुलिस ऑफिसर के तौर पर अपना काम शुरू किया, लेकिन मुझे इस बात का जरा भी एहसास नहीं था कि मैं जिस मुख्यमंत्री के अधीन काम कर रहा था वह न केवल देश के बल्कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ राजनेताओं में से एक था, और सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्रियों में से भी एक। मुझे भी इसका भी ज़रा भी भान नहीं था कि यह एक व्यक्ति मेरे जीवन को आकार देने में अप्रत्यक्ष रुप से एक बड़ी भूमिका अदा करेगा। मुझे राजनीति की कोई समझ नहीं थी, सिर्फ प्रशासकीय बुद्धि थी। मगर आने वाले दिनों में टुकड़ों-टुकड़ों में मैंने इस महान व्यक्तित्व से सीखना शुरू किया।

त्रिपुरा एक छोटा-सा राज्य है, उस समय जिसकी जान-संख्या थी केवल 28 लाख। पश्चिम बंगाल के एक बड़-से जिले के बराबर था। अपने प्रशासकीय उत्साह में एक दिन मैंने अधीनस्थों को आदेश दिया कि एक सड़क के किनारे जो छोटी दुकानें और गुमटियां लगी थीं, उन्हें हटा दिया जाए। हुक्म तामील हुई। एक हफ्ते के बाद मुख्यमंत्री का कार्यक्रम मेरे क्षेत्र में था। जाहिर है कि मुझे उपस्थित रहना था, सो हुआ।  नृपेन दा ने मुझे बुलाया और हल्के से मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा। केमोन आछेन?’,  उन्होंने मुझसे पूछा। मैंने कहा, ‘भालो आछी। उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरी मासिक तनख्वाह क्या थी। मैंने कहा 1200 रुपए। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मुझे पता है कि जिन छोटी दुकानों को मैंने उजाड़ दिया, उन  दुकान चलाने वालों की मासिक आय क्या थी? मैं हतप्रभ हुआ! मैंने कहा, ‘नहीं

नृपेंद्र दा ने मुझे धीमे स्वर में समझाया ताकि आस-पास के लोग सुन न पाएं। उन्होंने कहा, ‘आपने कानून लागू कर बड़ा अच्छा किया, लेकिन एक बात याद रखिएगा। हम इन्हें रोजगार नहीं दे सकते तो जो रोजगार वह अपने लिए स्वयं जुटा रहे हैं, क्या हमें उसे नष्ट कर देना चाहिए? यह प्रश्न पूछ कर वे आगे बढ़ गए। मैं पीछे ठिठक कर खड़ा रह गया। अगले कई दिनों तक नृपेन दा की बातों ने मेरी नींद में हलचल पैदा की, और तभी अंकुरित हुई मेरे ह्रदय में गरीब के लिए करुणा, जो तब तक मेरे धर्मग्रंथ भी मेरे अंदर अंकुरित नहीं कर पाए थे। मैंने उसके बाद के प्रशासकीय जीवन में दुकानें सिर्फ उन्हीं जगहों से हटवाईं जहाँ वे ट्रैफिक को गंभीर रूप से बाधित करती थीं। उन्हें भी वैकल्पिक व्यवस्था प्रदान करने की कोशिश की।

मुख्यमंत्री जब मेरे क्षेत्र से गुजरते थे तो नियम के अनुसार मैं अपने अनुमंडल की सीमा पर पुलिस बल के साथ उनकी अगवाई करने के लिए खड़ा होता था। मैंने लक्ष्य करना शुरू किया कि मैं अपनी घड़ी उनके मूवमेंट के हिसाब से ठीक कर सकता थाक्योंकि वे कभी एक मिनट भी लेट नहीं होते थे। इस मामले में तो उन्होंने बिना एक शब्द कहे अपना संदेश सदा के लिए छोड़ दिया।

जब मैं एस पी बना दो तो कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े पुलिस अधिकारी यूनियन के एक अनुशासहीन सब-इंस्पेक्टर को विभागीय कार्रवाई कर नौकरी से बर्खास्त कर दिया। परिणाम वही हुआ जो होता है। 8महीने में मेरा तबादला सीपीएम पार्टी के दबाव में नृपेन दा को करना पड़ा। उनका कद बहुत बड़ा था लेकिन वे पार्टी से बड़े नहीं थे। मेरे स्थानांतरण के पहले वे  मेरे जिले में आए, मुझे डिनर पर बुलाया, और दार्शनिक बातें कीं।  मुझे तब तक नहीं पता था कि वे इतने पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। मुझे उस दिन समझ में नहीं आया दर्शनशास्त्र और राजनीति शास्त्र के प्रसंग वे क्यों उठा रहे थे। लेकिन जब स्थानांतरण का आदेश मेरे हाथ में दो-चार दिनों के बाद आया तब मेरी समझ में कुछ बात आई। राजनीति में रहने वाले एक महापुरुष को भी कभी-कभी समझौते करने पड़ते हैं। उनके लिए मेरा स्थानांतरण एक समझौता था। अपनी पार्टी के साथ।

जब तक नृपेन दा मुख्यमंत्री रहे, उन्होंने एयर-कंडिशनर का प्रयोग नहीं किया। उनके चेंबर में एक सीलिंग फैन और एक पेडस्टल फैन रहा करते थे। जब मुख्यमंत्री ए सी का प्रयोग नहीं कर रहा हो तो मंत्री कैसे करतेचीफ सेक्रेटरी और डी जी पी कैसे करते? और जब चीफ सेक्रेटरी और डी जी पी नहीं लगाते तो कलेक्टर और एस पी  कैसे लगाते? कुछ ऐसी संस्कृति बनाकर रखी उन्होंने त्रिपुरा में। बाद में जब कांग्रेस की सरकार सत्ता में आई तब हर मंत्री और हर अधिकारी के चेंबर में एयर-कंडीशनर की बहारआई।

एक बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु महोदय त्रिपुरा आए। उन्होंने इच्छा जाहिर की कि वे सर्किट हाउस में नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री- निवास में रुकेंगे। ऐसा ही हुआ। सुबह-सुबह ज्योति बसु महोदय बाथरूम में स्नान करने गए तो उन्होंने टॉवेल की मांग की। उन्हें टॉवेल की जगह गमछादिया गया – वही लाल गमछा जो आप मजदूर के कंधे पर पाते हैं। अब भला ज्योति बाबू उस गमछे से कैसे शरीर कैसे पोछते? ‘भद्र लोगथे! उन्होंने गमछा लेने से मना कर दिया!  तुरंत प्रशासन हरकत में आ गया, और गाड़ी सर्किट हाउस में भेज कर वहां से ज्योति बाबू के लिए टॉवल की व्यवस्था की गई। ऐसे सरल व्यक्ति से हमारे नृपेन दा!

1978 से 1988 तक दस वर्षों तक लगातार त्रिपुरा के मुख्यमंत्री रहने के बाद एक दिन आया जब वही हुआ जो एक लोकतंत्र में होता है। जनता ने परिवर्तन की मांग की, और कांग्रेस सत्ता में आ गई। नृपेन दा मुख्यमंत्री नहीं रहे। जब इस अविवाहित मुख्य मंत्री ने अपना सरकारी निवास छोड़ा तो सरकारी गाड़ी में नहीं छोड़ा। एक रिक्शे पर दो संदुकें रखीं और सौ रूपए किराए वाले एक कमरे में चले गए। एक संदूक में उनके कपड़े थे और दूसरे संदूक में उनकी किताबें! उनके पास और कुछ नहीं था!

 

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